2 लाख आंगनवाड़ी केन्द्रों को मिलेगी छत

नई दिल्ली/ नई राजग सरकार ने आते ही नीतिगत फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। इस कड़ी में सरकार ने  12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2 लाख आगनवाड़ी केन्द्र की इमारतें बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।2013-14 में 20000, 2014-15 में 50,000, 2015-16 में 60,000 व 2016-17 में 70,000 आंगनवाड़ी केन्द्रों को क्रमशः अपना छत नसीब होगा।

राज्यसभा में दिए लिखित उत्तर में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने बताया कि इन इकाईयों का निर्माण 4.5 लाख रुपये प्रति इकाई के दर से किया जाएगा, जिसके खर्च का वहन केन्द्र और राज्यों के बीच 75:25 के अनुपात में होगा, जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए यह अनुपात 90:10 है।

उन्होंने यह भी बताया कि अब तक राज्यों को 44,709 आंगनवाड़ी केन्द्र इमारतों के निर्माण को मंजूरी दी गई है, जिसमें ओड़िशा में 5556 इमारतों का निर्माण शामिल है। बजट आवंटन के संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2013-14 में राज्यों/ केन्द्रशासित प्रदेशों को 72,334.01 लाख रुपये की पहली किस्त जारी कर दी गई है।

सरकार के इस फैसले से बिना छत के चल रहे आंगनवाड़ी केन्द्रों को अपना छत मिल जायेगा। इस फैसले का आंगनवाणी कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है।

आशुतोष कुमार सिंह

ब्रेथवर्क : सुंदर सांसों की कला

कन्या राशि की होने के नाते लोगो से भावनात्मक तल पर जुड़ने का मेरा स्वभाव है और लोगो की समस्याएं सुनने और जानने और उनका समाधान निकालना मेरे काम का ही नही मेरे होने का भी ढंग है.यह सब अनुभव करते करते मैंने जाना प्रत्येक व्यक्ति के अपने संकोच, तनाव, कठोर विचारधाराएं और डर होते है जो उन्हें शांत नही होने देते. इसके चलते शरीर के कुछ अंगों में तकलीफ भी होती है. पेट से लेकर आँखों की तकलीफ तक सब कुछ उन्हीं मनोस्थिति का परिणाम है जिनके साथ हम रात – दिन और कहना चाहिए उम्रः भर रहते है. इसका सबसे बड़ा कारण है हमारा, हमारी साँसों के साथ लयबद्ध न होना.

अपनी साँसों को महसूस करना, गहरी और लम्बी सांस लेना, सांस के केंद्र ‘नाभि ‘ से जुड़ना, सांस को लयबद्ध रखना. इसी को मै ‘ब्रेथवर्क ‘ या सुंदरता से सांस लेने की कला कहती हूँ.

मेरी योग कक्षाओ में लोग विभिन्न समस्याओं और विभिन्न मनोदशाओं के साथ प्रवेश करते है और जब मैं उनसे कहती हूं कि आपको अपनी सांस लेने का तरीका बदलना होगा या सही तरीके से सांस लीजिये और आप ठीक हो जाएंगे, तो अधिकांश लोग मुझे अचरज से देखते है. पहली बार में यह उन्हें विश्वास करने योग्य नही लगता परन्तु उनका इस तरीके को सिखने के लिए दर्शाया गया नजरिया ही मुझे उनके स्वभाव की आधी जानकारी दे चुका होता है.

दरअसल जब हम साँसों पर प्रयोग करते है तो हमे न सिर्फ प्राणायाम, ब्रीथिंग एक्सरसाइज या राइट ब्रीथिंग ही नही सीखनी होती है, हमे अपने मनोस्थिति को आमने – सामने देखने का हौसला भी दिखाना होता है. हमे अपने भय और संकोचों को हटाने से पहले उन्हें देखना और स्वीकार करना होता है , जो कि नकारात्मक ऊर्जा से घिरे व्यक्ति के लिए आसान काम नही है. ब्रेथवर्क से जुड़े प्रयोगों के लिए दूसरी अनिवार्य शर्त होती है…वर्तमान में प्रवेश करने की. सुन्दर साँसों के प्रयोग कल्पनाओं या तर्को के साथ संभव नही है. इन्हें अभी और यहाँ रह कर ही किया जा सकता है. यह आपको तत्क्षण अतीत और भविष्य से निकाल कर वर्तमान में खड़ा कर देते है. हमारा स्वाभाविक संस्कार यह होता है की हम अपनी परेशानियों को अतीत का परिणाम मानते है और जब यह ख्याल छोड़ना पड़ता है तो तकलीफ होती है. क्यों ?…क्योंकि उसी समय हमे अपनी समस्याओं की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है.कुल मिला कर ब्रेथवर्क के प्रयोगों को प्रारम्भ करने के साथ ही हम अपने ऊपर बहुत सारा मनोवैज्ञानिक कार्य कर चुके होते है. इन प्रयोगों के साथ हमें अद्भुत अनुभव मिलते हैं क्योंकि तब हम अपनी शरीर की ऊर्जा को नई दिशा देने के लिए उनसे जुड़ते है. यक़ीन मानिए जब मेरे सामने कोई व्यक्ति पहली बार अपनी साँसों के साथ सम्बन्ध स्थापित कर खुश होता है तो मेरा सुकून भी असीम होता है.

क्या इस बात में कोई शंका है की जो लोग अधिक श्वास लेते है उनके  मस्तिष्क को अधिक ऑक्सीजन मिलती है और जिस मस्तिष्क को अधिक ऑक्सीजन मिलती है उनकी कार्य क्षमता दूसरों की अपेक्षा अधिक होती है. मस्तिष्क की कार्य क्षमता न सिर्फ हमारी बौद्धिक विकास बल्कि हमारी सर्जनात्मकता, हमारे बोध, हमारे विवेक और हमारी संवेदनशीलता और यहां तक की हमारे शरीर की ताकत को भी निर्धारित करती है.

सांस का एक प्रयोग 

पंद्रह मिनट का यह प्रयोग गहन विश्रांति और मौन के भाव को बड़ा कर देता है. आरामदायक स्थिति में बैठ कर गहरी सांस बाहर छोड़ो और सांस छोड़ते समय आँखे बंद रखो और अंदर जो खाली स्थान निर्मित हुआ है उसमें प्रवेश करो. अब शरीर को स्वयं सांस लेने दो और इस वक्त आँखे खोले और बाहर जाएं. यह छोटा सा प्रयोग  ‘ध्यान’ के लिए बहुत अच्छी पृष्ठभूमि बनाता है.

