क्या आप जानते हैं ! 65 साल पहले भारत में आया जापानी इंसेफलाइटिस !

आशुतोष कुमार सिंह

भारत जैसे देश किसी भी नई बीमारी का पालनहाल आसानी से बन जाते हैं। सवा अरब से ज्यादा जनसंख्या को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे भारत में जब कोई बीमारी आयात होती है, तो उसकी खातिरदारी घर आए मेहमान की तरह की जाती है। उसके प्रति हमारा नजरिया, उसको रोकने के उपाय ठीक वैसे ही होते हैं जैसे घर आए दामाद खुद से चले जाएं तो ठीक है, नहीं तो उन्हें कौन कहे की आप अपने घर चले जाइए। ऐसी बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीमारियों के फलने-फूलने के लिए जरूरी खाद-पानी यहां पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। यहां पर नई बीमारियों की खेती करने में पूरा तंत्र सहयोग करता है। कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू एवं इबोला जैसी बीमारियों की खेती यहां पर खूब हो रही है। इनकी ब्रांडिंग कर के कुछ यहां के कुछ दूसरे मूल्कों की संस्थाएं अपनी आर्थिक स्वार्थों को पूर्ण करने में सफल भी हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ स्वस्थ मानव संसाधन की रीढ़ की हड्डी तोड़ने की कोशिश साकार होती दिख रही है।
इन सब बातों की चर्चा यहां पर इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इन दिनों एक और बीमारी की ब्रांडिंग जोरो पर है। वर्षों से इस बीमारी का जो बीज हमने बोए थे वे अब फलदायी हो गए हैं। अब पहले से ज्यादा मारक हो गई है यह बीमारी। अब मौतों की संख्या बढ़ाने में इस बीमारी ने महारत हासिल कर ली है। अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस बीमारी की इतनी तारीफ किए जा रहा हूं। जी हां, यह बीमारी है जापानी इंसेफलाइटिस(जेई)। इस बीमारी ने भारत के कई क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया है। और आज उसका हरेक निशाना सही लग रहा है। देश के नौनिहालों को निगलने में यह बीमारी बहुत ही सफल रही है। गोरखपुर के बीआडी अस्पताल में हो रही मौतों का सिलसिला थमा भी नहीं था कि यह झारखंड के जमशेदपुर में हाहाकार मचाने में सफल रही। बगल के रांची में भी इसने कोहराम मचा रखा है। बिहार के मुजफ्फरपुर का क्षेत्र हो अथवा गोरखपुर, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज एवं सिवान का भूगोल। इन क्षेत्रों में इंसेफलाटिस ने अपने आप को खूब फैलाया है।

लचर व्यवस्था ने ली जान

अब यहां पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इंसेफलाइटिस होता कैसे है? और भारत में इसने कब कदम रखा? इसकी मजबूती का राज क्या है?
उत्तर प्रदेश में इंसेफलाइटिस पर पिछले दिनों एपीपीएल ट्रस्ट ने एक अध्ययन किया था। उस अध्य्यन में कहा गया है कि यह रोग फ्लावी वायरस के कारण होता है। यह भी मच्छर जनित एक वायरल बीमारी है। जिसमें सिर में अचानक से दर्द शुरू होता है, शरीर कमजोर पड़ने लगता है। इसका लक्ष्ण भी बहुत हद तक सामान्य बुखार जैसा ही होता होता है। इसका असर शरीर के न्यूरो सिस्टम पर पड़ता है। यही कारण है कि इस बीमारी ने या तो बीमारों को मौत की नींद सुलाया है अथवा उन्हें विकलांग कर दिया है। इस बीमारी को फैलने वाले क्षेत्र के बारे मे इस शोध में कहा गया है कि धान की खेती एवं सुअर-पालन जिन क्षेत्रों में होता है, वहां पर यह बीमारी आसानी से फैलती है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका फैलाव व्यक्ति से व्यक्ति के रूप में नहीं होता है। यह बात तो इस बीमारी के सिम्टम्स की हुई।

