संतुलित भोजन जरूरी

हम दवा पर खर्च हजारों खर्च कर देते हैं लेकिन स्वस्थ रहने के लिए संतुलित भोजन नहीं लेते। आज हमारी निर्भरता दवाइयों पर बहुत बढ़ गई है। यदि हम अपने जीवन में कुछ बातों का ध्यान रखें तो एक अच्छा और निरोग जीवन जिया जा सकता है।  किसी ने ठीक ही कहा है-‘आहार के समान दूसरा कोई औषधि नहीं है।’ 

डॉ. रुचि भारद्वाज

vegetarian-main_0हमारे जीवन में भोजन का महत्वपूर्ण स्थान है। और स्वस्थ शरीर के लिए संतुलित भोजन जरूरी है। भोजन हमारे शरीर को शक्ति प्रदान करता है, लेकिन यदि हम संतुलित व पौष्टिक भोजन नहीं खाएंगे तो पूर्णत: स्वस्थ रहना असंभव है। वैसे स्वास्थ्य में पूर्णता हासिल करना असंभव है क्योंकि पूर्णता हमें कभी भी और किसी में भी नहीं दिखाई पड़ती, कहीं न कहीं कुछ कमी रह ही जाती है। यही वजह है कि विज्ञान की इतनी उन्नति के बावजूद हमारा जीवन रोगों से घिरा हुआ है। यहां तक कि नए-नए रोग पैदा हो रहे हैं। रोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन रोगों के कई कारण हैं, परंतु उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण है- हमारे भोजन का संतुलित और उचित न होना। अगर हम अपने भोजन पर ध्यान दें तो बहुत सी बीमारियों से बचा जा सकता है।
भोजन हल्का, सुपाच्य, सात्विक और स्वास्थ्यवर्धक होना चाहिए। यदि हमारा भोजन तामसिक, तला-भुना और भारी होगा तो वह हमारे शरीर में उत्तेजना पैदा करेगा और हमें रोगी बनाएगा। गौरतलब है कि शरीर स्वस्थ रहे इसके लिए शरीर में 85 प्रतिशत क्षारपन और 15 प्रतिशत अम्लता रहनी चाहिए। यदि शरीर में अम्लता अधिक होगी तो शरीर में रोग बहुत जल्दी होंगे। हमें अधिकांशत: क्षार प्रधान भोजन ही करना चाहिए। फल, दूध, सब्जी, अंकुरित अनाज, गुड़ आदि क्षार प्रधान खाद्य सामग्री हैं। अंकुरित अनाज को अपने आहार में कच्चा ही खाना चाहिए, यह एक अच्छा पौष्टिक नाश्ता हो सकता है। चावल-रोटी, तली-भुनी चीजें, पकौड़े, चाय, आलू, अम्लता देने वाले खाद्य सामग्री हैं। हमें अपने भोजन में इनका कम से कम इस्तेमाल करना चाहिए।
हमें अपने भोजन में सलाद को जरूर शामिल करना चाहिए। इसमें विटामिन और खनिज लवण के साथ-साथ फाईबर भी मिलता है जो कब्ज नहीं होने देता जो कि बहुत से रोगों की जड़ है। गाजर, टमाटर, खीरा, प्याज, मूली, शलगम, ककड़ी, बंदगोभी, पालक, चुकन्दर आदि कच्चे खाये जा सकते हैं, सलाद के रूप में। दूध पीना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह कैल्शियम का स्रोत है। स्वस्थ गाय का दूध सर्वश्रेष्ठ है, इससे कई रोगों से दूर रहा जा सकता है। वहीं छाछ या मट्ठा पाचन संबंधी रोगों से दूर रखते हैं।
प्राकृतिक रूप से ग्रहण किए जाने वले प्राय: सभी भोज्य पदार्थो में जीवन सत्व विद्यमान रहते हैं, परंतु जब हम उन्हें तेज आंच पर पकाते हैं तो उसकी अधिकांश पौष्टिकता, विटामिन और मिनरल्स नष्ट हो जाते हंै। इसलिए जो पदार्थ प्राकृतिक रूप से खाये जा सकते हैं उन्हें पका कर नहीं खाना चाहिए। हाल यह है कि हम भोजन के तत्वों को नष्ट कर लेते हैं और फिर उन्हीं तत्वों को हम पैसा खर्च करके दवाइयों या फिर मल्टीविटामिन्स सप्लीमेंटस के रूप में ग्रहण करते हैं जो शरीर को नुकसान भी पहुंचाती है। इसलिए जो पदार्थ कच्चे खाए जा सकंे उन्हंे थोड़ी मात्रा मंे प्रतिदिन खाते रहना चाहिए। कुछ ऐसे पदार्थ हैं जिनमें एक से अधिक तत्व रहते हैं, उन्हें अदल-बदलकर खाना चाहिए। हमारा भोजन इस तरह का होना चाहिए जिससे शरीर को आवश्यक सभी तत्वों को प्राप्ति होती रहे।
भोजन को लेकर हम बहुत लापरवाह रहते हैं। यह लापरवाही हम भोजन करते समय भी दिखाते हैं। ऑफिस का समय हो गया तो भोजन करना ही चाहिए यह एक प्रथा हो गई है। भूख लगी है या नहीं हमें इसकी परवाह नहीं होती। वास्तव में भोजन का समय तभी होना चाहिए जब हमें भूख लगे। तभी खाएं जब भूख से बेचैन हों। वह भी केवल उतनी मात्रा में जिससे भूख शांत हो जाए। हम कभी भी कम खाने से परेशान नहीं होते जितना की अधिक खाने से होते हैं। कम खाने से गैस नहीं बनती, पेट हल्का रहता है और भूख ठीक लगती है। भोजन हमेशा शांतिपूर्ण तरीके से मन की एकाग्रता के साथ करना चाहिए। तभी वह भोजन हमारे लिए उपयोगी होगा और स्वास्थ्य को सुधारेगा। बार-बार खाने की आदत को छोड़ंे, इससे पेट पर व्यर्थ का बोझ पड़ता है। दिन में तीन बार ही खाना चाहिए। सुबह नाश्ता, दोहपर और रात का भोजन। शाम को कोई भी मौसमी फल या कोई हल्का पेय या जूस।
स्वास्थ्य के लिए फलों का सेवन आवश्यक है। हर मौसम के फल खाने चाहिए क्योंकि सभी फलों में अलग-अलग पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं। रसदार फल, संतरा, मौसमी, माल्टा, अनार, शहतूत, अनानास आदि लाभदायक हैं। इनसे शरीर को क्षारपन अधिक मिलता है और शरीर स्वस्थ रहता है। इससे पाचन तंत्रों को आराम मिलता है और उनमें पाचन शक्ति बनी रहती है। बार-बार चाय-बिस्कुट, पकौडे़ खाते रहना पेट पर अत्याचार ही होगा और भूख भी नहीं लगेगी।
यह सच है कि शरीर को मीठे की आवश्यकता है परंतु यह भी सच है कि प्रत्येक भोज्य पदार्थ में थोड़ी-बहुत मात्रा में मीठे तत्व होते हैं। यदि मीठी चीजें खाने में आपकी रुचि है तो आप शहद और गुड़ का सेवन कर सकते हैं। सफेद चीनी, मिठाई और मैदा का कम से कम सेवन करना चाहिए। चीनी के स्थान पर गुड़ या शहद लाभदायक है। शहद में कैंसर निरोधक तत्व होते हैं। चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, तंबाकू, मांस-मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। यह पाचन तंत्र को बिगाड़ देते हैं और शरीर में अम्लता पैदा करते हैं। बार-बार चाय पीना हानिकारक है। इससे प्यास मिट जाती है और पाचन तंत्र शक्तिहीन हो जाते हंै। वहीं सब्जियां हमेशा मौसमी और ताजी लेनी चाहिए। बासी सब्जियों के तत्व नष्ट हो जाते हैं। बेमौसम की सब्जियों और फलों में न ही स्वाद होता है, न ही पौष्टिक तत्व।