सांस लेने का सही तरीका

ब्रेथवर्क के प्रयोगो के लिए हमे सही तरीके से सांस लेना आना चाहिए. हममें से अधिकांश लोग गलत तरीके से सांस लेने की आदत निर्मित कर चुके है परन्तु कुछ दिन के जागरूक प्रयास से हम सही सांस ले सकते है. सबसे पहले गहरी धीमी सांस नाभि तक लें और पेट अंदर होने वाली हलचल पर गौर करें. सही सांस लेने की स्थिति में हमारा डायफ्राम नीचे पेट की ओर गति करता है और इससे छाती में एक वैक्यूम बनता है और जितना वैक्यूम बनेगा उस मात्र में ऑक्सीजन हमारे शरीर में प्रवेश करेगी और जब सांस बाहर निकलती है तो यह डायफ्राम पुनः अपनी स्थिति में आ जाता है. डायफ्राम के नीचे गति करने की क्रिया से न सिर्फ पेट के अंगो में प्राण वायु का संचार होता है बल्कि पेट के अंगो की प्राकृतिक मालिश भी होती है, जो की पाचन तंत्र से जुडी सभी ग्रंथियों और अंगो को स्वस्थ रखती है.

डायफ्राम की शक्ति को बढ़ाने का प्रयोग

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की गहरी सांस लेने पर डायफ्राम अपने स्थान से 15 से. मी. पेट की ओर गति करने की क्षमता रखता है. बीजिंग यूनिवर्सिटी में इसे नापने के लिए वर्षो से ताइ ची एवं ची कुंग (चाइनीज योग) कर रहे दस गुरुओं पर अध्ययन किया गया. इस अध्ययन में आये आकड़ों का औसत निकला 13.5 से. मी. देखा जाए तो यह आश्चर्यजनक प्रमाण है क्योंकि हमारी डायफ्राम मात्र 5-6 से. मी. नीचे खिसकती है और तनाव की स्थिति हो तो यह मात्र 1 या 2 से. मी. नीचे जाती है. डायफ्राम की शक्ति को बढ़ाने के लिए एक भरपूर गहरी सांस ले, उसे रोक ले. अब बिना सांस बाहर छोड़े एक छोटी सांस ले और सांस को रोके रखे. जितनी देर आप सांस रोक सकते है डायफ्राम उतना शक्तिशाली है. यह प्रयोग खाली पेट करें.

ताओ की प्राण साधना

1 -सांस को धीरे धीरे नाभि पर ले जाना.

2 -सांस को छोड़ने पर ज्यादा ध्यान देना.

3-सांस के आने जाने को पृथक न समझे.

प्राण के साथ एक हो जाएं

सांस का जो प्राथमिक स्रोत है, जापानी भाषा में उसके लिए एक शब्द है. वह शब्द है ‘तांदेन ‘. नाभि से 2 इंच नीचे, इस बिंदु से सांस का सम्बन्ध होता है और जितना तनावग्रस्त व्यक्ति होगा, तांदेन से सांस का बिंदु उतना ही दूर हटता जाता है.

उक्त सभी प्रयोग हमें सहजता और कोमलता से सांस लेना सिखाते है. यह प्रयोग हमे हमारी साँसों से ही जोड़ने का काम करते है. इसके अभ्यास के बाद हम प्राकृतिक रूप से सुन्दर सांस लेने की योग्यता पा लेते है और तब हमें किसी भी विधि को पकड़े रहने की आवश्यकता नही है.आखिर में एक छोटी सी दुआ…मेरे मौला हर जिंदा आदमीं को मिले मनमुताबिक साँसे…

लेखक परिचयः इरा सिंह

इरा सिंह योग शिक्षक हैं। देश की जानी-मानी पत्र-पत्रिकाओं में इनके मनोविश्लेषनात्मक लेख प्रकाशित होते रहते हैं…

यूरोप में नहीं बिक पाएंगी हमारी आयुर्वेदिक दवाएं

People_living_with_HIV_AIDS_world_mapयूरोपीय यूनियन के एक कड़े फैसले के बाद 30 अप्रैल 2011 के बाद भारत की आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री पर उनके इलाके में पांबंदी लगा दी गई है। इन दवाओं के दुष्प्रभावों की बढ़ती शिकायतों के चलते अब यूरोपीय देशों में हर्बल दवाओं की बिक्री से पहले उनकी कड़ी जांच हो रही है। यदि दवाएं उनके वैज्ञानिक मानकों पर खरी नहीं उतरतीं हैं तो उन्हें बेचने की अनुमति नहीं होती है। यह हमारे एक पारंपरिक ज्ञान व उद्योग के लिए बड़ी चुनौती है, लेकिन यह बात स्वीकारना होग कि आज आयुर्वेद दवाओं के नाम पर बाजार में जो कुछ बेचा जा रहा है, उसके कुप्रभाव अंग्रेजी दवाओं से भी अधिक घातक हैं। पिछले दिनों अमेरिका के हावर्ड मेडिकल स्कूल ने अमेरिका में बिक रही कोई 70 भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं का अध्ययन किया तो उनमें सीसा, पारा, संखिया आदि की मात्रा जानलेवा स्तर तक मिली। इनमें से अधिकांश दवाएं भारत की नामी गिरामी दवा कंपनियों की थीं। जाहिर है कि अब हमारा देशी दवा उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिक नहीं पाएगा।

बढ़ता औद्योगिकीकरण, उससे उपजा प्रदूषण और इसकी देन घातक बीमारियां। इन बीमारियों से निबटने के लिए आई अंग्रेजी दवाओं की बाढ़ किसी नई बीमारी का बीज होते हैं। सो सुरक्षित दवाईयों के लिए लोग एक बार फिर अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की ओर लौटे। जब आम लोग त्वरित रोग मुक्ति के लालच में सस्ती अंग्रेजी दवाओं की ओर दौड़ रहे थे, तब भारत के अभिजात्य वर्ग और पश्चिमी देशों ने इस चिकित्सा पद्धति के कुप्रभावों को ताड़ लिया था। और उन्होंने जड़ी-बूटियां (फैशन में हर्बल) अपना ली थीं। उधर विदेशी दवाई कंपनियों ने जब देखा कि भारत की बहुसंख्यक आबादी उनकी ‘जहरीली’ दवाओं की आदी हो गई हैं तो उन्होंने धीरे-धीरे दाम बढ़ाने शुरू किए। आम लोगों को जब इस विदेशी कुचक्र की सुध लगी, तब तक देर हो चुकी थी। तपस्या से तैयार जड़ी-बूटियों की दवाओं का व्यावसायिकरण हो चुका था। आज बाजार आयुर्वेद दवाओं से पटा पड़ा है, लेकिन उनमें मुनियों की जन कल्याण भावना या धनवंतरी के रसशास्त्र का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है।

