Frontpage Article SBA विशेष चिंतन फार्मा सेक्टर विमर्श स्वस्थ भारत अभियान

स्वस्थ भारत (न्यास) का तृतीय स्थापना दिवस के अवसर पर होगी जेनरिक दवाइयों की बात, मुख्य अतिथि विपल्व चटर्जी का होगा उद्बोधन

गौरतलब है कि स्वास्थ्य की दिशा में स्वस्थ भारत पिछले 3 वर्षों से लगातार काम कर रहा है। पिछले वर्ष स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश देने के लिए 21000 किमी की ‘स्वस्थ भारत यात्रा’ स्वस्थ भारत ने की थी। 2016 में स्वस्थ भारत की यूनर्जी टीम ने समुद्र के नीचे साइकिल चलाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। स्वस्थ भारत अभियान के अंतर्गत ‘जेनरिक लाइए पैसा बचाइए’ कैंपेन पिछले 6 वर्षों से चल रहा है। स्वस्थ भारत को वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय जी एवं लोकगायिका मालिनी अवस्थी जी का संरक्षण प्राप्त है।

Frontpage Article SBA विशेष स्वस्थ भारत यात्रा

विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेषः देश के बच्चों के नाम स्वस्थ भारत अभियान के संयोजक आशुतोष कुमार सिंह की पाती

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में जब वेलोग थे तो वहां के बच्चों से उन्होंने पूछा था कि वे मुंह कैसे धोते हैं? सबने बताया कि टूथपेस्ट से। उन्होंने उनको नीम के दातुन से मुंह धोने की सलाह दी। क्या आप बच्चों को नीम के पेड़ के बारे में कुछ जानकारी है। नहीं न!  मैं बताता हूं। नीम भी एक औषधीय पेड़ है। इसके तने, छाल, पत्ते एवं बीज सब के सब औषधि के रूप में प्रयोग में लाए जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अगर हम नीम से दातुन करें तो हमारे दांतों में कोई बीमारी नहीं फैलेगी और इसका फायदा हमारे पेट को भी होगा। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तो यह उठता है कि नीम से दातुन तो हम तब करेंगे, जब नीम के पेड़ होंगे। तो बच्चों!  क्या आपलोग उनकी एक सलाह मानेंगे। आप सभी लोग भी अपने आस-पास एक-एक नीम का पेड़ लगाइए। केरल के तिरुवनंतपुरम के बच्चों ने यह संकल्प लिया है कि वे नीम का पेड़ एवं तुलसी का पौधा ज्यादा से ज्यादा लगायेंगे। तो आप भी उनकी तरह यह संकल्प लीजिए कि नीम का पेड़ लगाएंगे। बच्चों! आपको मालूम है अभी हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि दुनिया में 5 वर्ष तक के 17 लाख बच्चे सिर्फ पर्यावरणीय प्रदुषण के कारण प्रत्येक वर्ष मर रहे हैं। ऐसे में बच्चों यह जरूरी हो जाता है कि हम पेड़-पौधे ज्यादा से ज्यादा लगाएं ताकि हम अपनी पर्यावरण की रक्षा कर सकें। क्यों सही कह रहा हूं न। मुझे मालूम है आपलोग बहुत अच्छे बच्चे हो और आप इस बात को मानेंगे भी।

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अगर मगर के डगर में स्वस्थ भारत की तस्वीर

किसी भी राष्ट्र-राज्य के नागरिक-स्वास्थ्य को समझे बिना वहां के विकास को नहीं समझा जा सकता है। दुनिया के तमाम विकसित देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतनशील व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य राष्ट्र की प्रगति को तीव्रता प्रदान करता है। इतिहास गवाह रहा है कि जिस देश के लोग ज्यादा स्वस्थ रहे हैं, वहां की उत्पादन शक्ति बेहतर रही है। और किसी भी विकासशील देश के लिए अपना उत्पदान शक्ति का सकारात्मक बनाए रखना ही उसकी विकसित देश की ओर बढ़ने की पहली शर्त है। ऐसे में भारत को पूरी तरह कैसे स्वस्थ बनाए जाए यह एक अहम् प्रश्न है। अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय नागरिकों को पूर्ण रूपेण स्वास्थ्य-सुरक्षा कैसे दी जाए आज भी एक यक्ष प्रश्न है। ऐसे में एक स्वास्थ्य चिंतक होने के नाते कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर मैं चिंतन-मनन करता रहा हूं। हमें लगता है कि सरकार इन सुझाओं पर ध्यान दें तो इस दिशा में और बेहतर परिणाम आ सकते हैं।

