SBA विशेष आयुष

ब्रेथवर्क : सुंदर सांसों की कला

कन्या राशि की होने के नाते लोगो से भावनात्मक तल पर जुड़ने का मेरा स्वभाव है और लोगो की समस्याएं सुनने और जानने और उनका समाधान निकालना मेरे काम का ही नही मेरे होने का भी ढंग है.यह सब अनुभव करते करते मैंने जाना प्रत्येक व्यक्ति के अपने संकोच, तनाव, कठोर विचारधाराएं और डर होते है जो उन्हें शांत नही होने देते. इसके चलते शरीर के कुछ अंगों में तकलीफ भी होती है. पेट से लेकर आँखों की तकलीफ तक सब कुछ उन्हीं मनोस्थिति का परिणाम है जिनके साथ हम रात – दिन और कहना चाहिए उम्रः भर रहते है. इसका सबसे बड़ा कारण है हमारा, हमारी साँसों के साथ लयबद्ध न होना.

अपनी साँसों को महसूस करना, गहरी और लम्बी सांस लेना, सांस के केंद्र ‘नाभि ‘ से जुड़ना, सांस को लयबद्ध रखना. इसी को मै ‘ब्रेथवर्क ‘ या सुंदरता से सांस लेने की कला कहती हूँ.

मेरी योग कक्षाओ में लोग विभिन्न समस्याओं और विभिन्न मनोदशाओं के साथ प्रवेश करते है और जब मैं उनसे कहती हूं कि आपको अपनी सांस लेने का तरीका बदलना होगा या सही तरीके से सांस लीजिये और आप ठीक हो जाएंगे, तो अधिकांश लोग मुझे अचरज से देखते है. पहली बार में यह उन्हें विश्वास करने योग्य नही लगता परन्तु उनका इस तरीके को सिखने के लिए दर्शाया गया नजरिया ही मुझे उनके स्वभाव की आधी जानकारी दे चुका होता है.

दरअसल जब हम साँसों पर प्रयोग करते है तो हमे न सिर्फ प्राणायाम, ब्रीथिंग एक्सरसाइज या राइट ब्रीथिंग ही नही सीखनी होती है, हमे अपने मनोस्थिति को आमने – सामने देखने का हौसला भी दिखाना होता है. हमे अपने भय और संकोचों को हटाने से पहले उन्हें देखना और स्वीकार करना होता है , जो कि नकारात्मक ऊर्जा से घिरे व्यक्ति के लिए आसान काम नही है. ब्रेथवर्क से जुड़े प्रयोगों के लिए दूसरी अनिवार्य शर्त होती है…वर्तमान में प्रवेश करने की. सुन्दर साँसों के प्रयोग कल्पनाओं या तर्को के साथ संभव नही है. इन्हें अभी और यहाँ रह कर ही किया जा सकता है. यह आपको तत्क्षण अतीत और भविष्य से निकाल कर वर्तमान में खड़ा कर देते है. हमारा स्वाभाविक संस्कार यह होता है की हम अपनी परेशानियों को अतीत का परिणाम मानते है और जब यह ख्याल छोड़ना पड़ता है तो तकलीफ होती है. क्यों ?…क्योंकि उसी समय हमे अपनी समस्याओं की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है.कुल मिला कर ब्रेथवर्क के प्रयोगों को प्रारम्भ करने के साथ ही हम अपने ऊपर बहुत सारा मनोवैज्ञानिक कार्य कर चुके होते है. इन प्रयोगों के साथ हमें अद्भुत अनुभव मिलते हैं क्योंकि तब हम अपनी शरीर की ऊर्जा को नई दिशा देने के लिए उनसे जुड़ते है. यक़ीन मानिए जब मेरे सामने कोई व्यक्ति पहली बार अपनी साँसों के साथ सम्बन्ध स्थापित कर खुश होता है तो मेरा सुकून भी असीम होता है.

क्या इस बात में कोई शंका है की जो लोग अधिक श्वास लेते है उनके  मस्तिष्क को अधिक ऑक्सीजन मिलती है और जिस मस्तिष्क को अधिक ऑक्सीजन मिलती है उनकी कार्य क्षमता दूसरों की अपेक्षा अधिक होती है. मस्तिष्क की कार्य क्षमता न सिर्फ हमारी बौद्धिक विकास बल्कि हमारी सर्जनात्मकता, हमारे बोध, हमारे विवेक और हमारी संवेदनशीलता और यहां तक की हमारे शरीर की ताकत को भी निर्धारित करती है.