कोई 100 आयुर्वेदिक दवाओं में मानव शरीर के लिए घातक धातु पारद का इस्तेमाल धडल्ले से किया जा रहा हैं। अधिकांश आयुर्वेद दवाएं जिनके नाम के साथ ‘रस’ शब्द जुड़ा होता है, में पारे की बहुत अधिक मात्रा होती है। बावजूद इसके ऐसी दवाओं के कुप्रभावों को जांचने के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। कई सालों से पश्चिमी देश हमारी दवाओं का बाजार बंद करने के लिए प्रयासरत थे और प्रयोगशालाओं में ऐसी दवाओं के परीक्षण चूहों पर किए तो पाया कि उनकी आंतरिक कार्यप्रणाली पर खतरनाक असर पड़ा था। दावा किया गया कि ये दवाएं चूहों की तरह ही मानव शरीर पर भी विपरीत प्रभावकारी हैं। भारत सरकार ने इन रिपोर्टों को कतई गंभीरता से नहीं लिया। जब लगभग यही बात हावर्ड मेडिकल स्कूल ने कही तो सरकार में बैठे लोगों को देश की छवि ध्यान आया।

हालांकि आयुर्वेदाचार्य दावा करते हैं कि उनकी दवाईयों में प्रयुक्त पारा पहले परिष्कृत किया जाता है, जिससे उसका नुकसानदायक तत्व समाप्त हो जाता है। लेकिन परीक्षणों से सिद्ध होता है कि यह दावा गलत है, और दवाईयों में मौजूद पारे के कारण चूहों पर हानिकारक असर पड़ा था। ‘कजली’ एक आधारभूत दवा है और यह अधिकांश आयुर्वेदिक दवाओं का मुख्य हिस्सा होता है। इसका उपयोग त्वचा और यौन रोग आदि में मलहम के रूप में भी होता है। कोई 200 दवाएं होंगी, जिनमें ‘कजली’ प्रमुख घटक है। शोध के दौरान जिन चूहों को ‘कजली’ दी गई थी उनके शरीर में कई परिवर्तन देखे गए। इसमें मौजूद पारद के कारण चूहों की भूख, रक्त, सक्रियता और वजन घट गया। उनके मस्तिष्क, गुर्दे और यकृत में पाई गई पारद की उच्च मात्रा दर्शाती है कि यह धातु शरीर की कोशिकाओं द्वारा आसानी से अवशोषित की जा रही है।

‘कजली’ देना रोकने के कुछ दिनों बाद चूहों का फिर से परीक्षण किया गया, मालूम चला कि उनके गुर्दे और यकृत की कार्य प्रणाली न सुधरने की हद तक बिगड़ चुकी थी। कजली में 49 प्रतिशत पारद और 40 फीसदी गंधक होता है। सनद रहे कजली आमतौर पर प्रतिदिन 1000 मिग्रा की मात्रा में दी जाती है। डाक्टर आदमी के शरीर के प्रति किलो वजन के लिए 20 मिग्रा ‘कजली’ के हिसाब से दवा देते हैं। (माना जाता है कि मानव का मानक वजन 50 किग्रा है) ‘कफ’ के लिए प्रयुक्त दवा ‘बिसेस्वर रस’ में कजली के साथ लोहा और जड़ीबूटियां होती हैं। ‘‘मृत्युसंजीवनी रस’’ और ‘‘रस सिंदूर’’ स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक  के रूप में बेची जाती है। इन दोनों दवाओं में कुछ जड़ी बूटियों के अलावा मुख्य घटक कजली ही होता है। फायलेरिया, तपेदिक, बुखार में प्रयुक्त ‘नित्यानंद रस’ हो या फिर हृदय रोग की दवा ‘पंचानन रस’ या फिर मधुमेह का निदान ‘प्रमेह सेतु’ इन सभी में पारद की उंची मात्रा वाली ‘कजली’ मौजूद होती है।

अब भारत सरकार को आयुर्वेदिक दवाओं के उत्पादन के कड़े मानक बनाने चाहिए साथ ही यदि हमारे वैद्य कारखानों में बनी दवाईयों का मोह त्याग दें तो आयुर्वेद की पारंपरिक प्रतिष् ठबरकरार रखी जा सकती है।       

व्यावयासिक आयुर्वेदिक दवाओं में समस्या केवल पारद की मौजूदगी ही नहीं है। कुछ समय पहले मुंबई के भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर(बीएआरसी) ने कुछ आयुर्वेद दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई थी। इन दवाओं को ले रहे मरीजों के खून में यह जहर बुरी तरह घुल गया था बीएआरसी के वैज्ञानिकों ने ऐसे चार मरीजों का गहन परीक्षण किया जो आर्थोराईटिस या मधुमेह के कारण आयुर्वेद दवाएं खा रहे थे। इन दवाओं में सीसे की मात्रा लगभग आठ मिलीग्रा थी, जो रोजाना खाने या हवा के जरिए शरीर में पहुंच रहे सीसे की मात्रा से 80 गुना अधिक है। बीएआरसी की टीम ने एक अन्य विषैली धातु केडमियम को भी ऐसी दवाओं में पाया था। कुछ वर्ष पहले नेशनल इंस्टीट्सूट ऑफ ओक्यूपेशनल हेल्थ, अमदाबाद ने भी कुछ पारंपरिक दवाओं के नमूनों में सीसे की मात्रा पाई थी। इस संस्था के शोधकर्ताओं ने एक दवा में 27,500 पीपीएम और दूसरी में 9700 पीपीएम सीसे की मात्रा देखी थी।

