क्या आप जानते हैं ! 65 साल पहले भारत में आया जापानी इंसेफलाइटिस !

आशुतोष कुमार सिंह

भारत जैसे देश किसी भी नई बीमारी का पालनहाल आसानी से बन जाते हैं। सवा अरब से ज्यादा जनसंख्या को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे भारत में जब कोई बीमारी आयात होती है, तो उसकी खातिरदारी घर आए मेहमान की तरह की जाती है। उसके प्रति हमारा नजरिया, उसको रोकने के उपाय ठीक वैसे ही होते हैं जैसे घर आए दामाद खुद से चले जाएं तो ठीक है, नहीं तो उन्हें कौन कहे की आप अपने घर चले जाइए। ऐसी बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीमारियों के फलने-फूलने के लिए जरूरी खाद-पानी यहां पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। यहां पर नई बीमारियों की खेती करने में पूरा तंत्र सहयोग करता है। कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू एवं इबोला जैसी बीमारियों की खेती यहां पर खूब हो रही है। इनकी ब्रांडिंग कर के कुछ यहां के कुछ दूसरे मूल्कों की संस्थाएं अपनी आर्थिक स्वार्थों को पूर्ण करने में सफल भी हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ स्वस्थ मानव संसाधन की रीढ़ की हड्डी तोड़ने की कोशिश साकार होती दिख रही है।
इन सब बातों की चर्चा यहां पर इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इन दिनों एक और बीमारी की ब्रांडिंग जोरो पर है। वर्षों से इस बीमारी का जो बीज हमने बोए थे वे अब फलदायी हो गए हैं। अब पहले से ज्यादा मारक हो गई है यह बीमारी। अब मौतों की संख्या बढ़ाने में इस बीमारी ने महारत हासिल कर ली है। अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस बीमारी की इतनी तारीफ किए जा रहा हूं। जी हां, यह बीमारी है जापानी इंसेफलाइटिस(जेई)। इस बीमारी ने भारत के कई क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया है। और आज उसका हरेक निशाना सही लग रहा है। देश के नौनिहालों को निगलने में यह बीमारी बहुत ही सफल रही है। गोरखपुर के बीआडी अस्पताल में हो रही मौतों का सिलसिला थमा भी नहीं था कि यह झारखंड के जमशेदपुर में हाहाकार मचाने में सफल रही। बगल के रांची में भी इसने कोहराम मचा रखा है। बिहार के मुजफ्फरपुर का क्षेत्र हो अथवा गोरखपुर, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज एवं सिवान का भूगोल। इन क्षेत्रों में इंसेफलाटिस ने अपने आप को खूब फैलाया है।

लचर व्यवस्था ने ली जान

अब यहां पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इंसेफलाइटिस होता कैसे है? और भारत में इसने कब कदम रखा? इसकी मजबूती का राज क्या है?
उत्तर प्रदेश में इंसेफलाइटिस पर पिछले दिनों एपीपीएल ट्रस्ट ने एक अध्ययन किया था। उस अध्य्यन में कहा गया है कि यह रोग फ्लावी वायरस के कारण होता है। यह भी मच्छर जनित एक वायरल बीमारी है। जिसमें सिर में अचानक से दर्द शुरू होता है, शरीर कमजोर पड़ने लगता है। इसका लक्ष्ण भी बहुत हद तक सामान्य बुखार जैसा ही होता होता है। इसका असर शरीर के न्यूरो सिस्टम पर पड़ता है। यही कारण है कि इस बीमारी ने या तो बीमारों को मौत की नींद सुलाया है अथवा उन्हें विकलांग कर दिया है। इस बीमारी को फैलने वाले क्षेत्र के बारे मे इस शोध में कहा गया है कि धान की खेती एवं सुअर-पालन जिन क्षेत्रों में होता है, वहां पर यह बीमारी आसानी से फैलती है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका फैलाव व्यक्ति से व्यक्ति के रूप में नहीं होता है। यह बात तो इस बीमारी के सिम्टम्स की हुई।