सांस का एक प्रयोग 

पंद्रह मिनट का यह प्रयोग गहन विश्रांति और मौन के भाव को बड़ा कर देता है. आरामदायक स्थिति में बैठ कर गहरी सांस बाहर छोड़ो और सांस छोड़ते समय आँखे बंद रखो और अंदर जो खाली स्थान निर्मित हुआ है उसमें प्रवेश करो. अब शरीर को स्वयं सांस लेने दो और इस वक्त आँखे खोले और बाहर जाएं. यह छोटा सा प्रयोग  ‘ध्यान’ के लिए बहुत अच्छी पृष्ठभूमि बनाता है.

सांस लेने का सही तरीका

ब्रेथवर्क के प्रयोगो के लिए हमे सही तरीके से सांस लेना आना चाहिए. हममें से अधिकांश लोग गलत तरीके से सांस लेने की आदत निर्मित कर चुके है परन्तु कुछ दिन के जागरूक प्रयास से हम सही सांस ले सकते है. सबसे पहले गहरी धीमी सांस नाभि तक लें और पेट अंदर होने वाली हलचल पर गौर करें. सही सांस लेने की स्थिति में हमारा डायफ्राम नीचे पेट की ओर गति करता है और इससे छाती में एक वैक्यूम बनता है और जितना वैक्यूम बनेगा उस मात्र में ऑक्सीजन हमारे शरीर में प्रवेश करेगी और जब सांस बाहर निकलती है तो यह डायफ्राम पुनः अपनी स्थिति में आ जाता है. डायफ्राम के नीचे गति करने की क्रिया से न सिर्फ पेट के अंगो में प्राण वायु का संचार होता है बल्कि पेट के अंगो की प्राकृतिक मालिश भी होती है, जो की पाचन तंत्र से जुडी सभी ग्रंथियों और अंगो को स्वस्थ रखती है.

डायफ्राम की शक्ति को बढ़ाने का प्रयोग

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की गहरी सांस लेने पर डायफ्राम अपने स्थान से 15 से. मी. पेट की ओर गति करने की क्षमता रखता है. बीजिंग यूनिवर्सिटी में इसे नापने के लिए वर्षो से ताइ ची एवं ची कुंग (चाइनीज योग) कर रहे दस गुरुओं पर अध्ययन किया गया. इस अध्ययन में आये आकड़ों का औसत निकला 13.5 से. मी. देखा जाए तो यह आश्चर्यजनक प्रमाण है क्योंकि हमारी डायफ्राम मात्र 5-6 से. मी. नीचे खिसकती है और तनाव की स्थिति हो तो यह मात्र 1 या 2 से. मी. नीचे जाती है. डायफ्राम की शक्ति को बढ़ाने के लिए एक भरपूर गहरी सांस ले, उसे रोक ले. अब बिना सांस बाहर छोड़े एक छोटी सांस ले और सांस को रोके रखे. जितनी देर आप सांस रोक सकते है डायफ्राम उतना शक्तिशाली है. यह प्रयोग खाली पेट करें.

ताओ की प्राण साधना

1 -सांस को धीरे धीरे नाभि पर ले जाना.

2 -सांस को छोड़ने पर ज्यादा ध्यान देना.

3-सांस के आने जाने को पृथक न समझे.

प्राण के साथ एक हो जाएं

सांस का जो प्राथमिक स्रोत है, जापानी भाषा में उसके लिए एक शब्द है. वह शब्द है ‘तांदेन ‘. नाभि से 2 इंच नीचे, इस बिंदु से सांस का सम्बन्ध होता है और जितना तनावग्रस्त व्यक्ति होगा, तांदेन से सांस का बिंदु उतना ही दूर हटता जाता है.

उक्त सभी प्रयोग हमें सहजता और कोमलता से सांस लेना सिखाते है. यह प्रयोग हमे हमारी साँसों से ही जोड़ने का काम करते है. इसके अभ्यास के बाद हम प्राकृतिक रूप से सुन्दर सांस लेने की योग्यता पा लेते है और तब हमें किसी भी विधि को पकड़े रहने की आवश्यकता नही है.आखिर में एक छोटी सी दुआ…मेरे मौला हर जिंदा आदमीं को मिले मनमुताबिक साँसे…

लेखक परिचयः इरा सिंह

इरा सिंह योग शिक्षक हैं। देश की जानी-मानी पत्र-पत्रिकाओं में इनके मनोविश्लेषनात्मक लेख प्रकाशित होते रहते हैं…

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