(लेखिका एम.डी. (होम्यो.) और स्त्री एवं बाल रोग विशेषज्ञ हैं।)

श्रीपद येस्सो नाइक 12 दिसंबर, 2015 को वाराणसी में आरोग्य मेले का उद्धाटन करेंगे

उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार, बीएचयू एवं भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के सहयोग से 12-12-2015 से 15-12-2015 तक बीएचयू में आरोग्य मेले का आयोजन किया जा रहा है

sripad Naik, State Health Minister, India

sripad Naik, State Health Minister, India

नई दिल्ली/11.12.15 केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री श्रीपद येस्सो नाइक 12 दिसंबर, 2015 को वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपेथी पर एक व्यापक राष्ट्रीय स्तर के मेले का उद्धाटन करेंगे।

इस आरोग्य मेले को काफी महत्व दिया जा रहा है क्योंकि इसमें अंतर्राष्ट्रीय शिष्टमंडलों की भागीदारी होगी। भारत में 16 विदेशी मिशनों के अधिकारी उद्धाटन समारोह में भाग लेंगे। इसके अतिरिक्त 5 देशों की आयुष कंपनियों ने आरोग्य मेले में अपनी भागीदारी की पुष्टि कर दी है।

आयुष मंत्रालय 2005 से ही जागरुकता बढ़ाने एवं विभिन्न आयुष प्रणालियों में विकास प्रदर्शित करने के लिए भारत के बड़े शहरों में आरोग्य मेले का आयोजन करता रहा है। इस मेले को मिल रहे भारी जनसमर्थन को देखते हुए मंत्रालय उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार, बीएचयू एवं भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के सहयोग से 12-12-2015 से 15-12-2015 तक बीएचयू में आरोग्य मेले का आयोजन कर रहा है।

नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड (एनएमपीबी), इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्यूटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) के साथ आयुष प्रणाली की दवाओं में केंद्रीय अनुसंधान परिषदों/ राष्ट्रीय संस्थान और लगभग 80 निजी आयुष उद्योग इस चार दिवसीय मेले में भाग लेंगे और आयुष प्रणालियों के जरिये स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान, शिक्षा एवं उत्पादों के विकास के क्षेत्र में अपनी ताकत प्रदर्शित करेंगे। आरोग्य मेला आयुष के सभी तथ्यों को प्रदर्शित करने के लिए एक साथ आने के लिए आयुष के सभी हितधारकों को एक व्यापक मंच मुहैया कराता है।

मेले का उद्देश्य आयुष प्रणाली की कुशलता, उनकी निम्न लागत एवं सामान्य बिमारियों से बचाव एवं उपचार के लिए उपयोग में आने वाली जड़ी-बुटियों एवं पौधों की उपलब्धता के बारे में आम लोगों की जागरूकता को बढ़ाना है। यह सुविधा लोगों को विभिन्न जनसूचना माध्यमों के जरिये उनके दरवाजे पर ही उपलब्ध हो जाती है और इससे सभी लोगों के लिए स्वास्थ्य के लक्ष्य को अर्जित करने में भी सहायता मिलती है।

अपनी बदहाली पर रो रहा है 90लखिया होम्योपैथी लैब, पांच वर्ष गुजर गए एक भी कर्मचारी नहीं बहाल हुआ

प्रयोगशाला की बिल्डिंग के निर्माण में करीब 90 लाख रुपये की लागत आई थी उद्द्येश था कि पिछड़ती प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति होम्योपैथी को एक नया मुकाम देना। लेकिन इसे अधिकारियों की लापरवाही ही कहेंगे कि 5 साल बीत जाने के बाद भी अभी तक इस प्रयोगशाला में रिसर्च के लिए पदों का सृजन तक नहीं हो पाया है।

 

आधार में अटका होमिओपैथी लैब का प्रोजेक्ट

लखनऊ/25.10.15

लखनऊ में होम्योपैथिक दवाओं पर रिसर्च की भारत में दूसरे नंबर की प्रयोगशाला अभी तक शुरू नहीं हो पायी है। प्रयोगशाला बिल्डिंग के बने करीब 5 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद भी अभी तक ये प्रयोगशाला शुरू नहीं हो पाई है।

प्रयोगशाला के लिए लाखों की लागत से बनी चार मंजिला बिल्डिंग बनकर तैयार है। बिल्डिंग में एयर कंडीशन से लेकर पंखों तक लगाए गए हैं। इसके साथ ही प्रयोगशला के लिए उपकरणों को भी खरीदा जा चुका है, लेकिन प्रयोगशाला में रिसर्च के लिए कर्मचारियों की भर्ती नहीं हो पाई है। लापरवाही का आलम ये है कि अभी तक इस प्रयोगशाला में काम करने वाले पदों का सृजन ही नहीं हुआ है। ऐसे में होम्योपैथिक चिकित्सा की बदहाल स्थिति के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है।

