विश्व बालिका दिवस के अवसर पर स्वस्थ भारत ने की मांग, महिलाओं के लिए सार्वजानिक जगहों पर बने शौचालय!

नई दिल्ली

‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ विषय को लेकर 21000 किमी की स्वस्थ भारत यात्रा करने वाले स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह ने महिलाओं के लिए सार्वजानिक जगहों पर अलग शौचालय बनाएं जाने कीय मांग की है। अपनी यात्रा के अनुभवों एवं बालिकाओं से हुई बातचीत का हवाला देते हुए श्री आशुतोष ने कहा कि देश के प्रत्येक जिला मुख्यालय, प्रखंड मुख्यालय, बस अड्डा सहित उन सभी जगहों पर महिलाओं के अलग से शौचालय बनें, विशेष रूप से मूत्रालय।

श्री आशुतोष ने बताया की यात्रा के दौरान देश भर की बालिकाओं ने अलग से मूत्रालय बनाये जाने की बात प्रमुखता से रखी थी। विश्व बालिका दिवस के अवसर पर स्वस्थ भारत (न्यास) के पदाधिकारियों ने एक बैठक की। इस बैठक में यह निर्णय किया गया की बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय की मांग को जोर सोर से उठाया जायेगा। अगर सरकार इस बात पर गंभीर नहीं हुई तो आंदोलन किया जायेगा। इस अवसर पर धीप्रज्ञ द्विवेदी, शशिप्रभा तिवारी, प्रसून लतांत सहित दर्जनों लोग उपस्थित थे।

लंबा है स्वास्थ्य का डगर

मन की बात

बुरा हाल...

बुरा हाल…

सिद्धार्थ झा

भारत में एक बड़ी आबादी के पास आज भी स्वास्थ्य-सेवाएं नहीं पहुंच पायी हैं। वैसे कहने को तो हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम भारतीयों के स्वास्थ्य नीम हकीमों या टेलीवीजनी  बाबाओं के भरोसे ही है। दुर्भाग्य है इस व्यवस्था का, हमारा कि आजादी के इतने वर्ष बीत जे का बाद भी सरकार की नज़र में बड़ा भवन बना देना ही अस्पताल बना देने  का पर्याय मान लिया गया है।

जो मित्र देहाती पृष्ठभूमि से आते हैं उन्होंने जरूर गौर किया होगा कि कितने दिन उन भवनों में डॉक्टर बैठते हैं! राम भरोसे गांव के छोटे सरकारी अस्पताल चल रहे हैं। डॉकटर साहब से महीनों दर्शन तक नहीं होता है।

इन अस्पतालों में जो कंपाउंडर अथवा सहायक रहते हैं वे पैरासेटामल, एविल, एल्वेंडाजोल जैसी एक-दो दवाओं को देकर मरीज को चलता कर देते हैं।

हालत तो यह हैं कि जिन चिकित्सकों को गांवें में लोगों का ईलाज करने के लिए भेजा जाता है, वे शहरों में अपना निजी प्रैक्टिस कर रहे होते हैं।

स्थिति यह है कि अगर कोई गंभीर बीमारी से पीड़ित भी है तो उसे अपनी मौत आने तक पता तक नहीं चलता है कि उसे सही मायने में कौन-सी बीमारी हुई है। देर-सबेर किसी मरीज को सद्बुद्धि आ भी जाए तो वो दौड़ता है जिला अस्पताल या फिर एम्स की तरफ।

शहर के नजदीक बसे कस्बों में जितना कचड़ा भर गया है, उससे बीमारियों को फैलने का और मौका मिल रहा है। ऐसे में इस बार का बजट में इन समस्याओं को छूने की कोशिश सरकार ने की है। जब वित्तमंत्री जी ने आर्थिक रूप से कमजोर प्रत्येक परिवार 1 लाख रुपये के स्वस्थ्य बीमा की घोषणा की तो यह सुनकर अच्छा लगा। मुझे लगता है कि अगर इसे सही तरीके से लागू कर दिया जाए तो गरीबों को  बहुत फायदा मिलेगा। इसके पूर्व यूपीए सरकार ने 30 हजार रूपये तक का स्वस्थ्य बीमा शुरू की थी, लेकिन वह निजी अस्पतालों के बड़े पेट का का हिस्सा बन गया।