65 वर्ष पहले भारत में आई थी यह बीमारी

भारत में यह बीमारी कब आई यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है। आज से 65 वर्ष पूर्व यानी 1952 में पहली बार महाराष्ट्र के नागपुर परिक्षेत्र में इस बीमारी का पता चला। वहीं सन् 1955 तमिलनाडू के उत्तरी एरकोट जिला के वेल्लोर में पहली बार क्लीनीकली इसे डायग्नोस किया गया। 1955 से 1966 के बीच दक्षिण भारत में 65 मामले सामने आए। धीरे-धीरे इस बीमारी ने भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। भारत में पहली बार इस बीमारी ने 1973 फिर 1976 में पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा तबाही मचाई। पंश्चिम बंगाल के वर्दवान एवं बांकुरा जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। 1973 में बांकुरा जिला में इस रोग से पीड़ित 42.6 फीसद लोगों की मौत हुई। 1978 आते-आते यह बीमारी देश के 21 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में फैल गयी। इसी दौरान भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 1002 मामले सामने आए जिसमें 297 मौतें हुई। सिर्फ यूपी की बात की जाए तो 1978 से 2005 तक यह बीमारी 10,000 से ज्यादा मौतों का कारण बनी। 2005 में जो हुआ उसने इस बीमारी की ताकत से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को परिचित कराया। सिर्फ गोरखपुर में 6061 केस सामने आए जिसमें 1500 जानें गईं। इसी तरह 2006 में 2320 मामलों में 528 बच्चों को अपनी जान गवानी पड़ी। 2007 में 3024 मामलों में 645 मौत। इस तरह 2007 तक देश में 103389 मामले सामने आए जिसमें 33,729 रोगियों को नहीं बचाया जा सका। इस शोध में यह बात भी कही गयी है कि 597,542,000 लोग जापानी इंसेफलाइटिस प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं और 1500-4000 मामले प्रत्येक वर्ष सामने आ रहे हैं। यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अभी तक हम लोग जिन आंकड़ों की बात कर रहे हैं, वे सब रिपोर्टेड हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होंगे जो रिपोर्ट नहीं हुए होंगे। ऐसे में जब बिना रिपोर्ट किए गए मामलों की नज़र से इस बीमारी को हम देखें तो पता चलेगा कि यह बीमारी कितनी ताकतवर हो चुकी है। नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) जिसे पहले हमलोग राष्ट्रीय एंटी मलेरिया प्रोग्राम (एनएएमपी) के नाम से जानते थे, इन दिनों भारत में जेई के मामले को मोनिटर कर रही है। अभी तक देश के 26 राज्यों में कभी-कभार तो 12 राज्यों में अनवरत यह बीमारी अपना कहर बरपा रही है।
1951-52 में पहली बार भारत में लोकसभा चुनाव हुआ था। तब से लेकर अभी तक तमाम प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री बने और चले गए लेकिन 1952 से चली आ रही इस बीमारी का ईलाज नहीं ढ़ूढ़ पाए। लोग मरते रहे और आज भी मर रहे हैं।

146 वर्ष पहले जापान में सबसे पहले इस बीमारी का पता चला

इंसेफलाइटिस की जड़ों को अगर हम ढूढ़ें तो पता चलता है कि इसका जन्म सबसे पहले जापान में हुआ था। शायद यहीं कारण है कि इसे जापानी इंसेफलाइटिस कहा जाता है। आज से 146 वर्ष पूर्व जापान में यह बीमारी सबसे पहले पहचान में आई। 53 वर्षों के बाद इस बीमारी ने अपना विकराल रूप दिखाया और 1924 में जापान में 6000 केस पंजीकृत हुए। यहां से इसका फैलाव एशिया के देशों में हुआ। 1960 के दशक में चलाए गए टिकाकरण अभियान के कारण इस पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया। जापान के अलावा, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों में इसने अपना पैर पसारा फिर जैसा की ऊपर बताया जा चुका है 1952 में इसका प्रवेश भारत में हुआ।