65 वर्ष पहले भारत में आई थी यह बीमारी

भारत में यह बीमारी कब आई यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है। आज से 65 वर्ष पूर्व यानी 1952 में पहली बार महाराष्ट्र के नागपुर परिक्षेत्र में इस बीमारी का पता चला। वहीं सन् 1955 तमिलनाडू के उत्तरी एरकोट जिला के वेल्लोर में पहली बार क्लीनीकली इसे डायग्नोस किया गया। 1955 से 1966 के बीच दक्षिण भारत में 65 मामले सामने आए। धीरे-धीरे इस बीमारी ने भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। भारत में पहली बार इस बीमारी ने 1973 फिर 1976 में पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा तबाही मचाई। पंश्चिम बंगाल के वर्दवान एवं बांकुरा जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। 1973 में बांकुरा जिला में इस रोग से पीड़ित 42.6 फीसद लोगों की मौत हुई। 1978 आते-आते यह बीमारी देश के 21 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में फैल गयी। इसी दौरान भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 1002 मामले सामने आए जिसमें 297 मौतें हुई। सिर्फ यूपी की बात की जाए तो 1978 से 2005 तक यह बीमारी 10,000 से ज्यादा मौतों का कारण बनी। 2005 में जो हुआ उसने इस बीमारी की ताकत से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को परिचित कराया। सिर्फ गोरखपुर में 6061 केस सामने आए जिसमें 1500 जानें गईं। इसी तरह 2006 में 2320 मामलों में 528 बच्चों को अपनी जान गवानी पड़ी। 2007 में 3024 मामलों में 645 मौत। इस तरह 2007 तक देश में 103389 मामले सामने आए जिसमें 33,729 रोगियों को नहीं बचाया जा सका। इस शोध में यह बात भी कही गयी है कि 597,542,000 लोग जापानी इंसेफलाइटिस प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं और 1500-4000 मामले प्रत्येक वर्ष सामने आ रहे हैं। यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अभी तक हम लोग जिन आंकड़ों की बात कर रहे हैं, वे सब रिपोर्टेड हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होंगे जो रिपोर्ट नहीं हुए होंगे। ऐसे में जब बिना रिपोर्ट किए गए मामलों की नज़र से इस बीमारी को हम देखें तो पता चलेगा कि यह बीमारी कितनी ताकतवर हो चुकी है। नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) जिसे पहले हमलोग राष्ट्रीय एंटी मलेरिया प्रोग्राम (एनएएमपी) के नाम से जानते थे, इन दिनों भारत में जेई के मामले को मोनिटर कर रही है। अभी तक देश के 26 राज्यों में कभी-कभार तो 12 राज्यों में अनवरत यह बीमारी अपना कहर बरपा रही है।
1951-52 में पहली बार भारत में लोकसभा चुनाव हुआ था। तब से लेकर अभी तक तमाम प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री बने और चले गए लेकिन 1952 से चली आ रही इस बीमारी का ईलाज नहीं ढ़ूढ़ पाए। लोग मरते रहे और आज भी मर रहे हैं।

146 वर्ष पहले जापान में सबसे पहले इस बीमारी का पता चला

इंसेफलाइटिस की जड़ों को अगर हम ढूढ़ें तो पता चलता है कि इसका जन्म सबसे पहले जापान में हुआ था। शायद यहीं कारण है कि इसे जापानी इंसेफलाइटिस कहा जाता है। आज से 146 वर्ष पूर्व जापान में यह बीमारी सबसे पहले पहचान में आई। 53 वर्षों के बाद इस बीमारी ने अपना विकराल रूप दिखाया और 1924 में जापान में 6000 केस पंजीकृत हुए। यहां से इसका फैलाव एशिया के देशों में हुआ। 1960 के दशक में चलाए गए टिकाकरण अभियान के कारण इस पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया। जापान के अलावा, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों में इसने अपना पैर पसारा फिर जैसा की ऊपर बताया जा चुका है 1952 में इसका प्रवेश भारत में हुआ।

आश्चर्य का विषय यह है कि भारत सरकार इंसेफलाइटिस के सही कारणों को जानने में अभी तक नाकाम रही है। अभी जांच का फोकस गोरखपुर बना हुआ है। जबकि इस बीमारी का फैलाव देश के लगभग प्रत्येक कोने में है। दक्षिण भारत में यह बीमारी पहले आई लेकिन वहां पर वह उतना सफल नहीं हुई जितना उत्तर भारत में दिख रही है। ऐसे में शोध का बिंदु दक्षिण भारत भी होना चाहिए। इतना ही नहीं जांच का बिंदु एशिया के तमाम देश भी होने चाहिए जहां पर यह बीमारी अपना पांव पसार चुकी है। शायद तब जाकर हम इस बीमारी के कारणों की तह में जा पाएंगे एवं ईलाज ढूढ़ पाने के नजदीक पहुंचेंगे। अभी तो ऐसा लगता है कि सरकार चाहती ही नहीं है कि इस बीमारी का ईलाज संभव हो सके नहीं तो गर हमारी सरकारों ने इस बीमारी की भयावहता को पहले ही भांप कर समुचित कदम उठाया होता तो बीआरडी अस्पताल में जो चीख-पुकार सुनने को मिल रही है शायद वह नहीं मिलती।

यह लेख www.firstposthindi.com से साभार लिया गया है।

विश्व बालिका दिवस के अवसर पर स्वस्थ भारत ने की मांग, महिलाओं के लिए सार्वजानिक जगहों पर बने शौचालय!

नई दिल्ली

‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ विषय को लेकर 21000 किमी की स्वस्थ भारत यात्रा करने वाले स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह ने महिलाओं के लिए सार्वजानिक जगहों पर अलग शौचालय बनाएं जाने कीय मांग की है। अपनी यात्रा के अनुभवों एवं बालिकाओं से हुई बातचीत का हवाला देते हुए श्री आशुतोष ने कहा कि देश के प्रत्येक जिला मुख्यालय, प्रखंड मुख्यालय, बस अड्डा सहित उन सभी जगहों पर महिलाओं के अलग से शौचालय बनें, विशेष रूप से मूत्रालय।

श्री आशुतोष ने बताया की यात्रा के दौरान देश भर की बालिकाओं ने अलग से मूत्रालय बनाये जाने की बात प्रमुखता से रखी थी। विश्व बालिका दिवस के अवसर पर स्वस्थ भारत (न्यास) के पदाधिकारियों ने एक बैठक की। इस बैठक में यह निर्णय किया गया की बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय की मांग को जोर सोर से उठाया जायेगा। अगर सरकार इस बात पर गंभीर नहीं हुई तो आंदोलन किया जायेगा। इस अवसर पर धीप्रज्ञ द्विवेदी, शशिप्रभा तिवारी, प्रसून लतांत सहित दर्जनों लोग उपस्थित थे।

