बजट और स्वास्थ्यःस्वस्थ भारत का सपना

एक पुरानी और सर्वमान्य संकल्पना है कि पढ़ाई, दवाई और लड़ाई यानी कि शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तीनों पूरी तरह निःशुल्क होने चाहिएं। स्वाधीन भारत के संविधान निर्माताओं ने संभवतः इसी बात को ध्यान में रख कर भारत को एक कल्याणकारी राज्य घोषित किया था और इसको ही ध्यान में रख कर सरकार हर वर्ष बजट बनाती है। बजट में हजारों करोड़ रूपये स्वास्थ्य के लिए आबंटित भी किए जाते हैं। परंतु दुःख का विषय यह है कि तमाम सरकारी प्रयत्नों के बावजूद ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है।

बजट और स्वस्थ भारत का सपना

योजना के अगस्त अंक में प्रकाशित लेख

इस वर्ष नई सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट में भी स्वास्थ्य के लिए पिछली सरकार की ही भांति प्रावधान किए गए हैं। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 21912 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है। इसके अतिरिक्त नए एम्स खोलने के लिए 500 करोड़ रूपये दिए गए हैं। एकीकृत बालविकास सेवाओं हेतु 18691 करोड़ रूपये दिए गए हैं और आयुष के लिए कुल 411 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया गया है। साथ ही फार्मास्यूटिकल रिसर्च के लिए 87 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इस प्रकार देखा जाए तो स्वास्थ्य के लिए सरकार ने बजट में कुल 41601 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सरकार ने पिछली यूपीए सरकार के बजट के 37300 करोड़ रूपयों की तुलना में कहीं अधिक बजट स्वास्थ्य के लिए आबंटित किया है।

देखा जाए तो इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं की झलक साफ दिखाई देती है। जेटली अपने घोषणापत्र के हर राज्य में एम्स का वादा पूरा करने की दिशा में बढ़े। उन्होंने आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र में विदर्भ और यूपी के पूर्वाचल में एम्स जैसे चार संस्थानों के लिए 500 करोड़ आवंटित किए। 12 मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा भी की। गांवों के विकास के लिए ग्रामीण हेल्थ रिसर्च सेंटर खोलने का भी ऎलान किया। प्रधानमंत्री के एक वादे “सबके लिए स्वास्थ्य” का इस्तेमाल करते हुए कहा वित्त मंत्री ने कहा कि, नि:शुल्क औषधि सेवा और नि:शुल्क निदान सेवा प्राथमिकता का आधार पर शुरू की जाएगी। इस प्रकार बजट को स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक-ठाक कहा जा सकता है। परंतु देश के जनस्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मानें तो यह बजट पर्याप्त नहीं है।

कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेल बजट की तर्ज पर स्वास्थ्य के लिए भी अलग से बजट लाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य पर और ध्यान देते हुए स्वास्थ्य बजट में और पारदर्शिता लाए। इसके लिए आवश्यक है कि रेल बजट की तरह स्वास्थ्य बजट भी अलग से पेश किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य पर किया जाने वाला यह खर्च विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। दूसरा तर्क यह है कि सरकार द्वारा कम बजट और सुविधाएं दिए जाने के कारण लोगों को निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की ओर जाना पड़ता है। निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की भागेदारी आज सरकार से कहीं आधिक हो गई है। 2008-09 के एक अध्ययन के अनुसार देश के स्वास्थ्य-व्यय का 71.62 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है और केवल 26.7 प्रतिशत सरकार द्वारा। इससे स्वास्थ्य सेवाएं मंहगी और गरीबों की पहुंच से दूर हो रही हैं।

सबको स्वास्थ्य का सपना

बहरहाल इस बजट के कुछ प्रमुख मुद्दे हैं जिन पर अलग से चर्चा की जानी आवश्यक प्रतीत होती है। सबसे पहला मुद्दा है सबके लिए स्वास्थ्य। इसके लिए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन चला रखा है। पिछली सरकार ने शहरी स्वास्थ्य मिशन की भी शुरूआत की थी परंतु उसे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बजट में ही रखा गया था। इस सरकार ने दोनों को अलग-अलग कर दिया है। परंतु सवाल है कि क्या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन सबको स्वास्थ्य के लक्ष्य को पूरा कर सकता है?

ध्यातव्य है कि देश की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाई गई वर्ष 1983 में जिसमें पहली बार सभी नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था। यानी कि स्वाधीनता मिलने के लगभग 46 वर्ष बाद सरकार को देश के स्वास्थ्य की चिंता हुई। इसके बाद देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और इसके उप केंद्र खोले जाने लगे। परंतु इनकी संख्या देश की जनसंख्या के अनुपात में काफी कम थी। 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2011 तक देश में 1 लाख 76 हजार 820 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (ब्लॉक स्तर), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-केंद्र स्थापित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त देश में 11 हजार 493 सरकारी अस्पताल हैं और 27 हजार 339 आयुष केंद्र। देश में (एलोपैथ के) 8 लाख 83 हजार 812 डॉक्टर हैं। नर्सों की संख्या 18 लाख 94 हजार 968 बताई गई है। परंतु दूसरी ओर देश में 5 लाख से अधिक गांव हैं और अधिकतर गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच रही हैं।

अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति खराब है। कोई भी डॉक्टर गांवों में जाने के लिए तैयार नहीं है। जिन्हें भेजा जाता है, वे केंद्रों में बैठते नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब एमबीबीएस के छात्रों के लिए गांवों में एक वर्ष के लिए सेवा देना अनिवार्य किए जाने पर डाक्टरों ने तीखा विरोध किया था। ऐसे में यह चिंतनीय हो जाता है कि यदि पर्याप्त संख्या में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोल भी दिए जाएंगे तो उसके लिए डॉक्टर कहां से लाए जाएंगे। हालांकि वर्ष 2012 के भारत सरकार के आंकड़ों को देखें तो प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों के लिए कुल 24 हजार 49 डाक्टरों की आवश्यकता थी और इसके लिए सरकार ने 31 हजार 867 डाक्टरों को नियुक्त करने की व्यवस्था की जिनमें से 28 हजार 984 डाक्टर केंद्रों में तैनात भी हैं। इस पर भी कुल 903 केंद्र डाक्टरविहीन हैं और 14873 केंद्रों में केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध है। 7 हजार 676 केंद्रों में लैब तकनीशियन नहीं है तो 5 हजार 549 केंद्रों में फार्मास्यूटिकल नहीं है। केवल 5 हजार 438 केंद्रों में महिला डाक्टर उपलब्ध हैं। दूसरी ओर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डाक्टरों की संख्या और भी दयनीय है। आवश्यकता है 19 हजार 332 विशेषज्ञों की जबकि सरकार केवल 9 हजार 914 की ही व्यवस्था कर पाई है और उनमें से भी 5 हजार 858 ही कार्यरत हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि देश की बड़ी आबादी के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं कितनी कम हैं। इससे यह भी साफ है कि यदि हमें सबको स्वास्थ्य का सपना साकार करना है तो इसके दस-बीस गुणे बजट की आवश्यकता पड़ेगी, जो वर्तमान स्थिति में संभव ही नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? यदि हम रोगों की बात करें तो वर्तमान में जो रोग देश में व्यापक हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश हमारी जीवनशैली और खान-पान में आए बदलाव के कारण बढ़ रहे हैं। चाहे वह हृदय रोग हो या रक्तचाप, मधुमेह हो या फिर मोटापे की। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में भी मलेरिया, डायरिया और तपेदिक जैसी बीमारियां ही अधिक देखी जा रही हैं। वर्ष 2012 में जिन बीमारियों के कारण अधिक मौतें हो रही हैं उनकी सूची इस प्रकार है

