क्या आप जानते हैं ! 65 साल पहले भारत में आया जापानी इंसेफलाइटिस !

आशुतोष कुमार सिंह

भारत जैसे देश किसी भी नई बीमारी का पालनहाल आसानी से बन जाते हैं। सवा अरब से ज्यादा जनसंख्या को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे भारत में जब कोई बीमारी आयात होती है, तो उसकी खातिरदारी घर आए मेहमान की तरह की जाती है। उसके प्रति हमारा नजरिया, उसको रोकने के उपाय ठीक वैसे ही होते हैं जैसे घर आए दामाद खुद से चले जाएं तो ठीक है, नहीं तो उन्हें कौन कहे की आप अपने घर चले जाइए। ऐसी बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीमारियों के फलने-फूलने के लिए जरूरी खाद-पानी यहां पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। यहां पर नई बीमारियों की खेती करने में पूरा तंत्र सहयोग करता है। कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू एवं इबोला जैसी बीमारियों की खेती यहां पर खूब हो रही है। इनकी ब्रांडिंग कर के कुछ यहां के कुछ दूसरे मूल्कों की संस्थाएं अपनी आर्थिक स्वार्थों को पूर्ण करने में सफल भी हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ स्वस्थ मानव संसाधन की रीढ़ की हड्डी तोड़ने की कोशिश साकार होती दिख रही है।
इन सब बातों की चर्चा यहां पर इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इन दिनों एक और बीमारी की ब्रांडिंग जोरो पर है। वर्षों से इस बीमारी का जो बीज हमने बोए थे वे अब फलदायी हो गए हैं। अब पहले से ज्यादा मारक हो गई है यह बीमारी। अब मौतों की संख्या बढ़ाने में इस बीमारी ने महारत हासिल कर ली है। अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस बीमारी की इतनी तारीफ किए जा रहा हूं। जी हां, यह बीमारी है जापानी इंसेफलाइटिस(जेई)। इस बीमारी ने भारत के कई क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया है। और आज उसका हरेक निशाना सही लग रहा है। देश के नौनिहालों को निगलने में यह बीमारी बहुत ही सफल रही है। गोरखपुर के बीआडी अस्पताल में हो रही मौतों का सिलसिला थमा भी नहीं था कि यह झारखंड के जमशेदपुर में हाहाकार मचाने में सफल रही। बगल के रांची में भी इसने कोहराम मचा रखा है। बिहार के मुजफ्फरपुर का क्षेत्र हो अथवा गोरखपुर, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज एवं सिवान का भूगोल। इन क्षेत्रों में इंसेफलाटिस ने अपने आप को खूब फैलाया है।

लचर व्यवस्था ने ली जान

अब यहां पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इंसेफलाइटिस होता कैसे है? और भारत में इसने कब कदम रखा? इसकी मजबूती का राज क्या है?
उत्तर प्रदेश में इंसेफलाइटिस पर पिछले दिनों एपीपीएल ट्रस्ट ने एक अध्ययन किया था। उस अध्य्यन में कहा गया है कि यह रोग फ्लावी वायरस के कारण होता है। यह भी मच्छर जनित एक वायरल बीमारी है। जिसमें सिर में अचानक से दर्द शुरू होता है, शरीर कमजोर पड़ने लगता है। इसका लक्ष्ण भी बहुत हद तक सामान्य बुखार जैसा ही होता होता है। इसका असर शरीर के न्यूरो सिस्टम पर पड़ता है। यही कारण है कि इस बीमारी ने या तो बीमारों को मौत की नींद सुलाया है अथवा उन्हें विकलांग कर दिया है। इस बीमारी को फैलने वाले क्षेत्र के बारे मे इस शोध में कहा गया है कि धान की खेती एवं सुअर-पालन जिन क्षेत्रों में होता है, वहां पर यह बीमारी आसानी से फैलती है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका फैलाव व्यक्ति से व्यक्ति के रूप में नहीं होता है। यह बात तो इस बीमारी के सिम्टम्स की हुई।