श्रीनगर के 18 वर्षीय युवा को ‘स्वच्छता ही सेवा’ का एम्बेसडर बनाया गया

नई दिल्ली/पीआइबी/25.9.17

श्रीनगर के युवा बिलाल डार को श्रीनगर नगर निगम का ब्रान्ड एम्बेसडर बनाया गया है। 12 वर्ष की उम्र से ही बिलाल डार ‘स्वच्छता अभियान’ में योगदान दे रहा है। प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में बिलाल डार का जिक्र किया था।

प्रमुख व्यक्तियों द्वारा स्वच्छता के लिए श्रमदान कार्यक्रम के अन्तर्गत आज रेल राज्य मंत्री श्री राजेन गोहेन ने गुवाहटी में श्रमदान कार्यक्रम में अपना योगदान दिया। उपभोक्ता मामले, खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री करम श्याम ने मणिपुर में स्वच्छता ही सेवा अभियान का शुभारम्भ किया। चण्डीगढ प्रशासन के अधिकारियों ने केंद्र-प्रशासन सचिवालय परिसर में आयोजित स्वच्छता ही सेवा कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

भारतीय कोस्ट गार्ड ने अपने परिसर में स्वच्छता ही सेवा पखवाड़ा के तहत स्वच्छता अभियान चलाया और पौधे लगाए। जहाज की साफ-सफाई करते हुए कचरा एकत्र किया और फिर उसका निपटान भी किया।

‘स्वच्छता ही सेवा अभियान’ आम लोगों के साथ-साथ कबाड़ का व्यवसाय करने वालों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है। इसके अलावे मच्छरों, मक्खियों से फैलने वाली बिमारियों की भी रोकथाम करने में मदद मिल रही है।

 

लिवर से संबंधित बिमारी आ ओकर बचाव

13263805_1618570195122627_4040873819155750205_n

लिवर से संबंधित बिमारी आ ओकर बचाव

—- डॉ सरवन कुमार पुरी
जब लिवर मे कवनो संक्रमण , सूजन चाहे कवनो तरह के विकार से संबंघित लक्छण के हेपाटाइटिस चाहे आम भाषा मे पीलिया भा जॉन्डिस कहल जाला।

‪#‎बिलरुबिन‬ के परभाव:- पीलिया ई बीमारी ना होके खालि कुछ लक्छण के सामने ले आवेला।जइसे ऑख के सफेद वाला हिस्सा मै पीलापन हो गइल ।पीलिया के लक्छण शरीर मे एतना बदलाव ले आवेला कि पीड़ित आदमी के ऑख आ चमड़ी के रंग भी बदल जाला।शरीर मे एह पीलापन के ले आवे वाला चीझ के #बिलरुबिन कहल जाला आ ई लाल रक्त कोशिका के (RBC) टूटला से बनेला।
‪#‎कारण‬:- लिवर मे वाइरस इंफेक्सन। जइसे ह्पेटाइटिस ए, बी ,सी, डी आउर ई।
शरीर मे रक्त कोशिका के जल्दी टूटल। शराब के कारण लिवर छतिग्रस्त भइल ।कुछ दवाई भा बिषइला चीझ के परभाव के कारण।शरीर मे ऑटोईम्यून हेपेटाइटिस आ एस एल ई नाम के रोग के कारण ।
पित्त नली(बाइल डक्ट) जवना के गॉल ब्लाडर कहाला के रास्ता मे पथरी भा ट्यूमर भइल ।
वइसे तs सैकड़न तरह के वाइरस लिवर के परभावित कर सकेला बाकि पांच गो वाइरस जादा महत्वपुर्ण बा ए , बी, सी,डी, आ ई।

बचाव ही बेहतर बा :- सबसे अच्छा बचाव बा टीकाकरण चाहे वैक्सीनेशन । हेपेटाइटिस ए आ बी के टीकाकरण बच्चा आ सेयान दुनू करा सकत बा ।
खाना के झांप के (ढक) के राखी।
पीये वाला पानी के खास कइ के धेयान राखी कि ऊ साफ होखो , बेहतर होइ कि पानी के उबाल के ठंढा कर लि । गली मुहल्ला के सामान जवन खुला मे मिले वाला चीझ मत खांइ।खाये से पहिले साबून से हांथ जरुर धोवे के चाहीं।
लक्छण :- ऑख पीयराइल , पेशाब पीयर भइल
बोखार भइल , जी मिचलाइल भा उल्टी भइल , भूख कम लागल ,पेट मे दरद आ पेट के फूल गइल।
‪#‎गंभीर‬ लक्छण :- शरीर मे रक्तस्राव भइल , बेहोश भइल , सांस लेवे मे तकलीफ , पेशाब कम भइल ।

