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कब तक ढोते रहेंगे बालिका भ्रूण हत्या जैसे कलंक

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 1981 में 0-6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1000-962 था जो 1991 में घटकर 1000-945 और 2001 में 1000-927 रह गया। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2001 से 2005 के अंतराल में करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण हत्याएं हुई हैं। इस लिहाज से देखें तो इन चार सालों में रोजाना 1800 से 1900 कन्याओं को जन्म लेने से पहले ही दफ्न कर दिया गया।

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क्या आप जानते हैं एम्स में एक दिन के बच्चे का ईलाज नहीं होेता है!

एनसीआर मे कार्यरत एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पत्नी को सोमवार रात बिजनौर के एक अस्पताल मे संतान प्राप्ति हुयी। मंगलवार दोपहर को अस्पताल ने बताया कि बच्चे की आहार नाल बंद है और इसका इलाज़ उनके पास नहीं है। बच्चे को रेफर कर दिया गया और आनन फानन मे परिजन उस बच्चे को लेकर एम्स पहुँच गए। देश के सबसे बड़े अस्पताल की आपातकालीन सेवाओं मे उस बच्चे को एड्मिट करने से मना कर दिया गया। कारण बताया गया कि एक दिन के बच्चे को नहीं करेंगे उसको एड्स का खतरा हो सकता है। इतने बड़े अस्पताल का ये बे-सिर पैर का तर्क समझ से परे था।

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  योग : भारतीयता की अंतराष्ट्रीय पहचान

अब भारत के युवा वर्ग और आम जनमानस मे ऐसा विश्वास हो चला है कि जिस समृद्ध परंपरा को हम किताबों मे पढ़ते आये हैं उस पर सम्पूर्ण विश्व मुहर लगा रहा है। और ये क्षण शायद सबसे ज़्यादा गौरव का क्षण होता है। अब वो गौरवशाली समय तो आने वाला है जब भारतीयों की कही गयी बातें और सम्मेलन सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करने वाले हैं। तब ऐसे मे हमारा भी ये फर्ज़ होगा कि हम अपने अपने पक्ष की जिम्मेदारियों को निभाते चले जाएँ। विश्वगुरु बनने के बाद हमारी जिम्मेदारियाँ और भी बढ़ जायेंगी।

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