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अगर मगर के डगर में स्वस्थ भारत की तस्वीर

आशुतोष कुमार सिंह
वैश्विकरण के इस युग में खुद को सेहतमंद बनाए रख पाना आसान नहीं रह गया है। खासतौर से उस समय जब सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय प्रदूषण तेजी से बढ रहा हो। बेसक विकास की लकीर बुलेट ट्रेन तक जा पहुंची हो लेकिन सच यह भी है कि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल तक इसकी पहुंच नहीं हो पायी है। चांद पर जाने में सफलता मिल रही है एक सच है, लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक आईएस की तैयारी करने वाली लड़की को सरेराह बेआबरू होने से हम नहीं बचा पा रहे हैं यह भी सच है ! दिल्ली जैसी जगह पर भी स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर केवल लूट को ही अंजाम दिया जा रहा है। फोर्टिज डेंगी के मरीज से 16 लाख रुपये ऐंठता है तो मैक्स जैसा अस्पताल जीवित बच्चों को मृत घोषित कर देता है। अपोलो के सर किडनी रैकेट चलाने का मामला सामने आता है। कोई प्लेटलेट्स की गड़बड़ी दिखाकर मरीजों को लूट रहा है तो कोई और तरीके से डरा कर। पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को कुछ बड़े पूंजीपतियों ने अपने हाथ में ले रखा है। ऐसे में 2018 का भारत कितना स्वस्थ रह पायेगा एक गंभीर एवं चिंतनीय प्रश्न है।
किसी भी राष्ट्र-राज्य के नागरिक-स्वास्थ्य को समझे बिना वहां के विकास को नहीं समझा जा सकता है। दुनिया के तमाम विकसित देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतनशील व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य राष्ट्र की प्रगति को तीव्रता प्रदान करता है। इतिहास गवाह रहा है कि जिस देश के लोग ज्यादा स्वस्थ रहे हैं, वहां की उत्पादन शक्ति बेहतर रही है। और किसी भी विकासशील देश के लिए अपना उत्पदान शक्ति का सकारात्मक बनाए रखना ही उसकी विकसित देश की ओर बढ़ने की पहली शर्त है। ऐसे में भारत को पूरी तरह कैसे स्वस्थ बनाए जाए यह एक अहम् प्रश्न है। अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय नागरिकों को पूर्ण रूपेण स्वास्थ्य-सुरक्षा कैसे दी जाए आज भी एक यक्ष प्रश्न है। ऐसे में एक स्वास्थ्य चिंतक होने के नाते कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर मैं चिंतन-मनन करता रहा हूं। हमें लगता है कि सरकार इन सुझाओं पर ध्यान दें तो इस दिशा में और बेहतर परिणाम आ सकते हैं।
2018 में कैशलेश स्वास्थ्य व्यवस्थाका ले संकल्प
मेरी समझ से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को नागरिकों के उम्र के हिसाब से तीन भागों में विभक्त करना चाहिए। 0-25 वर्ष तक, 26-60 वर्ष तक और 60 से मृत्युपर्यन्त। शुरू के 25 वर्ष और 60 वर्ष के बाद के नागरिकों के स्वास्थ्य की पूरी व्यवस्था निःशुल्क सरकार को करनी चाहिए। जहाँ तक26-60 वर्ष तक के नागरिकों के स्वास्थ्य का प्रश्न है तो इन नागरिकों को अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाना चाहिए। जो कमा रहे हैं उनसे बीमा राशि का प्रीमियम भरवाने चाहिए, जो बेरोजगार है उनकी नौकरी मिलने तक उनका प्रीमियम सरकार को भरना चाहिए।
ऐसा क्यों जरूरी है?