एक स्थापित बहुराष्ट्रीय कंपनी का उत्पाद ‘इसेन्सल’ लीवर (यकृत) की बीमारियों की कारगर दवा के नाम पर बेची जाती है। एक स्वतंत्र संस्था ‘‘फाउंडेशन आफ हेल्थ एक्शन’’(एफएचए) के मुताबिक इस दवा में ऐसी कोई क्षमता नहीं हैं। तभी दो राज्यों महाराष्ट्र और गुजरात के खाद्य और औषधि नियंत्रक महकमे इस उत्पाद का लाईसेंस निरस्त कर चुके हैं। ‘एफएचए’ बताता है कि बहुप्रचारित ‘थर्टी प्लस’ भी एक हानिकारक दवा है। ‘‘कर्पुरआसव’’ में मौजूद अल्कोहल की अधिक मात्रा के कारण इसका सेवन शराबी लोग खुब कर करते है। नवंबर 1991 में इसी दवा (शराब) को पीने कारण दिल्ली में 200 मौतें हुई थीं। जो बच गए वे अंधे हो गए थे।

आयुर्वेद की शास्वत मान्यता आज के विकसित तकनीकी युग में भी पूर्णरूपेण खरी उतर सकती है, बशर्ते सुरक्षित और प्रभावी आयुर्वेद दवाओं के उत्पादन और पारंपरिक जड़ी-बूटियों के सही उपयोग की पद्धति को बरकरार रखा जाए। इसके लिए सरकार से कहीं अधिक कारगर कदम वे वैद्ध उठा सकते है, जो बगैर किसी मान्यता प्राप्त डिग्री के पुश्त-दर-पुश्त इस वेद-विद्या से उपचार में तल्लीन हैं। यूरोपीय देशों की प्रयोगशालाओं में परीक्षण की गई दवाएं कारखानों में बनी थीं। उनकी विपरीत रिपोर्ट से भारत के पारंपरिक ज्ञान पर सवालिया निशान खड़े हुए हैं। अब भारत सरकार को आयुर्वेदिक दवाओं के उत्पादन के कड़े मानक बनाने चाहिए साथ ही यदि हमारे वैद्य कारखानों में बनी दवाईयों का मोह त्याग दें तो आयुर्वेद की पारंपरिक प्रतिष् ठबरकरार रखी जा सकती है।

लेखक परिचयः पंकज चतुर्वेदी

देश की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में आपके जनसरोकारी लेख-आलेख प्रकाशित होते रहे हैं।

बदहाल स्वास्थ्य सेवाएँ संवैधानिक अधिकारों का हनन

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Amit Tyagi For Swasthbharat.in

सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली एक चिंता का विषय है। देश की आम जनता अपने अनुभव से इसे महसूस करती रही है अनेक अध्ययन और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े इस कटु सत्य से समय-समय पर हमें रूबरू करते रहे हैं। डेढ़ वर्ष पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रमेश ने स्वीकार किया कि देश की जन स्वास्थ्य व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में हम बांग्लादेश और केन्या जैसे गरीब देशों से भी पिछड़ चुके हैं।11SMSANITATION_103185g

एक कल्याणकारी राज्य भारत के लिए सोचने का समय आ गया है कि क्यों ‘स्वस्थ भारत’ हमारी पहली प्राथमिकता नहीं बन पा रहा है। ऊंची विकास दर के बावजूद सामाजिक विकास के मानकों पर हम पिछड़े हैं । संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास की रिपोर्ट प्रत्येक वर्ष हमें आगाह करती है कि स्वास्थ्य पर अभी हमें बहुत ध्यान देना है। सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था पर हमारा सरकारी खर्च काफी कम है। देश के चालीस फीसद से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। प्रसव के दौरान स्त्रियों और बच्चों की मृत्यु दर के मामले में भारत का रिकार्ड दुनिया में बेहद खराब है। साधारण बीमारियों से हर साल लाखों लोगों का मरना स्वास्थ्य सेवाओं मे हमारी अनदेखी का ही परिणाम है। एक ओर जहां सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा चिंता का विषय है वहीं निजी अस्पतालों में बीमार व्यक्ति के पैसे से उसका ही क्लिनिकल ट्राइल चिंता का विषय है। समृद्ध वर्ग का सरकारी सेवाओं पर भरोसा कम है इसलिए चिकित्सा पर देश में सत्तर फीसद स्वास्थ्य-खर्च निजी स्रोतों से पूरा किया जाता है।

इस संदर्भ मे बेहद महत्वपूर्ण तथ्य है कि अमेरिका जैसे विकसित और धनी देश में भी लोगों को अपनी जेब से चिकित्सा में इतना व्यय नहीं करना पड़ता। अधिकतर विकसित देशों ने सार्वजनिक चिकित्सा तंत्र को कमजोर करने की गलती नहीं की है। अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव में बराक ओबामा को दुबारा कामयाबी की एक बड़ी वजह उनकी ‘हेल्थ केयर’ योजना भी थी। इससे हमारे देश को कुछ सबक लेने की जरूरत है।

 

जब विशिष्ट वर्ग का संसाधनो पर एकाधिकार हो जाता है तब वो शिष्टता और नैतिकता को तांक पर रखकर धन और शक्ति अर्जित करने की प्रवृत्ति का परिचय देते हैं।    महात्मा गांधी

नई-नई बीमारियों के द्वारा निजी अस्पताल पैसा कमाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। जापानी बुखार, डेंगू, स्वाइन फ्लू के द्वारा मुनाफे को केंद्र में रख कर चलने वाले चिकित्सा के कारोबारियों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे इन समस्याओं से निपटने को प्राथमिकता देंगे। भारतीय नागरिकों पर  बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा किए जा रहे अवैध परीक्षणों पर सूप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को चेताया है। एक जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति आर एम लोढा और न्यायमूर्ति अनिल आर दवे की खंडपीठ का यहाँ तक कहना था कि दवाओं के अवैध परीक्षण देश में बर्बादी ला रहे हैं।  नागरिकों की मौत के जिम्मेदार परीक्षणों के इस धंधे को रोकने के लिए समुचित तंत्र स्थापित करने में सरकार क्यों विफल रही है। न्यायालय ने इसके साथ ही निर्देश भी दिया था कि देश में भविष्य मे अब सभी दवाओं के परीक्षण केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की देखरेख में ही होंगे। सरकार को स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तत्काल इस समस्या से निबटना चाहिए। अनियंत्रित परीक्षण देश में बर्बादी ला रहे हैं और सरकार गहरी नींद में है। यह जानकर हमें दुख होता है कि नियमों का प्रारूप दिखा कर ये कंपनियां हमारे देश के बच्चों को बलि का बकरा बना रहीं हैं।