क्र. रोग                  मामले    मौतें     मौत दर (%)

1  रैबीज                 212     212    100.00

2  एक्यूट इसेफ्लाइटिस     8344    1256   15.05

3  टिटेनस               3421    248    7.25

4  मेनिंगकोकल मेनिनजाइटिस        5609   413    7.36

5  तपेदिक (2011)        1515872 63265  4.17

6  स्वाइन फ्लू            5044    405    8.03

7  टिटेनस (नवजात)       748     42     5.61

8  डिप्थिरिया             3902    60     1.54

इससे यह स्पष्ट है कि इनमें से अधिकांश रोगों में ऑपरेशन की कोई आवश्यकता नहीं है और यह भी कि इनमें से अधिकांश रोग देशज चिकित्सा पद्धतियों यानी कि आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा तथा वैकल्पिक पद्धतियों यानी कि होमियोपैथ, यूनानी आदि से भी ठीक की जा सकती हैं। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि ये पद्धतियां अनुभवसिद्ध हैं और सस्ती भी हैं। इसलिए आयुष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। परंतु आयुष को लेकर सरकार की नीतियां न तो तब ठीक थीं और न ही अब ठीक हैं।

आयुषः भारतीय व वैकल्पिक पद्धतियां

वर्तमान में देश में आयुष क्षेत्र के तहत बुनियादी ढांचे में 62 हजार 649 बिस्तरों की क्षमता के साथ 3 हजार 277 अस्पतालों, 24 हजार 289 औषधालयों, 495 अंडर ग्रेजुएट कॉलेजों, 106 स्नातकोत्तर विभागों वाले कॉलेज और देश में भारतीय चिकित्सा पद्धति और होम्योपैथी के 7 लाख 85 हजार 185 पंजीकृत चिकित्सक हैं। परंतु दुःख की बात यह है कि सरकार ही आयुर्वेद व होमियोपैथ के डाक्टरों के साथ भेदभाव करती है। आयुर्वेद के डाक्टरों को शल्य चिकित्सा यानी कि ऑपरेशन करने की छूट नहीं है। हालांकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का विशद् वर्णन है और इसका काफी गौरवपूर्ण इतिहास भी रहा है। माना जाता है कि सुश्रुत मस्तिष्क का ऑपरेशन करने वाले दुनिया के पहले चिकित्सक थे। इस पर भी अंग्रेजी सरकार ने देश की परतंत्रता के कालखंड में आयुर्वेद पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगा रखे थे जो आज भी यथावत् चले आ रहे हैं।

इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतिबंध था पंजीकृत किए जाने का। आयुर्वेद एक परंपरागत ज्ञान परंपरा है और इस कारण बड़ी संख्या में इसके विशेषज्ञ आज की पढ़ाई से दूर हैं। इस कारण उनका पंजीकरण नहीं हो सकता। परंतु अंग्रेजी कानूनों के अनुसार केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर ही चिकित्सा कार्य कर सकता है। इस कारण बड़ी संख्या में आयुर्वेदिक वैद्य अवैध सिद्ध हो जाते हैं। दुःखद यह है कि स्वाधीनता के 67 वर्षों के बाद भी भारत सरकार इसका कोई समाधान नहीं निकाल पाई। वास्तव में देख जाए तो प्रारंभ में सरकार का आयुर्वेद के प्रति काफी उपेक्षा का भी रवैया था। अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारतीय सरकारों ने आयुर्वेद को समाप्त कर इसके स्थान पर एलौपैथ को स्थापित करने पर ही पूरी ताकत लगाई। इसका ही परिणाम है कि आज भी 41 हजार करोड़ रूपयों के स्वास्थ्य बजट में केवल 411 करोड़ रूपये ही आयुष को दिए गए हैं और उसमें से भी आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा के लिए केवल 217 करोड़ रूपये ही आबंटित किए गए हैं।

इन देशज प्रणालियों की ओर सरकार का ध्यान स्वाधीनता मिलने के 17 वर्ष बाद 1964 में गया था जबकि पहली स्वास्थ्य नीति 1952 में ही बनी थी। 1964 में सरकार ने आयुर्वेदिक औषधालय खोलने का निर्णय लिया था, परंतु इसकी चाल इतनी धीमी थी कि वर्ष 2007 तक केवल 31 औषधालय ही खोले गए थे। हालांकि इस क्षेत्र में कितनी अधिक संभावनाएं थी, इसका पता केवल इस एक बात से लगाया जा सकता है कि आज देश में 24 हजार 289 आयुर्वेदिक औषधालय हैं और वह भी न्यूनतम बजट के बावजूद। इसके बाद भी आयुर्वेद जैसी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध, विकास और इनके अस्पतालों की स्थापना पर सरकार का ध्यान 1995 में गया यानी कि स्वाधीनता से पूरे 48 वर्ष बाद। मार्च 1995 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होमियोपैथी विभाग की रचना की गई और बात में वर्ष 2003 में इसका नाम बदल कर आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी विभाग (आयुष) कर दिया गया। हालांकि सिद्ध और यूनानी जैसी पद्धतियां काफी कम ही प्रचलित हैं, परंतु इससे सरकार का ध्यान आयुर्वेद की ओर से कम ही हो गया। आयुष की स्थापना के बावजूद यह सब लंबे समय तक सरकारी दिखावा ही बना रहा। हजारों करोड़ के स्वास्थ्य मंत्रालय के बजट में से आयुष को केवल कुछ सौ करोड़ रूपये ही मिलते रहे हैं। इतना ही नहीं, ऐलोपैथ के शोध, शिक्षण आदि के लिए भी इससे कहीं अधिक रूपये दिए जाते रहे हैं।