कुछ मिथक आ भ्रांति तथ्य के आइना मे:-
‪#‎भ्रांति‬ पीलिया भा जॉंडनिडिस मे मरीज के पीला फल आ हरदी ना देवे के चाहीं।
‪#‎तथ्य‬ ई गलत धारणा बा आ एकर कवनो वैग्यानिक आधार नइखे ।
‪#‎भ्रींति‬ कुछ लोग मान्ला कि कवनो तालाब – पोखरा मे नहाए से पीलिया ठीक हो जाला।
#तथ्य ई धारणा भी गलत बा । हेपेटाइटिस ए आ ई समय के साथ अपने आप ठीक हो जाला ।

साहब! एड्स नहीं आंकड़ों का खेल कहिए…

भोग-बाजार के विस्तार ने पारिवारिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया, संबंध और रिश्तों के अनुशासन को बाजार के हवाले कर दिया और जरूरतों को वस्तुवादी बना दिया। फिर हम खुद भी बाजार के लिए एक वस्तु बन गए! वर्तमान में बीमारियों में सबसे बड़े ब्रांड के रूप में एड्स की पहचान है! पहले भोगी बना कर बाजार ने कमाई की और अब उसके दुष्परिणाम को बेच कर बाजार अपना विस्तार पा रहा है। बाजार-विस्तार को सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर मालूम चलता है कि बाजार ने हमें बीमारू किस तरह से बना दिया है।

एड्स के अर्थशास्त्र को समझने की जरूरत है...

एड्स के अर्थशास्त्र को समझने की जरूरत है…

भारतीय सांस्कृतिक चेतना का विस्तार सुखानुभूति पर आधारित रही है। सुख की खोज भारतीयों को अध्यात्म से जोड़ता है। जब मन-मस्तिष्क अध्यात्म की सीमा में प्रवेश करता है, तब आप मानवतावादी हो जाते हैं, बल्कि सही मायने में धार्मिक हो जाते हैं। क्या करें और क्या न करें की सीमा को समझने लगते हैं। भारतीयों के इस स्वभाव को आधुनिक बाजार ने बहुत ही सूक्ष्मता से समझा है। हमारे शब्दों के माध्यम से ही वह हमें मात देने की जुगत में है। सुख-खोजी भारतीयों को सुख-भोगी बनाने के लिए बड़े पैमाने पर बाजार ने जाल फैलाया है। ये दोनों शब्द प्रथमदृष्ट्या एक-से ही लगते हैं। इसी भ्रम का फायदा उठा कर बाजार ने सुख को बाजारू बना दिया, एक वस्तु में तब्दील कर दिया, एक आकार दे दिया। जब भाव को कोई आकार मिल जाता है तो स्वाभाविक रूप से हमारी इंद्रियां उस आकार के साथ खुद को जोड़ने के लिए चुंबक की तरह दौड़ी चली जाती हैं। इसी स्वाभाविकता को बाजार ने अपने विस्तार का सबसे सुगम हथियार बनाया और हम अपने भावों को वस्तुपरक स्वरूप देते गए।
आज चारों ओर बाजार का दबदबा है। उसने हमारे मनोभाव को इस कदर गुलाम बना लिया है कि हम उसके कहे को नकार नहीं पाते। वह जो कहता है, वही जीवन-आधार और सुख का मानक हो जाता है! इसी बाजार ने एक बीमारी दी, जिसको वर्तमान में एड्स के नाम से जाना जाता है। इसके लिए बाजार ने बहुत ही शातिर तरीके से सुख-खोजी प्रवृत्ति को सुख-भोगी बना दिया है! भोग-बाजार के विस्तार ने पारिवारिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया, संबंध और रिश्तों के अनुशासन को बाजार के हवाले कर दिया और जरूरतों को वस्तुवादी बना दिया। फिर हम खुद भी बाजार के लिए एक वस्तु बन गए! वर्तमान में बीमारियों में सबसे बड़े ब्रांड के रूप में एड्स की पहचान है! पहले भोगी बना कर बाजार ने कमाई की और अब उसके दुष्परिणाम को बेच कर बाजार अपना विस्तार पा रहा है। बाजार-विस्तार को सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर मालूम चलता है कि बाजार ने हमें बीमारू किस तरह से बना दिया है।

भारत में एड्स का पहला मामला सन 1986 में पाया गया था। यह वह दौर था, जब भारत के दरवाजे बाजार के लिए खुलने वाले थे। वैश्विक शक्ति एकध्रुव्रीय होने की कगार पर पहुंच चुकी थी। हुआ भी यही। अगले पांच सालों में सोवियत संघ का पतन हुआ और बाजार-विस्तार की गति और तीव्र हुई। भारत में उदारीकरण के वायरस का तेजी से विस्तार हुआ और सुख-खोजी भारतीयों को सुख-भोगी बनाने का एक बड़ा प्लेटफार्म मिल गया। एड्स नियंत्रण विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी 2013-14 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि 20.89 लाख लोग एड्स से प्रभावित हैं।

सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में जिस बीमारी से तकरीबन इक्कीस लाख लोग प्रभावित है, उसे रोकने के लिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तृतीय चरण (2007-12) के दौरान विभिन्न बजटीय स्रोतों के माध्यम से 6,237.48 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे और अब चौथे चरण के लिए 13,415 करोड़ रुपए का बजट अनुमोदित हुआ है। इसमें सरकारी बजटीय सहयोग, विश्व बैंक बाह्य सहायता प्राप्त सहयोग और वैश्विक निधि और अन्य विकास साझेदारों के अतिरिक्त बजटीय सहयोग शामिल है। सच्चाई यह है कि विगत अट्ठाईस वर्षों में बाजार ने पहले भोगी बनाया फिर रोगी बनाया और दोनों ही स्थिति में खुद को विस्तारित करने में सफल रहा!