बताते चलें कि साल 2009-10 में सिटी स्टेशन रोड स्थित उत्तर प्रदेश होम्योपैथिक मेडिसिन बोर्ड में होम्योपैथिक दवाओं पर रिसर्च के लिए प्रयोगशाला का निर्माण करवाया गया था। इससे पहले यहां होम्योपैथी की पढ़ाई करने वाले छात्रों का हॉस्टल था, जिसे गोमतीनगर स्थित होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज में शिफ्ट कर दिया गया था।

नहीं है सुरक्षा-व्यवस्था

सिटी स्टेशन रोड स्थित होम्योपैथिक मेडिसिन बोर्ड में बनी प्रयोगशाला में सुरक्षा-व्यवस्था नहीं है। चार मंजिले शीशे टूटे पड़े हैं। यहां रहने वाले कर्मचारियों का कहना है कि यहां से 4 महीने पहले कई एयर कंडीशन चोरी हो चुके हैं क्योंकि यहां पर किसी सुरक्षा गार्ड की तैनाती नहीं की गई है। बिल्डिंग में लगे खिड़कियों के शीशे टूटे पड़े हैं। इससे सरकार की ओर से प्रयोगशाला के लिए दिए गए बजट का दुरुपयोग है।

नीचे चलती है ओपीडी
होम्योपैथिक प्रयोगशाला के मैनगेट से जाने पर नीचे स्थित दो कमरों में ओपीडी चलती है। यहां पर आने वाले मरीजों की संख्या लगातार घटती जा रही है। यहां पर मौजूद एक डॉक्टर ने बताया कि मीठी गोली चिकित्सा पद्धति से इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या लगातार घटती जा रही है। इसका कारण है कि लोगों में इस चिकित्सा के बारे में जानकारी ही नहीं है। इसके अलावा केंद्र सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश मेडिसिन बोर्ड जरूर बना दिया गया है, लेकिन बोर्ड के लापरवाही अधिकारियों के कारण प्राचीन चिकित्सा पद्धति को नुकसान हो रहा है।

उत्तर प्रदेश होम्योपैथी मेडिसिन बोर्ड के सचिव डॉ विक्रमा प्रसाद ने बताया कि ये भारत में दूसरे नंबर की प्रयोगशाला है। अभी तक किसी कारणवश प्रयोगशाला में पदों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। इसके कारण अभी तक प्रयोगशाला की शुरुआत नहीं हो पाई हैं। जल्द से जल्द पदों को सृजित कर प्रयोगशाला को शुरू किया जाएगा।

साभार : पत्रिका

होम्योपैथी से सम्भव है कैंसर का इलाज

नई दिल्ली :  कैंसर जैसी बीमारी का इलाज होम्योपैथी से भी सम्भव है। साथ ही थैलीसेमिया, एचआईवी और दिल के मरीजों के लिए आर्टेरियल क्लीयरेंस थेरेपी का भी होम्योपैथी से इलाज किया जा सकता है। ऐसा कहना है डॉ. ए. एम माथुर का, जो वर्ल्ड होम्योपैथी डेवलपमेंट आर्गेनाइज़ेशन (डब्ल्यूएचडीओ) के संस्थापक अध्यक्ष हैं। डब्ल्यूएचडीओ के 11वें कैंसर क्योर कार्यक्रम में उन्होंने ये बात कहकर इन रोगों से ग्रस्त मरीजों को काफी उम्मीदें जगा दीं। कार्यक्रम का आयोजन राजधानी के फिक्की सभागार में शनिवार को आयोजित किया गया।

फोट क्रेडिट chicagolandhomeopathy.com

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डॉ. ए. एम माथुर देश के जाने माने होम्योपैथिक फिज़िशियन हैं और उन्हें कैंसर की 22 साल की रिसर्च के मद्देनज़र इंटरनैशनल साइंटिस्ट अवॉर्ड से भी नवाज़ा जा चुका है। अपनी रिसर्च के दौरान डॉ. माथुर ने हर तरह के कैंसर के निदान के लिए `कैंसर क्योर` नाम की होम्योपैथी दवा भी विकसित की। इस दवा को भारत सरकार के अंतर्गत पेटेंट किया जा चुका है। 15 साल पहले इसे 1837700 नम्बर के तहत पेटेंट किया गया। इस मौके पर डॉ. ए. एम माथुर ने बताया कि इस रोग के लक्षण सबसे पहले नाखुन, आंखों और जीभ पर दिखाई देते हैं। आंखों का रंग हल्का पीला पड़ जाता है। जीभ के दोनों किनारों पर गड्ढे दिखाई देने लगते हैं, जिन्हें आसानी से देखा जा सकता है और नाखूनों में सूखापन आ जाता है और वे काले पड़ने लगते हैं। इन तीनों लक्षणों से ये स्पष्ट हो जाता है कि मरीज़ को कैंसर है। डॉ. माथुर ने मानवीय शरीर में किसी भी तरह के कैंसर का पता लगाने का दावा किया। उनका कहना है कि उस स्थिति में किसी तरह के बायोस्पी टेस्ट की भी ज़रूरत नहीं पड़ती और छह महीने के अंदर ही किसी भी तरह के कैंसर का इलाज सम्भव है। डॉ. माथुर ने कहा कि वह अब तक कैंसर के 5800 मरीज़ों का इलाज कर चुके हैं और भी ऐसे सैंकड़ों मरीज़ों का इलाज चल रहा है।
इस मौके पर डॉ. ए. एम माथुर ने थैलीसेमिया नामक बीमारी पर अपनी रिसर्च का भी खुलासा किया। उनका कहना है कि होम्योपैथी से इसका इलाज सम्भव है और इस इलाज में किसी तरह की बोनमैरो को बदलने की भी ज़रूरत नहीं है। इस बीमारी के निदान के लिए रोडेक्स नामक दवा काफी उपयोगी साबित हो सकती है और इस दवा से वह अब तक 60 ऐसे मरीज़ों का इलाज कर चुके हैं। ऐसे मरीज़ों को ये समस्या जन्म से थी, जिसका निदान कर लिया गया और वे लोग आज स्वस्थ हैं। भारत में बोनमैरो का कोई बैंक ना होने से ऐसे मरीज़ों को ट्रांसप्लांटेशन के लिए अमेरिका, इटली और इंग्लैंड जाना पड़ता था लेकिन इनका इलाज भारत में ही सम्भव है। इसके अलावा डॉ. ए. एम. माथुर अब तक एचआईवी-एड्स के 50 मरीज़ों का इलाज कर चुके हैं और हार्ट पेशंट्स के लिए होम्योपैथिक मेडिसन हार्टकेयर डॉ. माथुर ने इजात की है। इस दवा के उपयोग से बाईपास सर्जरी की ज़रूरत नहीं है।