इस भेदभाव के बावजूद आयुष तेज गति से आगे बढ़ा। एक तो ये पद्धतियां सस्ती हैं, इस कारण कम बजट में भी ये तेजी से फैलीं। साथ ही एलौपैथी चिकित्सा पद्धति की अनेक खामियां और अनेक रोगों के इलाज में इसकी असमर्थता उजागर होने के बाद आम जनता उससे दूर जाने लगी। वास्तव में देखा जाए तो चिकित्सकीय विकास के तमाम दावों के बावजूद देश की स्वास्थ्य समस्याओं में कोई कमी नहीं आई है। आम आदमी को परेशान करने वाले मलेरिया, डायरिया, तपेदिक, दमा, कैंसर आदि रोग पहले से कहीं अधिक जटिल और खतरनाक हो गए हैं। एलौपैथ का इलाज काफी मंहगा और आम जनता की पहुंच से दूर है। ऊपर हम देख चुके हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त संख्या में डाक्टर ही नहीं हैं और सामुदायिक केंद्रों में भी विशेषज्ञ डाक्टरों का घोर अभाव है। डाक्टर मूलतः शहरों में बैठे हैं और ऊंची फीस वसूल कर ही ईलाज कर रहे हैं। सरकारी अस्पताओं में दुर्व्यवस्थाओं का यह आलम है कि मध्यम वर्ग तक इनमें जाने से घबराता है। संभवतः सरकार ने भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया प्रतीत होता है और संभवतः इसी कारण देश में और अधिक एम्स खोले जाने का प्रयास हो रहा है। परंतु वर्तमान एम्स का ही स्तर काफी गिर गया है। ऐसे में नए खुलने वाले एम्सों की दुर्गति वर्तमान सरकारी अस्पतालों जैसी नहीं हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी है?

चिकित्सा और व्यावसायीकरण

सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों की दुरावस्था का सबसे बड़ा कारण है एलौपैथी चिकित्सा का अत्यंत मंहगा होना और इस कारण इसका व्यावसायीकरण। निजी संस्थानों से एमबीबीएस की पढ़ाई करने में आम तौर पर 30-40 लाख रूपयों का खर्च आता है। सरकारी संस्थानों से पढ़ाई करने में भी 4-5 लाख रूपये खर्च हो जाते हैं। स्वाभाविक ही है कि जो इतनी मंहगी शिक्षा ले रहा है, वह समाजसेवा तो नहीं ही करेगा। इसमें भी ध्यान देने की बात यह है कि इस पद्धति में रोग पहचानने में ही सर्वाधिक व्यय हो जाता है। रोग पहचानने की मशीनें काफी मंहगी हैं और उनके कारण इसका ईलाज भी काफी मंहगा है। एक एलौपैथ के अस्पताल के स्थापित करने का खर्च कई करोड़ में आएगा। इतना खर्च करने वाली संस्था समाजसेवा नहीं ही कर सकती। भले ही उसे जमीन सरकार ने दी हो। स्वाभाविक ही है कि एलौपैथ ही चिकित्सा के व्यावसायीकरण के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है।

हालांकि आयुर्वेद का भी कुछ हद तक व्यावसायीकरण होना प्रारंभ हो गया है परंतु फिर भी इस क्षेत्र में अनेक लोग और संस्थाएं निस्स्वार्थ रूप से कार्यरत हैं। इसके अलावा देश के गांव-गांव में देसी वैद्य पाए जाते हैं। अधिकांश आयुर्वेदिक दवाएं घर में भी बनाई जा सकती हैं। लोग बनाते भी हैं। उनकी विधियां सर्वसुलभ हैं। सीधी-सी बात है कि इसका व्यावसायीकरण न तो फलदायक है और न ही संभव है। सरकार यदि आयुर्वेद को स्कूली शिक्षा से ही बढ़ाना शुरू कर दे, तो स्वास्थ्य पर किया जाने वाला बजट काफी कम हो जा सकता है।

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है अंतरराष्ट्रीय दबाव-समूहों के कारण लिए जाने वाले फैसले। उदाहरण के लिए सभी गर्भवती स्त्रियों के लिए एड्स की जांच करवाना सरकार ने अनिवार्य करवा रखा है। यह एक व्यर्थ की कवायद है। इसमें केवल सरकार का खर्च होना है। यह जांच वैकल्पिक की जानी चाहिए। इसी प्रकार और भी कई व्यवस्थाएं हैं, जो जरूरी नहीं होने पर भी सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से थोपी जा रही हैं और जिसमें काफी खर्च भी किया जा रहा है। इसका प्रभाव आम आदमी पर भी पड़ रहा है।

आयुर्वेदिक वैद्य प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों को भी सक्रिय कर सकते हैं। थोड़े से प्रशिक्षण से गांव के वैद्य को गांव में होने वाली सामान्य बीमारियों जैसे कि मलेरिया, डायरिया, खांसी-जुकाम, ज्वर, गैस्ट्रिक आदि का ईलाज करने योग्य बनाया ही जा सकता है। इतना तो वे पहले से भी जानते ही हैं, केवल एक पंजीकरण की आवश्कता होती है जो पूरी की जा सकती है। उन्हें इन केंद्रों में बैठाया जा सकता है। साथ ही एमबीबीएस डाक्टर उपलब्ध न होने पर बीएएमएस डाक्टरों को भी बैठाया जा सकता है। इससे आयुर्वेद की महत्ता भी बढ़ेगी और उसकी शिक्षाओं का भी प्रचार प्रसार होगा। साथ ही चिकित्सा का व्यावसायीकरण भी रूकेगा। देखा जाए तो शल्य क्रिया यानी कि ऑपरेशन के अलावा और किसी भी रोग के ईलाज के लिए आयुर्वेद व अन्य चिकित्सा प्रणालियां पर्याप्त सक्षम हैं। इसलिए देश भर में मंहगे अस्पतालों की उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, बनिस्पत कि सामान्य बीमारियों को प्रारंभ में ही रोक देने वाले सामान्य अस्पतालों की।

कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं से अधिक देश में स्वास्थ्य शिक्षा की आवश्यकता है। अच्छी स्वास्थ्य शिक्षा से आधी से अधिक बीमारियां होने से रोकी जा सकती हैं। इससे न केवल सरकार, बल्कि जनता के भी पैसों की बचत होगी। सरकार को बजटीय प्रावधान करते हुए इसका भी ध्यान रखना चाहिए। आयुर्वेद जैसी भारतीय चिकित्सा प्रणालियां इसी अव्यवसायिक और ईलाज से परहेज अच्छा वाले चिकित्सकीय तंत्र को मजबूत करती हैं। यही कारण भी था कि महात्मा गांधी ने 1909 में लिखी अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में देश से डाक्टरों को पूरी तरह हटाए जाने की बात कही थी और मृत्यु पर्यंत अपनी बात पर डटे रहे थे। आज एक बार फिर महात्मा गांधी जी के उसी भविष्य-दृष्टि को सामने रख कर देश का स्वास्थ्य बजट बनाए जाने की आवश्यकता है। केवल तभी सबको स्वास्थ्य का सपना साकार किया जा सकता है।

साभारः योजना अगस्त-2014

Drug Price Control Order

Drug Price Control Order -2013

ड्रग प्राइस कण्ट्रोल आर्डर २०१३ का पीडीऍफ़ नीचे संलग्न है.

