बजट 2016: नई स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की होगी शुरूआत, प्रति परिवार 1 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा

राष्‍ट्रीय डायलिसिस सेवा कार्यक्रम शुरू किया जाएगा

healthकेंद्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने आज लोकसभा में वित्‍त वर्ष 2016-17 का आम बजट पेश करते हुए एक नई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा योजना की घोषणा की है। संसद में अपनी बजट घोषणा में वित्‍त मंत्री ने चिंता जताई कि परिवार के सदस्‍यों की गंभीर बीमारी गरीबों एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालती है। ऐसे परिवारों की सहायता करने के लिए सरकार एक नई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा योजना शुरू करेगी जो प्रति परिवार 1 लाख रुपए तक का स्‍वास्‍थ्‍य कवर प्रदान करेगी। वहीं घर के बुजु्र्ग को 35 हजार रुपये और कवर मिलेगा…।

वित्‍त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा कि किफायती दामों पर गुण्‍वत्‍तापूर्ण दवाओं का निर्माण करना एक बड़ी चुनौती रही है। उन्‍होंने कहा कि हम जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में फिर से तेजी लाएंगे और 2016-17 के दौरान प्रधानमंत्री की जन औषधि योजना के तहत 3000 स्‍टोर खोले जाएंगे। वित्‍त मंत्री ने एक ‘राष्‍ट्रीय डायलिसिस सेवा कार्यक्रम’ शुरू करने का प्रस्‍ताव रखा है। इसके लिए राशि पीपीपी मॉडल के जरिए राष्‍ट्रीयस्वास्थ्य य मिशन के तहत उपलब्‍ध कराई जाएगी जिससे कि सभी जिला अस्‍पतालों में डायलिसिस सेवाएं मुहैया कराई जा सके।

हम क्या चाहते हैं…


भारत को स्वस्थ बनाना…जाने कैसे…

 

किसी भी राज्य के विकास को समझने के लिए नागरिक-स्वास्थ्य को समझना आवश्यक होता है। नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य राष्ट्र की प्रगति को तीव्रता प्रदान करता है। दुनिया के तमाम विकसित देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतनशील व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दुस्तान में स्वास्थ्य चिंतन न तो सरकारी प्राथमिकता में है और न ही नागरिकों की दिनचर्या में। हिन्दुस्तान में स्वास्थ्य के प्रति नागरिक तो बेपरवाह है ही, हमारी सरकारों के पास भी कोई नियोजित ढांचागत व्यवस्था नहीं है जो देश के प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य का ख्याल रख सके।

स्वास्थ्य के नाम पर चहुंओर लूट मची हुई है। आम जनता तन, मन व धन के साथ-साथ सुख-चैन गवां कर चौराहे पर किमकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में है। घर की इज्जत-आबरू को बाजार में निलाम करने पर मजबूर है। सरकार के लाख के दावों के बावजूद देश के भविष्य कुपोषण के शिकार हैं, देश की जन्मदात्रियां रक्तआल्पता (एनिमिया) के कारण मौत की नींद सो रही हैं।

दरअसल आज हमारे देश की स्वास्थ्य नीति का ताना-बाना बीमारों को ठीक करने के इर्द-गीर्द घूम रही है। जबकि नीति निर्धारण बीमारी को खत्म करने पर केन्द्रित होने चाहिए। एक पोलियो से मुक्ति पाकर हम फूले नहीं समा रहे हैं, जबकि इस बीच कई नई बीमारियां देश को अपने गिरफ्त में जकड़ चुकी हैं।

मुख्यतः आयुर्वेद, होम्योपैथ और एलोपैथ एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से बीमारों का इलाज होता है। हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा एलोपैथिक पद्धति अथवा अंग्रेजी दवाइयों के माध्यम से इलाज किया जा रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि अंग्रेजी दवाइयों से इलाज कराने में जिस अनुपात से फायदा मिलता है, उसी अनुपात से इसके नुकसान भी हैं। इतना ही नहीं महंगाई के इस दौर में लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा है। ऐसे में बीमारी से जो मार पड़ रही है, वह तो है ही साथ में आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इन सभी समस्याओं पर ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वास्थ्य की समस्या राष्ट्र के विकास में बहुत बड़ी बाधक है।