65 वर्ष पहले भारत में आई थी यह बीमारी

भारत में यह बीमारी कब आई यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है। आज से 65 वर्ष पूर्व यानी 1952 में पहली बार महाराष्ट्र के नागपुर परिक्षेत्र में इस बीमारी का पता चला। वहीं सन् 1955 तमिलनाडू के उत्तरी एरकोट जिला के वेल्लोर में पहली बार क्लीनीकली इसे डायग्नोस किया गया। 1955 से 1966 के बीच दक्षिण भारत में 65 मामले सामने आए। धीरे-धीरे इस बीमारी ने भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। भारत में पहली बार इस बीमारी ने 1973 फिर 1976 में पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा तबाही मचाई। पंश्चिम बंगाल के वर्दवान एवं बांकुरा जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। 1973 में बांकुरा जिला में इस रोग से पीड़ित 42.6 फीसद लोगों की मौत हुई। 1978 आते-आते यह बीमारी देश के 21 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में फैल गयी। इसी दौरान भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 1002 मामले सामने आए जिसमें 297 मौतें हुई। सिर्फ यूपी की बात की जाए तो 1978 से 2005 तक यह बीमारी 10,000 से ज्यादा मौतों का कारण बनी। 2005 में जो हुआ उसने इस बीमारी की ताकत से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को परिचित कराया। सिर्फ गोरखपुर में 6061 केस सामने आए जिसमें 1500 जानें गईं। इसी तरह 2006 में 2320 मामलों में 528 बच्चों को अपनी जान गवानी पड़ी। 2007 में 3024 मामलों में 645 मौत। इस तरह 2007 तक देश में 103389 मामले सामने आए जिसमें 33,729 रोगियों को नहीं बचाया जा सका। इस शोध में यह बात भी कही गयी है कि 597,542,000 लोग जापानी इंसेफलाइटिस प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं और 1500-4000 मामले प्रत्येक वर्ष सामने आ रहे हैं। यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अभी तक हम लोग जिन आंकड़ों की बात कर रहे हैं, वे सब रिपोर्टेड हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होंगे जो रिपोर्ट नहीं हुए होंगे। ऐसे में जब बिना रिपोर्ट किए गए मामलों की नज़र से इस बीमारी को हम देखें तो पता चलेगा कि यह बीमारी कितनी ताकतवर हो चुकी है। नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) जिसे पहले हमलोग राष्ट्रीय एंटी मलेरिया प्रोग्राम (एनएएमपी) के नाम से जानते थे, इन दिनों भारत में जेई के मामले को मोनिटर कर रही है। अभी तक देश के 26 राज्यों में कभी-कभार तो 12 राज्यों में अनवरत यह बीमारी अपना कहर बरपा रही है।
1951-52 में पहली बार भारत में लोकसभा चुनाव हुआ था। तब से लेकर अभी तक तमाम प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री बने और चले गए लेकिन 1952 से चली आ रही इस बीमारी का ईलाज नहीं ढ़ूढ़ पाए। लोग मरते रहे और आज भी मर रहे हैं।

146 वर्ष पहले जापान में सबसे पहले इस बीमारी का पता चला

इंसेफलाइटिस की जड़ों को अगर हम ढूढ़ें तो पता चलता है कि इसका जन्म सबसे पहले जापान में हुआ था। शायद यहीं कारण है कि इसे जापानी इंसेफलाइटिस कहा जाता है। आज से 146 वर्ष पूर्व जापान में यह बीमारी सबसे पहले पहचान में आई। 53 वर्षों के बाद इस बीमारी ने अपना विकराल रूप दिखाया और 1924 में जापान में 6000 केस पंजीकृत हुए। यहां से इसका फैलाव एशिया के देशों में हुआ। 1960 के दशक में चलाए गए टिकाकरण अभियान के कारण इस पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया। जापान के अलावा, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों में इसने अपना पैर पसारा फिर जैसा की ऊपर बताया जा चुका है 1952 में इसका प्रवेश भारत में हुआ।