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मरीज के साथ संबंध बनाएं

एम्स के 42 वे दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी...

एम्स के 42 वे दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी…

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एम्स, नई दिल्ली के छात्रों को संबोधित करते हुए, भविष्य की आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार रहने को कहा है। साथ ही उनका इस बात पर बल है कि डॉक्टर-मरीज के बीच दोस्ताना संबंध हो। जो डॉक्टर हैं, अथवा बनने जा रहे हैं उनको इसे जरूर पढ़ना चाहिए…अपने पाठकों के लिए प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ प्रस्तुत क रहे हैं…संपादक

 

Narendra Modi, Prime Minister Of India

 

मंत्रिपरिषद के मेरे साथी डॉ. हर्षवर्द्धन, मंचस्‍थ सभी महानुभाव और आज के दिवस के केंद्र बिन्‍दु वे सभी डिग्रीधारी जो आज इस कैंपस को छोड़ करके एक नई जिम्‍मेदारी की ओर कदम रख रहे हैं।

मैं आप सबको हृदय से बहुत-

बहुत शुभकामनाएं देता हूं।
मैं कभी अच्‍छा स्‍टूडेंट नहीं रहा हूं, और न ही मुझे इस प्रकार से कभी अवॉर्ड प्राप्‍त करने का सौभाग्‍य मिला है। इसलिए मुझे बहुत बारीकियों का ज्ञान नहीं है। लेकिन इतनी समझ जरूर है कि विद्यार्थी का जब Exam होता है, उस हफ्ते बड़ा ही टेंशन में रहता है, बड़ा ही गंभीर रहता है। खाना भी जमता नहीं, बड़े तनाव में रहता है। लेकिन आज एक प्रकार से वो सारी झंझटों से मुक्ति का पर्व है और आप इतने गंभीर क्‍यों हैं?
मैं कब से देख रहा था, कि क्‍या कारण है यहां! क्या, मिश्रा जी, क्‍या कारण है? मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आप अपने दायित्‍व पर उससे भी ज्‍यादा गंभीर हों – अच्छी चीज़ है – लेकिन जीवन को गंभीर मत बना देना। जिंदगी को हंसते-खेलते, संकटों से गुजरने की आदत बनाते हुए चलना, और उसका जो आनंद है, वह बड़ा ही अलग होता है। हमारे देश में, अगर पुराने शास्‍त्रों की तरफ देखें, तो पहला convocation, इसका उल्लेख तेत्रैय उपनिषद् में आता है। वेद काल में गुरु-शिष्‍य जब परंपरा थी, और शिष्‍य जब विद्यार्थी काल समाप्‍त करके जाता था, तो उसका प्रथम उल्‍लेख तैत्रेय उपनिषद में आता है कि कैसे Convocation की क्‍या कल्‍पना थी।

वो परंपरा अब भी चल रही है, नए रंग-रूप के साथ चल रही है। मेरा एक-दो सुझाव जरूर है। क्‍या कभी हम इस Convocation में एक Special guest की परंपरा खड़ी कर सकते हैं क्‍या? और Special guest का मेरा मतलब है कि गरीब बस्‍ती में जो Schools हैं, गरीब परिवार के बच्‍चे जहां पढ़ते हैं, ऐसे एक Selected 8वीं 9वीं कक्षा वे बच्‍चे, 30, 40, 50 जो भी आपकी Capacity में हो, उनको ये Convocation में Special guest के रूप में बुलाया जाए, बिठाया जाए, और वे देखें, ये दुनिया क्‍या है। जो काम शायद उसका टीचर नहीं कर पाएगा, उस बालक मन में एक घंटे-डेढ़ घंटे का ये अवसर उसके मन में जिज्ञासा पैदा करेगा। उसके मन में भी सपने जगाएगा। उसको भी लगेगा कि कभी मेरी जिंदगी में ये अवसर आए।

आप कल्‍पना कर सकते हैं, कितना बड़ा इसका impact हो सकता है। चीज बहुत छोटी है। लेकिन ताकत बहुत गहरी है और यही चीजें हैं जो बदलाव लाती है। मेरा आग्रह रहेगा, वे गरीब बच्‍चे। डॉक्‍टर का बच्‍चा आएगा तो उसको लगेगा कि मेरे पिताजी ने भी ये किया है, उसको नहीं लगेगा। समाज जीवन में अपने सामान्‍य बातों से हम कैसे बदलाव ला सकते हैं। उस पर हम सोचें। जो डॉक्‍टर बनकर आज जा रहे हैं, अपने जीवन में अचीवमेंट किया है, मेरे जाने के बाद भी शायद हर्षवर्द्धन जी कईयों को अवॉर्ड देने वाले हैं, सर्टिफिकेट देने वाले हैं। लेकिन आज आप जा रहे हैं, बीता हुआ कल और आने वाला कल के बीच कितना बड़ा अंतर है।

आपने जब पहली बार AIIMS में कदम रखा होगा तो घर से बहुत सारी सूचनाएं दी गई होंगी, मां ने कहा होगा, पिताजी ने कहा होगा। चाचा ने कहा होगा, देखो ऐसा करना, ऐसा मत करना। ट्रेन में बैठे होंगे तो कहा होगा कि देख खिड़की के बाहर मत देखना। कोई अनजान व्‍यक्ति कुछ देता है तो मत लेना। बहुत कुछ कहा होगा। एक प्रकार से आज भी वही पल है। Convocation एक प्रकार से आखिरी कदम रखते समय परामर्श देने का एक पल होता है।

कभी आप सोचे हैं कि जब आप क्‍लासरूम में थे, Institute में थे, जब आप पढ़ रहे थे, तब आप कितने protected थे? कोई कठिनाई आई तो सीनियर साथी मिल जाता था, बताता था। समाधान नहीं हुआ तो प्रोफेसर मिल जाते थे। प्रोफेसर नहीं मिले तो डीन मिल जाते थे। बहुत avenues रहते थे कि जहां पर आप आपकी समस्‍याओं का, आपकी जिज्ञासा का समाधान खोज सकते थे। आप कभी यहां काम करते थे, आपका हॉस्‍टल लाइफ रहा होगा। परिवार का कोई नहीं होगा, जो आपको हर पल ये कहता होगा, ये करो, ये मत करो। लेकिन कोई तो कोई होगा अरे यार क्‍या कर रहे हो भाई? किसी ने कहा होगा भाई तुम्‍हारे पिताजी ने कितनी मेहनत करके भेजा है, तुम ये कर रहे हो क्‍या ? बहुत कुछ सुना होगा आपने। और तब आपको बुरा भी लगा होगा कि क्‍या ये मास्‍टर जी देते हैं, हमें मालूम नहीं है क्‍या हमारी जिंदगी का? लेकिन कोई तो था जो आपको कहता था कि ये करो, ये मत करो।

