फार्मासिस्ट संगठन समेत सोशल मीडिया पर चीख रहे फार्मासिस्टों की सच्चाई

काफी दिन से चाह रहा की फार्मासिस्ट आंदोलन और संगठनो समेत सोशल मीडिया पर चीख रहे फार्मासिस्टों की सच्चाई लिखूं । यह सोच कर रुक जाता की कई दिल टूट जायेगे… रिश्ते में खटास आ जायेगी । आज कोशिश करता हूँ की रिस्क ले ही लूँ … वैसे भी क्या फर्क पड़ेगा … जिन्हे बुरा लगे ज्यादा से ज्यादा  गालियां देंगे … उससे ज्यादा कुछ कर भी तो नहीं सकते !! 

दिनांक १२ जनवरी जब फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने दिल्ली में कदम रखा

दिनांक १२ जनवरी जब फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने दिल्ली में कदम रखा

करीब एक साल हो गए दिल्ली आए… सोचा था दिल्ली के बड़े फार्मासिस्ट संगठनो को थोड़ा समय देकर उन्हें सक्रीय करूँगा। उनके कुछ काम निपटा दूंगा। जब थोड़ा एक्टिव जायें तो विस्तार करने की सोचूंगा। जब लगे की सब ठीक है तब कुछ बड़े कदम उठाने की सोचूंगा। कोशिश तो यही थी की सारे फार्मासिस्ट चाहे नौकरी पेशा हों या वेरोजगार सबके मुद्दे को एक एक कर सूचीबद्ध करूँ। फिर एक एक कर टीम बनाकर हर मुद्दे और समस्याओं के समाधान हेतु प्रयाश करूँ । एक्सपर्ट की कोई कमी नहीं। सोशल मीडिया पर कई ऐसे दिग्गज मित्र मिले जो कहीं ना कहीं संगठन को तकनिकी सुझाव दे सकते थे। बस स्ट्रेटेजी बनाकर उसे धरातल पर इम्प्लीमेंट करना है । मेरा हमेशा से ही मानना रहा है की समस्या चाहे कितनी भी बड़ी या जटिल क्यों ना हो कोई ना कोई समाधान जरूर होता है। जरुरत होती है योजना बनाकर काम करने की। दिल्ली के करीब सभी बड़े फार्मासिस्ट संगठन नकारात्मकता से भरे अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं । राष्ट्रीय स्तर के बड़े संगठन अबतक इंतज़ार कर रहे की लोग सदस्य बनेंगे जब फण्ड इकठ्ठा हो जाएगा तब जाकर काम कर पायेंगे। दूसरी तरफ फार्मासिस्ट इंतज़ार कर रहे की जब बड़े संगठन काम करेंगे तभी उनपर भरोषा करेंगे या उनकी सदस्यता लेंगे। दोनों ही एक दूसरे का इंतज़ार बर्षों से कर रहे… आज भी वही आलम है।