आज भी जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य योजनाओं को पर भी सरकार को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं, ये स्वीकारने में सरकार विरोधियों को भी हिचक नही होनी चाहिए।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि स्वास्थ्य की दिशा में हमको अभी भी मीलो लंबा सफर तय करना है।

 

कैंसर-मरीज के नाम पर कहीं आपको लूटा तो नहीं जा रहा!

यह आपबीती है मुंबई में रहने वाले प्रकाश सुमन की। स्वास्थ्य के नाम पर समाज को ठगने वालो से सावधान रहने की जरूरत है।

donateBoxमुंबई/ 4 महीने पहले मेरी मुलाकात ऐसे दो लोगो से लोकल ट्रेन में हुई थी जिन्हें बीमारी के नाम पर लोगो से पैसे मांगते हुये देखता था,कभी-कभी 100 -50रुपये दे भी देता था । पर उस दिन मुझे कुछ अटपटा लगा  था। उनलोगो के गले में आई-कार्ड था और एक बच्चे का फ़ोटो था जो किसी हॉस्पिटल के बेड पर था। दोनों के पास NGO का रजिस्टर्ड लेटर भी था। दोनों स्टूडेंट लग रहे थे। अंग्रेजी-मराठी-हिंदी में बोल कर डोनेट करने के लिए बार-बार लोगो से आग्रह कर रहे थे। उस डब्बे में बैठे बहुत से लोगो ने 100 -50 दिए मुझे भी लगा कि मदत करनी चाहिये। वैसे तो मैं कुछ कर नहीं पाता। आशुतोष जी हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते रहते थे, सोचा चलो आज कुछ कर देते हैं। मैंने उन दोनों से कहा कि मैं 1 लाख डोनेट करना चाहता हूँ, मुझे उस बच्चे के पास ले चलो। ट्रेन के सारे लोग मुझे अजीब दृष्टि से देखने लगे मानो मैं कोई होशियारी दिखा रहा हूँ, या बड़ा दानी बनने की कोशिश कर रह हूँ। खैर, वो दोनों पहले तो थोडा घबराए, फिर लड़की बोली- पुणे के अस्पताल में है वो बच्चा। मैंने जवाब दिया- कोई बात नहीं, चलिये हम आपके साथ चलेंगे। तब तक फ़ास्ट ट्रेन अँधेरी में रुक गई और मैं भी उन लोगो के साथ ट्रेन से उतर गया।  बस से पुणे चलने की तैयारी करने लगा, चूकी वेस्टर्न से पुणे के लिए बहुत ही कम ट्रेनें जाती है। तभी लड़की ने कहा- मुझे घर में पापा को बताना पड़ेगा।  मैंने जवाब दिया- बता दो फोन कर के। लड़की ने कहा पापा के पास फोन (मोबाइल) नहीं है हमें जाना पड़ेगा । मैंने कहा- ठीक है आप जा कर आ जाओ हम लोग तुम्हारा वेट करते हैं, तभी लड़की बोली की नहीं रोहन (लड़के का नाम) को भी साथ में जाना पड़ेगा नहीं तो पापा पुणे नहीं जाने देंगे। मैंने कहा फिर मैं भी आपके साथ आपके घर चालता हूं। अब वे लोग थोड़ा और घबरा गए। ये सब घटना क्रम आते-जाते लोग देख रहे थे। तब लड़के ने कहा- आप तकलीफ मत उठाइये आप यहीं इंतजार कीजिए हम आधे घण्टे में आते हैं। अब मुझे शक होने लगा था कि कुछ गड़बड़ है। फिर भी मैंने कहा- कोई बात नहीं हम साथ चलते है। तब लड़की ने कहा की अगर आप डोनेट करना ही चाहते है तो चेक दे दीजिये, इतनी तकलीफ क्यों उठा रहे है, हम आपको रसीद दे देते हैं। मैंने कहा- नहीं मुझे उस बच्चे से मिलना है। अब तो उन दोनों की हालात और खराब हो गई। तब लड़की ने कहा रहने दीजिये अगर आपको हमपे भरोसा नहीं है तो आप डोनट मत कीजिये। मैंने कहा- कोई 1 लाख ऐसे ही तो नहीं दे देगा न, जिसे मदत की जरुरत है उसे डायरेक्ट दूं तो मुझे ज्यदा ख़ुशी मिलेगी। अब लड़के ने कहा- हमें आपका डोनेशन नहीं चाहिये आप जाइये। ये कह के दोनों जाने लगे। मैंने कहा- क्यों उस बच्चे के मदत के लिए मैं इतनी बड़ी रकम दे रहा हूँ क्यों नहीं चाहिये, पर वे लोग मेरी बात अनसुनी कर के चले जा रहे थे। लड़की ने कहा आप हम लोगो का टाइम वेस्ट मत कीजेये हमें जाने दीजिये। मैंने सीधे कहा- तुम लोग बच्चे के बीमारी के नाम पर फ्रॉड कर रहे हो! और दोनों रिक्शा में बैठे और चलते बने। मैं पागलो की तरह आवाज़ लगाता रह गया। सब लोग मुझे देख कर घूरने लगे जैसे मैंने कोई गलती कर दी हो या मैं कोई पागल हूँ। मुझे अजीब सा लगने लगा क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

