आयुर्वेद क्यों जरूरी है?

आयुर्वेद जरूरी है

आयुर्वेद जरूरी है

आयुर्वेद से हमारा सदियों से नाता रहा है। लेकिन आधुनिकता की चादर इतनी बड़ी होती गयी है कि इस परंपरागत ज्ञान को हम भूल-से गए हैं…इसी ज्ञान की ओर आप देशवासियों को पुनः लौटाने का प्रयास www.swasthbharat.in कर रहा है. इस कड़ी में आपको आयुर्वेद से परिचय करा रहे हैं देश के जाने में आयुर्वेदाचार्य डॉ सोम जी…इसे हम क्रमवार चलाएंगे…सबसे पहले यह चर्चा कर लें की आयुर्वेद की जरूरत क्यों है…. (संपादक)

आयुर्वेद विश्व ही नहीं इस भूमण्डल का सर्वप्रथम स्वास्थ्य एंव रोग निवारण के ज्ञान का प्रदाता है। वैसे तो यह ज्ञान प्रकृति की उत्पत्ति के साथ ही उत्पन्न हुआ, लेकिन इसका नामकरण भगवान धन्वन्तरि जी द्वारा किया गया। भगवान धन्वन्तरि ने चिकित्सा को दो भागों में विभक्त किया। 1 औषधि चिकित्सा और 2 शल्य चिकित्सा। वैसे तो आयुर्वेद का ज्ञान बहुत ही विशाल है। चूंकि इसमे ही ऐसी प्रणाली का ज्ञान है जो मानव को निरोगी रहते हुए स्वस्थ लम्बी आयु तक जीवित रहने की लिये मार्ग प्रशस्त कराता है ताकि प्राणी सारी उम्र सुख शान्ति व निरोगी रहकर लम्बे समय तक अपना जीवन यापन कर सके। मानव हित व अहित किसमे है, का ज्ञान कराता हैं यह पांचवां वेद है। पांचो वेदो में सर्वप्रथम यही है जो प्राणी के स्वास्थ्य की रक्षा करने की कला का ज्ञान कराता है। आयुर्वेद मे जड़ी बूटी भस्म तन्त्र मन्त्र यन्त्र ज्योतिष आदि को दर्शाता है। ये इसके शरीर के ही अंग या अवयव है। आयुर्वेद पर इतना अधिक शोध हो चुका है कि अब इसकी परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसा कोई रोग नही है जिसको आयुर्वेद ने न दर्शाया हो। यहां तक कि कैन्सर एंव एड्स जैसे भयानक रोगों के विषय मे भी विस्तार से ज्ञान एवं उपचार की प्रक्रिया को बताया है। मिरगी दौरे जैसे असामान्य जाने जाते रोग की इसमे सफल चिकित्सा का ज्ञान कराया गया है।
आयुः कामयमानेन धर्मार्थ सुखसाधनम्
आयुर्वेदो देशेषु विधेय परमादरः।।

अर्थात् धर्म, अर्थ एंव काम नामक पुरूषार्थों का साधन आयु ही है। अतः आयु की कामना करने वाले को आयुर्वेद के प्रति सत्य निष्ठा रखते हुए इसके उपदेशों का पालन करना नितान्तावश्यक है।
इस पृथ्वी की रचना के साथ ही ब्रह्मा जी ने प्राणियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिये जड़ी बूटियों के रूप मे आयुर्वेद के ज्ञान को प्रसारित किया। ताकि उनके बनाये प्राणियो में स्वस्थता बनी रहे। वैसे तो चारों वेद अनन्त काल से हैं। लेकिन मेरा मानना यह है कि इन चारो वेदों से भी पूर्व आयुर्वेद स्थापित हुआ और कुछ समय पश्चात् आवश्यकता के अनुसार प्रकाण्ड विद्वानों ने अपने अपने अनुसन्धान के माध्यम से आयुर्वेद को आठ भागों मे विभक्त कर दिया। जैसे 1-काय चिकित्सा,2-बाल तन्त्र, 3-भूत विद्या,4-शल्य चिकित्सा,5-स्पर्श चिकित्सा,6- मंत्र चिकित्सा,
7-रसायन तंत्र (आयुवर्धक एंव निरोगी शरीर का ज्ञान) और बाजीकरण चिकित्सा।

वास्तव मे जितनी भी पाश्चात्य चिकित्साएं हैं ये सारी की सारी निकली इसी से हैं, सभी चिकित्सा पद्धतियों की जननी आयुर्वेद ही है। नाड़ी ज्ञान केवल आयुर्वेद की ही देन है। जो कि वैद्य रोगी की नाड़ी को पकड़ कर ही उसके शरीर के अन्दर व्याप्त रोगो का वर्णन कर देता है। चिकित्सा का प्रयोजन रोगी को रोग से शान्ति दिलाना है। परन्तु आयुर्वेद कहता है कि रोगी को रोग से शान्ति तो होनी ही चाहिये साथ ही स्वस्थ्य प्राणी के स्वास्थ्य की रक्षा भी कैसे की जाये इसका ज्ञान भी आयुर्वेद कराता है। ताकि प्राणी जीवन पर्यन्त निरोगी रह कर आनन्द पूर्व मस्त जीवन बिता सके।
यह बात अवश्य ध्यान मे लावें कि जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उन सभी मे से आयुर्वेद ही यह ज्ञान देता है कि यदि आयु है तो उसकी रक्षा, संवर्धन, संरक्षण पूर्वक रहकर आनन्दपूर्वक जीवन कैसे बिताया जाये।
इसीलिये आयुर्वेद का ज्ञान तथा आयुर्वेद दवाओं की उपयोगिता अति आवश्यक है।
इति!

संपर्क- डॉ सोम जी से आप 09411109348 संपर्क कर सकते हैं।

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