संगठनो की बात भी एक हद तक सही ही थी की बगैर फण्ड के वे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते थे। उनका अपना बुरा अनुभव भी रहा हो… ऐसे में मैंने भी एक कोशिश की अपने फेसबुक के जरिए राष्ट्रीय संगठन से जुड़ने की अपील की। बात सदस्यता शुल्क पर आई तो मैंने फार्मासिस्टों को मेम्बरशिप जमा करने कहा । यहाँ कुछ नहीं छुपा… कइयों ने हमेशा की तरह सदस्यता अपील को फेसबुक पर लाइक तक नहीं किया और आगे बढ़ गए। ऐसा भी नहीं की सदस्यता के रूप में राशि नहीं मिली। थोड़ी ही सही पर बैंक में गए। संगठन से बात कर मैंने सदस्यता राशि की डिटेल वेबसाइट पर डालने को कहा ताकि ट्रांसपेरेंसी बनी रहे । कोई भी सदस्य कभी भी अकाउंट डिटेल देख सके। पर ऐसा नहीं किया गया । इस बात ने मुझे भी आहत किया । फिर मैंने संगठनों के काम से तौबा कर अकेले काम करने की सोची । पीसीआई और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया के अधिकारीयों से मिलने जुलने के क्रम में  इतना तो आभास हो ही गया था की मामला इतना भी आसान नहीं। यहाँ एक से बढ़कर एक चालबाज़ अधिकारी है। इन्हे देश में फार्मेसी के बदतर हालात हमसे कही ज्यादा बेहतर पता है। देश के कोने कोने से हज़ारों फार्मासिस्ट आरटीआई करते है, सूचना मांगते है, ज्ञापन देते हैं।  फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया हो या ड्रग कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया का कार्यालय दोनों ही एक दूसरे को लेटर लिखते है। यहाँ दो एक्ट पर बात होती है ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और फार्मेसी एक्ट  … पीसीआई कहती है की हमारा काम फार्मेसी एक्ट 1948 तक ही सिमित है। पर बात जब फार्मेसी एक्ट को इम्प्लीमेंट करने की आती है तो वे खुद कुछ नहीं करते पूरी तरह फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन पर निर्भर है । फार्मेसी एक्ट इम्प्लीमेंटेशन सम्बन्धी पत्राचार ड्रग कॉट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया को करतें हैं। कभी कभी स्टेट गवर्नमेंट को भी लेटर जारी करती है। मेरी जब अर्चना मुगदल (पीसीआई सेक्रेटरी) से पहली बार बात हो रही थी, तो मैंने इस बात को जोरदार तरीके से रखने की कोशिश की थी कि पीसीआई के लाख लेटर लिखने के बाद भी जब ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया , स्टेट ड्रग कंट्रोलर , स्टेट फार्मेसी कौंसिल या राज्यों के स्वास्थ्य सचिव या हेल्थ डायरेक्टर जैसे अधिकारी कोई एक्शन नहीं लेते…  ऐसे में पीसीआई क्या एक्स्ट्रा एफर्ट लगाती है ? पीसीआई का जबाब था इसके सिवा हम ज्यादा से ज्यादा एक रिमाइंडर लगा देते है और भला हम कर भी क्या सकते हैं ? मैडम के चेहरे पर भले ही लाचारी के भाव थे पर वावजूद इसके उन्हें इस बात का जरा भी मलाल नहीं था कि इस संबादहीनता और नॉन इफेक्टिव परफॉरमेंस से फार्मेसी का कितना नुकसान हो रहा है। ऐसे में जब फार्मेसी कौंसिल ऑफ़ इंडिया की कोई नहीं सुनेगा तो फिर फार्मेसी की अहमियत ही कहाँ रह जायेगी ? फिर मतलब क्या रह जाएगा कड़े एक्ट और कानून का ? सेक्रेटरी  अर्चना मुगदल के इस गैर जिम्मेदाराना जबाब से एक बार तो मैं भी हताश हो गया कि पीसीआई ने पल्ला झाड़ लिया । अब आगे काम कैसे करूँगा ? पर कुछ ना कुछ रास्ता तो निकालना ही था सो ड्रग कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया के दफ्तर जाकर डिप्टी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया सुदीप्तो डे से मिला । इस मुलाकात में डिप्टी डायरेक्टर से जोरदार बहस हुई । गाली गलौज तक की नौबत आ गयी । डिप्टी ड्रग कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया साहेब सबकुछ जानने के बाद भी न तो जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थे ना ही कोई विशेष एक्शन प्लान बनाने के पक्ष में। सुदीप्तो डे कह रहे थे की जैसा चल रहा चलने दो अब कुछ नही किया जा सकता । गुस्सा तब आ गया जब उनकी ही जारी की गई कुछ पत्राचार की प्रतियां दिखाई गई जिसमे उन्होंने छत्तीसगढ़ के ड्रग कंट्रोलर को निर्देश देते हुए ड्रग कंट्रोलर को ड्रग एक्ट के उलघ्घन पर करवाई करने को लिखा था । पहले तो इंकार कर दिया फिर कहा जब हमारे पास शिकायत आती है हम केवल ड्रग कंट्रोलर्स को लेटर फॉरवर्ड करते है। इसके अलावा हम कुछ नहीं कर सकते चूँकि हमारा काम नहीं है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया डॉ. ज़ी एन  सिंह से मिलने नहीं दे रहे। कई कोशिशें की  पर मुझे अप्पोइटमेंट नहीं दिया गया दिया गया और हर बार मिलने से रोका गया ।