आश्चर्य का विषय यह है कि भारत सरकार इंसेफलाइटिस के सही कारणों को जानने में अभी तक नाकाम रही है। अभी जांच का फोकस गोरखपुर बना हुआ है। जबकि इस बीमारी का फैलाव देश के लगभग प्रत्येक कोने में है। दक्षिण भारत में यह बीमारी पहले आई लेकिन वहां पर वह उतना सफल नहीं हुई जितना उत्तर भारत में दिख रही है। ऐसे में शोध का बिंदु दक्षिण भारत भी होना चाहिए। इतना ही नहीं जांच का बिंदु एशिया के तमाम देश भी होने चाहिए जहां पर यह बीमारी अपना पांव पसार चुकी है। शायद तब जाकर हम इस बीमारी के कारणों की तह में जा पाएंगे एवं ईलाज ढूढ़ पाने के नजदीक पहुंचेंगे। अभी तो ऐसा लगता है कि सरकार चाहती ही नहीं है कि इस बीमारी का ईलाज संभव हो सके नहीं तो गर हमारी सरकारों ने इस बीमारी की भयावहता को पहले ही भांप कर समुचित कदम उठाया होता तो बीआरडी अस्पताल में जो चीख-पुकार सुनने को मिल रही है शायद वह नहीं मिलती।

यह लेख www.firstposthindi.com से साभार लिया गया है।

चिकित्सक संवेदनशील बनें

देश के गरीबों को ध्‍यान में रखें चिकित्सकः प्रधानमंत्री

स्‍नातकोत्‍तर चिकित्‍सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्‍थान (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ के 34वें दीक्षांत समरोह में पहुंचे प्रधानमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री

इस मौके पर स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि देश भर के 70 मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्‍पेशलियटी ब्‍लॉक बनाए जा रहे हैं, 58 जिला अस्‍पतालों को मेडिकल कॉलेजों में बदला जा रहा है और 20 राज्‍य कैंसर संस्‍थानों और 50 त्रिस्‍तरीय कैंसर सुविधा केंद्रों का गठन किया जा रहा है।

 

चिकित्सक संवेदनशील बनें

चिकित्सकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री

नई दिल्ली/ स्‍नातकोत्‍तर चिकित्‍सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्‍थान (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ के 34वें दीक्षांत समरोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उत्‍तीर्ण छात्रों से आग्रह किया कि वे अपने कार्यशील जीवन के दौरान देश के गरीबों को ध्‍यान में रखें। उन्‍होंने उत्‍तीर्ण छात्रों को याद दिलाया कि यह दीक्षांत समारोह है न कि शिक्षांत समारोह और यहां उनकी शिक्षा का अंत नहीं होना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि यह ऐसा अवसर है कि जहां वे किताबों की दुनिया से निकलकर असली दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सर्वांगीण स्‍वास्‍थ्‍य सेवा संबंधी विश्‍व रुझानों का उल्‍लेख किया। उन्‍होंने उत्‍तीर्ण छात्रों से आग्रह किया कि वे केवल बीमारी का इलाज न करें बल्‍कि मरीजों के साथ निकट का संबंध भी रखें। समारोह में निकट के सरकारी स्‍कूलों के बच्‍चों की उपस्‍थिति को देखकर प्रधानमंत्री ने कहा कि ये बच्‍चे ही इस अवसर पर असली विशेष अतिथि हैं। उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि यह अवसर बच्‍चों को प्रेरित करेगा।

भारत के स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा उत्तीर्ण छात्रों के संबोधित करते हुए

भारत के स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा उत्तीर्ण छात्रों के संबोधित करते हुए

स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री श्री जेपी नड्डा ने इस अवसर उत्‍तीर्ण चिकित्‍सकों से आग्रह किया कि वे गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्ग के लोगों के प्रति सहानुभूति और करुणा का भाव रखें तथा अपने काम में उत्‍कृष्‍टता पैदा करें। उन्‍होंने कहा कि चिकित्‍सकों को जरूरतमंद लोगों के कल्‍याण के लिए अथक कार्य करना चाहिए। दीक्षांत समारोह में 500 से अधिक छात्रों ने स्‍नातकोत्‍तर डिग्री प्राप्‍त की। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा कि पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ मरीजों की देखभाल, चिकित्‍सा शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को लगातार उन्‍नत कर रहा है। उन्‍होंने कहा कि देश भर के 70 मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्‍पेशलियटी ब्‍लॉक बनाए जा रहे हैं और इस तरह मौजूदा मेडिकल कॉलेजों का विकास किया जा रहा है। उन्‍होंने बताया कि 58 जिला अस्‍पतालों को मेडिकल कॉलेजों में बदलकर देश के मेडिकल कॉलेजों के नेटवर्क को विस्‍तार दिया जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि 20 राज्‍य कैंसर संस्‍थानों और 50 त्रिस्‍तरीय कैंसर सुविधा केंद्रों का गठन किया जा रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा कि देश के प्रत्‍येक नागरिक को बेहतरीन त्रिस्‍तरीय स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं उपलब्‍ध कराने का सरकार का विजन है।

