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रोग-शोक जनि देहु विधाता

ठीक एक साल पहले …3 नवंबर 2014..वक्त करीब सवा ग्यारह बजे..दिल्ली के हौजखास मेट्रो स्टेशन का प्लेटफार्म…गेट नंबर दो की तरफ से उतरते वक्त नजर पड़ी…जहांगीरपुरी जाने वाली मेट्रो आ चुकी है…प्लेटफार्म सिर्फ तीन सीढ़ियां नीचे रह गया था.. कदम थोड़ा तेज बढ़ा दिया..लेकिन इसी बीच हल्की-सी सीढ़ियों की रेलिंग से टक्कर हुई..शरीर ने संतुलन खोया और धड़ाम…ऐसा क्रूर अनुभव होने के बावजूद अगर मैं हाथ में फ्रैक्चर होने के बावजूद सफदरजंग चला गया था तो इसकी बड़ी वजह उस दिन उठने वाला दर्द था..आर्थिक मसला तो खैर था ही…तब मेरा भोला मन यह मान बैठा था कि शायद नौ-दस सालों में अस्पताल की संस्कृति बदल चुकी हो….

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फॉर्मा सेक्टर के भ्रष्टाचार पर कब लगेगी लगाम

फार्मा सेक्टर इन दिनों उबाल पर है…फार्मासिस्ट लगातार आंदोलन कर रहे हैं..बीते 29 सितंबर को लखनऊ, रायपुर और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में फार्मासिस्टों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया..लखनऊ में तो शिक्षामित्रों के आंदोलन की तरह फॉर्मासिस्टों को पीटने की तैयारी थी..लेकिन फॉर्मासिस्टों ने संयम दिखाया..इसके पहले गुवाहाटी, रांची, जमशेदपुर और हैदराबाद में फार्मासिस्ट आंदोलन कर चुके हैं..लेकिन उनसे जुड़ी खबरें तक नहीं दिख रही हैं..दरअसल फार्मासिस्टों की मांग है कि जहां-जहां दवा है, वहां-वहां फॉर्मासिस्ट तैनात होने चाहिए। पश्चिमी देशों में एक कहावत है कि डॉक्टर मरीज को जिंदा करता है और फॉर्मासिस्ट दवाई को। पश्चिमी यूरोप के विकसित देशों, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में डॉक्टर मरीज को देखकर दवा तो लिखता है, लेकिन उसकी मात्रा यानी डोज रोग और रोगी के मुताबिक फार्मासिस्ट ही तय करता है।

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