संबंधित खबरें…
…तो हमारे अधिकारी चाहते हैं कि आंकड़ों में एड्स बना रहे !

एड्स का समाजशास्त्र

स्वस्थ सम्बन्धी ख़बरों से अपडेट रहने के लिए आप हमें फेसबुक पर फॉलो कर सकते हैं !!

…और बिनोद कुमार की पहल रंग लायी

सेमिनार को सम्बोधित करते श्री बिनोद कुमार

हाल में ही दवा के होल सेल लाइसेंस में फार्मासिस्टों की अनिवार्यता को लेकर मीडिया में आई खबर ने फार्मा जगत में तहलका मचा दिया है।जहाँ एक तरफ फार्मासिस्ट संगठनों ने सरकार के इस पहल का भरपूर स्वागत किया वही केमिस्ट संगठनों ने विरोध। ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) के इस प्रस्ताव पर कई फार्मासिस्ट संगठन अपना-अपना दावा पेश करते भी नज़र आये। स्वस्थ भारत अभियान की पड़ताल में यह बात सामने आई की होलसेल में भी फार्मासिस्ट की अनिवार्यता की मांग सबसे पहले पटना के वरिष्ठ फार्मासिस्ट बिनोद कुमार ने  वर्ष 2005 में की थी।  पटना के तारामंडल सेमिनार हॉल में सन् 2005 में राष्ट्रीय फार्मासिस्ट सप्ताह मनाया गया था। इस आयोजन में बिनोद कुमार ने होलसेल में फार्मासिस्ट की जरुरत रेखांकित करते हुए सरकार व मीडिया का ध्यान इस विषय की ओर आकृष्ट कराया था। उस सम्मेलन में बिहार के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री सकुनी चौधरी, ड्रग कंट्रोलर संगीत सिंह, इंडियन फार्मासिस्ट ग्रेजुएट एसोसिएशन सेंट्रल कमेटी दिल्ली के वरिष्ठ सदस्यों सहित फार्मा जगत के तमाम दिग्गज मौजूद थे ! बिनोद कुमार एक लम्बे अरसे से रिटेल से साथ साथ होलसेल दवा दुकानों के लिए भी लाइसेंस की मांग करते रहे और इसके लिए सरकार के आलाअधिकारियों से संपर्क स्थापित भी किए। कई बार तो उन्हें विपक्षियों के आलोचना का शिकार होना पड़ा। लेकिन वे अपनी बात से पीछे नहीं हटे। अंततः वर्ष 2012 में इंडियन फार्मासिस्ट ग्रेजुएट एसोसिएशन (IPGA) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अतुल कुमार नासा ने बांकीपुर क्लब  पटना में बिनोद कुमार के इस स्टैंड को जरुरी बताते हुए औपचारिक रूप से इस प्रस्ताव को सरकार के समक्ष रखने की बात कही। आईपीजीए सेंट्रल कमिटी के लगातार प्रयासों के फलस्वरूप पिछले महीने ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड के अधिकारिओं ने इस मसौदे को हरी झंडी दे दी !

फार्मासिस्ट ग्रेजुएट एसोसिएशन, बिहार चेप्टर के अध्यक्ष बिनोद कुमार ने स्वस्थ भारत अभियान से विशेष बातचीत में  बताया कि फार्मा सेक्टर में रोजगार की कमी नहीं है ! दवा के उत्पादन से लेकर वितरण तक में फार्मासिस्टों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। सरकारी लिपापोती के कारण आज भी फार्मासिस्ट दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं ! महज़ ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट 1940 और फार्मेसी एक्ट 1948 को ठीक से लागू कर दिया जाए तो  देश के लाखों बेरोजगार फार्मासिस्टों को रोजगार मिल जाए और आम लोगों को सुरक्षित तरीके से दवा। फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन 2015 के लागू होने से फार्मासिस्टों का मान सम्मान बढ़ेगा !

 

 

चिकित्सक संवेदनशील बनें

देश के गरीबों को ध्‍यान में रखें चिकित्सकः प्रधानमंत्री

स्‍नातकोत्‍तर चिकित्‍सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्‍थान (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ के 34वें दीक्षांत समरोह में पहुंचे प्रधानमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री

इस मौके पर स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि देश भर के 70 मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्‍पेशलियटी ब्‍लॉक बनाए जा रहे हैं, 58 जिला अस्‍पतालों को मेडिकल कॉलेजों में बदला जा रहा है और 20 राज्‍य कैंसर संस्‍थानों और 50 त्रिस्‍तरीय कैंसर सुविधा केंद्रों का गठन किया जा रहा है।

 

