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तो आप जेनरिक दवा ही खा रहे हैं, वसूला जा रहा है ब्रांड-शुल्क…

ब्रांडेड व जेनरिक दवाइयों को लेकर हिन्दुस्तान के मरीजों को भी खूब भ्रमित किया जा रहा है. मसलन जेनरिक दवाइयां काम नहीं करती अथवा कम काम करती हैं. जबकि सच्चाई यह है कि हिन्दुस्तान में लिगली जो भी दवा बनती है अथवा बनाई जाती है, वह इंडियन फार्मा कॉपी यानी आईपी के मानकों पर ही बनती हैं. कोई दवा पहले ‘दवा’ होती है बाद में जेनरिक अथवा ब्रांडेड. दवा बनने के बाद ही उसकी ब्रांडिंग की जाती है यानी उसकी मार्केटिंग की जाती है.

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निष्ठुर न बने डॉक्टर:स्वास्थ्य मंत्री

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने उपभोक्‍ता अदालतों में चिकित्‍सकों के खिलाफ मुकदमों के मामलों तथा सार्वजनिक अस्‍पतालों में चिकित्‍सकों के निष्‍ठुर बर्ताव की बढ़ती घटनाओं का जिक्र करने से बचते हुए चिकित्‍सकों से आग्रह किया कि वे हिप्‍पोक्रेटिक शपथ को याद करें और अपने रोगियों का उपचार करने के दौरान उनके साथ प्रेम एवं दया का बर्ताव करें। उन्‍होंने वहां उपस्‍थित चिकित्‍सकों से स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल एवं बीमार तथा जरूरतमंद लोगों के उपचार के उद्देश्‍य के प्रति अपने को फिर से समर्पित कर देने का स्‍मरण दिलाया।

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हमरा लगे तोहरा लोगन के आशीष देवे के सिवा कुछु ना हैःमहादेव भगत

वैशाली विधानसभा क्षेत्र के भगवानपुर रत्ति गांव में महादेव को उनकी पत्नी का लाश मिलने की खबर ने ग्रामीणों को भावविह्वल कर दिया था। परिजनों को सूचना दी गयी थी कि स्थानीय पुलिस सुमित्रा देवी का लाश लेकर महादेव के घर आ रही है। जब पुलिस लाश लेकर पहुंची तो पूरा गाँव महादेव के घर पहुंचा हुआ था। एक तरफ मातम का माहौल था वहीं दूसरी तरफ गांव वालों में इस बात का संतोष था कि मीडिया के सहयोग से गरीब महादेव को पांच दिन बाद ही सही उसकी पत्नि की लाश तो मिली। गांव के सहयोग से महादेव ने अपनी पत्नी की अंत्येष्टि आज सुबह की। अंत्येष्टि के बाद बात करते हुए महादेव ने कहा कि मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं अपनी पत्नी का अंतिम दर्शन कर पाऊंगा…लेकिन यह सब आप लोगों के कारण भइल है। हमरा पास तोहरा लोगन के आशीष देवे के सिवा कुछु ना है।

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पत्नी की लाश के लिए चार दिनों से गुहार लगा रहा है महादेव भगत, पुवाल का पुतला बनाकर अंत्येष्टि की तैयारी

पटना के अगमकुँवा स्थित शांति केयर क्लिनिक में चार दिन पूर्व महादेव भगत की गर्भवति पत्नि सुमित्रा देवी ने दम तोड़ दिया। स्थानीय सदर अस्पताल में जब सुमित्रा की स्थिति को नहीं सुधारा जा सका तब उसे पीएमसीएच के लिए रेफर कर दिया गया था। लेकिन स्थानीय दलालों ने परिवार को पीएमसीएच न ले जाने की सलाह दी और कहा कि वहां से कोई जिंदा वापस नहीं लौटता। मजबूरन परिवार ने सुमित्रा को शांति केयर में एडमिट करा दिया। एडमिशन के समय अस्पताल ने 60000 रुपये लिए। यहां बताता चलूं कि यह रूपया महादेव भगत ने अपनी जमीन का अंतिम टुकड़ा बेचकर इकट्ठा किए थे। एडमिशन के एक घंटे के अंदर ही मरीज ने दम तोड़ दिया। अस्पताल ने घर वालों से 1 लाख 20 हजार और देने की बात कही। बिहार का अति पिछड़ा समुदाय से आने वाला भगत परिवार के पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। बहुत गिड़गिड़ाया परिवार वालों ने किसी ने नहीं सुनी और उनके सारे कागज-पत्तर को छीन लिया गया और उन्हें कुत्तों की तरह वहां से भगा दिया गया।

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ढाई करोड़ यात्रियों के स्वास्थ्य के साथ रेलवे कर रहा है खिलवाड़!