फिर मैंने पुलिस में कंप्लेन लिखाने की सोची फिर सोचा पुलिस तो कुछ करेगी नहीं। फिर भी हिम्मत कर के अँधेरी रेलवे पुलिस स्टेशन गया और 2 घंटे इन्तजार करने के बाद सारी बात बताई पर ये कह कर कोई कंप्लेन नहीं ली गई कि आपके साथ तो कुछ नहीं हुआ न तो किस बात की शिकायत और मुझे भगा दिया गया। मैं लगातार 7 दिन तक अलग अलग रेलवे पुलिस थाने में चक्कर काटता रहा पर कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं था। फिर मैंने ऑनलाइन रेलवे पुलिस में कंप्लेन की। अब तक कोई जवाब तो नहीं आया पर अब बीमारी के नाम पर NGO का लेटर लिये हुये लोग नहीं दिखते। मुझे लगा शायद कुछ असर हुआ है मेरे कंप्लेन का।

प्रकाश सुमन
मुम्बई से….
मो.9702099550

साहब! एड्स नहीं आंकड़ों का खेल कहिए…

भोग-बाजार के विस्तार ने पारिवारिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया, संबंध और रिश्तों के अनुशासन को बाजार के हवाले कर दिया और जरूरतों को वस्तुवादी बना दिया। फिर हम खुद भी बाजार के लिए एक वस्तु बन गए! वर्तमान में बीमारियों में सबसे बड़े ब्रांड के रूप में एड्स की पहचान है! पहले भोगी बना कर बाजार ने कमाई की और अब उसके दुष्परिणाम को बेच कर बाजार अपना विस्तार पा रहा है। बाजार-विस्तार को सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर मालूम चलता है कि बाजार ने हमें बीमारू किस तरह से बना दिया है।

एड्स के अर्थशास्त्र को समझने की जरूरत है...