चिकित्सक संवेदनशील बनें

चिकित्सकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री

नई दिल्ली/ स्‍नातकोत्‍तर चिकित्‍सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्‍थान (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ के 34वें दीक्षांत समरोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उत्‍तीर्ण छात्रों से आग्रह किया कि वे अपने कार्यशील जीवन के दौरान देश के गरीबों को ध्‍यान में रखें। उन्‍होंने उत्‍तीर्ण छात्रों को याद दिलाया कि यह दीक्षांत समारोह है न कि शिक्षांत समारोह और यहां उनकी शिक्षा का अंत नहीं होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि यह ऐसा अवसर है कि जहां वे किताबों की दुनिया से निकलकर असली दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सर्वांगीण स्‍वास्‍थ्‍य सेवा संबंधी विश्‍व रुझानों का उल्‍लेख किया। उन्‍होंने उत्‍तीर्ण छात्रों से आग्रह किया कि वे केवल बीमारी का इलाज न करें बल्‍कि मरीजों के साथ निकट का संबंध भी रखें। समारोह में निकट के सरकारी स्‍कूलों के बच्‍चों की उपस्‍थिति को देखकर प्रधानमंत्री ने कहा कि ये बच्‍चे ही इस अवसर पर असली विशेष अतिथि हैं। उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि यह अवसर बच्‍चों को प्रेरित करेगा।

भारत के स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा उत्तीर्ण छात्रों के संबोधित करते हुए

भारत के स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा उत्तीर्ण छात्रों के संबोधित करते हुए

स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री श्री जेपी नड्डा ने इस अवसर उत्‍तीर्ण चिकित्‍सकों से आग्रह किया कि वे गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्ग के लोगों के प्रति सहानुभूति और करुणा का भाव रखें तथा अपने काम में उत्‍कृष्‍टता पैदा करें। उन्‍होंने कहा कि चिकित्‍सकों को जरूरतमंद लोगों के कल्‍याण के लिए अथक कार्य करना चाहिए। दीक्षांत समारोह में 500 से अधिक छात्रों ने स्‍नातकोत्‍तर डिग्री प्राप्‍त की। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा कि पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ मरीजों की देखभाल, चिकित्‍सा शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को लगातार उन्‍नत कर रहा है। उन्‍होंने कहा कि देश भर के 70 मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्‍पेशलियटी ब्‍लॉक बनाए जा रहे हैं और इस तरह मौजूदा मेडिकल कॉलेजों का विकास किया जा रहा है। उन्‍होंने बताया कि 58 जिला अस्‍पतालों को मेडिकल कॉलेजों में बदलकर देश के मेडिकल कॉलेजों के नेटवर्क को विस्‍तार दिया जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि 20 राज्‍य कैंसर संस्‍थानों और 50 त्रिस्‍तरीय कैंसर सुविधा केंद्रों का गठन किया जा रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा कि देश के प्रत्‍येक नागरिक को बेहतरीन त्रिस्‍तरीय स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं उपलब्‍ध कराने का सरकार का विजन है।

पीजीआईएमईआर द्वारा उठाए गए कदमों पर प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त करते हुए श्री नड्डा ने कहा कि यह संस्‍थान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया के विजन को हासिल करने की दिशा में अग्रसर है। उन्‍होंने बताया कि पीजीआईएमईआर ई-अस्‍पताल को क्रियान्‍वित कर रहा है। ऑनलाइन ओपीडी रजिस्‍ट्रेशन प्रक्रिया शुरू हो गई है और संस्‍थान निदान सेवाओं तथा समयबद्ध तरीके से भुगतान सुविधाएं शुरू कर रहा है। इन सुविधाओं के शुरू हो जाने पर मरीजों का समय बचेगा। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने संस्‍थान के प्रशासन से आग्रह किया कि वे अस्‍पताल में स्‍वच्‍छता को प्रोत्‍साहन देने के लिए अभी हाल में शुरू की जाने वाली ‘कायाकल्‍प’ योजना में सक्रिय हिस्‍सा लें।

इस अवसर पर पंजाब एवं हरियाणा के माननीय राज्‍यपाल प्रो. कप्‍तान सिंह, चंडीगढ़ से सांसद श्रीमती किरण खेर, स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण सचिव श्री भानु प्रताप शर्मा और पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के निदेशक डॉ. योगेश चावला भी उपस्‍थित थे। (सोर्सःपीआईबी)

दीक्षांत समारोह की झलकियां…

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्यमंत्री साथ-साथ

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्यमंत्री साथ-साथ

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री छात्रों को सम्मानित करते हुए...

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री छात्रों को सम्मानित करते हुए…

 

संसदीय समिति ने लगाई स्वास्थ्य मंत्रालय को फटकार

निजी पूंजी से एम्स में शोध न करने की संसदीय समिति की सिफारिश

संसदीय  समिति ने कहा है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय महत्व के केंद्र एम्स में शोध को सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर संसाधन मुहैया कराए ताकि किसी कंपनी के निजी हित के बजाय जनहित व लोक कल्याणकारी शोध को बढ़ावा दिया जा सके।

 