चिकित्सकीय परीक्षण कितने खतरनाक हैं इसके लिए एक चौकाने वाला आंकड़ा आपके सामने रखता हूँ। अवैध परीक्षणों मे मानसिक रूप से बीमार 233 मरीजों  और 0-15 साल उम्र के 1833 बच्चों पर भी परीक्षण किए गए थे। जिसकी वजह से सन् 2008 में 288, 2009 में 637 और 2010 में 597 लोगों की जान चली गई। अब मेरे मेरे खयाल से  सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी इतना समझ सकता है कि परीक्षणों में जान गंवाने वाले व्यक्तियों के परिवारों पर क्या बीतती होगी। पहले तो परिवार महंगे खर्च के द्वारा पैसों से हाथ धो बैठता है और बाद मे अपने मरीज से भी। जान गंवाने वाले व्यक्ति तो वापस नहीं आ सकते हैं। किन्तु हम और हमारी सरकार की जागरूकता देश को अस्वस्थ और गरीब होने से तो बचा ही सकती है।

हमारे लिए अब उपयुक्त समय है कि हम इस बात को समझे कि स्वस्थ नागरिक ही विकसित भारत का निर्माण कर सकते हैं। एक बीमार राष्ट्र कभी ऊँचाइयाँ प्राप्त नहीं कर सकता। जन स्वास्थ्य समवर्ती सूची में आता है, यानी यह मसला केंद्र की जिम्मेदारी से भी ताल्लुक रखता है और राज्यों की भी। जबकि विधि जानकार होने के नाते मेरा ये मानना है कि स्वास्थ्य को मूल अधिकार के अंतर्गत रखना ही देशहित में है। संविधान का अनु. 21 हमें जीवन का अधिकार प्रदान करता है। मोहिंदर सिंह चावला के वाद में सरकारी कर्मचारी को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य माना गया। किन्तु देश के प्रत्येक नागरिक का स्वस्थ रहना देश हित मे ही होगा। संविधान का  अनु. -32  हमारे मूल अधिकारों को ही हमारा मूल अधिकार बनाता है ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी खतरनाक भी है और असंवैधानिक भी ।

कानून और संविधान में प्रावधान तो पर्याप्त हैं। नियत का पक्ष ज़्यादा महत्वपूर्ण है। संबन्धित व्यक्तियों की नेकनीयती बेहद संवेदनशील पक्ष है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सुविधाओं के सुदृढीकरण एवं सुधार हेतु देश के नौकरशाही को भी अंग्रेजी मानसिकता से उबरना होगा, क्योंकि केवल वातानुकूलित कक्ष में बैठकर सुदूर आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सुविधा को चुस्त नहीं किया जा सकता। बुनियादी स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है कि विधायिका एवं कार्यपालिका समाज के अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर अपनी कार्ययोजना बनाए ताकि आम नागरिकों को समतामूलक स्वास्थ्य सुविधा सुलभ हो सके। केवल स्वस्थ समाज से ही समृद्ध राष्ट्र की अवधारणा साकार हो सकेगी, इसके लिए सरकार, सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों एवं सभी संबन्धित व्यक्तियों मे प्रतिबद्धता आवश्यक तत्व है।

लेखक परिचय
विधि विशेषज्ञ, स्तंभकार अमित त्यागी जी के सारगर्भित लेख विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहें हैं। आपको आई.आई.टी. दिल्ली के द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। रामवृक्ष बेनीपुरी जन्मशताब्दी सम्मान एवं पं. हरिवंशराय बच्चन सम्मान जैसे उच्च सम्मानो के साथ-साथ आपको दर्जनों अन्य सम्मानों के द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है।

‘एड्स’ का समाजशास्त्र

पंकज चतुर्वेदी

एक अति गंभीर स्वास्थ्य समस्या घोषित हो चुकी एड्स की बीमारी अनेक सामाजिक समस्याएं और जटिलताएं पनपा रही है। यह संक्रामक रोग मनुष्य की बिगड़ी हुई जीवन शैली का खतरनाक परिणाम है। अवांछित, अनैतिक, अप्राकृतिक और उन्मुक्त यौनाचार इस संक्रमण का प्रमुख कारण हैं।

राजू सखाराम पटोले अपनी बस्ती में दया, सहयोग और सद्व्यवहार के लिए मशहूर था। बरबस कोई यकीन नहीं कर रहा था कि उसने अपनी बीबी और चार मासूम बच्चों की सिलबट्टे से हत्या कर दी। वह खुद भी नहीं जीना चाहता था, लेकिन उसे बचा लिया गया, तिल-तिल मरने के लिए। समाजसेवी के रूप में चर्चित राजू के इस पाशविक स्वरूप का कारण एक ऐसी बीमारी है, जिसके बारे में अधकचरा ज्ञान समाज में कई विकृतियां खड़ी कर रहा है। राजू को 1995 में डाक्टरों ने बताया था कि उसे एड्स है। इसके बाद अस्पतालों में उसके साथ अछूतों सरीखा व्यवहार होने लगा था। वह जान गया था कि उसकी मौत होने वाली है और उसके बाद उसके मासूम बच्चों और पत्नी का भी जीना दुश्वार हो जाएगा। फिलहाल राजू जेल में है और पुलिस ने उसे ‘कड़ी सजा’ दिलवाने के कागज तैयार कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली है। यह ऐसा पहला मामला नहीं है जब एड्स ने कई बेगुनाहों को जीते-जी मार डाला है।

एशियन विकास बैक की एक रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ता हुआ एड्स संक्रमण कोरिया, मलेशिया, ताईवान जैसे आर्थिक रूप से संपन्न और भारत, पाकिस्तान, फिलीपीन्स जैसे उभरते देशों के विकास में बड़ा अड़ंगा बन सकता है।