सोशल मीडिया के जरिये देश भर के कई एक्टिव फार्मासिस्ट मित्रों व संगठनो की मदद से दिल्ली में एक बड़ा आंदोलन करने की योजना बनी। चूँकि फार्मासिस्ट दूर दूर से आ रहे थे फोर्मलिटी करने का कोई इरादा नहीं था। कॉन्फ्रेंस आयोजन के बहाने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया और फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया को घेरने की कोशिश के साथ ही उनपर दबाब बनाकर सबकी जबाबदेही तय करनी थी । तय हुवा की जंतर मंतर पर अनिश्चित कालीन हड़ताल पर बैठेंगे। फिर भी काम ना बने तो भूख हड़ताल पर चले जायेगे। सारी तैयारियां फेसबुक के चैटबॉक्स और व्हाट्सऐप ग्रुप में चल रही थी। सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था उम्मीद की जा रही थी पांच सौ लोग भी आ गए तो डट कर सामना करेंगे। पीसीआई और डीसीजीआई को घुटने टेकने पर मजबूर करेंगे । जबतक कोई कारगर समाधान ना निकले । यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान में एक्टिविटी ज्यादा दिख रही थी इनसे उम्मीदें भी ज्यादा की गई। ज्यादा से ज्यादा लोगों को साथ लाने को कहा गया । दिल्ली से दुरी को देखते हुवे पूर्वोत्तर राज्यों असम और तमिलनाडु  पर ज्यादा दबाब नहीं दिया गया था । दिल्ली के सभी बड़े संगठनो को खास कर न्योता दिया गया। ताकि वे डायरेक्ट देश भर के फार्मासिस्ट और संगठनो के सामने अपनी बात रख सकें। चूँकि हर काम अकेले को ही करना था । सामने एक बड़ी चुनौती इंतज़ार कर रही थी। दिल्ली में ज्यादा फार्मासिस्ट मित्र नहीं जुड़े थे । सोशल मीडिया ही एक मात्र सहारा था । इसलिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया गया ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा फार्मासिस्ट आंदोलन से जुड़ सकें। साथियों ने भी खूब प्रचार प्रसार किया। वावजूद इसके कॉन्फ्रेंस  में उपस्थिति देख कर एकबारगी इतना तो यकीं हो गया की सिस्टम से लड़ने से ज्यादा चुनौती अपने लोगों ने ही खड़ी कर रखी है । जिनके लिए आप लड़ रहे हैं वे खुद एक बड़ी चुनौती बने हुवे हैं। उम्मीद से बिपरीत काफी कम संख्या में लोगों को देख थोड़ा दुःख तो हुवा, पर काफी कम संख्या के बीच भी कुछ ऐसे फार्मासिस्ट भी थे जो देश के आखिरी छोर से दो दिन ट्रेन में गुजारने के बाद भी बगैर थकान के मुस्कुराते हुवे गले लगे थे। असम, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से आए चंद मुट्ठी भर लोगों ने हौशला बढ़ा दिया था। झारखण्ड से सिंघभूम फार्मासिस्ट एसोसिएशन की एक बड़ी टीम साथ में थी जिन्होंने मंच का कार्यभार संभाल लिया। वहीँ छत्तीसगढ़ और यूपी के संगठनों ने साथी मेहमानो की देखरेख व अन्य इंतज़ाम देखे। महज़ 24 घंटे के भीतर हर एक को जिम्मेदारी दी गयी कॉन्फ्रेंस और जंतर मंतर पर  अनिश्चित कालीन धरना दोनों ही रणनीति को इम्प्लीमेंट करने को तैयार किया गया ।

 

कोटला रोड दिल्ली का ग़ालिब ऑडिटोरियम में प्रवेश करते विनय कुमार भारती आंदोलन का आगाज़ यहीं किया गया

कोटला रोड दिल्ली का ग़ालिब ऑडिटोरियम में प्रवेश करते विनय कुमार भारती आंदोलन का आगाज़ यहीं किया गया

 

अबतक सब ठीक ठाक था इस बीच कार्यक्रम की शुरुवात में ही मध्य प्रदेश के स्टेट फार्मासिस्ट एसोसिएशन के चंद नेताओं ने कई बातों को लेकर खींचतान शुरू की। अबतक इतने सवाल उन्होंने अपनी सरकार से नहीं पूछे होंगे जितनी आंदोलन को लेकर मुझे सड़क पर पूछे जाने लगे । अगर जबाब मुझसे ही लेना था तो दिल्ली आने की जहमत क्यों ? मैं तो खुद उनके सवालों को लेकर सरकार के नुमाइंदो को कटघरे में करने की तैयारी में था। स्टेट फार्मासिस्ट एसोसिएशन (मप्र) के पदाधिकारी कॉन्फ्रेंस शुरुवात से पहले ही अपने नफे नुकसान का हिसाब लेना चाह रहे थे । इनकी बातें भी वेतुकी थी  – “इस कांफ्रेंस से हमारा क्या होगा ? बाकियों कि हम नहीं जानते  वे क्यों आये है?  सड़क पर खड़े खड़े संगठन ने  आरोप भी जड़े की उनकी खातिरदारी ठीक से नहीं हुई। उनके लीडर को सम्मान नहीं दिया गया। उनकी संस्था का लोगो कहीं नहीं दिख रहा है। अब उन्हें कैसे समझाता की बेटी की शादी कर रहा होता तो उनके अरमान पुरे करता। इलेक्शन या सम्मान समारोह अयोजित करता तो सबके कलरफुल पोस्टर बनाकर होर्डिंग चौराहे पर लगा देता। यहाँ तो सिस्टम के साथ आर पार की जंग की तैयारी चल रही थी। हाई रिस्क ज़ोन में काम करना था। पुरे कांफ्रेंस को दिल्ली पुलिस की एक टुकड़ी कवर कर रही थी । यहाँ तो यह संभव था की  दिल्ली पुलिस डंडे मारते हुवे जेल में भेज देगी । जबकि उन्हें अच्छे से पता था की जो लोग जमा है, आधे खुद किसी ना किसी फार्मासिस्ट संगठन के अध्यक्ष या सचिव है, जो एक दूसरे संगठन के सदस्यों के साथ तालमेल बिठाते हुए एक दूसरे की मदद कर रहे … खतिरदारी व ख्याल रख रहे। कई अन्य राज्यों के अध्यक्ष और सचिव तक खुद चाय पानी की व्यवस्था में दिखे । ऐसे में मध्य प्रदेश संगठन के प्रमुखों के नखरे तकलीफ दे रहे थे।