इन तमाम बीमारियों पर किए लम्बे रिसर्च को देखते हुए डॉ. ए. एम माथुर को सितम्बर 2000 में फिक्की सभागार में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इंटरनैशनल साइंटिस्ट अवॉर्ड से सम्मानित किया। इससे अगले वर्ष उन्हें इंटरनैशनल काउंसिल ऑफ होम्योपैथी (यूके) ने दिल्ली में ही उनकी इजाद की गई रोडेक्स दवा के लिए उन्हें नोवल प्राइज़ से सम्मानित किया। इसी वर्ष हरियाणा के राज्यपाल बाबू परमानंद ने उन्हें चंडीगढ़ में प्राइड ऑफ इंडिया अवॉर्ड दिया तो वहीं मॉरीशस के स्वास्थ्य मंत्री अशोक कुमार जगन्नाथ ने उन्हें डब्ल्यूएचडीओ के दिल्ली में आयोजित सेमिनार में मैन ऑफ द ईयर-2002 का पुरस्कार दिया। महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री ने उन्हें मुम्बई में क्रूसेडर ऑफ होम्योपैथी अवॉर्ड से सम्मानित किया। डॉ. माथुर भारत के अलावा मॉरीशस, लंदन, सिंगापुर और नेपाल में फ्री चेकअप शिविर लगा चुके हैं। इन बीमारियों पर जागरूकता लाने के लिए वो पम्फलेट्स और लीफलेट्स वितरित करने के अलावा पिछले दस वर्षों से सोशल वर्क में जुटे हुए हैं।

करगिल वॉर के बाद डॉ. माथुर ने करगिल के जवानों के लिए राजकोट और लुधियाना में रक्तदान शिविर आयोजित किए। डॉ. माथुर को ये शौक विरासत में मिला है। उनके दादा डॉ. मनोहर लाल माथुर और उनके बड़े भाई डॉ. चंद्र मोहन माथुर, अंकल डॉ. ललित मोहन माथुर और उनके पिता डॉ. हरि मोहन माथुर होम्योपैथी के जाने माने डॉक्टर रहे हैं।

 

 

देश में कुल 525 हैं आयुष महाविद्याल!

ayushहाल ही में भारतीय चिकित्सा पद्धति को विस्तारित करने के लिए आयुष मंत्रालय बनाया गया है। आयुष मंत्रालय के अंतर्गत आयुर्वेद, योग-प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी चिकित्सा पद्धति, सिद्ध चिकित्सा व होमियोपैथ चिकित्सा पद्धति आती है। इन छह पद्धतियों को विस्तारित करने के लिए भारत में कुल 525 महाविद्यालय हैं। आयुर्वेद के 281, यूनानी के 44, सिद्ध के 09 और होमियोपैथ के 191 महाविध्यालय हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि इस देश में भारतीय चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के लिए क्या किया गया है! संपादक

क्या कहते हैं आयुष राज्य मंत्री श्रीपद येस्सो नाइक…

sripad yesso naikस्‍वाथ्‍य सेवाएं राज्‍य सूची का विषय हैं अत: हर राज्‍य में आयुष चिकित्‍सकों के लिए विनियामक संस्‍थाएं हैं। लेकिन भारत सरकार ने इन चिकित्‍सकों के लिए दो विनियामक संस्‍थाएं स्‍थापित की हैं। भारतीय चिकित्‍सा परिषद (सीसीआईएम) भारतीय केन्‍द्रीय चिकित्‍सा परिषद अधिनियम 1970 के अंतर्गत शिक्षण संस्‍थानों का विनियमन करती है और आयुर्वेद, यूनानी और सिद्ध चिकित्‍सा पद्धतियों तथा केन्‍द्रीय होमियोपैथी परिषद ( होमियोपैथी केन्‍द्रीय परिषद अधिनियम 1973 के अंतर्गत काम कर रही) ये दोनों संस्‍थाएं शिक्षण संस्‍थानों और चिकित्‍सकों के मामले में विनियामक का काम करती हैं। फिलहाल, योग और प्राकृतिक चिकित्‍सा औषधिरहित चिकित्‍सा पद्धतियां हैं, अत: इनका विनियमन नहीं किया जाता।  यह जानकारी आज राज्‍यसभा में आयुष राज्‍यमंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्रीपद येस्‍सो नायक ने एक लिखित उत्‍तर में दी।

 

आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी महाविद्यालयों का 2014-15 शिक्षण वर्ष के दौरान राज्‍य/ संघ शासित प्रदेशवार विवरण

 

क्रमसंख्‍या राज्‍य/संघ शासित प्रदेश आयुर्वेदिक महाविद्यालयों की संख्‍या यूनानी महाविद्यलयों की संख्‍या सिद्ध महाविद्यालयों की संख्‍या होमियोपैथी महाविद्यालयों की संख्‍या कुल आयुष महा विद्यालय
आंध्र प्रदेश 02 01 00 06 9
अरुणाचल प्रदेश 00 00 00 01 1
असम 01 00 00 03 4
बिहार 08 04 00 15 27
चंडीगढ़ 01 00 00 01 2
छत्‍तीसगढ़ 04 01 00 03 8
दिल्‍ली 02 02 00 02 6
गोवा 01 00 00 01 2
गुजरात 13 00 00 17 30
हरियाणा 08 00 00 01 9
हिमाचल प्रदेश 02 00 00 01 3
जम्‍मू/कश्‍मीर 01 02 00 00 3
झारखंड 01 00 00 04 5
कर्नाटक 59 05 00 11 75
केरल 17 00 01 05 23
मध्‍य प्रदेश 18 04 00 19 41
महाराष्‍ट्र 68 06 00 49 123
ओडीशा 06 00 00 06 12
पांडीचेरी 01 00 00 00 1
पंजाब 13 00 00 04 17
राजस्‍थान 11 02 00 08 21
तमिलनाडु 05 01 08 10 24
तेलंगाना 05 02 00 00 7
उत्‍तर प्रदेश 24 13 00 10 47
उत्‍तराखंड 06 00 00 02 8
पश्चिम बंगाल 04 01 00 12 17
जोड़ : 281 44 09 191 525