जब आपको मालूम चले कि 40 रुपये के भोजन के लिए आपसे 80 रुपये लिए गए तब आपकी क्या हालत होगी! जरा सोचिए। सच कह रहा हूं यह स्थिति वर्तमान में देश के सभी रेल गाड़ियों में आम है। पिछले दिनों जब समता एक्सप्रेस से मैं और हमारे साथी मीडिया चौपाल में सरीक होने ग्वालियर जा रहे थे तब एक घटना घटी। कैटरर ने थाली की कीमत 120 रुपये बताया और एक सब्जी व चार चपाती की कीमत 80 रुपये। बातचीत में उसी ने बताया कि साउथ इंडिया की रेलगाड़ियों में आज भी भोजन 50-60 रुपये में मिल जाता है। फिर आखिर क्यों उत्तर-भारत की रेलगाड़ियों में यह खाना सस्ता व गुणवत्ता युक्त मिलता है। इसका जवाब है रेलवे की लापरवाही व गलत नीति। जितनी भी प्रीमियम ट्रेने हैं उन सब पर ठेकेदारों ने कब्जा जमा लिया है।

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10 करोड़ आदिवासी जनसख्या के स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय कार्यशाला

देश के आदिवासियों को कैसे स्वस्थ किया जाए? उनकी स्वास्थ्य के लिए क्या-क्या किया जा सकता है? इस तरह के तमाम प्रश्नों के जवाब ढूढ़ने के लिए पिछले सप्ताह महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के शोधग्राम में एक सरकारी-गैरसरकारी कार्यशाला का आयोजन किया गया। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा आयोजित इस कार्यशाल का मुख्य विषय ‘जनजातीय स्वास्थ्य सेवा में उत्तम कार्यप्रणालियां’ रखा गया था। इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भारत की 10 करोड़ आदिवासी जनसंख्या की स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए संभव समाधान की पहचान करना था। इस कार्यशाला का उद्घाटन स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की महानिदेशक डा. सौम्या स्वामीनाथन ने किया।

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स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के लिए मुख्यमंत्रियों के उप समूह ने सौंपी रिपोर्ट

स्वच्छ भारत एक मुश्किल कार्य है लेकिन असंभव नहीं:प्रधानमंत्री सभी स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षक की बहाली होःस्वस्थ भारत अभियान स्वच्छ भारत अभियान को गति प्रदान करने के लिए मुख्यमंत्रियों के उप-समूह ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दिया है। अपनी रिपोर्ट में मुख्यमंत्रियों के उप-समूह ने कई आवश्यक सुझाव दिए हैं। इस रिपोर्ट में कहा […]

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…तो हम भी करेंगे ऑनलाइन फार्मेसी का समर्थन: AIOCD

14 अक्टूबर को ऑल इंडिया ऑर्गानाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) देश भर के दवा दुकानों को बंद कराने जा रही है। बंद के समर्थन में अब तक जहां केमिस्ट एसोसिएशन यह कहते रहे थे कि वे ऑनलाइन फार्मेसी का विरोध कर रहे हैं और उनकी बात सरकार नहींसुन रही है। इस बावत आज जब नई दिल्ली के प्रेस क्लब में मीडिया से एआईओसीडी के अध्यक्ष जगन्नाथ शिंदे रूबरू हुए तो उनका सुर बदला हुआ नजर आया। उनका कहना था कि यदि ऑनलाइन फार्मेसी को हरी झंडी देनी ही है तो सरकार उनके साथ मिलकर काम करे। मीडिया के तीखे सवालों का जवाब शिंदे दे नहीं पा रहे थे। जब मीडिया ने पूछा कि क्या आप देश में सस्ती दवाइयों का विरोध कर रहे हैं तो शिंदे व उनकी टीम इसका ठीक से जवाब नहीं दे पायी।

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स्वाइन फ्लू ने ली यूपी के महेश की जान

दिल्ली में स्वाइन फ्लू का मामला सामने आने पर स्वस्थ भारत अभियान ने स्वास्थ्य मंत्री को उनके मोबाइल न. 9810154102 पर मैसेज कर (दिनांक 5 अक्टूबर, समय- दोपहर 1:20 ) के महेश की स्थिति के बारे में अवगत कराया था लेकिन कोई भी सकारात्मक उत्तर नहीं मिला। स्वस्थ भारत ने जब उनसे बात करने की कोशिश की तो रजत नामक उनके किसी सहयोगी ने फोन उठाया और इस दिशा में उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया। आश्चर्य का मामला यह है कि इतना संवेदनशील मामले को स्वास्थ्य मंत्रालय ने हल्के में लिया और आज महेश चन्द्र की मौत हो गई। इस मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?

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दंत-रोगों को हल्के में ले रही है हरियाणा सरकार, दंत चिकित्सकों को नौकरी से निकाल फेंका

हरियाणा से यह चौकाने वाला मामला सामने आया है। हरियाणा सरकार ने दांत के विशेषज्ञों को नौकरी से बाहर कर दिया है। सरकार अपने बजट का रोना रो रही है और कह रही है कि उन्हेें दांत के डॉक्टरों को सैलरी देने के लिए पैसा नहीं है। वह भी तब जब ये नियुक्तियां स्वास्थय मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 31 मार्च 2016 तक मान्य हैं तथा इस कार्यक्रम के बजट का दो तिहाई हिस्सा भारत सरकार को देना है। स्वस्थ भारत अभियान हरियाणा सरकार के इस फैसले की निंदा करता है और मांग करता है कि डेंटल डॉक्टरों की नियुक्ति को बहाल रखा जाए ताकि आने वाली नई पीढ़ी को दंत-रोगों से बचाया जा सके।

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