अस्पताल समाचार

संसदीय समिति ने लगाई स्वास्थ्य मंत्रालय को फटकार

निजी पूंजी से एम्स में शोध न करने की संसदीय समिति की सिफारिश

संसदीय  समिति ने कहा है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय महत्व के केंद्र एम्स में शोध को सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर संसाधन मुहैया कराए ताकि किसी कंपनी के निजी हित के बजाय जनहित व लोक कल्याणकारी शोध को बढ़ावा दिया जा सके।

 
प्रतिभा शुक्ल की रपट

निजी पूंजी का इस्तेमाल शोध में न हो...एम्स व स्वास्थ मंत्रालय को मिली हिदायत
निजी पूंजी का इस्तेमाल शोध में न हो…एम्स व स्वास्थ मंत्रालय को मिली हिदायत

नई दिल्ली/ देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के सबसे बड़े केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ( एम्स ) में दवा कंपनियों या निजी क्षेत्र के पूंजी से शोध व विकास का काम बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। इस मामले में हमें अमेरिका या दूसरे पश्चिमी देशों का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। यह कहते हुए स्वास्थ्य पर बनी स्थाई संसदीय समिति ने डॉ. वेलियाथन समिति की रपट व सिफारिशों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। एम्स के सुधार के लिए बनी वेलियाथन समिति ने उद्योग व दवा कंपनियों के हिसाब से शोध की प्रमुखता से सिफारिश की थी। इसके उलट संसदीय समिति ने एम्स को शोध व विकास के लिए पर्याप्त पूंजी मुहैया न कराने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को फटकार लगाई है। समिति ने कहा है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय महत्व के केंद्र एम्स में शोध को सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर संसाधन मुहैया कराए ताकि किसी कंपनी के निजी हित के बजाय जनहित व लोक कल्याणकारी शोध को बढ़ावा दिया जा सके।
साथ ही समिति में कई स्तर पर बड़े बदलाव की सिफारिश की है। समिति ने एम्स में आरक्षण के प्रावधानो की अनदेखी किए जाने पर कड़ी आपत्ति जाताई है। वेलियाथन समिति ने ए व बी श्रेणी में क्रमश: 31 व सात सिफारिशें की थीं जिनमें से सात सिफारिशों पर अमल के लिए एम्स के संविधान में संशोधन की जरूरत है जो कि केवल संसद के जरिए हो सकता है।
राज्य सभा सांसद सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई वाली संसद की स्थाई समिति ने कहा है कि चिकित्सा जगत में शोध व विकास के मामले में देश ही नहीं दुनिया में भी अग्रणी रहे संस्थान एम्स में शोध व विकास की सारी जरूरतें न केवल सरकार पूरी करे बल्कि इसकी लोकतांत्रिक जवाबदेही भी है। की जाए। इससे न केवल जनस्वास्थ्य के लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है बल्कि इसी तरह से कंपनी प्रायोजित शोध व विकास का उन्मूलन किया जा सकता है। इसी से अनियंत्रित ढंग से फैले क्लीनिकल टाÑयल पर भी लगाम लग सकता है। समिति ने कहा है कि शोध व विकास में  हम पश्चिम की नकल नहीं कर सकते। वहां का पूरा ढांचा ही निजी क्षेत्र की पूंजी व बौद्धिक संपदा की खरीद बिक्री पर निर्भर है। जबकि हमारे सरोकार अलग हैं। भारत की जरूरतें परिस्थितियां पश्चिमी देशों से अलग हैं। इस लिए यहां निजी पूंजी को संस्थान में मुनाफ कमाने के एजेंडे को लागू करने की इजाजत नही दी जा सकती।
इस लिए संस्थान को शोघ व विकास के लिए पेशेवर ढंग से रिसर्च काडर बना कर रोडमैप तैयार करके समयबद्ध तरीके से काम करना होगा। वेलियाथन समिति ने कंपनी प्रायोजित शोध व निजी पूंजी पर आधारित शोध की सिफारिश की थी जबकि संसदीय सीमित ने केंंद्रीकृत व्यवस्था के तहत के बहुआयामी व देश हित के शोध को तत्काल बढ़ावा देने की वकालत की है। समिति ने कहा है कि वेलियाथन समिति के हिसाब से या निजी पूंजी आधारित शोध से कंपनियों के मुनाफे वाले शोध ही होंगे। इससे अनैतिक काम को बढ़ावा मिलेगा। क्योंकि कंपनियां उन्हीं क्षेत्रों में शोध करवाना चाहती है जहां मुनाफा हो। समिति में संस्थान में दवाकंपनियों के कार्ययोजना को एम्स में थोपने से रोकने के लिए सशक्त निगरानी मशीनरी की जरूरत पर भी बल दिया।
समिति ने कहा है कि जनता के पैसों से स्थापित एम्स को जरूरत के हिसाब से देश के तमाम दूसरे सरकारी मेडिकल कालेजों के साथ या दुनिया के नामी स्वस्थ्य केंद्रों के साथ साझीदारी की जरूरत हो तो वह किया जा सकता है। शोध भी ऐसा किया जाए जिसका जनता को सीधे लाभ मिले न कि लैब में बंद पड़े रहने वाले शोध किए जाय। जरूर हो तो केवल उच्च शिक्षा ही संस्थान में कराई जाय।
समिति ने आरक्षण के मसले पर एम्स प्रशासन के दावे के उलट कहा है कि एम्स में संविधान प्रदत्त
आरक्षण के प्रावधानों की घोर अनदेखी की गई है। इसके लिए  जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश के साथ समिति ने ऐसी मशीनरी विकसित करने की जरूरत बताई है जिसमें कि वंचित तबके के लिए किए गए प्रावधानो तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की जा सके। इस श्रेणी में बैकलाग खत्म करने के लिए व्यापक योजना बनाकर काम करने की स्वस्थ्य मंत्रालय को हिदायत भी दी है।
जनसत्ता से साभार
हमारा नजरिया
संसदीय समिति के इस फैसले का स्वस्थ भारत अभियान स्वागत करता है. संसदीय समिति ने जिस आशंका को जाहिर करते हुए डॉ. लेवियाथन समिति की रिपोर्ट को खारिज किया है वह बिल्कुल जायज है।

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