आप उस अवस्‍था से गुजरे हैं और काफी लंबा समय गुजरे हैं, जहां, आपको स्‍वयं को निर्णय करने की नौबत बहुत कम आई होगी और निर्णय करने की नौबत आई होगी, तब भी protected environment में आई होगी, जहां पर आपको पूरा Confidence था कि मेरे निर्णय को इधर-उधर कुछ भी हो जाएगा तो कोई तो बैठा है जो मुझे मदद करेगा, बचा लेगा मुझे या मेरा हाथ पकड़ लेगा। इसके बाद आप एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जहां कोई आपका हाथ पकड़ने वाला नहीं है। जहां पर कोई आपको ये करो, ये मत करो, कहने वाला नहीं है। जहां आपका कोई protected environment नहीं है। आप एक चारदीवारी वाले classroom से एक बहुत बड़े विशाल classroom में enter हो रहे हैं। और तब जाकर के एकलव्‍य की मानसिकता आवश्‍यक होती है। एकलव्‍य को protected environment नहीं मिला था, लेकिन उसका लक्ष्‍य था achievement का। और उसने अपने काल्‍पनिक सृष्टि की रचना की और काल्‍पनिक सृष्टि के माध्‍यम से ज्ञान अर्जित करने का प्रयास किया था।

जिस पल, खास करके medical protection के लोग या professional क्षेत्र में जाने वाले लोग, विद्यार्थी काल की समाप्ति मानते हैं, मैं समझता हूं, अगर हमारे मन में यह अहसास हो कि चलो यार, छुट्टी हुई, बहुत दिन बिता लिए। वही Hostel, वहीं gown, वहीं stethoscopes, इधर दौड़ो, उधर दौड़ो। चलो मुक्ति हो गई। जो ये मानता है कि आज end of the journey है दरअसल वह एक नई journey में entry कर रहा है, मैं समझता हूं, अगर ये मन का भाव आया, तो मेरा निश्चित मत है, कि आप ठहराव की ओर जा करके फंस जाएंगे। रूकावटों की झंझटों में उलझ जाएंगे।

लेकिन अगर आप एक बंद classroom से एक विशाल classroom में जा रहे हैं। विद्यार्थी अवस्‍था भीतर हमेशा रहती है। जिन लोगों को आज सम्‍मानित करने का सौभाग्‍य आज मिला, 70-80 साल की आयु वाले भी हैं। लेकिन आज उनसे आप मिलेंगे तो मुझे विश्‍वास है, आज भी medical science के latest Development के बारे में उनको पता होगा। इसलिए नहीं कि उनको किसी पेशेंट की जरूरत है, इसलिए कि उनके भीतर का विद्यार्थी जिंदा है। जिसके भीतर का विद्यार्थी जिंदा होता है, वही जीवन में कुछ कर पाता है, कर गुजरता है। लेकिन अगर यहां से जाने के बाद इंस्‍टीट्यूट पूरी हुई तो विद्यार्थी जीवन भी पूरा हुआ। अगर ये सोच है तो मैं समझता हूं कि उससे बड़ा कोई ठहराव नहीं हो सकता है। विद्यार्थी अवस्‍था, मन की विद्यार्थी अवस्‍था जीवन के अंत काल तक जीवन को प्राणवान बनाती है, ऊर्जावान बनाती है। और जिस पल मन की विद्यार्थी अवस्‍था समाप्‍त हो जाती है, मृत्‍यु की ओर पहला कदम शुरू हो जाता है।

अभी मैं आया तो वो सज्‍जन बता रहे थे, कि लोगों को अचरज है, मोदीजी की energy का। अचरज जैसा कुछ है नहीं, आप लोग medical science के लोग हैं, थोड़ा इतना जोड़ दीजिए, हर पल नया करने की, सीखने की इच्‍छा आपके भीतर की ऊर्जा कभी समाप्‍त नहीं होती है। कभी energy समाप्‍त नहीं होती। आपकी स्थिति कुछ और भी बनेगी, जब आप hostel में रहते होंगे, OPD में आपको कई पेशेंट को डील करना होता होगा। कभी दोपहर को दोस्‍तों के साथ मूवी देखना तय किया है तो मन करता था कि OPD ऐसा करो निकालो। हमें सिनेमा देखने जाना है। मैं आपकी बात नहीं बता रहा हूं, ये तो मैं कहीं और की बात बता रहा हूं।

आपने पेशेंट को कहा होगा ये खाना चाहिए, ये नहीं चाहिए। इतना खाना चाहिए, इतना नहीं खाना चाहिए। लेकिन जैसे ही आप मेस में पहुंचते होंगे, सब साथियों ने मिलके स्‍पर्धा लगाई होगी, आज तो special Dish है। Sweet है, देखते हैं कौन ज्‍यादा खाता है। ये सब किया होगा। और वही तो जिंदगी होती है, दोस्‍तों। लेकिन आपने किसी को कहा होगा, ये खाओ, ये मत खाओ। तब जा करके अपनी आत्‍मा से पूछा है, मैंने उसको तो ये कहा था, मैं ये कर रहा हूं।…. मैं उसको appreciate करता हूं। लेकिन आने वाले कल में, मैं कैंसर का डॉक्‍टर हूं और शाम को धुंआधार सिगरेट जलाता रहता हूं और मैं दुनिया को कहूंगा कि भाई इससे कैंसर होता है तो किसी को गले नहीं उतरेगा। ऊपर से हम एक उदाहरण बन जाएंगे- हां यार, कैंसर के डॉक्‍टर सिगरेट पीते हैं तो मुझे क्‍या फर्क पड़ता है।
इसलिए मैं एक ऐसे व्‍यवसाय में हूं, मैं एक ऐसे क्षेत्र में कदम रख रहा हूं, जहां मेरा जीवन मेरे पेशेंट की जिंदगी बन सकता है। शायद हमने बहुत कम लोगों ने सोचा होगा कि क्‍या एक डॉक्‍टर का जीवन एक पेशेंट की जिंदगी बन सकता है? आप कभी सोचना, आपका हर मिनट, हर बात, हर संपर्क पेशेंट की जिंदगी बन सकती है। कभी सोच करके देखिए, बहुत कम लोग हैं, जो जीवन को इस रूप में देखते हैं। मैं आशा करता हूं, आज जो नई पीढ़ी जा रही है, वो इस पर सोचेगी। 