 

 

 

संदर्भ-पीआईबी/9 दिसंबर/2014

 

आयुर्वेदिक डॉक्टर ही इस पद्धति पर पूर्ण भरोसा नहीं करते: प्रधानमंत्री 

योग की तरह आयुर्वेद भी वैश्‍विक असर डाल सकता है: प्रधानमंत्री 

आयुर्वेद के चिकित्‍सकों को महज एक पेशे के तौर पर नहीं,बल्‍कि मानव जाति की सेवा के लिए आयुर्वेद के प्रति स‍मर्पित होना चाहिए: प्रधानमंत्री 

SBA DESK

छठा विश्व आयुर्वेद सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री, नरेद्र मोदी

छठा विश्व आयुर्वेद सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री, नरेद्र मोदी

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने छठी विश्‍व आयुर्वेद कांग्रेस के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि कि आयुर्वेद को सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों से मिल रही है, जिन्‍होंने अपना जीवन इसे समर्पित कर दिया है। उन्‍होंने कहा कि ये लोग भी आयुर्वेद पर पूर्ण भरोसा नहीं करते हैं। आयुर्वेद और एलोपैथी को चिकित्‍सा विज्ञान की प्रतिद्वंदी धाराएं मानने की धारणा को निराधार बताते हुए प्रधानमंत्री ने आयुर्वेद को जिंदगी जीने का तरीका बताया। उन्‍होंने कहा कि एलोपैथी से किसी बीमारी का इलाज हो सकता है और अगर कोई व्‍यक्‍ति आयुर्वेद को अपनाता है, तो वह यह सुनिश्‍चित कर सकता है कि वह लगातार स्‍वस्‍थ रहने के साथ-साथ बीमारियों से मुक्‍त भी रहेगा।
प्रधानमंत्री ने आयुर्वेद के चिकित्‍सकों से महज एक पेशे के तौर पर नहीं, बल्‍कि मानव जाति की सेवा के लिए आयुर्वेद के प्रति समर्पित रहने का आह्वान किया।
योग की तरह आयुर्वेद की भी बने वैश्विक पहचान

प्रधानमंत्री ने कहा कि योग ने उन लोगों के लिए वैश्‍विक पहचान हासिल कर ली है जो तनाव मुक्‍त जीवन जीना चाहते हैं और समग्र स्‍वास्‍थ्‍य रक्षा की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। इसी तरह अगर आयुर्वेद को भी सही भावना के साथ जिंदगी जीने के तरीके के रूप में पेश किया जाएगा, तो यह भी स्‍वीकार्यता हासिल कर सकता है।
आयुर्वेद के बारे में लेख लिखे जाने की जरूरत
प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुर्वेद के लिए यह आवश्‍यक है कि वह सरल एवं कारगर तरीके से लोगों तक पहुंचे। इसके लिए उपचार के तरीकों को बेहतर ढंग से प्रस्‍तुत करना चाहिए। श्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा, ‘आयुर्वेद पर लेखों के लिए चिकित्‍सा एवं विज्ञान की अंतर्राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में स्‍थान सृजित करना पड़ेगा। हालांकि, इसके लिए आयुर्वेद के चिकित्‍सकों एवं शोधकर्ताओं की ओर से ही प्रयास किये जाने चाहिए।’

The biggest challenge to Ayurveda comes from people who have dedicated their life to it: Prime Minister

छठा विश्व आयुर्वेद सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री, नरेद्र मोदी

छठा विश्व आयुर्वेद सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री, नरेद्र मोदी

The Prime Minister, Shri Narendra Modi today said the biggest challenge to Ayurveda comes from people who have dedicated their life to it. They too do not trust it fully, he said. Seeking to dispel the notion of Ayurveda and Allopathy being competing streams of medical science, the Prime Minister described Ayurveda as a way of life. He said a disease can be cured by Allopathy; and if a person adopts Ayurveda, he can ensure that he remains healthy and free of disease.

He called upon practitioners of Ayurveda to be dedicated to Ayurveda not just as a profession, but as a service to mankind. He was speaking at the valedictory function of the 6th World Ayurveda Congress.

The Prime Minister said that Yoga had acquired global recognition for people who wanted a stress-free life and were moving towards holistic healthcare. Similarly, if Ayurveda is presented in the right spirit as a way of life, it too can acquire acceptance.

The Prime Minister said it is essential for Ayurveda to reach people in a simple, effective way. For this, the modes of treatment should also be better packaged. Shri Narendra Modi said space has to be created in international medical and science publications, for articles on Ayurveda. But the effort for this has to come from the practitioners and researchers of Ayurveda, he added.

सोर्सः पीआईबी 

गैर संचारी रोगों से आयुर्वेद ही निजात दिला सकता हैः डॉ. हर्षवर्धन 

विश्व आयुर्वेद सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. हर्षवर्धन, स्वास्थ्य मंत्री, भारत सरकार

विश्व आयुर्वेद सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. हर्षवर्धन, स्वास्थ्य मंत्री, भारत सरकार

SBA DESK

आयुर्वेद को लेकर भारत सरकार का रूख सकारात्मक दिख रहा है। सदियों से उपेक्षित आयुर्वेद को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय की सक्रीयता बढ़ गयी है। पिछले दिनों पहले विश्व आयुर्वेद सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा है कि ऐसा कोई कारण नहीं है कि सरकार आयुर्वेद में लोगों की दिलचस्पी को फिर से जागृत न करे। सरकार का मुख्य लक्ष्य एक ऐसी जीवन शैली को बढ़ावा देना है जहां मनुष्य और उनके वातावरण के बीच उचित माहौल बने। देश के अपर्याप्त संसाधनों पर गैर-संचारी रोगों के बोझ को कम करने का यही एक मात्र तरीका है और आयुर्वेद इसकी कुंजी है।
डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि इस वर्ष मई में जब नई सरकार ने कार्यभार संभाला उस वक्त आयुष विभाग ने 1200 करोड़ रुपये के कुल खर्च में से केवल 167 करोड़ रुपये खर्च किये थे लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आयुर्वेद और अन्य परंपरागत दवाओं को चिकित्सा पद्धति में सही स्थान देने पर जोर देने के कारण यह खर्च 5000 करोड़ रूपये तक चला गया। इससे अनुसंधान और चिकित्सा सुविधाओं की संख्या में पर्याप्त वृद्धि होगी और वर्तमान बुनियादी ढांचे का विकास होगा।
भारत, जर्मनी, इटली, अमेरिका, अर्जेंटीना, रूस, नेपाल, भूटान, बंग्लादेश, मालदीव, इंडोनेशिया, चीन, मलेशिया, कंबोडिया और कई अन्य देशों के विशेषज्ञों ने श्री
डॉ. हर्षवर्धन की इस चेतावनी को ध्यान से सुना कि अगर कुछ बुरा होने की आशंका पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो एक पूरी पीढ़ी उच्च रक्तचाप, रक्त में कोलोस्ट्रोल की मात्रा बढ़ने, मधुमेह और मोटापे का शिकार हो जाएगी।