एड्स के अर्थशास्त्र को समझने की जरूरत है…

भारतीय सांस्कृतिक चेतना का विस्तार सुखानुभूति पर आधारित रही है। सुख की खोज भारतीयों को अध्यात्म से जोड़ता है। जब मन-मस्तिष्क अध्यात्म की सीमा में प्रवेश करता है, तब आप मानवतावादी हो जाते हैं, बल्कि सही मायने में धार्मिक हो जाते हैं। क्या करें और क्या न करें की सीमा को समझने लगते हैं। भारतीयों के इस स्वभाव को आधुनिक बाजार ने बहुत ही सूक्ष्मता से समझा है। हमारे शब्दों के माध्यम से ही वह हमें मात देने की जुगत में है। सुख-खोजी भारतीयों को सुख-भोगी बनाने के लिए बड़े पैमाने पर बाजार ने जाल फैलाया है। ये दोनों शब्द प्रथमदृष्ट्या एक-से ही लगते हैं। इसी भ्रम का फायदा उठा कर बाजार ने सुख को बाजारू बना दिया, एक वस्तु में तब्दील कर दिया, एक आकार दे दिया। जब भाव को कोई आकार मिल जाता है तो स्वाभाविक रूप से हमारी इंद्रियां उस आकार के साथ खुद को जोड़ने के लिए चुंबक की तरह दौड़ी चली जाती हैं। इसी स्वाभाविकता को बाजार ने अपने विस्तार का सबसे सुगम हथियार बनाया और हम अपने भावों को वस्तुपरक स्वरूप देते गए।
आज चारों ओर बाजार का दबदबा है। उसने हमारे मनोभाव को इस कदर गुलाम बना लिया है कि हम उसके कहे को नकार नहीं पाते। वह जो कहता है, वही जीवन-आधार और सुख का मानक हो जाता है! इसी बाजार ने एक बीमारी दी, जिसको वर्तमान में एड्स के नाम से जाना जाता है। इसके लिए बाजार ने बहुत ही शातिर तरीके से सुख-खोजी प्रवृत्ति को सुख-भोगी बना दिया है! भोग-बाजार के विस्तार ने पारिवारिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया, संबंध और रिश्तों के अनुशासन को बाजार के हवाले कर दिया और जरूरतों को वस्तुवादी बना दिया। फिर हम खुद भी बाजार के लिए एक वस्तु बन गए! वर्तमान में बीमारियों में सबसे बड़े ब्रांड के रूप में एड्स की पहचान है! पहले भोगी बना कर बाजार ने कमाई की और अब उसके दुष्परिणाम को बेच कर बाजार अपना विस्तार पा रहा है। बाजार-विस्तार को सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर मालूम चलता है कि बाजार ने हमें बीमारू किस तरह से बना दिया है।

भारत में एड्स का पहला मामला सन 1986 में पाया गया था। यह वह दौर था, जब भारत के दरवाजे बाजार के लिए खुलने वाले थे। वैश्विक शक्ति एकध्रुव्रीय होने की कगार पर पहुंच चुकी थी। हुआ भी यही। अगले पांच सालों में सोवियत संघ का पतन हुआ और बाजार-विस्तार की गति और तीव्र हुई। भारत में उदारीकरण के वायरस का तेजी से विस्तार हुआ और सुख-खोजी भारतीयों को सुख-भोगी बनाने का एक बड़ा प्लेटफार्म मिल गया। एड्स नियंत्रण विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी 2013-14 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि 20.89 लाख लोग एड्स से प्रभावित हैं।

सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में जिस बीमारी से तकरीबन इक्कीस लाख लोग प्रभावित है, उसे रोकने के लिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तृतीय चरण (2007-12) के दौरान विभिन्न बजटीय स्रोतों के माध्यम से 6,237.48 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे और अब चौथे चरण के लिए 13,415 करोड़ रुपए का बजट अनुमोदित हुआ है। इसमें सरकारी बजटीय सहयोग, विश्व बैंक बाह्य सहायता प्राप्त सहयोग और वैश्विक निधि और अन्य विकास साझेदारों के अतिरिक्त बजटीय सहयोग शामिल है। सच्चाई यह है कि विगत अट्ठाईस वर्षों में बाजार ने पहले भोगी बनाया फिर रोगी बनाया और दोनों ही स्थिति में खुद को विस्तारित करने में सफल रहा!

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…तो हमारे अधिकारी चाहते हैं कि आंकड़ों में एड्स बना रहे !

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…तो हमारे अधिकारी चाहते हैं कि आंकड़ों में एड्स बना रहे !