ऐसे में देश के प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ रखने के लिए सरकारी नीति बननी चाहिए न कि बीमार को स्वस्थ करने के लिए। ऐसे उपाय पर ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे कोई बीमार ही न हो। इस परिप्रेक्ष्य में स्वास्थ्य नीति बनाते समय सरकार को कुछ खास बिन्दुओं पर ध्यान जरूर देना चाहिए।

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को नागरिकों के उम्र के हिसाब से तीन भागों में विभक्त करना चाहिए। 0-25 वर्ष तक, 26-59 वर्ष तक और 60 से मृत्युपर्यन्त। शुरू के 25 वर्ष और 60 वर्ष के बाद के नागरिकों के स्वास्थ्य की पूरी व्यवस्था निःशुल्क सरकार को करनी चाहिए। जहाँ तक 26-59 वर्ष तक के नागरिकों के स्वास्थ्य का प्रश्न है तो इन नागरिकों को अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाना चाहिए। जो कमा रहे हैं उनसे बीमा राशि का प्रिमियम भरवाना चाहिए, जो बेरोजगार है उनकी नौकरी मिलने तक उनका प्रीमियम सरकार को भरना चाहिए।

शुरू के 25 वर्ष नागरिकों को उत्पादक योग्य बनाने का समय है। ऐसे में अगर देश का नागरिक आर्थिक कारणों से खुद को स्वस्थ रखने में नाकाम होता है तो निश्चित रूप से हम जिस उत्पादक शक्ति अथवा मानव संसाधन का निर्माण कर रहे हैं, उसकी नींव कमजोर हो जायेगी और कमजोर नींव पर मजबूत इमारत खड़ी करना संभव नहीं होता। किसी भी लोक कल्याणकारी
राज्य-सरकार का यह महत्वपूर्ण दायित्व होता है कि वह अपने उत्पादन शक्ति को मजबूत करे।

अब बारी आती है 26-59 साल के नागरिकों पर ध्यान देने की। इस उम्र के नागरिक सामान्यतः कामकाजी होते हैं और देश के विकास में किसी न किसी रूप से उत्पादन शक्ति बन कर सहयोग कर रहे होते हैं। चाहे वे किसान के रूप में, जवान के रूप में अथवा किसी व्यवसायी के रूप में हों कुछ न कुछ उत्पादन कर ही रहे होते हैं। जब हमारी नींव मजबूत रहेगी तो निश्चित ही इस उम्र में उत्पादन शक्तियाँ मजबूत इमारत बनाने में सक्षम व सफल रहेंगी और अपनी उत्पादकता का शत् प्रतिशत देश हित में अर्पण कर पायेंगी। इनके स्वास्थ्य की देखभाल के लिए इनकी कमाई से न्यूनतम राशि लेकर इन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाने की जरूरत है। जिससे उन्हें बीमार होने की सूरत में इलाज के नाम पर एक रूपये भी खर्च नहीं करने पड़े।

अब बात करते हैं देश की सेवा कर चुके और बुढ़ापे की ओर अग्रसर 60 वर्ष की आयु पार कर चुके नागरिकों के स्वास्थ्य की। इनके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सरकार को पूरी तरह उठानी चाहिए। और इन्हें खुशहाल और स्वस्थ जीवन यापन के लिए प्रत्येक गांव में एक बुजुर्ग निवास खोलने चाहिए जहां पर गांव भर के बुजुर्ग एक साथ मिलजुल कर रह सकें और गांव के विकास में सहयोग भी दे सकें।

आदर्श स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार को निम्न सुझाओं पर गंभीरता-पूर्वक अमल करने की जरूरत है। प्रत्येक गाँव में सार्वजनिक शौचालय, खेलने योग्य प्लेग्राउंड, प्रत्येक स्कूल में योगा शिक्षक के साथ-साथ स्वास्थ्य शिक्षक की बहाली हो। प्रत्येक गाँव में सरकारी डॉक्टरों की एक टीम हो जिनके ऊपर प्राथमिक उपचार की जिम्मेदारी रहे। प्रत्येक गाँव में सरकारी दवा की दुकान, वाटर फिल्टरिंग प्लांट जिससे पेय योग्य शुद्ध जल की व्यवस्था हो सके, सभी कच्ची पक्की सड़कों के बगल में पीपल व नीम के पेड़ लगाने की व्यवस्था के साथ-साथ हर घर-आंगन में तुलसी का पौधा लगाने हेतु नागरिकों को जागरूक करने के लिए कैंपेन किए जाए।