पीजीआईएमईआर द्वारा उठाए गए कदमों पर प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त करते हुए श्री नड्डा ने कहा कि यह संस्‍थान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया के विजन को हासिल करने की दिशा में अग्रसर है। उन्‍होंने बताया कि पीजीआईएमईआर ई-अस्‍पताल को क्रियान्‍वित कर रहा है। ऑनलाइन ओपीडी रजिस्‍ट्रेशन प्रक्रिया शुरू हो गई है और संस्‍थान निदान सेवाओं तथा समयबद्ध तरीके से भुगतान सुविधाएं शुरू कर रहा है। इन सुविधाओं के शुरू हो जाने पर मरीजों का समय बचेगा। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने संस्‍थान के प्रशासन से आग्रह किया कि वे अस्‍पताल में स्‍वच्‍छता को प्रोत्‍साहन देने के लिए अभी हाल में शुरू की जाने वाली ‘कायाकल्‍प’ योजना में सक्रिय हिस्‍सा लें।

इस अवसर पर पंजाब एवं हरियाणा के माननीय राज्‍यपाल प्रो. कप्‍तान सिंह, चंडीगढ़ से सांसद श्रीमती किरण खेर, स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण सचिव श्री भानु प्रताप शर्मा और पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के निदेशक डॉ. योगेश चावला भी उपस्‍थित थे। (सोर्सःपीआईबी)

दीक्षांत समारोह की झलकियां…

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्यमंत्री साथ-साथ

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्यमंत्री साथ-साथ

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री छात्रों को सम्मानित करते हुए...

प्रधानमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री छात्रों को सम्मानित करते हुए…

 

संसदीय समिति ने लगाई स्वास्थ्य मंत्रालय को फटकार

निजी पूंजी से एम्स में शोध न करने की संसदीय समिति की सिफारिश

संसदीय  समिति ने कहा है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय महत्व के केंद्र एम्स में शोध को सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर संसाधन मुहैया कराए ताकि किसी कंपनी के निजी हित के बजाय जनहित व लोक कल्याणकारी शोध को बढ़ावा दिया जा सके।

 