नई दिल्ली/ 01.12.2015

 

Child's hands holding an HIV awareness ribbon,

Child’s hands holding an HIV awareness ribbon

 

आरटीआई कार्यकर्ता से स्वास्थ्य कार्यकर्ता बने विनय कुमार भारती ने झारखंड के सुदुर क्षेत्रों में एड्स जागरूकता अभियान के अंतर्गत काम किया है। अपने काम के दौरान उन्होंने जो देखा, जो समझा उसे वो अपने इस लेख के माध्यम से साझा कर रहे हैं। श्री भारती का यह लेख एड्स के बढ़ते बाजार के कारणों पर से पर्दा उठा रहा है…यह उनका भोगा हुआ सच है। उनके अनुभव से आप पाठकों को कुछ फायदा मिल सके यही सोच कर इस आलेख को हम प्रस्तुत कर रहे हैं। संपादक

 

आज विश्व एड्स दिवस है। आज कोशिश करता हूँ कि अपने अनुभव साझा करूँ। झारखण्ड में एड्स जागरूकता हेतु चलाये जा रहे कार्यक्रम के सिलसिले में काफी लोगों से मिलना-जुलना हुआ। एड्स विक्टिम से लेकर कार्यक्रम को संचालित करने वाले सरकारी अफसरों को करीब से समझने का मौका मिला। एक बात जो समझ में आई वह यह कि यहाँ भी भ्रष्टाचार चरम पर है। बात जिले या राज्यों तक सिमित नहीं है बल्कि यहां तो बॉउंड्री पार भी खेल होता है। हर इंसान अपने कर्मों का हिसाब लगाता है। एक दिन जब मैं अपने कर्मों का हिसाब लगाने बैठा तो अपने आप में कुछ ऐसा महसूस हुआ मानो मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा हूँ। जिस हिसाब से राष्ट्रीय स्तर पर एड्स का आंकड़ा दिखाया जाता है उसकी प्रमाणिकता आखिर क्या है? भारत में एड्स के वास्तविक आंकड़े किस आधार पर बनाये गए हैं?  यह एक बड़ा सवाल है। एड्स के नाम पर डराकर जो खेल करोड़ों- अरबों डॉलर का चल रहा है, उसके पीछे का सच न तो किसी ने कुरेदा… न ही जानने की कोशिश की। आखिर क्यों एड्स को जरुरत से ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है ? आखिर क्यों पैसे पानी की तरह बहाये जा रहे है? दूसरी कई बीमारियां ऐसी हैं जो एचआईवी / एड्स से ज्यादा खतरनाक हैं (खतरनाक कहने का आसय अन्य बीमारियों के होने वाली मौतों से है)