उसी प्रकार से, हम डॉक्‍टर बने हैं, कभी अपनी ओर देखें – क्‍या आपके पिताजी के पास पैसे थे, इसलिए आपने पाया? क्‍या आपके प्रोफेसर बहुत अच्‍छे थे, इसलिए ये सब हुआ? क्‍या सरकार ने बहुत बढि़या इमारत बनाई थी, AIIMS बन गया था, इसके कारण हुआ? आप थोड़े मेहनती थे, इसलिए हुआ? अगर यही सोच हमारी सीमित रही तो शायद जिंदगी की ओर देखने का दृष्टिकोण पूर्णता की ओर हमें नहीं ले जाएगा। कभी सोचिये, यहां पर जब आप पहले दिन आए होंगे तो एक ऑटो-रिक्‍शा वाला या टैक्‍सी वाला होगा जिसने आपकी मदद की होगी। बहुत अच्‍छे ढंग से यहां लाया होगा, पहली बार दिल्‍ली में कदम रखा होगा, बहुतों ने। तो क्‍या आज स्थिति को प्राप्‍त करते समय आपकी जीवन की यात्रा का पहला चरण जिस ऑटो ड्राइवर के साथ किया, या उस टैक्‍सी वाले के साथ किया, क्‍या कभी स्‍मरण आता है?
Exam के दिन रहे होंगे, थकान महसूस हुई होगी, रात के 12 बजे पढ़ते-पढ़ते कमरे से बाहर निकले होंगे, ठंड का मौसम होगा और एक पेड़ के नीचे कोई चाय बेचने वाला बैठा होगा। आपका मन करता होगा, चाय मिल जाए तो अच्‍छा हो, क्‍योंकि रात भर पढ़ना है। और उस ठंडी रात में सोये हुए, उस पेड़ के नीचे सोये हुए उस चाय बेचेने वाले को आपके जगाया होगा, कि चाय पिला दे यार। और उसने अपना चेहरा बिगाड़े बिना, आप डॉक्‍टर बने इसलिए, आपका Exam अच्‍छा जाए, इसलिए, ठंड में भी जग कर के कही से दूध लाके आपको चाय पिलाई होगी। तब जा करके आपकी जिंदगी की सफलता का आरंभ हुआ होगा।

कभी-कभार एकाध peon भी, कोई Paramedical staff का बूढ़ा व्‍यक्ति, जिसके पास जीवन के अनुभव वा तर्जुबा रहा होगा, उसने कहा होगा, नहीं साब, सिरींज को ऐसे नहीं पकड़ते हैं, ऐसे पकड़ते हैं। हो सकता है, classroom का वह teacher नहीं होगा, लेकिन जिंदगी का वह Teacher बना होगा। कितने-कितने लोग होंगे, जिन्‍होंने आपकी जिंदगी को बनाया होगा। एक प्रकार से बहुत बड़ा क़र्ज़ लेकर के आप जा रहे हैं।

अब तक तो स्थिति ऐसी थी कि कर्ज लेना आपका हक भी था, लेकिन अब कर्ज चुकाना जिम्‍मेवारी है। और इसलिए भली-भांति उस हक का उपयोग किया है, अच्‍छा किया है। लेकिन अब भली-भांति उस कर्ज को चुकाना हमारा दायित्‍व बन जाता है। और उस दायित्‍व को हम पूरा करें। मुझे विश्‍वास है कि हम समाज के प्रति हमारा दायित्‍व अपने profession में आगे बढ़ते हुए भी निभा सकते हैं। आप अमीर घर के बेटे हो सकते हैं, गरीब परिवार के बेटे हो सकते हैं, मध्‍यम वर्ग के परिवार के बेटे / बेटी हो सकते हैं, लेकिन क्‍या कभी सोचा है कि आपकी पढ़ाई कैसे हुई है? क्‍या आपके फीस के कारण पढ़ाई हुई है? नहीं, क्‍या scholarship के कारण हुई है? नहीं।

इन व्‍यवस्‍थाओं का विकास तब हुआ होगा, जब किसी गरीब के स्‍कूल बनाने का बजट यहां divert हुआ होगा। किसी गांव के अंदर बस जाए तो गांव वालों की सुविधा बढ़े, हो सकता है कि वह बस चालू नहीं हुई होगी, वह बजट यहां divert किया गया होगा। समाज के कई क्षेत्रों के विकास की संभावनाओं को रोक करके इसे Develop करने के लिए कभी न कभी प्रयास हुआ होगा। एक प्रकार से उसका हक छिन कर हमारे पास पहुंचा है, जिसके कारण हम लाभान्वित हुए हैं। और ये जरूरत थी, इसलिए यहां करना पड़ा होगा। क्‍योंकि अगर इतने बड़े देश में Medical Profession को बढ़ावा नहीं देते हैं तो बहुत बड़ा संकट आ सकता है, अनिवार्य रहा होगा। लेकिन कोई तो कारण होगा कि समाज के किसी न किसी का हक मैंने लिया है, तब जाकर आज इस स्‍तर तक पहुंचा हूं। क्‍या मैं हर पल अपने जीवन में उस बात को याद करूंगा कि हां भाई, मैं सिर्फ डॉक्‍टर बना हूं, ऐसा नहीं है? ये मेरे सामने आया हर व्‍यक्ति किसी न किसी तरीके से योगदान दिया है, तब जाकर मैं इस अवस्‍था को पहुंचा हूं। मुझ पर उसका अधिकार है।