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा, ‘‘क्या कोई ऐसा देश है जहां गरीबी और समृद्धि दोनों से जुड़ी बीमारियों का सबसे ज्यादा बोझ है? दूसरी तरफ हमारे यहां तपेदिक के सबसे अधिक मामले हैं जबकि दूसरी तरफ हम कार्डियोवस्कुलर बीमारियों, मधुमेह, क्रोनिक पल्मोनरी बीमारी और कैंसर जैसी बीमारियों में सबसे आगे निकलने वाले हैं।’’

विश्व आयुर्वेद सम्मेलन के बारे में डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि इसमें पांच पूर्ण अधिवेशन, 15 अनुसंधान विषयों पर, 25 तकनीकी सत्र होंगे। भारत, जर्मनी, इटली, अमेरिका, अर्जेंटीना, रूस और अनेक अन्य देशों के वैज्ञानिक 750 पत्र पेश करेंगे।

Dr. Harsh Vardhan & Sumitra Mahajan

Dr. Harsh Vardhan & Sumitra Mahajan

इस मौके पर मंच पर लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन मौजूद थीं। इसके अलावा कुछ विदेशी मेहमान भी मौजूद थे, जिनमें बांगलादेश के राज्यमंत्री श्री जाहिद मलिकी, नेपाल के स्वास्थ्य मंत्री श्री खगराज अधिकारी, मालदीव के उप मंत्री डॉ. मोहम्मद हबीब, उजबेकिस्तान के उपमंत्री श्री एक्स के जालीलोव, विज्ञान भारती के चेयरपर्सन डॉ. विजय भतकर और अफगानिस्तान, भूटान, क्यूबा, मालदीव, स्लोवेनिया तथा त्रिनिदाद और टोबेगो के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। इस सम्मेलन में विदेश से आए 400 प्रतिनिधियों के अलावा 4000 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 6 नवंबर से 9 नवंबर-2014 तक चले इस आयोजन में देश की सैकड़ो आयुर्वेदिक दवा कंपनियों की प्रतिनिधि भी शामिल हुए। सभी ने आशा व्यक्त की कि अब आयुर्वेद की दिन सुधरने वाले हैं।

The government would soon set up a separate Central Drug Controller for traditional medicines!

Dr. Harsh Vardhan

Dr.Harsh vardhan, Health Minister Of India Speakin@Aarogya Expo, New Delhi

Dr.Harsh vardhan, Health Minister Of India Speakin@Aarogya Expo, New Delhi

Inaugurated the first “Arogya Expo” organised by the Ministry’s AYUSH Department as part of the World Ayurveda Congress, today. It was a pity that India’s experience and strengths in traditional medicine have not translated into market shares in the global traditional medicines market.

The government would soon set up a separate Central Drug Controller for traditional medicines with a view to ensuring quality in production standards. Call it whatever—Ayurvedic medicines or herbal medicines or traditional medicines –the global market is estimated at about $100 billion today. India’s share in this is negligible because quality standards are not maintained to international specifications. The government has decided to address this lacuna. The institutionalisation of a regulatory authority backed up by central and state laboratories would ensure for traditional and indigenous medicine pride of place in mainstream healthcare.

harsh vardhan arogya expo My respect for Ayurveda does not sprint from emotions but scientific understanding. In this age no single stream of medicine is supreme. This is the age of holistic medicine and I wish to give India an edge in this. With the world’s disease burden in non-communicable diseases growing, there is a new mindset in favour of holistic treatment. Also, with the explosion of information on the Internet people are getting aware of Ayurveda’s approach of treating each human body as unique. India had “missed the bus” in terms of capitalizing on her headstart in the traditional medicines sector.

It is a pity that China has captured such a huge share of the world market whereas India’s presence is non-existent. We are determined to develop Brand India through Ayurveda. With the launch of the National AYUSH Mission, the government will focus in detail on building up a brand value for Ayurvedic drugs manufactured in the country.

The new thrust on preserving and promoting AYUSH, as articulated by the Prime Minister, is expected to lead to a huge boom in the traditional medicine sector. The employment potential will be manifold as the scope for upstream and downstream expansion is considerable. The government is confident that a combination of incentives and regulation would help make up for the lost time. Accordingly,I have made a provision for financial support to be provided to traditional drugs manufacturing companies to enhance their quality lines and help them meet global standards. Drug testing laboratories will be set up at the state level in due course and regulatory arrangements are also proposed there. The Arogya Expo, the first to be organised by the government, is set to become the largest industrial fair involving stakeholders in the AYUSH sector. Trade associations from all over the world are expected to attend. The event offers opportunities for B2B interface. Facilities for medical check-up to the public have also been opened. Special attention has been given to showcase the small sector manufacturers. Traditional doctors and vaidhyas, especially from the north-east, have been attracted to showcase their expertise. Mr Nilanjan Sanyal, Secretary, AYUSH, Dr P.M. Varier, Trustee, Kotakkal Arya Vaidhya Sala, Mr Anand Burman, Chairman, Dabur group, Mr Anurag Sharma, Managing Director, Baidyanath Pharma, Mr S. Saji Kumar, Managing Director, Dharithri Pharma, Dr G.Krishnan, MP, Dr Mrinalini, Special Secretary (AYUSH) of Delhi Government, and Dr Vijay Bhatkar, President, Vijnana Bharati, were also present on the occasion.