जग जाहिर है की वर्ल्ड बैंक, डब्लूएचओ, USAIDS जैसी इंटरनेशनल संस्थाएं एड्स को लेकर अनुदान देती हैं। जो कई बिलियन डॉलर का है। भारत सरकार का एक पैसा भी एड्स भगाओ कार्यक्रम में नहीं लगा। काम के दौरान बड़े IAS अधिकारीयों से सच जानने की कोशिश करने लगा। जल्द ही सच्चाई पता चल गई। पहले कागज़ी खेल अच्छी तरह समझा… चूँकि जिले स्तर पर कार्यक्रम प्रबंधक था और फ़र्ज़ी आंकड़े बनाना सरकार की मांग थी। अगर जांच में एक भी पॉजिटिव ना हो तो कार्यक्रम बंद होने का खतरा मंडराता रहता। 35 से 55 हज़ार तक की सैलरी उठा रहे मैनेजरों की रोज़ी रोटी का संकट खड़ा हो रहा था। मैं भी कही ना कही उसी कतार में शामिल हो गया था। एक समय ऐसा आया की दफ्तर में कोई काम नहीं रह गया। बस महीने के अंत में वॉलेंटियर से सर्वे रिपोर्ट  व लैब टेंस्टिंग रिपोर्ट ( पूर्णतः फ़र्ज़ी ) कलेक्ट कर फाइनल रिपोर्ट जो आँख मूंद कर सरकारी टेलीफोनिक आदेश पर  बनाये जाने थे, बन कर तैयार रहते। एक चीज़ बढ़िया थी की सैलरी कमबख्त समय पर आती। करीबी मामला था सबकुछ सामने हो रहा था। मेरे लिए यह इस बात का प्रमाण था की काम चाहे कागज़ी हो, यहाँ अकाउंट अप टू डेट होता है…चूँकि तबा तोड़ खर्चे दिखाने होते, इसलिए झटपट सेटल करना होता है। कई बार तो एड्स कंट्रोल के मुख्यालय से वर्किंग रिपोर्ट से पहले स्टेटमेंट ऑफ़ अकाउंट (SOE) मांगी जाती। अगर काम काज का हिसाब लंबित भी रहे, तो चलता रहे। आंकड़े ही बनाने थे… तो हम बनाये या वे… सारे डाटा एक्सेल सीट में ही बनने थे। दो मिनट का काम है दस का बीस या बीस का तीस। कंप्यूटर का इस्तेमाल जोरदार तरीके से हो रहा था। ऐसा नहीं है कि केवल आंकड़े बढ़ाने ही है, चूँकि पैसा देने वाली संस्थाएं वर्ल्ड बैंक, डब्लूएचओ,  मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन और भी कई अन्य काम की समीक्षा भी करती हैं। ऐसे में काम दिखाने का दबाव तो था ही। कभी-कभी आंकड़े कहीं कहीं कम भी बनाये जाते। मेट्रो सिटी में संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है पर इसका मतलब नहीं की राह चलते आदमी की एड्स की जांच शुरू कर दी जाए या जबरन कंडोम बांटा जाने लगे।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की भारत जैसे देश में एचआईवी / एड्स की स्थिति सामान्य है पर स्थिति आउट ऑफ़ कंट्रोल है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। कई ऐसी भी बीमारियां है जो एड्स से ज्यादा जान लेती है। आज कुपोषण से सबसे ज्यादा बच्चे मर रहे हैं। कई ऐसा गावं भी है जहाँ मात्र मलेरिया के कारण लोग मर जाते हैं। पिछले साल सबसे ज्यादा मौत टीबी से हुई।  स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष जी अक्सर कहते हैं कुछ बीमारियां पोलिटिकल होती हैं… कुछ ब्रांडेड ऐसे में एचआईवी / एड्स को तो कॉमर्शियल बीमारी कहना ही ठीक होगा। फ़िलहाल इतना ही ज़िन्दगी ज़िंदाबाद !!

(विनय कुमार भारती)

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(* ऊपर लिखे बिचार लेखक के अपने विचार है)

 

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डिजिटल इंडिया को कुपोषण की चुनौती …

 मेक इन इंडिया,डिजिटल इंडिया,स्वच्छ भारत अभियान जैसे कई कार्यक्रमों को फॉलो कर रही राज्य सरकार जनस्वास्थ्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले से नजरें चुराए बैठी है..जब राज्य का भविष्य ही सांस बचाने की कवायद में लगा हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा..?