मैं नहीं जानता हूं, जो लोग यहां से पढ़ाई की और विदेश चले गए, उनके दिल में यह बात पहुंचेगी कि नहीं पहुंचेगी। कभी-कभार, अपने profession में बहुत आगे निकल गए और निकलना भी है। हम नहीं चाहते हैं कि सब पिछड़ेपन की अवस्‍था में हमारे साथी रहें। लेकिन कभी हम भी तो यार दोस्‍तों के साथ छुट्टी मनाने जाते हैं। कितने भी पेशेंट क्‍यों न हो, कितनी भी बीमारियों की आशंका क्‍यों न हो, लेकिन जिंदगी ऐसी है कि कभी न कभी उसकी चेतना अगले 7 दिन, 10 दिन अपने साथियों के साथ बाहर जाते हैं। कभी-कभार ये भी तो सोचिये कि भले ही बहुत बड़ी जगह पर बैठेंगे, लेकिन कम से कम सब साथियों को ले करके साल में एक बार पांच दिन, सात दिन दूर-सुदूर जंगलों में जा कर के, गरीबों के साथ बैठ कर के, मेरे पास जो ज्ञान है, अनुभव है, कहीं उनके लिए भी तो कर पाएं। मैं सात दिन, 365 दिन करने की जरूरत नहीं है, न कर पाएं, लेकिन ये तो कर सकते हैं। अगर इस प्रकार का हम संकल्‍प करके जाते हैं तो इतनी बड़ी शक्ति अगर लगती है। समाज की शक्ति से बड़ी कोई शक्ति नहीं हो सकती है। हम एक समाज के बहुत चेतनमंद ऊर्जा है। हम क्‍या कुछ नहीं कर सकते है इस भाव को लेकर अगर हम चलते हैं तो हम बहुत बड़ी सेवा समाज की कर सकते हैं।
सफल व विफल डॉक्टर
कभी-कभार मैंने देखा है, सफल डॉक्‍टर और विफल डॉक्‍टर के बीच में आपने अंतर कभी देखा है क्‍या? कुछ डॉक्‍टर होते हैं जो बीमारी के संबंध में बहुत focused होते हैं, और इतनी गहराई से उन चीजों को handle करते हैं, और उनके profession में उनकी बड़ी तारीफ होती है। भाई, देखिए इस विषय में तो इन्‍हीं को पूछिए। consult करना है तो उनको पूछिए। लेकिन कभी-कभार उसकी सीमा आ जाती है।

दूसरे प्रकार के डॉक्‍टर होते हैं। वे बीमारी से ज्‍यादा बीमार के साथ जुड़ते हैं। यह बहुत बड़ा फर्क होता है। बीमारी से जुड़ने वाला बहुत Focused activity करके बीमारी को Treat करता है, लेकिन वो डॉक्‍टर जो बीमार से जुड़ता है, वो उसके भीतर बीमारी से लड़ने की बहुत बड़ी ताकत पैदा कर देता है। और इसलिए डॉक्‍टर के लिए यह बहुत बड़ी आवश्‍यकता होती है कि वह उस इंसान को इंसान के रूप में Treat कर रहा है, कि उसके उस पुर्जे को हाथ लगा रहा है, जिस पुर्जे की तकलीफ है? मैं नहीं मानता हूं कि वो डॉक्‍टर लोकप्रिय हो सकता है। वह सफल हो सकता है। डॉक्‍टर का लोकप्रिय होना बहुत आवश्‍यक होता है, क्‍योंकि सामान्‍य व्‍यक्ति डॉक्‍टर के शब्‍दों पे भरोसा करता है।
हमें भी अंदाज नहीं होता है। हम कहते है तो कह देते हैं कि देखो भाई, जरा इतना संभाल लेना। बहुत पेशेंट होते हैं जो, उस एक शब्द को घोष वाक्‍य मान करके जिंदगी भर के लिए स्‍वीकार कर लेते हैं। तब जा करके हमारा दायित्‍व कितना बढ़ जाता है। और इसलिए हमें उस डॉक्‍टर समूहों की आवश्‍यकता है, जो सिर्फ बीमारों की नहीं, बीमारी की नहीं, लेकिन पेशेंट के confidence level को Build up करने की दृष्टि से जो कदम उठाए जाएं। और मैं नहीं जानता कि जब आप पढ़ते होंगे, तब classroom में ये बातें आई होगी। क्‍योकि आपको इतनी चीजें देखनी होती होगी, क्‍योंकि भगवान ने शरीर में इतनी चीजें भर रखी हैं, कि उसी को समझते-समझते ही कोर्स पूरा हो जाता है। सारे गली-मोहल्‍ले में Travel करते-करते पता नहीं कहां निकलोगे आप? इसलिए ये बहुत बड़ी आवश्‍यकता होती है कि मैं इस क्षेत्र में जा रहा हूं, तो मैं एक समाज की जिम्‍मेवारी ले रहा हूं। और समाज की जिम्‍मेवारी ने निभाने के लिए हम कोशिश कर रहे हैं।
अपने लेख छपवाने के लिए आग्रही बनें
हमारे देश में by and large, पहले के लोग थे, जो रात में भी मेहनत कर करके रिकॉर्ड मेंटेन करते थे। और वो पेशेंट की history, बीमारी की history, कभी-कभार भविष्‍य के लिए बहुत काम आती है। आज युग बदल चुका है। Digital Revolution एक बहुत बड़ी ताकत है। एक डॉक्‍टर के नाते मैं अभी से दो या तीन क्षेत्रों में focus करके case history के रिकॉर्ड्स बनाता चलूं, बनाता चलूं, बनाता चलूं। उसका analysis करता चलूं। कभी-कभार मेरे सीनियरों से उसका debate करूं, चर्चा करूं। science Magazines के अंदर मेरे Article छापे, इसके लिए आग्रही बनो।

मेडिकल शोध की आवश्यकता
भारत के लिए बहुत अनिवार्य है दोस्‍तों कि हमारे Medical Profession के लोग, अमेरिका के अंदर उसका बड़ा दबदबा है। दुनिया के कई देश ऐसे हैं, कि गंभीर से गंभीर बीमारी हो, अस्‍पताल में आपरेशन थियेटर में ले जाते हों, लेकिन जब तक वो हिन्‍दुस्‍तानी डॉक्टर का चेहरा नहीं देखते हैं, तब तक उनका विश्‍वास नहीं बढ़ता है। यह हमने Achieve किया है। By and large, हर पेशेंट विश्‍व में जहां भी उसको परिचय आया, कुछ ऐसा नहीं यार, आप तो हैं, लेकिन जरा उनको बुला लीजिए। ये कोई छोटी बात नहीं है। लेकिन, हम Research के क्षेत्र में बहुत पीछे है। और Research के क्षेत्र में यह आवश्‍यक है कि हम Case history के प्रति ज्‍यादा Conscious बनें। हम पेशेंट की हर चीज को बारीकी से लिखते रहें, analysis करते रहें, 10 पेशेंट को देखते रहें। हो सकता है कि धीरे-धीरे 2-4 साल की आपकी इस मेहनत का परिणाम यह आएगा कि आप मानव जाति के लिए बहुत बड़ा Contribute कर सकते हैं। और हो सकता है कि आपमें से कोई Medical Science का Research Scientist बन सकता है।

मानव जाति के कल्‍याण के लिए मैं समस्‍याओं को Treat करता रहूं, एक रास्‍ता है, लेकिन मैं मानव जाति की संभावित समस्‍याओं के समाधान के लिए कुछ नई चीजें खोज कर दे दूं। हो सकता है, मेरा Contribution बहुत बड़ा हो सकता है। और ये काम कोई दूसरा नहीं करेगा। और आज Medical Science, आज से 10 साल पहले और आज में बहुत बड़ा बदलाव आया है। Technology ने बहुत बड़ी जगह ले ली है, Medical Science में।