आश्चर्य का विषय यह है कि भारत सरकार इंसेफलाइटिस के सही कारणों को जानने में अभी तक नाकाम रही है। अभी जांच का फोकस गोरखपुर बना हुआ है। जबकि इस बीमारी का फैलाव देश के लगभग प्रत्येक कोने में है। दक्षिण भारत में यह बीमारी पहले आई लेकिन वहां पर वह उतना सफल नहीं हुई जितना उत्तर भारत में दिख रही है। ऐसे में शोध का बिंदु दक्षिण भारत भी होना चाहिए। इतना ही नहीं जांच का बिंदु एशिया के तमाम देश भी होने चाहिए जहां पर यह बीमारी अपना पांव पसार चुकी है। शायद तब जाकर हम इस बीमारी के कारणों की तह में जा पाएंगे एवं ईलाज ढूढ़ पाने के नजदीक पहुंचेंगे। अभी तो ऐसा लगता है कि सरकार चाहती ही नहीं है कि इस बीमारी का ईलाज संभव हो सके नहीं तो गर हमारी सरकारों ने इस बीमारी की भयावहता को पहले ही भांप कर समुचित कदम उठाया होता तो बीआरडी अस्पताल में जो चीख-पुकार सुनने को मिल रही है शायद वह नहीं मिलती।

यह लेख www.firstposthindi.com से साभार लिया गया है।

विश्व बालिका दिवस के अवसर पर स्वस्थ भारत ने की मांग, महिलाओं के लिए सार्वजानिक जगहों पर बने शौचालय!

नई दिल्ली

‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ विषय को लेकर 21000 किमी की स्वस्थ भारत यात्रा करने वाले स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह ने महिलाओं के लिए सार्वजानिक जगहों पर अलग शौचालय बनाएं जाने कीय मांग की है। अपनी यात्रा के अनुभवों एवं बालिकाओं से हुई बातचीत का हवाला देते हुए श्री आशुतोष ने कहा कि देश के प्रत्येक जिला मुख्यालय, प्रखंड मुख्यालय, बस अड्डा सहित उन सभी जगहों पर महिलाओं के अलग से शौचालय बनें, विशेष रूप से मूत्रालय।

श्री आशुतोष ने बताया की यात्रा के दौरान देश भर की बालिकाओं ने अलग से मूत्रालय बनाये जाने की बात प्रमुखता से रखी थी। विश्व बालिका दिवस के अवसर पर स्वस्थ भारत (न्यास) के पदाधिकारियों ने एक बैठक की। इस बैठक में यह निर्णय किया गया की बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय की मांग को जोर सोर से उठाया जायेगा। अगर सरकार इस बात पर गंभीर नहीं हुई तो आंदोलन किया जायेगा। इस अवसर पर धीप्रज्ञ द्विवेदी, शशिप्रभा तिवारी, प्रसून लतांत सहित दर्जनों लोग उपस्थित थे।

श्रीनगर के 18 वर्षीय युवा को ‘स्वच्छता ही सेवा’ का एम्बेसडर बनाया गया

नई दिल्ली/पीआइबी/25.9.17

श्रीनगर के युवा बिलाल डार को श्रीनगर नगर निगम का ब्रान्ड एम्बेसडर बनाया गया है। 12 वर्ष की उम्र से ही बिलाल डार ‘स्वच्छता अभियान’ में योगदान दे रहा है। प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में बिलाल डार का जिक्र किया था।

प्रमुख व्यक्तियों द्वारा स्वच्छता के लिए श्रमदान कार्यक्रम के अन्तर्गत आज रेल राज्य मंत्री श्री राजेन गोहेन ने गुवाहटी में श्रमदान कार्यक्रम में अपना योगदान दिया। उपभोक्ता मामले, खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री करम श्याम ने मणिपुर में स्वच्छता ही सेवा अभियान का शुभारम्भ किया। चण्डीगढ प्रशासन के अधिकारियों ने केंद्र-प्रशासन सचिवालय परिसर में आयोजित स्वच्छता ही सेवा कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

भारतीय कोस्ट गार्ड ने अपने परिसर में स्वच्छता ही सेवा पखवाड़ा के तहत स्वच्छता अभियान चलाया और पौधे लगाए। जहाज की साफ-सफाई करते हुए कचरा एकत्र किया और फिर उसका निपटान भी किया।