जयपुर / 25.10.2015 

डिजिटल होने जा रहे इंडिया का एक खौफ़नाक सच हैं कुपोषण…राजस्थान के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो बेहद शर्मनाक स्थिति सामने आ रही हैं। 1179 करोड़ रूपयों के वार्षिक खर्च के बावजूद प्रति हजार में से 74 बच्चे पांच साल से पहले ही कुपोषण के कारण अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। पिछड़े कहे जाने वाले बिहार,झारखंड और छत्तीसगढ़ भी पोषण के मामले में राजस्थान से कहीं आगे हैं..होने को तो प्रदेश में 147 कुपोषण उपचार केन्द्र हैं जिनके उपर 100 करोड़ रूपए प्रति माह खर्च हो रहे हैं, ऐसे में कुपोषण के मामले में राज्य का पूरे देश में पांचवें स्थान पर रहना बहुत कुछ कह रहा हैं..यह सौ करोड़ रूपये कहाँ जा रहा है,इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं हैं। कई जगह तो ये केन्द्र बंद ही पड़े हैं ऐसे में कुपोषण से हारते बचपन को बचाने की सरकारी कवायद कैसे सफल होगी..? समझ से बाहर हैं।आंकड़े राज्य सरकार और चिकित्सा महकमें के निक्कमेपन को चीख-चीख कर बयां कर रहे हैं। शर्मनाक बात ये है कि मेक इन इंडिया,डिजिटल इंडिया,स्वच्छ भारत अभियान जैसे कई कार्यक्रमों को फॉलो कर रही राज्य सरकार जनस्वास्थ्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले से नजरें चुराए बैठी है..जब राज्य का भविष्य ही सांस बचाने की कवायद में लगा हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा..?

 

भारत के स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए कुपोषण एक बहुत ही बड़ा प्रश्नचिन्ह है...

भारत के स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए कुपोषण एक बहुत ही बड़ा प्रश्नचिन्ह है…

क्या है कुपोषण 

यह एक ऐस चक्र है जिसके चंगुल में बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही फंस जाते हैं। उनके जीवन की नियति दुनिया में जन्म लेने के पहले ही तय हो जाती है। यह नियति लिखी जाती है गरीबी और भुखमरी की स्याही से। इसका रंग स्याह उदास होता है और स्थिति गंभीर होने पर जीवन में आशा की किरणें भी नहीं पनप पाती हैं। कुपोषण के मायने होते हैं आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास न होना, एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूध करने लगता है। बहुत छोटे बच्चों खासतौर पर जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का हास होता है और छोटी-छोटी बीमारियां उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं।

कुपोषण वास्तव में घरेलू खाद्य असुरक्षा का सीधा परिणाम है। सामान्य रूप में खाद्य सुरक्षा का अर्थ है ”सब तक खाद्य की पहुंच, हर समय खाद्य की पहुंच और सक्रिय और स्वस्थ्य जीवन के लिए पर्याप्त खाद्य”। जब इनमें से एक या सारे घटक कम हो जाते हैं तो परिवार खाद्य असुरक्षा में डूब जाते है। खाद्य सुरक्षा सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर निर्भर करती है। भारत का उदाहरण ले जहां सरकार खाद्यान्न के ढेर पर बैठती है (एक अनुमान के अनुसार यदि बोरियों को एक के उपर एक रखा जाए तो आप चांद तक पैदल आ-जा सकते हैं)। पर उपयुक्त नीतियों के अभाव में यह जरूरत मंदों तक नहीं पहुंच पाता है। अनाज भण्डारण के अभाव में सड़ता है, चूहों द्वारा नष्ट होता है या समुद्रों में डुबाया जाता है पर जन संख्या का बड़ा भाग भूखे पेट सोता है।

कुपोषण बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करता हैं। यह जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और 6 महीने से 3 वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है। इसके परिणाम स्वरूप वृध्दि बाधिता, मृत्यु, कम दक्षता और 15 पाइंट तक आईक्यू का नुकसान होता है। सबसे भयंकर परिणाम इसके द्वारा जनित आर्थिक नुकसान होता है। कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10-15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5-10 प्रतिशत तक कम कर सकता है। कुपोषण के कारण बड़ी तादाद में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। कुपोषित बच्चे घटी हुई सिखने की क्षमता के कारण खुद को स्कूल में रोक नहीं पाते। स्कूल से बाहर वे सामाजिक उपेक्षा तथा घटी हुई कमाऊ क्षमता तथा जीवन पर्यंत शोषण के शिकार हो जाते है। इस कारण बड़ी संख्या में बच्चें बाल श्रमिक या बाल वैश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाते हैं। बड़े होने पर वे अकुशल मजदूरों की लम्बी कतार में जुड़ जाते हैं जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बनता है।