स्वास्थ्य ही क्यों हमारी किसान नीति भी कहां कुछ कर पा रही है। जो किसान हमें अनाज उत्पादित कर के देता है। जिसकी मेहनत से हम अपना पेट पालते हैं। उसकी मेहनत का उचित मूल्य आज तक हम नहीं दे पाएं हैं। गर हम सरकारी आंकड़ों को माने जिसके अनुसार देश में 65 फीसद किसान हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि देश के आधे से ज्यादा लोग किसानी पर निर्भर हैं। 35 फीसद लोग नौकरी, उद्योग धंधे आदि पर निर्भर हैं। 35 फीसद लोग जो उत्पाद बनाते हैं उसका ग्राहक भी उनके साथ-साथ किसान भी है। लेकिन यहां पर भी गजब की धोखाधड़ी है। किसान के उत्पाद का मूल्य सरकार तय करती है और उसके उत्पाद से उत्पादित वस्तु का मूल्य साहूकार यानी उद्योगपति तय करता है। बाजार में आज 20 रुपये में 4 किलो आलू उपलब्ध है। लेकिन आलू से बने 40 ग्राम चिप्स की कीमत आज भी 10 रुपये है। मेहनत किसान करे और डीपीएस स्कूल में पढने उद्योगपति का लड़का जाए!

गजब का यह विकास मॉडल है! इन विषयों पर बात की जाए तो लंबी बात की जा सकती हैं। मूल बात यह है कि विकास के मौजूदा मॉडल को भारतीय संदर्भ में परिभाषित किए जाने की सख्त जरूरत है। नहीं तो सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत सिर्फ चिड़िया बन कर रह जायेगा, वह भी बिना हाड़ मांस के! गर 2018 में इन विषयों पर हम थोड़ा भी संजीदा गो गए तो निश्चित ही स्वस्थ भारत की दिशा में एक बेहतर कदम होगा!

Frontpage Article SBA विशेष अस्पताल विमर्श स्वास्थ्य स्कैन

क्या आप जानते हैं ! 65 साल पहले भारत में आया जापानी इंसेफलाइटिस !

भारत जैसे देश किसी भी नई बीमारी का पालनहाल आसानी से बन जाते हैं। सवा अरब से ज्यादा जनसंख्या को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे भारत में जब कोई बीमारी आयात होती है, तो उसकी खातिरदारी घर आए मेहमान की तरह की जाती है। उसके प्रति हमारा नजरिया, उसको रोकने के उपाय ठीक वैसे ही होते हैं जैसे घर आए दामाद खुद से चले जाएं तो ठीक है, नहीं तो उन्हें कौन कहे की आप अपने घर चले जाइए। ऐसी बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीमारियों के फलने-फूलने के लिए जरूरी खाद-पानी यहां पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। यहां पर नई बीमारियों की खेती करने में पूरा तंत्र सहयोग करता है। कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू एवं इबोला जैसी बीमारियों की खेती यहां पर खूब हो रही है। इनकी ब्रांडिंग कर के कुछ यहां के कुछ दूसरे मूल्कों की संस्थाएं अपनी आर्थिक स्वार्थों को पूर्ण करने में सफल भी हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ स्वस्थ मानव संसाधन की रीढ़ की हड्डी तोड़ने की कोशिश साकार होती दिख रही है।
आश्चर्य का विषय यह है कि भारत सरकार इंसेफलाइटिस के सही कारणों को जानने में अभी तक नाकाम रही है। अभी जांच का फोकस गोरखपुर बना हुआ है। जबकि इस बीमारी का फैलाव देश के लगभग प्रत्येक कोने में है। दक्षिण भारत में यह बीमारी पहले आई लेकिन वहां पर वह उतना सफल नहीं हुई जितना उत्तर भारत में दिख रही है। ऐसे में शोध का बिंदु दक्षिण भारत भी होना चाहिए। इतना ही नहीं जांच का बिंदु एशिया के तमाम देश भी होने चाहिए जहां पर यह बीमारी अपना पांव पसार चुकी है। शायद तब जाकर हम इस बीमारी के कारणों की तह में जा पाएंगे एवं ईलाज ढूढ़ पाने के नजदीक पहुंचेंगे। अभी तो ऐसा लगता है कि सरकार चाहती ही नहीं है कि इस बीमारी का ईलाज संभव हो सके नहीं तो गर हमारी सरकारों ने इस बीमारी की भयावहता को पहले ही भांप कर समुचित कदम उठाया होता तो बीआरडी अस्पताल में जो चीख-पुकार सुनने को मिल रही है शायद वह नहीं मिलती।

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इंसेफलाइटिस नहीं, अव्यवस्था से मर रहे हैं नौनिहाल

नवंबर 1969 इस अस्पताल का शिलान्यास करने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी एवं यूपी के मुख्यमंत्री स्व. चन्द्र भानू गुप्ता जी अथवा बाबा राघव दास की आत्मा चाहे जितना विलाप कर ले लेकिन जबतक सही अर्थों में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा तब तक तो शिशुओं के पारिवारीजनों की सिसिकियां ही बीआरडी में सुनाई पड़ती रहेंगी।