‘स्वच्छता ही सेवा अभियान’ आम लोगों के साथ-साथ कबाड़ का व्यवसाय करने वालों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है। इसके अलावे मच्छरों, मक्खियों से फैलने वाली बिमारियों की भी रोकथाम करने में मदद मिल रही है।

 

उप-राष्‍ट्रपति ने कर्नाटक में ‘शौचालय के लिए समर’ का उद्घाटन किया

नई दिल्ली/26.9.17

उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडू ने  कर्नाटक में ‘स्‍वच्‍छता ही सेवा’ और ‘शौचालय के लिए समर’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया। वे हुबली में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि थे।

इसके बाद उपराष्‍ट्रपति श्री वेंकैया नायडू गडग जिले के नरगुण्‍ड तालुका में कोन्‍नुर गांव गए जहां उन्‍होंने कचरा प्रसंस्‍करण की शुरुआत की। उन्‍होंने परिष्‍कृत पेयजल संयंत्र का भी उद्घाटन किया और गांव की जनता कॉलोनी स्थित उच्‍च विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम ‘शौचालय के लिए समर’ के दौरान एक जन सभा को संबोधित किया।

The Vice President, Shri M. Venkaiah Naidu lighting the lamp to inaugurate ‘Swachhta Hi Sewa’ and ‘A Crusade for Toilets’ Programmes under Swachh Bharat Abhiyan, at Konnur Village, Gadag District, Karnataka on September 26, 2017.
The Governor of Karnataka, Shri Vajubhai Vala, the Minister of State for Drinking Water & Sanitation, Shri Ramesh Chandappa Jigajinagi and the Minister of Rural Development & Panchayat Raj, Karnataka, Shri H.K. Patil are also seen.

 

इस मौके पर उप-राष्‍ट्रपति ने स्‍वच्‍छता को जन आंदोलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्‍होंने तालुका, जिला और राज्‍य की इस संदर्भ में किए गए अच्‍छे काम की सराहना की। उन्‍होंने मौजूद सभी लोगों से स्‍वच्‍छता से जुड़ी गतिविधियों में हिस्‍सा लेने का आग्रह किया और कहा कि स्‍वच्‍छ भारत मिशन एक राष्‍ट्रीय कार्यक्रम है न कि किसी खास राजनीतिक दल का। उन्‍होंने असाधारण योगदान कर रहे साधारण लोगों के कई उदाहरण दिए जिसमें कर्नाटक की सुश्री लावण्‍या का भी जिक्र किया जिसने शौचालय बनाने के लिए अपने अनिच्‍छुक परिवार को राज़ी कराया और उसके बाद पूरे गांव को शौचालय बनाने के लिए प्रेरित किया। उपराष्‍ट्रपति ने इस बात की भी प्रशंसा की कि कई युवा महिलाएं अब शादी से पहले अपने ससुराल में शौचालय की मांग करने लगी हैं।

इस मौके पर उपराष्‍ट्रपति ने 13 ग्रामीण पंचायत अध्‍यक्षों और ‘शौचालय के लिए समर’ का लक्ष्‍य हासिल करने वाले नरगुण्‍ड तालुका पंचायत अध्‍यक्ष को भी सम्‍मानित किया। उन्‍होंने नरगुण्‍ड तालुका के ग्रामीण इलाके को ‘‘खुले में शौच से मुक्‍त’’ क्षेत्र घोषित किया।

कर्नाटक के राज्‍पाल श्री वज्‍जुभाई रुडाभाई वाला ने कर्नाटक से स्‍वच्‍छता ही सेवा अभियान शुरू करने के लिए उपराष्‍ट्रपति का धन्‍यवाद देते हुए अपना संबोधन शुरू किया। उन्होंने भारत सरकार का नारा ‘सबका साथ, सबका विकास’ की लय में एक-दूसरे की देखभाल करने पर जोर दिया। उन्‍होंने कहा कि दूसरे की देखभाल के लिए हमें स्‍वच्‍छ भारत की दिशा में खुद ही पहल करने की जरूरत है।