एक अति गंभीर स्वास्थ्य समस्या घोषित हो चुकी एड्स की बीमारी ऐसी ही अनेक सामाजिक समस्याएं और जटिलताएं पनपा रही है। यह संक्रामक रोग मनुष्य की बिगड़ी हुई जीवन शैली का खतरनाक परिणाम है। अवांछित, अनैतिक, अप्राकृतिक और उन्मुक्त यौनाचार इस संक्रमण का प्रमुख कारण हैं। साझा सूईयों से नशा करना, रक्तदान में बरती लापरवाहियां भी एड्स की जनक हैं। एशिया और तीसरी दुनिया के अविकसित या विकासशील देशों में इस संक्रमण का असर कुछ अधिक ही है। यह बात इंगित करती है कि एड्स के प्रसार में कहीं आर्थिक विषमता भी एक कारण है। एड्स से प्रभावित देशों की जनता अलबत्ता पहले ही गरीबी, कुपोषण से जूझ रही है, ऐसे में यदि वहां हालात पर काबू नहीं पाया गया तो आने वाले सदी में ये देश भीषण तबाही, जनहानि, और घोर त्रासदी से ग्रस्त होंगे। इसके कारण उद्योग, व्यापार, कृषि, पर्यटन के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था पर भी खतरे के बादल मंडरा सकते हैं। ऐसा कई अफ्रीकी देशों में हो भी चुका है। जांबिया का बार्कलेस बैंक केवल इस लिए बंद करना पड़ा क्योंकि उसके दस फीसदी कर्मचारी एड्स के शिकार हो कर मारे गए थे। युगांडा, कीनिया, सूडान और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में हालात बेहद नाजुक हैं। वहां का समूचा प्रशासनिक और चिक्त्सिा तंत्र ‘एड्स’ के हमले के सामने अकर्मण्य और असहाय स्थिति में है। सामाजिक ढ़ांचा तो अस्त-व्यस्त होने की कगार पर है। औद्योगिक ईकाईयां लगातार वीरान होती जा रहीं हैं। दूर क्यों जाएं , हमारे देश का पूर्वोत्तर राज्य की युवा पीढ़ी की बड़ा हिस्सा इस बीमारी की चपेट में है और सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी ना तो वहां की आर्थिक स्थिति सुधर पा रही है और ना ही सरकारी योजनाएं सफल हो पा रही हैं। मनरेगा और सूचना के अधिकार जैसी योजनाएं वहां कहीं दिखती तक नहीं हैं।

विशेषज्ञों की राय में इक्कीसवीं सदी का मध्य बेहद खौफनाक और त्रासपूर्ण होगा। एक ओर जहां सामाजिक और प्रशासनिक वयवस्था पर गहरा संकट आसन्न होगा वहीं दूसरी ओर आर्थिक व्यवस्था पर चौतरफा दबाव और दिक्कतों की मार होगी। ‘एड्स’ के बारे में सर्वाधिक चिंताजनक बात यह है कि आज तक उसका कोई सटीक इलाज नहीं खोजा सका है, ऐसे में नए-नए प्रयोग और झूठे-सच्चे दावों के फेर में पड़ कर लोग घोर निराशा और धोखे का शिकार होते जा रहे हैं।

ऐसी घटनाएं आए रोज पूरे देश से सुनाई देती हैं जिनमें एड्स से हुई एक मौत के बाद मृतक के परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। मृतक के परिवारजनों के खून में एचआइवी पोजिटिव पाया गया हो या नहीं, इसकी परवाह किए बगैर उनको स्कूल से भगा दिया गया। ऐसे लोग गांव-बस्ती से दूर एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं। यही नहीं ऐसे गांवों में दूसरे गांव के लोग शादी-ब्याह संबंध करने को राजी नहीं होते हैं। यह बानगी है कि एड्स किस तरह के सामाजिक विग्रह उपजा रहा है।

दुनिया भर में एचआइवी वाइरस से ग्रस्त 90 फीसदी लोग तीसरी दुनिया के देशों से हैं। अकेले भारत में इनकी संख्या 40 लाख से अधिक है। विकासशीलता के दौर में जब वहां प्रगति, विकास, शिक्षा व अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए अधिक धन व मानव संसाधन की जरूरत है, तब वहां के संसाधनों का एक हिस्सा एड्स से जूझने पर खर्च करना पड़ रहा है।  भारत को सन् 1990 से ही इसके लिए विदेशी कर्ज मिल रहा है। अनुमान है कि आज इस बीमारी पर होनो वाला खर्चा सालाना 11 अरब डालर पहुंच गया है।

एड्स को ले के फैली भ्रांतियों के हालात इतने गंभीर हैं कि महानगरों के बड़े अस्पताल व डाक्टर एचआईवी संक्रमितों का इलाज अपने यहां करने से परहेज करते हैं। ऐसे लोगों को काम नहीं मिलता, ऐसे में एचआईवी ग्रस्त लोगों की बड़ी संख्या  बेरोजगार के रूप में अर्थ व्यवस्था को आहत कर रही है। यहां जानना जरूरी है कि अभी तक उजागर एड्स के मामलों में 78 फीसदी अलग-अलग तरह के यौन संबंधों से पनपे हैं। गौरतलब है कि 20 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लोग सर्वाधिक यौन सक्रिय होते हैं। चिंता का विषय है कि जब इस आयुवर्ग के लोग एड्स जैसी बीमारी से ग्रस्त होंगे तो  देश को सक्रिय मानव शक्ति का कितना नुकसान होगा।

एशियन विकास बैक की एक रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ता हुआ एड्स संक्रमण कोरिया, मलेशिया, ताईवान जैसे आर्थिक रूप से संपन्न और भारत, पाकिस्तान, फिलीपीन्स जैसे उभरते देशों के विकास में बड़ा अड़ंगा बन सकता है। एड्स का वाईरस कई साल तक शरीर में छिप कर अपना काम करता रहता है। संक्रमित व्यक्ति में बीमारी पूरी तरह फैलने में पांच से दस साल लगते हैं और फिर उसकी मृत्यु छह महीने से दो साल के बीच हो जाती है। यानी एक इंसान को कई साल तक बीमारी से लड़ने, बेरोजगारी, सामाजिक उपेक्षा से जूझना होता है। बहरहाल तो जागरूकता और सुरक्षा ही इस रोग व उससे उपजी त्रासदियों से बचाव का एकमात्र तरीका है।

 

Pankaj Chaturvedi 

शिशुओं की मृत्यु पर स्वास्थ्य मंत्री चिंतित

  • स्वास्थ्य मंत्री ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
  • सहयोग का आश्वासन
  • पश्चिम बंगाल के प्रभावित इलाकों में विशेषज्ञ टीम रवाना

आशुतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली/ 25जुलाई/14

केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने पश्चिम बंगाल में एईएस और जेई के कारण नवजात शिशुओं की हो रही मौतों के संबंध में मुख्‍यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर केंद्र का सहयोग देने का प्रस्‍ताव दिया है।
अपने पत्र में डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा कि, ‘पश्चिम बंगाल से नवजात शि‍शुओं की मौतों की आ रही खबरों के चलते उन्‍होंने इसी माह प्रभावित इलाकों में विशेषज्ञों की टीमें भेजी हैं।’ ढांचागत मुद्दों पर काम करने पर जोर देते हुए डॉ हर्षवर्धन ने लिखा है कि, ‘एमसीएच मापदंडों पर मिलेनियम विकास लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने के लिए तय समय सीमा को पूरा होने में महज एक साल बाकी है, ऐसे में हमें ढांचागत मुद्दों पर काम करने की जरूरत है।’ पश्चिम बंगाल को इस बीमारी से निपटने के लिए हर संभव सहायता करने का प्रस्ताव देते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि, ‘मंत्रालय ने जेई के खिलाफ टीकाकरण अभियान की शुरूआत कर दी है और प्रभावित क्षेत्रों में तुरंत आवश्‍यक अस्‍पतालों के बनाने का रास्‍ता साफ कर दिया।’ उन्‍होंने जून महीने में बिहार में व्‍यापक टीकाकरण अभियान शुरू किए जाने की जानकारी भी दी। गौरतलब है कि बिहार के मुज्जफरपुर जिले में जापानी बुखार से लगातार नवजात शिशुओं की मौत हो रही है। इस बावत स्वास्थ्य मंत्री बिहार का दौरा भी किए थे।

2 लाख आंगनवाड़ी केन्द्रों को मिलेगी छत

 

आशुतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली/ नई राजग सरकार ने आते ही नीतिगत फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। इस कड़ी में सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2 लाख आगनवाड़ी केन्द्र की इमारतें बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।2013-14 में 20000, 2014-15 में 50,000, 2015-16 में 60,000 व 2016-17 में 70,000 आंगनवाड़ी केन्द्रों को क्रमशः अपना छत नसीब होगा।

राज्यसभा में दिए लिखित उत्तर में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने बताया कि इन इकाईयों का निर्माण 4.5 लाख रुपये प्रति इकाई के दर से किया जाएगा, जिसके खर्च का वहन केन्द्र और राज्यों के बीच 75:25 के अनुपात में होगा, जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए यह अनुपात 90:10 है।

उन्होंने यह भी बताया कि अब तक राज्यों को 44,709 आंगनवाड़ी केन्द्र इमारतों के निर्माण को मंजूरी दी गई है, जिसमें ओड़िशा में 5556 इमारतों का निर्माण शामिल है। बजट आवंटन के संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2013-14 में राज्यों/ केन्द्रशासित प्रदेशों को 72,334.01 लाख रुपये की पहली किस्त जारी कर दी गई है।

सरकार के इस फैसले से बिना छत के चल रहे आंगनवाड़ी केन्द्रों को अपना छत मिल जायेगा। इस फैसले का आंगनवाणी कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है।

 

एमसीआई और स्वास्थ्य मंत्रालय में तकरार

 

मेडिकल कालेजों में सीटें रद्द करने के लिए डॉ. हर्षवर्धन ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की आलोचना की 

 

आशुतोष कुमार सिंह

 

नई दिल्ली/  नई सरकार बनते ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मनमानियों पर उंगली उठनी शुरू हो गयी है। इस बार किसी और ने नहीं बल्की खुद देश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने एमसीआई के काम करने के तरीके की आलोचना की है। स्वास्थ्य मंत्री मेडिकल कॉलेजों में सीटें रद्द करने के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की आलोचना की है। एम.सी.आई के इस कृत्य को छात्र विरोधी कदम बताते हुए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के इस कदम के कारण 2014-15 के अकादमिक सत्र में 1,170 सीटों का नुकसान हुआ है और कई प्रतिभावान विद्यार्थियों का सपना टूट गया है।

गौरतलब है कि कि 31 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने मंत्रालय की उस याचना को खारिज कर दिया था, जिसमें मंत्रालय ने प्रार्थना की थी कि नये मेडिकल कालेजों को मंजूरी देने और पुराने कालेजों में मौजूदा सीटों की अनुमति के नवीनीकरण के लिए समय सारणी में बदलाव करने की जरूरत है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि, ‘अदालत में हमारे निवेदन को समर्थन देने के बजाय मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने इसका विरोध किया, जिससे मैं हैरान हूं कि वे किसकी तरफ हैं।’

उन्होंने आगे कहा कि, मौजूदा सीटें बढ़ाने के लिए कई आवेदन आये हैं क्योंकि नये मेडिकल कॉलेज खोले जाने हैं और पुराने मेडिकल कालेजों की सीटें बढ़ाई जानी हैं। इसके मद्देनजर 2,750 सीटों को मंजूरी दी गई है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के मानदण्डों पर असफल हो जाने के कारण 3,920 सीटों के नवीनीकरण के आवेदनों को रद्द कर दिया गया है। इसके कारण 1,170 सीटों का कुल ऩुकसान हुआ है। प्रभावित होने वाले 46 मेडिकल कालेजों में से 41 निजी कालेज हैं। मंत्रालय ने इस संबंध में 150 मामले, जिनमें ज्यादातर सरकारी कालेजों के हैं, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को समीक्षा के लिए भेजे थे लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया है।

मधुमेह की दवाइयां हुई 79 फीसद सस्ती!

  • डेस्कमहंगी दवाइयों की गुंज अब संसद में भी सुनाई देने लगी है। पिछले दो-तीन वर्षों से महंगी दवाइयों को लेकर लगातार आंदोलन होता रहा है। रसायन व उर्वरक राज्य मंत्री निहाल चंद ने राज्यसभा में पूछे गए महंगी दवाइयों के सवाल के जवाब में लिखित उत्तर देते हुए कहा कि, मधुमेह और हृदय रोग के उपचार से संबंधित गैर-अधिसूचित 108 दवाओं के सदंर्भ में अधिकतम खुदरा मूल्‍य (एमआरपी) की सीमा तय करने के लिए राष्‍ट्रीय औषधीय मूल्‍य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की पहल के परिणामस्‍वरूप इन दवाओं की कीमतों में लगभग 01 प्रतिशत से लेकर 79 प्रतिशत तक कमी आई है।’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये 108 दवाएं अनिवार्य दवाओं की राष्‍ट्रीय सूची में शामिल नहीं हैं और औषधि मूल्‍य नियंत्रण आदेश, 2013 के पैरा 19 के अधीन इनकी कीमतों में कमी की गई है। उनका यह भी कहना था कि कुछ दवा निर्माता संघों ने एनपीपीए द्वारा इन संबंधित अधिसूचनाओं को वापस लेने की मांग की है।

    इस बावत स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशुतोष कुमार सिंह का कहना है कि जब देश में दवाइयों का मुनाफा 1000 फीसदी हो वहां पर 50-100 फीसदी दाम कम हो जाने से बहुत फायदा नहीं होने वाला है। श्री आशुतोष ने सरकार को दवाइयों के निर्माण में खुद आगे आने की अपील की और कहा की जिस देश का घरेलु दवा बाजार 1 लाख हजार करोड़ रूपये के आस-पास हो, वहां की सरकार इसे निजी हाथों में कैसे छोड़ सकती है!