Courtesy DR. Harshvardhan’s Facbook Wall

6 नवंबर से विश्व आयुर्वेद सम्मेलन, प्रधानमंत्री करेंगे उद्घाटन

हम ‘पंचम वेद’ के गौरव को अक्षुण्ण रखने के प्रति कटिबद्ध हैः स्वास्थ्य मंत्री

भारतीय स्वास्थ्य ज्ञान बहुत पुरातन है, जरूरत है इसे आगे बढ़ाने की...सरकार की सक्रियता दिख रही है...जनता को जगने की जरूरत है

भारतीय स्वास्थ्य ज्ञान बहुत पुरातन है, जरूरत है इसे आगे बढ़ाने की…सरकार की सक्रियता दिख रही है…जनता को जगने की जरूरत है

 

Ashutosh Kumar Singh for SBA

छठा विश्व आयुर्वेद सम्मेलन (अखिल भारत आयुर्वेद महासम्मेलन) सरकारी तत्वावधान में 06 नवम्बर से लेकर 09 नवम्बर तक नई दिल्ली स्थित प्रगति मैदान में आयोजित किया जाएगा। यह सम्मेलन भारतीय जन स्वास्थ्य प्रणाली की मुख्य धारा में ‘पंचम वेद’ के गौरवमयी स्थान को रेखांकित करने के लिए आयोजित किये जाने वाले अनेक कार्यक्रमों की श्रृंखला का एक हिस्सा होगा।
विश्व आयुर्वेद कांग्रेस के स्वरूप के बारे में विस्तार से बताते हुए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि इस दौरान 15 अनुसंधान विषयों पर 5 पूर्ण सत्र और 25 तकनीकी सत्र आयोजित किये जाएंगे। इस दौरान भारत, जर्मनी, इटली, अमेरिका, अर्जेंटीना, रूस और कई अन्य देशों के वैज्ञानिकों की ओर से कुल मिलाकर 750 वैज्ञानिक प्रपत्र पेश किये जाएंगे। 
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधि संगोष्ठी, राष्ट्रीय चिकित्सीय पौध बोर्ड द्वारा चिकित्सीय पौधों पर आयोजित की जाने वाली अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी और फॉर्मेक्सिल द्वारा आयोजित की जाने वाली क्रेता-बिक्रेता बैठक इस सम्मेलन का मुख्य आकर्षण होंगी।
मंत्री ने घोषणा की कि ‘आरोग्य एक्सपो’ के जरिए इसे एक सार्वजनिक कार्यक्रम बनाने का इरादा है, जो आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी चिकित्सा प्रणालियों पर एक स्वास्थ्य मेले की तरह होगा। विश्व आयुर्वेद कांग्रेस के दौरान इसका आयोजन हॉल नम्बर 18 में किया जाएगा। आयुर्वेदिक दवाओं से वास्ता रखने वाली तकरीबन 500 दवा कंपनियां इसमें शिरकत करेंगी।
डॉ. हर्षवर्धन ने कहा, ‘हमारी परंपरागत दवाओं के चमत्कार से रूबरू होने के लिए आम जनता को आमंत्रित किया जाएगा। हम निःशुल्क परामर्श की सुविधाएं मुहैया कराएंगे, जिसके तहत ‘आयुष’ डॉक्टर सभी मरीजों की जांच करने के बाद उन्हें निःशुल्क दवाएं भी मुहैया कराएंगे। लाइव योग सत्र भी आयोजित करने का इरादा है।’

डॉ. हर्षवर्धन ने इस ओर ध्यान दिलाया कि भारत में आज भले ही आयुर्वेद को नजरअंदाज किया जा रहा हो, लेकिन सभी भारतीयों को यह जानकर गर्व होगा कि अमेरिका के इलिनॉयस स्थित शिकागो मेडिकल स्कूल के पैथोलॉजी संग्रहालय में प्राचीन भारतीय चिकित्सक ‘सुश्रुत’ की तस्वीर लगी हुई है। इस तस्वीर के नीचे लिखे गये चित्र परिचय में उनका वर्णन इस तरह से किया गया हैः मोतियाबिंद की प्रथम शल्‍य–चिकित्‍सा करने वाले शख्‍स।

उन्‍होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि अगले दो वर्षों में भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार मेले की ही तरह विश्‍व आयुर्वेद कांग्रेस भी लोकप्रिय हो जाए, जिसका आयोजन प्रगति मैदान में ही होता है। इसके जरिए भारतीयों की नई पीढ़ी आधुनिक चिकित्‍सा की जन्‍मस्‍थली के रूप में भारत के गौरवमयी इतिहास के बारे में और ज्‍यादा जान पाएगी। स्‍वास्‍थ्‍य शिविर निश्‍चित रूप से एक बड़ा आकर्षण होंगे।’

आयुर्वेद का एम्स
वहीं दूसरी तरफ एक संवाददाता सम्मेलन में इस आशय की घोषणा करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि दिल्ली के जसोला में निर्माणाधीन नये अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) में शैक्षणिक वर्ष 2015-16 के दौरान स्नातकोत्तर विद्यार्थियों का पहला बैच दाखिला लेगा।

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा, ‘मेरा एक आरंभिक निर्णय पाठ्यक्रम को मंजूरी देने के बारे में था। मैं चाहता हूं कि यह संस्थान इस तरह से विकसित हो कि उसकी तुलना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से होने लगे। दूसरे शब्दों में, यह आयुर्वेद के लिए एम्स साबित हो।’
दस एकड़ में फैले परिसर में 200 बिस्तरों वाला सात मंजिला परामर्श अस्पताल भी होगा। इस अस्पताल में अभी से छह माह के भीतर मरीजों को भर्ती करने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। एआईआईए एक ऐसे उत्कृष्टता केन्द्र के रूप में उभर कर सामने आएगा, जिसमें बुनियादी शोध, दवा सुरक्षा के मूल्यांकन, मानकीकरण, गुणवत्ता नियंत्रण और आयुर्वेदिक दवाओं की वैज्ञानिक पुष्टि करने के कार्यों को बखूबी अंजाम दिया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्री वैसे तो आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा प्रणाली से वास्ता रखने वाले एक ईएनटी सर्जन हैं, लेकिन वह आयुर्वेद की भी भूरि-भूरि प्रशंसा करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि नये, निर्माणाधीन एम्स में आयुष विभाग खोलकर वह एम्स के अंतर्गत आयुष का गौरवमयी स्थान पहले ही सुनिश्चित कर चुके हैं। समग्र दवा विकसित करने के लिए एक खास विशेषज्ञ समूह भी गठित किया गया है।

 

 

आप जानते हैं होम्योपैथी का इतिहास…!