एक जमाना था, जब गांव में एक वैद्यराज हुआ करते थे, और गांव स्‍वस्‍थ होता था। गांव बीमार नहीं होता था। आज आंख का डॉक्‍टर अलग है, कान का अलग है। वो दिन भी दूर नहीं, भाईं आंख वाला एक होगा, दाईं आंख वाला दूसरा होगा। लेकिन एक वैद्यराज से गांव स्‍वस्‍थ रहता था और बायें-दायें होने के बावजूद भी स्‍वस्‍थता के संबंध में सवालिया निशान लगा रहता है। तब जा करके बदले हुए समय में Research में कहीं न कहीं हमारी कमी महसूस होती है। Technological development इतना हो रहा है, आप मुझे बताइए, अगर Robot ही ऑपरेशन करने वाला है तो आपका क्‍या होगा? एक programming हो जाएगा, programme के मुताबिक robot जाएगा जहां भी काटना-वाटना है, काट करके बाहर निकल जाएगा, बाद में paramedical staff हैं, वहीं देखता रहेगा। आप तो कहीं निकल ही जाएंगे।

मैं आपको डरा नहीं रहा हूं। लेकिन इतना तेजी से बदलाव आ रहा है, आपमें से कितने लोग जानते हैं, मुझे मालूम नहीं है। एक बहुत बड़ा साइंस, जो कि हम सदियों पहले जिसके विषय में जानकारी रखते थे, बताई जाती थी हमारे पूर्वजों को, वह आज Medical Science में जगह बना रहा है। पुराने जमाने में ऋषि-मुनियों की तस्‍वीर होती थी, उसके ऊपर एक aura हुआ करता था, कभी हमको लगता था कि aura अच्‍छी designing के लिए शायद paint किया गया हो। लेकिन आज विज्ञान स्‍वीकार करने लगा है कि aura Medical Science के लिए सबसे बड़ा input बन सकता है। Kirlian Photography शुरू हुई, जिसके कारण aura की फोटोग्राफी शुरू हो गई। Aura की photography से पता चलने लगा कि इस व्‍यक्ति के जीवन में ये Deficiency है, शरीर में 25 साल के बाद ये बीमारी आ सकती है, 30 साल के बाद ये बीमारी आ सकती है, औरा साइंस बहुत बड़ी बात है, वो Develop हो रहा है।

आज के हमारे Medical Science के सबसे जुड़ा हुआ Aura Science नहीं है। Full Proof भले ही नहीं होगा, पर एक वर्ग है दुनिया में, विदेशों में, जो लोग इसी पर बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। अगर ये Aura Science की स्‍वीकृति हो गई तो शायद Medical Science की Terminology बदल जाएगी। एक बहुत बड़े Revolution की संभावना पड़ी है। हम Revolution से डरते नहीं है। हम चाहते हैं, Innovations होते रहने चाहिए। लेकिन चिंता ये है कि हम उसके अपने आप के साथ मेल बिठा रहे हैं कि हम उन पुरानी किताबों को पढ़ें, क्‍योंकि हमारे professor भी आए होंगे, वो भी वही पुरानी किताब लेके आए होंगे। उनके टीचर ने उनको दी होगी। और हम भी शायद प्रोफेसर बन गए तो आगे किसी को सरका देंगे कि देख यार, मैं यहीं पढ़ाता रहा हूं, तुम भी यही पढ़ाते रहो। तो शायद बदलाव नहीं आ सकता है।

इसलिए रोज नूतन प्राणवान व्‍यवस्‍था की ओर हमारा मन रहता है, तो हम Relevant रहते हैं। हम समाज के बदलाव की स्थिति में जगह बना सकते हैं। उसे बनाने की दिशा में अगर प्रयास करते हैं तो मैं मानता हूं कि हम बहुत बड़ी सेवा कर सकते हैं। आप एक ऐसे Institution के Students हैं, जिसने हिन्‍दुस्‍तान में अपना एक Trademark सिद्ध किया हुआ है। आज हिन्‍दुस्‍तान में कहीं पर भी अच्‍छा अस्‍पताल बनाना हो, या Medical Science में कुछ काम करना हो, कॉलेज अच्‍छे बनाने हो तो लोग क्‍या कहते हैं? पूरे देश के हर कोने में। हमारे यहां एक AIIMS बना दो।

इसका मतलब, आप कितने भाग्‍यवान हैं कि पूरा हिन्‍दुस्‍तान जिस AIIMS के साथ जुड़ना चाहता है, हर कोने में कोई कहता है, पेशेंट भी चाहता है कि यार मुझे AIIMS में Admission मिल जाए तो अच्‍छा होगा, Students भी चाहता है कि पढ़ने को यदि AIIMS में मिल जाए तो exposure बहुत अच्‍छा मिलेगा, Faculty अच्‍छी मिल जाए, बहुत बड़ा जीवन में सीखने को मिलेगा। आप भाग्‍यवान हैं, आप एक ऐसे Institution से निकल रहे है, जिस Institution ने देश और दुनिया में अपनी जगह बनाई है। ये बहुत बड़ा सौभाग्‍य ले करके आप जा रहे हैं।

मुझे विश्‍वास है कि आपके जीवन में माध्‍यम से भविष्‍य में समाज को कुछ न कुछ मिलता रहेगा और “स्‍वस्‍थ भारत” के सपने को पूरा करने में आप भी भारत माता की संतान के रूप में, जिस समाज ने आपको इतना सारा दिया है, उस समाज को आप भी कुछ देंगे। इस अपेक्षा के साथ में आज, जिन्‍होंने यह अचीवमेंट पाई है, उन सबको हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं। मेरी शुभकामनाएं हैं, और मैं आपका साथी हूं। आपके कुछ सुझाव होंगे, जरूर मुझे बताइए। हम सब मिल करके अच्‍छे रास्‍ते पर जाने की कोशिश करेंगे।

आपके बीच आने का मुझे अवसर मिला, मैं भी हैरान हूं कि मुझे क्‍यों बुलाया? ना मैं अच्‍छा पेशेंट हूं। भगवान करे, ना बनूं। डॉक्‍टर तो हूं ही नहीं। लेकिन मुझे इसलिए बुलाया कि मैं प्रधानमंत्री हूं। और हमारे देश का दुर्भाग्‍य ऐसा है कि हम लोग सब जगह पे चलते हैं। खैर, मुझे आप लोगों से मिलने का अवसर मिला, मैं आपका आभारी हूं।

नोट

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह उद्बोधन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्‍थान, नई दिल्‍ली के 42वें दीक्षांत समारोह के दौरान दी थी। जिसका मूल पाठ पीआईबी के सौजन्य से आप तक पहुंचा रहें है।