शुरू के 25 वर्ष नागरिकों को उत्पादक योग्य बनाने का समय है। ऐसे में अगर देश का नागरिक आर्थिक कारणों से खुद को स्वस्थ रखने में नाकाम होता है तो निश्चित रूप से हम जिस उत्पादक शक्ति अथवा मानव संसाधन का निर्माण कर रहे हैं, उसकी नींव कमजोर हो जायेगी और कमजोर नींव पर मजबूत इमारत खड़ी करना संभव नहीं होता। किसी भी लोक- कल्याणकारी राज्य-सरकार का यह महत्वपूर्ण दायित्व होता है कि वह अपने उत्पादन शक्ति को मजबूत करे। अब बारी आती है 26-60 साल के नागरिकों पर ध्यान देने की। इस उम्र के नागरिक सामान्यतः कामकाजी होते हैं और देश के विकास में किसी न किसी रूप से उत्पादन शक्ति बन कर सहयोग कर रहे होते हैं। चाहे वे किसान के रूप में, जवान के रूप में अथवा किसी व्यवसायी के रूप में हों कुछ न कुछ उत्पादन कर ही रहे होते हैं। जब हमारी नींव मजबूत रहेगी तो निश्चित ही इस उम्र में उत्पादन शक्तियाँ मजबूत इमारत बनाने में सक्षम व सफल रहेंगी और अपनी उत्पादकता का शत् प्रतिशत देश हित में अर्पण कर पायेंगी। इनके स्वास्थ्य की देखभाल के लिए इनकी कमाई से न्यूनतम राशि लेकर इन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाने की जरूरत है। जिससे उन्हें बीमार होने की सूरत में इलाज के नाम पर अलग से एक रूपये भी खर्च न करने पड़े। अब बात करते हैं देश की सेवा कर चुके और बुढ़ापे की ओर अग्रसर 60 वर्ष की आयु पार कर चुके नागरिकों के स्वास्थ्य की। इनके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सरकार को पूरी तरह उठानी चाहिए। और इन्हें खुशहाल और स्वस्थ जीवन यापन के लिए प्रत्येक गांव में एक बुजुर्ग निवास भी खोलने चाहिए जहां पर गांव भर के बुजुर्ग एक साथ मिलजुल कर रह सकें और गांव के विकास में सहयोग भी दे सकें।
अगर ऐसा हम करने में सफल रहे तो निश्चित ही भारत को हम एक खुशहाल देश की ओर बढ़ा पाएंगे। संयुक्त राष्ट्र ने कुछ समय पूर्व खुशहाल देशों की वैश्विक सूची जारी किया था जिसमें पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका एवं बाग्लादेश हमारे देश से ऊपर निकल गए। 155 देशों की सूची में हम 122 वें स्थान पर रहे। यह स्थिति यह बताने के लिए काफी है कि सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के लोग आज अवसाद में हैं। परेशान हैं। बीमार हैं। भूख नहीं मिटा पा रहे हैं। बेरोजगार हैं।
कहने के लिए देश आजाद है। यहां पर जनता का शासन है। यहां लोग ही मालिक हैं। फिर भी गरीब-अमीर के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है। 3 फीसद लोग केवल महंगी दवाइयों के कारण गरीबी रेखा से ऊबर नहीं पा रहे हैं। महंगी एंटीबायोटिक्स खरीदने के लिए उनके पास रुपये नहीं है। बीमारी, हताशा और कर्ज की बोझ से दबे हुए हैं। देश का किसान सही उत्पादन मूल्य नहीं मिलने के कारण मजदूर बनता जा रहा है। यूरिया एवं कीटनाशकों के बेतहाशा प्रयोग से खेतों से उगने वाले अनाज बीमारी के घर होते जा रहे हैं। देश में बीमारी एवं बीमारों की संख्या बढ़ती जा रही है। ट्बरोक्लोसिस, कैंसर, जापानी इंसेफलाइटिस, डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों ने देश की उत्पादन शक्ति को अपने गिरफ्त में ले लिया है। बीमारियों को ठीक करने वाली पैथियां यानी आयुर्वेद, एलोपैथ, होम्योपैथ, सिद्धा, योग आदि में आपसी समन्वय का अभाव है। बीमारी एवं बीमार को ठीक करने की बजाए अपनी जेब भरने में सब जुटे हुए हैं। 40 हजार करोड़ का वार्षिक स्वास्थ्य बजट है अपने देश का, लेकिन 90 हजार करोड रुपये की दवा साल भर में हम भारत के लोग गटक जाते हैं। स्वास्थ्य के नाम जारी होता सरकारी धन किधर जाता है, ठीक से किसी को नहीं पता। आजादी के बाद अगर पोलियों को छोड़ दे तो किसी भी बीमारी को हम समूल खत्म नहीं कर पाएं हैं। ऐसे में हमारी स्वास्थ्य-नीति कटघरे में तो है ही।
स्वास्थ्य ही क्यों हमारी किसान नीति भी कहां कुछ कर पा रही है। जो किसान हमें अनाज उत्पादित कर के देता है। जिसकी मेहनत से हम अपना पेट पालते हैं। उसकी मेहनत का उचित मूल्य आज तक हम नहीं दे पाएं हैं। गर हम सरकारी आंकड़ों को माने जिसके अनुसार देश में 65 फीसद किसान हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि देश के आधे से ज्यादा लोग किसानी पर निर्भर हैं। 35 फीसद लोग नौकरी, उद्योग धंधे आदि पर निर्भर हैं। 35 फीसद लोग जो उत्पाद बनाते हैं उसका ग्राहक भी उनके साथ-साथ किसान भी है। लेकिन यहां पर भी गजब की धोखाधड़ी है। किसान के उत्पाद का मूल्य सरकार तय करती है और उसके उत्पाद से उत्पादित वस्तु का मूल्य साहूकार यानी उद्योगपति तय करता है। बाजार में आज 20 रुपये में 4 किलो आलू उपलब्ध है। लेकिन आलू से बने 40 ग्राम चिप्स की कीमत आज भी 10 रुपये है। मेहनत किसान करे और डीपीएस स्कूल में पढने उद्योगपति का लड़का जाए!
गजब का यह विकास मॉडल है! इन विषयों पर बात की जाए तो लंबी बात की जा सकती हैं। मूल बात यह है कि विकास के मौजूदा मॉडल को भारतीय संदर्भ में परिभाषित किए जाने की सख्त जरूरत है। नहीं तो सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत सिर्फ चिड़िया बन कर रह जायेगा, वह भी बिना हाड़ मांस के! गर 2018 में इन विषयों पर हम थोड़ा भी संजीदा गो गए तो निश्चित ही स्वस्थ भारत की दिशा में एक बेहतर कदम होगा!
 

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