प्रतिभा शुक्ल की रपट

निजी पूंजी का इस्तेमाल शोध में न हो...एम्स व स्वास्थ मंत्रालय को मिली हिदायत

निजी पूंजी का इस्तेमाल शोध में न हो…एम्स व स्वास्थ मंत्रालय को मिली हिदायत

नई दिल्ली/ देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के सबसे बड़े केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ( एम्स ) में दवा कंपनियों या निजी क्षेत्र के पूंजी से शोध व विकास का काम बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। इस मामले में हमें अमेरिका या दूसरे पश्चिमी देशों का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। यह कहते हुए स्वास्थ्य पर बनी स्थाई संसदीय समिति ने डॉ. वेलियाथन समिति की रपट व सिफारिशों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। एम्स के सुधार के लिए बनी वेलियाथन समिति ने उद्योग व दवा कंपनियों के हिसाब से शोध की प्रमुखता से सिफारिश की थी। इसके उलट संसदीय समिति ने एम्स को शोध व विकास के लिए पर्याप्त पूंजी मुहैया न कराने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को फटकार लगाई है। समिति ने कहा है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय महत्व के केंद्र एम्स में शोध को सर्वोच्च प्राथमिकता के स्तर पर संसाधन मुहैया कराए ताकि किसी कंपनी के निजी हित के बजाय जनहित व लोक कल्याणकारी शोध को बढ़ावा दिया जा सके।
साथ ही समिति में कई स्तर पर बड़े बदलाव की सिफारिश की है। समिति ने एम्स में आरक्षण के प्रावधानो की अनदेखी किए जाने पर कड़ी आपत्ति जाताई है। वेलियाथन समिति ने ए व बी श्रेणी में क्रमश: 31 व सात सिफारिशें की थीं जिनमें से सात सिफारिशों पर अमल के लिए एम्स के संविधान में संशोधन की जरूरत है जो कि केवल संसद के जरिए हो सकता है।
राज्य सभा सांसद सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई वाली संसद की स्थाई समिति ने कहा है कि चिकित्सा जगत में शोध व विकास के मामले में देश ही नहीं दुनिया में भी अग्रणी रहे संस्थान एम्स में शोध व विकास की सारी जरूरतें न केवल सरकार पूरी करे बल्कि इसकी लोकतांत्रिक जवाबदेही भी है। की जाए। इससे न केवल जनस्वास्थ्य के लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है बल्कि इसी तरह से कंपनी प्रायोजित शोध व विकास का उन्मूलन किया जा सकता है। इसी से अनियंत्रित ढंग से फैले क्लीनिकल टाÑयल पर भी लगाम लग सकता है। समिति ने कहा है कि शोध व विकास में  हम पश्चिम की नकल नहीं कर सकते। वहां का पूरा ढांचा ही निजी क्षेत्र की पूंजी व बौद्धिक संपदा की खरीद बिक्री पर निर्भर है। जबकि हमारे सरोकार अलग हैं। भारत की जरूरतें परिस्थितियां पश्चिमी देशों से अलग हैं। इस लिए यहां निजी पूंजी को संस्थान में मुनाफ कमाने के एजेंडे को लागू करने की इजाजत नही दी जा सकती।
इस लिए संस्थान को शोघ व विकास के लिए पेशेवर ढंग से रिसर्च काडर बना कर रोडमैप तैयार करके समयबद्ध तरीके से काम करना होगा। वेलियाथन समिति ने कंपनी प्रायोजित शोध व निजी पूंजी पर आधारित शोध की सिफारिश की थी जबकि संसदीय सीमित ने केंंद्रीकृत व्यवस्था के तहत के बहुआयामी व देश हित के शोध को तत्काल बढ़ावा देने की वकालत की है। समिति ने कहा है कि वेलियाथन समिति के हिसाब से या निजी पूंजी आधारित शोध से कंपनियों के मुनाफे वाले शोध ही होंगे। इससे अनैतिक काम को बढ़ावा मिलेगा। क्योंकि कंपनियां उन्हीं क्षेत्रों में शोध करवाना चाहती है जहां मुनाफा हो। समिति में संस्थान में दवाकंपनियों के कार्ययोजना को एम्स में थोपने से रोकने के लिए सशक्त निगरानी मशीनरी की जरूरत पर भी बल दिया।
समिति ने कहा है कि जनता के पैसों से स्थापित एम्स को जरूरत के हिसाब से देश के तमाम दूसरे सरकारी मेडिकल कालेजों के साथ या दुनिया के नामी स्वस्थ्य केंद्रों के साथ साझीदारी की जरूरत हो तो वह किया जा सकता है। शोध भी ऐसा किया जाए जिसका जनता को सीधे लाभ मिले न कि लैब में बंद पड़े रहने वाले शोध किए जाय। जरूर हो तो केवल उच्च शिक्षा ही संस्थान में कराई जाय।
समिति ने आरक्षण के मसले पर एम्स प्रशासन के दावे के उलट कहा है कि एम्स में संविधान प्रदत्त
आरक्षण के प्रावधानों की घोर अनदेखी की गई है। इसके लिए  जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश के साथ समिति ने ऐसी मशीनरी विकसित करने की जरूरत बताई है जिसमें कि वंचित तबके के लिए किए गए प्रावधानो तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की जा सके। इस श्रेणी में बैकलाग खत्म करने के लिए व्यापक योजना बनाकर काम करने की स्वस्थ्य मंत्रालय को हिदायत भी दी है।

जनसत्ता से साभार
हमारा नजरिया
संसदीय समिति के इस फैसले का स्वस्थ भारत अभियान स्वागत करता है. संसदीय समिति ने जिस आशंका को जाहिर करते हुए डॉ. लेवियाथन समिति की रिपोर्ट को खारिज किया है वह बिल्कुल जायज है।

केईएम अस्पताल के एक और डॉक्टर को हुआ डेंगू

जब डॉक्टर डेंगी से खुद को नहीं बचा पा रहे हैं, तो आम लोगों का क्या होगा...