पेयजल और सफाई राज्‍यमंत्री श्री रमेश जिगाजिनागी ने इस मौके पर राज्‍य सरकार को बधाई दी और स्‍वच्‍छता ही सेवा अभियान के महत्‍व पर जोर दिया। उन्‍होंने जोर देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश के हाल ही के अपने दौरे में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने शौचालय का नाम ‘इज्‍जत घर’ रखने की अनुशंसा की है।

कर्नाटक के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज्‍य मंत्री श्री एच के पाटिल ने स्‍वच्‍छ भारत मिशन के तहत राज्‍य सरकार द्वारा किए गए कामों के बारे में बताया और कहा कि राज्‍य और राष्‍ट्र दोनों स्‍वच्‍छ एवं खुले में शौच से मुक्‍त होने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

पेयजल एवं सफाई मंत्रालय में सचिव श्री परमेश्‍वरन अय्यर ने जन सभा का स्‍वागत करते हुए स्‍वच्‍छ भारत मिशन की राष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्रगति के बारे में बताया और मिशन के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में कर्नाटक सरकार द्वारा किए जा रहे बेहतरीन काम की प्रशंसा की।

इस मौके पर सांसद श्री पीसी गड्डीगौदर और नरगुण्‍ड के विधायक श्री बी आर यवगल भी मौजूद थे।

सोर्स-http://pib.nic.in/newsite/PrintHindiRelease.aspx?relid=67335

फोटो क्रेडिट-http://pib.nic.in/newsite/photo.aspx?hflag=1

देश के 201 जिले हुए ओडीएफ मुक्त, स्वच्छता ही सेवा है का मंत्र कर रहा है काम

स्वच्छता ही सेवा है…

खुले में शौच की बुराई के विरुद्ध पूरे देश में ‘स्वच्छता ही सेवा’ को प्रोत्साहित करने वाला सहयोगी अभियान चलाया गया। इससे ग्रामीण स्वच्छता का दायरा बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मिली है। आज चार और नये जिलों को ओडीएफ घोषित किये जाने के साथ ही देश में ऐसे जिलों की संख्या बढ़कर 201 हो गई है।

स्वच्छता ही सेवा मुहीम के एक हफ्ते के बाद बॉलीवुड सितारों का सहयोग भी इस आंदोलन को मिला है। माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान के बाद सुपरस्टार रजनीकांत ने भी ‘स्वच्छता ही सेवा’ आंदोलन के प्रति अपना पूरा-पूरा समर्थन देने की प्रतिबद्धता जतायी है। फिल्मकार एस.एस. राजामौलि ने भी ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान को अपना पूरा समर्थन दिया है।

ओडिशा के बालासोर में अंतरिम टेस्ट रेंज (आटीआर) चांदीपुर के वैज्ञानिकों और विभागकर्मियों ने झाड़ू हाथ में लिये और सड़कों की साफ-सफाई की। समूचे असम में ‘स्वच्छता ही सेवा है’, के जारी अभियान के अंतर्गत कई गतिविधियां चलाई गई। स्वच्छता अभियान में भाग लेने के लिए माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमंतण्रपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रख्यात ब्रेस्ट कैंसर विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ पी रघुराम (निदेशक, नगर स्थित केआईएमएस, ऊषालक्ष्मी सेंटर एवं अध्यक्ष, ब्रेस्ट कैंसर सर्जन्स ऑफ इंडिया) ने कहा ‘मैंने अपने गोद लिये गांव में स्वच्छता अभियान चलाने का निर्णय किया है। मेरा यह गांव तेलंगाना राज्य के दूर-दराज हिस्से में पड़ता है।’

बिहार में जवाहर नवोदय विद्यालय के छात्रों ने अपने-अपने स्कूलों को साफ-सुथरा कर ‘स्वच्छता ही सेवा है’ अभियान के प्रति अपना समर्थन जताया। ‘स्वच्छता ही सेवा’ आंदोलन की युवा टीम ने भी स्वच्छता की असंख्य गतिविधियों को अंजाम दिया। भारतीय पर्यटन ने गुजरात पर्यटन विभाग, भारतीय पुरातत्व सव्रेक्षण (एएसआई), अहमदाबाद नगरपालिका कॉरपोरेशन (एएमसी), भारतीय होटल प्रबंधन (आईएचएम), गांधीनगर, ट्रेवल एजेंट्स, टूरऑपरेर्ट्स, होटल मालिकों और मान्यता प्राप्त गाइडों ने वि धरोहर हिलते मीनार स्थल को साफ-सुथरा करने का कार्यक्रम आयोजित किया।