प्रतिभा शुक्ल की रपट

निजी पूंजी का इस्तेमाल शोध में न हो...एम्स व स्वास्थ मंत्रालय को मिली हिदायत

निजी पूंजी का इस्तेमाल शोध में न हो…एम्स व स्वास्थ मंत्रालय को मिली हिदायत

नई दिल्ली/ देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के सबसे बड़े केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ( एम्स ) में दवा कंपनियों या निजी क्षेत्र के पूंजी से शोध व विकास का काम बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। इस मामले में हमें अमेरिका या दूसरे पश्चिमी देशों का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। यह कहते हुए स्वास्थ्य पर बनी स्थाई संसदीय समिति ने डॉ. वेलियाथन समिति की रपट व सिफारिशों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। एम्स के सुधार के लिए बनी वेलियाथन समिति ने उद्योग व दवा कंपनियों के हिसाब से शोध की प्रमुखता से सिफारिश की थी। इसके उलट संसदीय समिति ने एम्स को शोध व विकास के लिए पर्याप्त पूंजी मुहैया न कराने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को फटकार लगाई है। समिति ने कहा है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय महत्व के केंद्र एम्स में शोध को सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर संसाधन मुहैया कराए ताकि किसी कंपनी के निजी हित के बजाय जनहित व लोक कल्याणकारी शोध को बढ़ावा दिया जा सके।
साथ ही समिति में कई स्तर पर बड़े बदलाव की सिफारिश की है। समिति ने एम्स में आरक्षण के प्रावधानो की अनदेखी किए जाने पर कड़ी आपत्ति जाताई है। वेलियाथन समिति ने ए व बी श्रेणी में क्रमश: 31 व सात सिफारिशें की थीं जिनमें से सात सिफारिशों पर अमल के लिए एम्स के संविधान में संशोधन की जरूरत है जो कि केवल संसद के जरिए हो सकता है।
राज्य सभा सांसद सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई वाली संसद की स्थाई समिति ने कहा है कि चिकित्सा जगत में शोध व विकास के मामले में देश ही नहीं दुनिया में भी अग्रणी रहे संस्थान एम्स में शोध व विकास की सारी जरूरतें न केवल सरकार पूरी करे बल्कि इसकी लोकतांत्रिक जवाबदेही भी है। की जाए। इससे न केवल जनस्वास्थ्य के लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है बल्कि इसी तरह से कंपनी प्रायोजित शोध व विकास का उन्मूलन किया जा सकता है। इसी से अनियंत्रित ढंग से फैले क्लीनिकल टाÑयल पर भी लगाम लग सकता है। समिति ने कहा है कि शोध व विकास में  हम पश्चिम की नकल नहीं कर सकते। वहां का पूरा ढांचा ही निजी क्षेत्र की पूंजी व बौद्धिक संपदा की खरीद बिक्री पर निर्भर है। जबकि हमारे सरोकार अलग हैं। भारत की जरूरतें परिस्थितियां पश्चिमी देशों से अलग हैं। इस लिए यहां निजी पूंजी को संस्थान में मुनाफ कमाने के एजेंडे को लागू करने की इजाजत नही दी जा सकती।
इस लिए संस्थान को शोघ व विकास के लिए पेशेवर ढंग से रिसर्च काडर बना कर रोडमैप तैयार करके समयबद्ध तरीके से काम करना होगा। वेलियाथन समिति ने कंपनी प्रायोजित शोध व निजी पूंजी पर आधारित शोध की सिफारिश की थी जबकि संसदीय सीमित ने केंंद्रीकृत व्यवस्था के तहत के बहुआयामी व देश हित के शोध को तत्काल बढ़ावा देने की वकालत की है। समिति ने कहा है कि वेलियाथन समिति के हिसाब से या निजी पूंजी आधारित शोध से कंपनियों के मुनाफे वाले शोध ही होंगे। इससे अनैतिक काम को बढ़ावा मिलेगा। क्योंकि कंपनियां उन्हीं क्षेत्रों में शोध करवाना चाहती है जहां मुनाफा हो। समिति में संस्थान में दवाकंपनियों के कार्ययोजना को एम्स में थोपने से रोकने के लिए सशक्त निगरानी मशीनरी की जरूरत पर भी बल दिया।
समिति ने कहा है कि जनता के पैसों से स्थापित एम्स को जरूरत के हिसाब से देश के तमाम दूसरे सरकारी मेडिकल कालेजों के साथ या दुनिया के नामी स्वस्थ्य केंद्रों के साथ साझीदारी की जरूरत हो तो वह किया जा सकता है। शोध भी ऐसा किया जाए जिसका जनता को सीधे लाभ मिले न कि लैब में बंद पड़े रहने वाले शोध किए जाय। जरूर हो तो केवल उच्च शिक्षा ही संस्थान में कराई जाय।
समिति ने आरक्षण के मसले पर एम्स प्रशासन के दावे के उलट कहा है कि एम्स में संविधान प्रदत्त
आरक्षण के प्रावधानों की घोर अनदेखी की गई है। इसके लिए  जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश के साथ समिति ने ऐसी मशीनरी विकसित करने की जरूरत बताई है जिसमें कि वंचित तबके के लिए किए गए प्रावधानो तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की जा सके। इस श्रेणी में बैकलाग खत्म करने के लिए व्यापक योजना बनाकर काम करने की स्वस्थ्य मंत्रालय को हिदायत भी दी है।

जनसत्ता से साभार
हमारा नजरिया
संसदीय समिति के इस फैसले का स्वस्थ भारत अभियान स्वागत करता है. संसदीय समिति ने जिस आशंका को जाहिर करते हुए डॉ. लेवियाथन समिति की रिपोर्ट को खारिज किया है वह बिल्कुल जायज है।