जब डॉक्टर डेंगी से खुद को नहीं बचा पा रहे हैं, तो आम लोगों का क्या होगा…

– डॉक्टर की गंभीर हालत के चलते किया हिंदूजा अस्पताल में ऐडमिट
– बीएमसी ने केईएम अस्पताल और हॉस्टल को दिया डेंगू की ब्रीडिंग साइट के चलते नोटिस

Deepika Sharma For SBA

मुंबई/ केईएम अस्पताल में एक रेजिडेंट डॉक्टर की डेंगी से मौत हुए, एक हफ्ता भी नहीं हुआ है, इसी अस्पताल के तीन और रेजिडेंट डॉक्टर डेंगी से जूझ रहे हैं। केईएम के मेडिसिन विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर वृज दुर्गे को बेहद गंभीर हालत के चलते सोमवार सुबह हिंदूजा अस्पताल में ऐडमिट कराया गया है। वहीं दूसरी तरफ मरीजों के लिए डेंगी का इलाज देने वाला यह केईएम अस्पताल खुद डेंगी के मच्छरों का घर बन गया है। बीएमसी ने केईएम अस्पताल और इसी अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टरों के हॉस्टल को डेंगी की ब्रीडिंग के चलते नोटिस भेजा है।
तीन डॉक्टर हैं डेंगी के शिकार
मेडिसिन विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर वृज दुर्गे के अलावा दो और रेजिडेंट डॉक्टर भी डेंगी के चलते अस्पताल में ऐडमिट हैं। अस्पताल से जुड़े सूत्रों के अनुसार पीडियाट्रिक विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर, शशी यादव केईएम अस्पताल के मेडिसिन इंनटेंसिव केयर युनिट (एमआईसीयू) और कार्डियोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर अरविंद सिंह इसी अस्पताल के आईआईसीयू में ऐडमिट हैं। गौरतलब है कि एक हफ्ते पहले केईएम अस्पताल के अनेस्थेसिया विभाग के थर्ड ईयर की स्टूडेंट, डॉ़ श्रुति खोबरगेड़े की डेंगी के चलते ही मौत हो गई थी। इस घटना के बाद केईएम अस्पताल प्रशासन और बीएमसी के पेस्ट कंट्रोल विभाग ने कई कदम उठाए थे। जानकारी के अनुसार पिछले तीन महीनों में इस अस्पताल के लगभग 50 से ज्यादा डॉक्टर डेंगी की चपेट में आ चुके हैं।
अस्पताल खुद बना डेंगी का घर
केईएम अस्पताल के महाराष्ट्र असोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (मार्ड) से मिली जानकारी के अनुसार डॉक्टर वृज को शनिवार को केईएम के एमआईसीयू में ऐडमिट किया गया था। लेकिन धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती चली गई, जिसके चलते परिवार वालों ने उन्हें हिंदूजा अस्पताल में ऐडमिट करने का फैसला किया। डॉ़ दुर्गे हिंदूजा अस्पताल के आईसीयू में ऐडमिट हैं और उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। मार्ड से मिली जानकारी के अनुसार इस अस्पताल में डेंगू के ब्रीडिंग स्पॉट पाए गए हैं, जिसके बीएमसी ने इन्हें नोटिस भी भेजा हैं।

साभारःनवभारत टाइम्स, मुंबई 

परिचयः दीपिका शर्मा नवभारत टाइम्स, मुंबई से जुड़ी हुई हैं। स्वास्थ्य रिपोर्टिंग में दीपिका शर्मा ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

500 रूपये की खातिर छत्तीसगढ़ में तार तार हो गई इंसानियत

अभी अभी छत्तीसगढ़ ने बहुत गर्व और गौरव से अपना स्थापना दिवस मनाया है। लेकिन जिस वक्त राजधानी अपने होने के जश्न में डूबी थी उसी वक्त राजधानी रायपुर के सबसे बड़े भीमराव अंबेडकर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मानवता को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई। पोस्टमार्टम विभाग (चीरघर) के कुछ भ्रष्ट कर्मचारी शनिवार ने चंद पैसों के लिए इंसानियत को शर्मसार कर दिया और लाशों के सौदागर बन गये।

Ambedkar Hospital...शर्म भी शर्मा जाएं...

