मन की बात

लंबा है स्वास्थ्य का डगर

स्थिति यह है कि अगर कोई गंभीर बीमारी से पीड़ित भी है तो उसे अपनी मौत आने तक पता तक नहीं चलता है कि उसे सही मायने में कौन-सी बीमारी हुई है। देर-सबेर किसी मरीज को सद्बुद्धि आ भी जाए तो वो दौड़ता है जिला अस्पताल या फिर एम्स की तरफ।

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चिंतन

कैंसर-मरीज के नाम पर कहीं आपको लूटा तो नहीं जा रहा!

मैंने कहा कोई 1लाख ऐसे ही तो नहीं दे देगा न जिसे मदत की जरुरत है मैं उसे डायरेक्ट दू तो मुझे ज्यदा ख़ुशी मिलेगी। मै पैसे के मामले में बहुत बड़ा झटका खा चूका था इसलिये किसी और पे भरोषा नहीं कर सकता था आशूतोष जी आप जानते है। अब लड़के ने कहा हमें आपका डोनेशन नहीं चाहिये आप जाइये। ये कह के दोनों जाने लगे। मैंने कहा क्यों उस बच्चे के मदत के लिए मैं इतनी बड़ी रकम दे रहा हूँ क्यों नहीं चाहिये पर वे लोग मेरी बात अनसुनी कर के चले जा रहे थे । लड़की ने कहा आप हम लोगो का टाइम वेस्ट मत कीजेये

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SBA विशेष काम की बातें चिंतन

साहब! एड्स नहीं आंकड़ों का खेल कहिए…

आज चारों ओर बाजार का दबदबा है। उसने हमारे मनोभाव को इस कदर गुलाम बना लिया है कि हम उसके कहे को नकार नहीं पाते। वह जो कहता है, वही जीवन-आधार और सुख का मानक हो जाता है! इसी बाजार ने एक बीमारी दी, जिसको वर्तमान में एड्स के नाम से जाना जाता है। इसके लिए बाजार ने बहुत ही शातिर तरीके से सुख-खोजी प्रवृत्ति को सुख-भोगी बना दिया है! भोग-बाजार के विस्तार ने पारिवारिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया, संबंध और रिश्तों के अनुशासन को बाजार के हवाले कर दिया और जरूरतों को वस्तुवादी बना दिया। फिर हम खुद भी बाजार के लिए एक वस्तु बन गए! वर्तमान में बीमारियों में सबसे बड़े ब्रांड के रूप में एड्स की पहचान है! पहले भोगी बना कर बाजार ने कमाई की और अब उसके दुष्परिणाम को बेच कर बाजार अपना विस्तार पा रहा है। बाजार-विस्तार को सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर मालूम चलता है कि बाजार ने हमें बीमारू किस तरह से बना दिया है।

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चिंतन चौपाल

…तो हमारे अधिकारी चाहते हैं कि आंकड़ों में एड्स बना रहे !

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की भारत जैसे देश में एचआईवी / एड्स की स्थिति सामान्य है पर स्थिति आउट ऑफ़ कंट्रोल है ऐसा भी नहीं। कई ऐसी भी बीमारियां है जो एड्स से ज्यादा जान लेती है। आज कुपोषण से सबसे ज्यादा बच्चे मर रहे है। कई ऐसा गावं भी है जहाँ मात्र मलेरिया के कारण लोग मर जाते है। पिछले साल सबसे ज्यादा मौत टीबी से हुई।

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चिंतन चौपाल

डिजिटल इंडिया को कुपोषण की चुनौती …

डिजिटल होने जा रहे इंडिया का एक खौफ़नाक सच हैं कुपोषण…राजस्थान के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो बेहद शर्मनाक स्थिति सामने आ रही हैं। 1179 करोड़ रूपयों के वार्षिक खर्च के बावजूद प्रति हजार में से 74 बच्चे पांच साल से पहले ही कुपोषण के कारण अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। पिछड़े कहे जाने वाले बिहार,झारखंड और छत्तीसगढ़ भी पोषण के मामले में राजस्थान से कहीं आगे हैं..होने को तो प्रदेश में 147 कुपोषण उपचार केन्द्र हैं जिनके उपर 100 करोड़ रूपए प्रति माह खर्च हो रहे हैं, ऐसे में कुपोषण के मामले में राज्य का पूरे देश में पांचवें स्थान पर रहना बहुत कुछ कह रहा हैं..यह सौ करोड़ रूपये कहाँ जा रहा है,इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं हैं। कई जगह तो ये केन्द्र बंद ही पड़े हैं ऐसे में कुपोषण से हारते बचपन को बचाने की सरकारी कवायद कैसे सफल होगी..?

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