 

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Dr. R.Kant For Swasthbharat.in

भारत में बहुत कम ही लोग जानते है कि होम्योपैथी एक सफ़ल चिकित्सा पद्धति है,जानकारी के आभाव में होम्योपैथी को अधूरी चिकित्सा पद्धति मानकर लोग आधुनिक चिकित्सा पद्धति की ओर आकर्षित होते हैं। आखिर हो भी क्यों न, होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति को लेकर कई भ्रातिंया देश मे फ़ैली है, और इस भ्रान्ति को दूर करने के लिये न तो सरकार और ना ही किसी संस्था द्वारा कोई मुकम्म्ल प्रयास किया गया। इसके गुणों को भी इसके चिकित्सकों द्वारा प्रचारित नही किया गया।

सबसे पहले मैं आप सब को होम्योपैथी चिकित्सा के इतिहास के बारे मे कुछ जानकारी देता हूं। इस चिकित्सा पद्धति को भारत में विस्तार कैसे मिला इस पर भी चर्चा जरूरी है।

होम्योपैथी का इतिहास : होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति एक जर्मन चिकित्सक डॉ. क्रिशिच्यन फ़्रेडरिक सैमुअल हैनिमेन द्वारा आरंभ की गई थी। डॉ. हैनिमेन को 1779 में इरलानजेन विश्वविद्यालय द्वारा एम.डी. की डिग्री से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपनी चिकित्सा का अभ्यास शुरू किया परंतु उस समय की अधूरी एवं अस्पष्ट चिकित्सा ज्ञान से वे असंतुष्ट थे, इस प्रकार के अवैज्ञानिक चिकित्सा उपचार से हतोत्साहित होकर उन्होंने अपनी डॉक्टरी अभ्यास छोड़ दी।  डॉक्टरी अभ्यास छोड़ने के बाद बहुमुखी प्रतिभा और कई भाषाओं के जानकार होने के कारण कई विज्ञान और चिकित्सा संबंधी पुस्तकों का अंग्रेजी भाषा से अन्य भाषाओं में अनुवाद किया। डॉ. क्यूलेन लंदन यूनिवर्सिटी में चिकित्सा के प्राध्यापक थे और उन्होंने मैटेरिया मेडिका में लगभग 20 पेज सिनकोना की छाल के औषधीय गुण के बारे मे लिखा है,1790 में जब डॉ हैनिमैन डॉ. क्यूलन की मैटेरिया मेडिका जो कि अंग्रेजी मे थी उसका अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे, तभी डॉ. हैनिमैन  का ध्यान सिनकोना की छाल के औषधीय गुण के बारे में गया और उन्होंने पाया कि यह औषधि मलेरिया के उपचार में उपयोगी है। इसके बाद डॉ. हैनिमैन ने यह जानने के लिये कि उसका असर कैसे और किस प्रकार होता है उन्होंने खुद कुछ दिनों तक सिन्कोना का रस दिन मे दो बार लिया और उन्हें इस बात ने अचंभित किया कि उनको मलेरिया बुखार के लक्षणों के समरुप ही लक्षणों ने प्रहार किया ,इस अप्रत्यासित नतीजे ने उन्हें प्रोत्साहित किया और इसके बाद कई शोध डॉ. हैनिमैन ने किये और “समानता के नियम” के विचार पर गहन अध्ययन किया और 1796 में आरोग्य के नियम (लॉ ऑफ क्योर) SIMILIA SIMILIBUS CURENTURE की सार्वजनिक घोषणा की।

1805 और 1810 में होम्योपैथी के सिद्धांत पर आधरित पुस्तक Medicine of Experiences और  Organon of Rational Art of Healing का प्रकाशन हुआ। जिसमें होम्योपैथी कि विधियां, धारणाओं पर स्पष्टीकरण के साथ उल्लेख था। इन दोनों पुस्तकों के प्रकाशन के बाद आधुनिक चिकित्सकों द्वारा काफ़ी विरोध होना शुरू हो गया लेकिन डॉ हैनिमैन बिल्कुल भी हतोत्साहित नहीं हुए और अपने कार्य को जारी रखा,और मैटेरिया मेडिका के कुल 8 संस्करण प्रकाशित हुए।

1821 में तमाम विरोधों के बीच कोइथेन के ड्यूक फ़र्दिनांद ने डॉ हैनिमैन को कोइथेन में रहने और होम्योपैथ का अभ्यास की इजाजत दी और इसी जगह से डॉ. हैनिमैन सभासद भी चुने गये।

1835 में डॉ. हैनिमैन फ़्रांस गए और अपनी पत्नी के प्रभाव से उन्हें पेरिस मे होम्योपैथ के अभ्यास कि अनुमति मिल गई, डा हैनिमैन को नाम, प्रसिद्धि, पैसा, और शांति पेरिस में ही मिली।

डॉ. हैनिमैन लागातार शोध कार्य मे व्यस्त रहे वे अंतिम सांस तक चिकित्सा प्रणाली में सुधार लाते रहने का प्रयास करते रहे जिससे कि अस्वस्थ जीवन को सरलता से उपचार मिलता रहे। डा हैनिमैन की यात्रा का अंत 2 जुलाई 1843 को प्रात: 5 बजे हुआ।

भारत में होम्योपैथी का विस्तार : पंजाब के किंग महाराजा रणजीत सिंह के  ईलाज के लिये भारत मे सबसे पहले होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति का प्रयोग भारत में हुआ। इसकी सफलता देखकर पश्चिम बंगाल में इस पद्धति पर व्यवस्थित काम शुरू हुआ और धीरे-धीरे अब पूरे भारत में इस पद्धति का फैलाव हुआ। भारत में 1971 मे होम्योपैथिक फ़ार्माकोपिया बना और भारत सरकार ने होम्योपैथी को 1972 में मान्यता दे दी। उसके बाद केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद और केन्द्रीय अनुसंधान परिषद की भी स्थापना की गई।

परिचयः(सिम्पैथी संस्था के निदेशक डॉ आर.कांत होमियोपैथी पद्धति के प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।)

संपर्क- simpathyc79@gmail.com, 91-9911009198