उपरोक्त बातों का सार यह है कि स्वास्थ्य के नाम किसी भी स्थिति में नागरिकों पर आर्थिक दबाव नही आना चाहिए। और इसके लिए यह जरूरी है कि देश में पूर्णरूपेण कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

यदि उपरोक्त ढ़ाचागत व्यवस्था को हम नियोजित तरीके से लागू करने में सफल रहे तो निश्चित ही हम ‘स्वस्थ भारत’ का सपना बहुत जल्द पूर्ण होते हुए देख पायेंगे।

 

1 reply
  1. सिद्धार्थ झ
    सिद्धार्थ झ says:

    भारत मे एक बड़ी आबादी आज भी स्वस्थ्य सेवाओं से मरहूम हें /कहने को हम इक्कीसवी सदी मे हें जरूर लेकिन भारतीयो के स्वथ्य का बड़ा दामोरदार नीम हकीमो या टेलीवीसनी बाबाओ के भरोसे है/ आज़ादी के बाद से ये हमारी बदकिस्मती रही हे की सरकार की नज़र मे बड़े भवन के अस्पताल की दीवारों ओर कमरो को अस्पताल मान लिया ज्ञ हे/अगर आप किसी ग्रामीण पृस्ठभूमि से आते ही तो आपने गौर किया होगा की कितने दिन उन भवनो मे डॉक्टर बैठते है या सहायक ही डिस्परीन ऐविल की गोली फंका कर चलता कर देता हे/ज़्यादातर डॉक्टर जो उन गाँव मे तैनात हे वो प्राथमिक स्वस्थ्य केंद्र मे बैठने की जगह शहरों मे अपनी प्राइवेट दुकान चलाते पाये जाते है/अगर कोई किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हे भी तो उसकी मौत तक भी उसे अपनी बीमारी का पता नही चलता आओर वो मजबूर हो जाता ही तिल तिल करके मरने के लिए/ देर सबेर किसी मरीज को सद्बुद्धि आ भी जाए तो वो दौरता हे जिला अस्पताल या एम्स की तरफ मूह उठाए/लेकिन कितने मरीज़ो की ओर किस स्टेज पर जांच बचती है ये शोध का विषय हो सकता हे/आइए अब तस्वीर का दूसरा भी रुख देखते है बड़ी संखया मे ग्रामीण आबादी आज शहरों की तरफ पलायन कर चुकी हे ओर इस मंहगाई के जमाने मे मजबूर है दिल्ली मुंबई के पुनर्वास बस्तियों मे नरकीय जीवन जीने के लिए जहा हजारो बीमारिया हर पल उसकी तरफ मूह बाए खड़ी है /उसकी रोज़मर्रा की कितनी आम्दनी हो सकती है ये बताने की जरूरत नही है और इस तरह की आपदा मे नीम हाकिम उसके लिए किसी भगवान से कम नही होते क्योंकि सरकारी अस्पतालो मे अक्सर हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है या दुतकारा जाता है ओर जो मुफ्त दावा की खिड़की होती है उसमे नब्बे प्रतिशत दवाइया वहाँ उपलब्ध ही नहीं होती/ अगर एड्मिट होने की नौबत आ जाए तो कितने कम बेड हैं ओर उस मरीज की क्या हालत होती है ये भी बताने की जरूरत नही है क्योंकि फर्श पर सोया मरीज ओर किसी पशु मे ज्यादा अंतर नही होता/मगर मरता क्या न करता वाली कहावत वहाँ चरितार्थ होती है/ और अब ज़रा शहरों की चकाचौंध पर भी नज़र दौराइए एक से बाद कर एक अस्पताल छोटे छोटे शहरों मे भी उपलब्ध है/ दूर दूर देश विदेश से मरीज भारत का रुख कर रहे हे क्योंकि आज हम स्वस्थ्य पर्यटन का केंद्र बिन्दु है कम कीमत पर विश्वस्तरिए स्वस्थ्य सेवाइन हम देने मे समर्थ हैं/ ये स्वस्थ्य सेवाय सती जरूर है लेकिन रुपय मे नही बल्कि डॉलर या यूरो मे भुगतान करने वालों के लिए/क्योंकि आम भारतीय की सालाना कमाई ही 35000 रु के आसपास बैठती है जबकि इन अस्पतालो का का शायद 