दिल्ली में देश भर के एनएचएम कर्मियों की होगी जुटान, सरकार को घेरने की बनेगी योजना

  • 14 जून को जुटेंगे एनएचएम कर्मी

    14 जून को जुटेंगे एनएचएम कर्मी

    AINHMA की बैठक 14 जून को

देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य परियोज़ना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारी अपनी स्थाईकरण की मांग को लेकर लामबंद हो रहे है ! विदित है की देश भर में लाखों की संख्या में चिकित्सक, पैरामेडिकल समेत लाखों कर्मचारी बर्षों से अपनी सेवा दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की सारी योज़नाओं को लोगों के बीच ले जाने की जिम्मेदारी इन्हीं संबीदा कर्मचारिओं पर है। बरसों से मेहनत कर रहे इन संबीदा कर्मचारिओं के स्थाईकरण को लेकर अब तक न ही केंद्र सरकार ने कोई पहल की है और न राज्य सरकारों ने दिलचस्पी दिखाई है। नियमितीकरण की अपनी मांग को लेकर हर बार ठगे गए इन संबीदा कर्मचारिओं ने इस बार आर-पार की लड़ाई का मन बनाया है। इसको लेकर दिल्ली में बैठकों का दौर जारी है। आगामी 14 जून 2015 को देश भर के राज्य स्तरीय एन.एच.एम संगठनों के प्रतिनिधि व स्थाईकरण आंदोलन से जुड़े सैकड़ों कार्यकर्ता इकट्ठा! हो रहे हैं।

इस बावत इस महाआयोजन का संयोजन कर रहे स्वास्थ्य कार्यकर्ता विनय कुमार भारती ने बताया कि, दिनांक 14 जून 2015 को अखिल भारतीय राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन संगठन की कार्यकारणी के गठन का प्रस्ताव है। AINHMA के संस्थापक विनय भारती ने आगे बताया कि इस दिन देश भर से आए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से जुड़े कर्मचारियों की समस्या व समाधान पर चर्चा होगी।

 

 

सेमिनार में शामिल होने के लिए रजिस्ट्रेशन फॉर्म यहाँ से कॉपी-पेस्ट करें !

 

 

 

 

All India NHM Association (AINHMA)          

            

STATES NHM UNION’S REPRESENTATIVE  MEET & ELECTION OF GOVERNNING BODY OF ALL INDIA NHM ASSOCIATION, New Delhi

Venue: Maharashtra Bhawan, Nr. Paharganj Police Station, New Delhi

Contact: 09911278418 / 08826890764

                  (Date: 14th June 2015 Time: 10 am onwards)

Participation form

———————-

District / State :

Name and address association:

 

Name ofdeligates:

  1. ………………………………………………………………………………………………….Contact No.…………………………
  2. ………………………………………………………………………………………………… Contact No …………………..…….
  3. ………………………………………………………………………………………………….Contact No …………….…………..
  4. ………………………………………………………………………………………………Contact No………………………..
  5. ………………………………………………………………………………………………… Contact No …………………………
  6. ………………………………………………………………………………………………… Contact No …………………………

Name, Designation and contact details of Team Leader/ Team coordinator:

………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………Participatuon fee : 2800/ – one participant.

Mode of payment: Cash/ Cheque / Online Banking (Please tick any one)

(*Please attach xerox copy of payment receipt with the participation form.)

Please send cash, cheque, DD in favor of “BHARTI INDIA RURAL DEVELOPMENT SOCIETY”, Current Account No: 13111131003298, (Oriental Bank of Commerce) IFSC Code – ORBC 0101311.

Please submit the filled format and payment receipt (cash/chechqe /net banking) and send its soft copy to ainhamdelhi@gmail.com , Cc- vinayk@zindagizindabad.com . Delegates are requested to bring original copy of payment receipt during conference at Delhi. (Original copy required for the audit purpose).

Name & signature of team leader

                             Terms & Conditions

 

  1. Delegates will book his/her journey tickets to avoid problems.
  2. Delegates are requested to report their arrival one day before the conference. All are requested to report on 13th June 2015 after noon to late night as per travel plan.
  3. Delegates those are reaching Delhi to attend conference must inform their arriving schedule to AINHMA.
  4. Delegates will be provided food/refreshment by AINHMA management during conference.
  5. Smoking and alcohol will not to be allowed in conference hall.
  6. Delegates are looking for accommodation (Hotel room) to stay. They can contact AINHMA administration before 8th June 2015. After paying actual hotel cost AINHMA will help to book that hotel room.
  7. AINHMA request our guest to do online hotels booking near preferably paharganj location.
  8. Delegates are requested to bring his valid ID proof with one passport / size photographs for special ID card provided by AINHMA.
  9. All the delegates are requested to cooperate AINHMA members and hotel service to maintain peace during you stays at Delhi.
  10. There are elections / nomination has been proposed for the formation of GOVERNING BODY. All the delegates are requested to participate actively in election / nomination. It will be decided on spot during the conference with the consent of NHM delegates.
  11. If any member found any misbehavior / violence he/she will be out from the conference.

 

Signature of Every participant with full name.

 

14 जून को जुटेंगे एनएचएम कर्मी

14 जून को जुटेंगे एनएचएम कर्मी