सोर्स-http://pib.nic.in/newsite/PrintHindiRelease.aspx?relid=67288

पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्रालय ने स्‍वच्‍छ भारत मिशन की तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर प्रदान किए जाने वाले मीडिया पुरस्‍कारों के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित की

स्वच्छता ही सेवा ह

पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्रालय ने स्‍वच्‍छ भारत मीडिया पुरस्‍कार के लिए प्रस्‍ताव भेजने के वास्‍ते मीडिया संगठनों से प्रविष्टियां आमंत्रित की है। यह पुरस्‍कार 2 अक्‍टूबर 2017 को स्‍वच्‍छ भारत मिशन की तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर प्रदान किये जायेंगे। इन पुरस्‍कारों का उद्देश्‍य 2 अक्‍टूबर, 2014 में स्‍वच्‍छ भारत मिशन की शुरूआत से अब तक विशेष कदम उठाकर जागरूकता फैलाने के जरिए स्‍वच्‍छता को जन आंदोलन बनाने के तरीके में योगदान देने वाले मीडिया संगठनों का सम्‍मान करना है

 

 

क्या करें…

कृपया नाम, माध्‍यम (प्रिंट, टेलीविजन, रेडियो आदि), दर्शकों/पाठकों समेत अपने संगठन के बारे में विस्‍तृत जानकारी सहित निम्‍नलिखित प्रश्‍नों के उत्‍तर दें।

1)     स्‍वच्‍छ भारत मिशन, इसकी विशेषता और चुनौतियों के बारे आप क्‍या जानते हैं? कृपया 250 शब्‍दों में इसके बारे में बताएं।

2)     क्‍या राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय स्‍तर के स्‍वच्‍छता से जुड़े मुद्दों को कवर करने के लिए आपके कोई बीट पत्रकार /समर्पित टीम है? कृपया दोनों स्‍तरों पर समर्पित इस टीम के कर्मचारी सदस्‍यों की संख्‍या का उल्‍लेख करें।

3)     क्‍या स्‍वच्‍छता अभियान में नागरिकों को शामिल करने के लिए आपने कोई विशेष मीडिया अभियान/कार्यक्रम चलाए हैं? कृपया इन विशेष पहलों के प्रभाव सहित इसका वर्णन अधिकतम 300 शब्‍दों में करें।

4)     क्‍या आपने एक वर्ष में स्‍वच्‍छता को समर्पि‍त कोई विशेष फीचर/कार्यक्रम चलाया है। कृपया इसका अधिकतम 300 शब्‍दों में वर्णन करें।

5)     आपके संगठन ने एक वर्ष में स्‍वच्‍छ भारत मिशन के संदेश को फैलाने के कितने समाचार दिए हैं? कृपया दस श्रेष्‍ठ उदाहरण दें।

 

आपने देश में स्‍वच्‍छता को बढ़ावा देने के लिए अन्‍य विशेष कदम उठाए हैं। (अधिकतम 300 शब्‍द)।

कहां भेजें…

‘स्‍वच्‍छ भारत मीडिया पुरस्‍कारों के लिए प्रस्‍ताव’  विषय के साथ अपनी प्रविष्टि gpsingh@washinstitute.org  पर और इसकी एक कॉपी anisha.pmcmdws@gmail.com  पर भेजे।  प्रविष्टि जमा कराने की अंतिम तिथि 25 सितंबर, 2017 है।

नोटः  पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्रालय एक जूरी गठित करेगी जो विजेताओं का चयन करने के लिए प्रविष्टियों का मूल्‍यांकन करेगी। जूरी का निर्णय अंतिम और उचित रहेगा।

सोर्सःhttp://pib.nic.in/newsite/PrintHindiRelease.aspx?relid=67238