3-4 दिन का बिल ही इससे कहीं ज्यादा/इस बार के बजट मे कहीं न कहीं इस समस्या को छूने की कोशिश की गई है जब वित्तमंत्री जी ने एक लाख रु के प्रति परिवार स्वस्थ्य बीमा की घोषणा की हे/ निसंदेह ये अच्छा कदम आओर सार्थक कदम है अगर सही दिशा मे रोड मैप तैयार करके इसको लागू किया जा सके/क्योंकि इससे पहले भी यूपीए सरकार द्वारा 30000 रु तक का स्वस्थ्य बीमा शुरू किया गया था लेकिन निजी अस्पतालो ने लालच मे आकार लोगो की जान हे लेनी तकरीबन शुरू कर दी थी और जब बीमा की रकम खतम हो जाती तो सड़क पर फेंक देते थे मरने के लिए/ये बीमा योजना न जाने कितनी ही जानो को लील गया होगा जिसका आज कोई आंकड़ा नहीं है / दूसरी बात आज भी जच्चा बच्चा स्वस्थ्य योजनाओ को बड़ी मात्र मे पैसा चाहिए जिस्पर सरकार को ओर अधिक् ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि प्रजनान्न के दौरान न जाने कितनी हे संख्या मे आज भी मौते हो रही है/स्वस्थ्य की दिशा म,ए पिछले कुछ समाई मे काफी क्रांतिकारी बदल्लाव हुए है ये स्वीकारने मे सरकार विरोधिओं को भी हिचक नही होनी चाहिए/ हाल ही मे कुछ एंटी बाइओटिक दवाइयों पर रेड लाइन देने का निर्देश सरकार ने दिया है जो आम जन मे उन दवाओ के प्रति जागरूकता लाएगा क्योंकि आज भी अधिकांश आबादी इस तरह की दवाओ को टॉफी कैंडी की तरह फाँकती है जिसके भविष्य मे उसके शरीर पर क्या दुष्परिणाम पड़ेगा उससे वो अनिभिज्ञ रहता है/ अगर ऐसे दवाओ काय प्रचार प्रसार ओर जन जागरूकता के द्वारा बहुत सी बड़ी सेयसत्य संबंधी परेशानिओ से वर्तमान मे निपटा जा सकता है /क्योंकि स्वस्थ्य रहने की कुंजी इलाज़ या दवाओ मे नही बल्कि निरोगी रहने मे है / इस बार के बजट की एक और जो बड़ी कामयाबी रही वो थी डायलिसिस केन्द्रो की तरफ सरकार का ध्यान गया/निसंदेह भारत मे किडनी के मरीज़ो की संकया मे प्रतिवर्ष बहुत तेज़ी से इजाफा हो रह है तकरीबन डेढ़ लाख मरीज हर साल बढ़ रहे हैं लेकिन उनको डाइलिसिस करवाने के लिए मिलो लंबा सफर करना पड़ता है /इसपेर भी प्रति डायलिसिस की कीमत ढाई से तीन हज़ार आती है जरा सोचिए उस गरीब या माध्यम वर्ग के बारे मे जिसको प्रति सप्ताह 2 डायलिसिस करवाना अनिवार्य है/ वो मरीज इससे अच्छा मर जाना पसंद करेगा क्योंकि वो इस खर्च का इंतजाम कहा से करे/ सभी किडनी के मरीज सिर्फ दारू पीने की वजह से नहीं होते बल्कि आज का वातावरण,प्रदूषण,मिलावट,दूषित खाना यर सब कहीं अधिक जिम्मेदार है शायद यही वजह है सरकार का ध्यान भी अपने इस नैतिक कर्तव्य की तरफ गया है / अंत मे यही कहना चाहूँगा स्वस्थ्य की दिशा मे हमको अभी भी मीलो लंबा सफर टाई करना है क्योंकि ये सफर इतना आसान भी नही है सवा साओ कारोड़ देशवासीओ का दर्मोदार अभी भी सरकार के कंधे पर है हलकी निजी छेत्र की भागीदारी की बिना लक्षय नामुमकिन है क्योंकि कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को भी
    इसमे अपनी भागीदारी करनी होगी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ्ना होगा जिससे जन जन स्वस्थ्य हो समृद्ध हो /

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