Ambedkar Hospital…शर्म भी शर्मा जाएं…

Himanshu Sharma, Raipur Se

जेल के एक कैदी की यहां लापरवाही और उचित इलाज के अभाव में मौत हो गई थी। गरीब कैदी की मौत के बाद जब उसके परिजन लाश लेने चीरघर पहुंचे तो कर्मचारियों ने लाश को सीलने के नाम पर उनसे सौदेबाजी शुरू कर दी। चीरघर के कर्मचारियों को जब मृतक के परिजनों ने लाश सिलने के लिए 500 रुपए नहीं दिए, तो उन्होंने पोस्टमार्टम के बाद कटी-फटी हालत में लाश बगैर सिले परिजनों को सौंप दी। इस घटना से सदमे में आए परिजन खुद ही लाश कपड़े में लपेटकर अपने साथ ले गए।

प्रदेश के सबसे बड़े डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल में अंबिकापुर सेंट्रल जेल में हत्या के अपराध में उम्रकैद की सजा काट रहे लगन राम पिता उजित राम को कैंसर के उपचार के लिए दाखिल कराया गया था। सरगुजा के कालीपुर में रहने वाला लगन 1 अक्टूबर को अस्पताल में इलाज के लिए दाखिल कराया गया था। कैदी का पूरा शिश्न निकालकर वैकल्पिक मूत्र द्वार बनाया जाना था, लेकिन इसी बीच अस्पताल में जूनियर डॉक्टर्स की हड़ताल हो गई। इससे उसका आॅपरेशन टलता रहा। इसी दौरान 30 अक्टूबर को उसने दम तोड़ दिया। मृतक के परिजनों का कहना है, घटना के बाद से ही उन पर पोर्टमार्टम करने वाले कर्मचारी 500 रुपए रिश्वत देने का दबाव बनाते रहे। इसके चलते पोस्टमार्टम की प्रक्रिया भी नहीं हो पा रही थी। दबाव के बाद जब 1 नवंबर की शाम करीब 6 बजे उसका पोस्टमार्टम किया गया, तो फिर कर्मचारियों ने उन पर रुपए देने का दबाव बनाया। जब इसके बाद भी उन्हें रिश्वत नहीं दी गई, तो उन्होंने पोस्टमार्टम रूम में ही लगन राम की कटी-फटी लाश फेंक दी और कहा, जाओ इसे खुद ही बांधो और ले जाओ। इस पर मृतक के परिजन कपड़े में लपेटकर लगन राम की लाश ले गए।

अपने पिता की लाश का इस तरह अपमान देखकर मृतक लगन राम का बेटा अरविंद कुमार अधीर हो गया। उसने बिलखते हुए कहा- अस्पताल में मेरे पिता का समय पर आॅपरेशन नहीं किया गया, जिसके कारण उनकी मौत हो गई। वहीं पोस्टमार्टम करने वाले कर्मचारी मुझसे 500 रुपए रिश्वत की मांग कर रहे थे। जब मैंने उन्हें रुपए नहीं दिए, तो उन्होंने मेरे पिता की लाश को फर्श पर फेंक दिया। मृतक की लगातार नाजुक हो रही स्थिति को देखते हुए जेल प्रशासन ने भी आंबेडकर अस्पताल के सर्जरी विभाग को आॅपरेशन करने की अनुमति दे दी थी, लेकिनबावजूद  बंदी मरीज का समय रहते आॅपरेशन नहीं  हो सका और उसकी मौत हो गई। अस्पताल की जन संपर्क अधिकारी शुभ्रा ठाकुर का कहना है कि मामला बेहद गंभीर है। इस संबंध में वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दे दी गई है। मामले की जांच के साथ ही दोषी के खिलाफ कार्रवाई भी होगी।

साभारः www.visfot.com