    नोटःयह खबर बियोंड हेडलाइन्स डॉट कॉम पर प्रकाशित है

 

डायरिया से प्रत्येक वर्ष 1.36 मिलियन बच्चों की हो रही मौत!

”अतिसार पर काबू पाने के लिए आसान उपायों के बारे में व्यापक जागरूकता पैदा करने की जरूरत” डॉ. हष वर्धन ने शौचालय बनाने के लिए योजना में सीएसआर फंड के इस्तेमाल को कहा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने आज भारत के कॉर्पोरेट क्षेत्र से शौचालय बनाने के लिए राष्ट्रव्यापी परियोजना में योगदान की अपील की । उन्होंने कहा कि सरकार ने इससे पहले व्यापक स्तर पर ऐसो कोई प्रयास नहीं किया है तथा इसकी सफलता बहुत कुछ इस आम सहमति पर टिकी है कि खुले में शौच जाना राष्ट्रीय समस्या है और यह समाप्त होनी चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री ने अपने मंत्रालय के पहले ” तीव्री कृत अतिसार नियंत्रण पखवाड़े” की शुरुआत करते हुए कहा, ”हमारे प्रधानमंत्री ने इस कुप्रथा को बंद करने का प्रण लिया है। ” डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के इस्तेमाल से हर भारतीय के लिए शौचालय का उनका सपना साकार करने में मदद मिलेगी। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि सरकार ने लंबे से चली आ रही समस्याओं के असाधारण समाधान पर अभूतपूर्व बल दिया है। उन्होंने कहा, ” बहुत वर्षों से बहुत कुछ किया गया है। अब हमें ऐसे विचारों की जरूरत है जो नई राह को परिभाषित करे और उसके लिए साहसिक कार्य करने की जरूरत हो। ” उन्होंने कहा कि भारत के स्वास्थ्य प्रशासक अतिसार प्रबंधन के बारे में व्यापक जागरूकता फैलाने में नाकाम रहे हैं और यह तथ्य स्पष्ट करता है कि पिछले कार्यक्रम पर्याप्त नहीं थे। इसलिए लोगों से संवद करने के नए श्रेष्ठ तरीकों के बारे में सोचने का समय आ गया है। दस्त या अतिसार से हर साल 1.36 मिलियन बच्चे मरते हैं जो बच्चों की मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा, ” मृत्यु दर कम करने के लिए हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। सितंबर 2015 तक हमें संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को हासिल करना है। इसलिए मैं बच्चों की मृत्यु की महाविपत्ति की चुनौती से निपटने के लिए प्रयासों के व्यापक तालमेल की अपील करता हूं। ” ” तीव्रीकृत अतिसार नियंत्रण पखवाड़े” के औचित्य के बारे में डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा कि इससे अतिसार नियंत्रण उपायों को तेज करने के लिए केंद्र और राज्यों के स्तर पर तथा स्वयं सेवी क्षेत्र से स्वास्थ्यकर्मी एकजुट होंगे। यह अनिवार्य सेवाओं का समूह है जिसमें जागरूकता फैलाने में तेजी लाने, इस चुनौती से निपटने की तरफदारी करने, अधिक ओआरएस-जिंक केंद्रों की स्थापना, जरूरत पड़ने पर बच्चों वाले परिवारों तक ओआरएस पैकेट जैसे समाधान पहुंचाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करना शामिल है। डॉ. हर्ष वर्धन ने माताओं से अपील की कि वे दस्त लगने पर भी छह महीनों से कम आयु के बच्चों को स्तानपान कराना बंद न करें। यह शिशु और बच्चों को स्तानपान कराने की बेहतरीन परिपाटियों का ज्ञान फैलाने के आइडीसीएफ के कार्यक्रम के तहत शामिल है। एक प्रस्तुति के जरिए इस कार्यक्रम का ब्योरा देते हुए अमरीका के जॉन हॉकिन्स विश्वविद्यालय के डॉ. माथूराम संतोषम और स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव डॉ. राकेश कुमार ने कहा कि साफ-सफाई के बारे में पखवाड़े भर के तीव्रीकृत जागरूकता अभियान तथा समुचित आयु वर्ग के बच्चों को स्तनपान कराने की आदत तथा ओआरएस एवं जिंक थॅरेपि को प्रोत्साहन राज्य, जिला और ग्राम स्तर पर आयोजित किए जाएंगे। यूनिसेफ इंडिया प्रतिनिधि श्री लुईस-जॉर्ज आर्सेनॉल्ट ने ” तीव्रीकृत अतिसार नियंत्रण पखवाड़े” के आयोजन के लिए मंत्रालय की प्रशंसा करते हुए कहा कि इससे जीवन-रक्षक कार्यक्रमों तक पहुंच बढ़ाने के जरिण् देश में बच्चों की मृत्यु रोकने के लिए भारत के प्रयासों में फिर से जोश भरा जा सकेगा। भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख डॉ. नाटा मेनाब्डे ने कहा, ” विकासशील जगत में अनेक बच्चे स्वास्थ्य, स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल और व्यापक स्तनपान के लिए गंभीर बीमारी होने पर तत्काल चिकित्सा देखभाल हासिल नहीं कर सकते। ये अतिसार नियंत्रण के महत्वपूर्ण घटकों में शामिल होने चाहिए। केंद्रीय गृह सचिव श्री लव वर्मा ने कहा कि टीकाकरण एवं बाल स्वास्थ्य सेवाओं तक हाल के दिनों में पहुंच बढ़ने के बीच शिशु और बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है। ”