 

ग़ालिब ऑडिटोरियम में कांफ्रेंस के दौरान फार्मासिस्ट की टीम

ग़ालिब ऑडिटोरियम में कांफ्रेंस के दौरान फार्मासिस्ट की टीम

 

खैर मध्य प्रदेश के रूठे फार्मासिस्ट नेताओं  को मानाने की कोशिश कर आंदोलन से जुड़ने की अपील करते जब हर संगठन के लोग हार मान गए तो उन्हें वापस मध्य प्रदेश जाने को कहा गया। स्टेट फार्मासिस्ट एसोसिएशन के प्रधान बड़ी संख्यां में अपने कार्यकर्ताओं के साथ वापस हो गए। हमने पीछे मुड़ने की बजाय आगे बढ़ने की ठानी और बढ़ते गए। पहले दिन कॉन्फ्रेंस में हर किसी की ने अपने राज्यों की बातें शेयर करते हुवे अपने राज्यों का हालात सामने रखा। अंततः फैसला हुवा की सब मिलकर जंतर मंतर पर जुटेंगे । संख्या भले ही कम थी पर हौसले बुलंद । दूसरे दिन महज़ पच्चीस से तीस लोग जंतर मंतर पर जमा हुवे । अगर स्टेट वाइस नाम लूँ तो सबसे पहले झारखण्ड , असम , तमिलनाडु , महाराष्ट्र, यूपी और राजस्थान के फार्मासिस्ट  एक्टिविस्ट शरीक हुवे मध्य प्रदेश का जत्था वापस जा चूका था । अच्छी तरह याद है सईद अहमद को छोड़ दिल्ली से कोई जंतर मंतर पर नहीं पंहुचा।

 

जंतर मंतर पर डटे फार्मा एक्टिविस्ट

जंतर मंतर पर डटे फार्मा एक्टिविस्ट

 

जंतर मंतर पर नारेबाजी करते फार्मासिस्ट युवाओं की विडिओ

जंतर मंतर पर हमेशा ही भीड़ रहती है। हज़ारों की भीड़ में पच्चीस लोगों को शायद ही मिडिया तवज़्ज़ो दे। बमुश्किल असम और तमिल की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने थोड़ा बहुत  कवर किया असम की टीम और तमिल की टीम ने अगुवाई की और मीडिया हैंडल किया। सबसे दिलचस्प बात रही की जब असम की मीडिया कवर कर रही थी तो जंतर मंतर पर उपस्थित सभी फार्मासिस्टों ने असामी भाषा में नारेबाजी की यह अपने आप में सांस्कृतिक एकता के साथ राष्ट्रीय फार्मासिस्ट एकता का भी परिचय दिया । संख्या कम थी लोग दूर से आये थे उन्हें लौटना भी था उम्मीद की जा रही थी की दिल्ली व आसपास के लोगों को रोक कर धरना अनिश्चित काल के लिए आगे बढ़ाया जाएगा । ऐसी स्थिति में स्पॉट पर फैसला लेना था । सब इस बात पर तैयार हुवे की चुपचाप धरने पर बैठकर टाइमपास और फॉरमैलिटी करने से अच्छा है आज  ही पीसीआई पर धावा बोलेंगे और घेराव करेंगे। महज़ आधे घंटे में सभी जंतर मंतर से उठकर फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया के मुख्यालय कोटला रोड दिल्ली के दफ्तर पहुंचे और कैंपस की घेराबंदी कर दी। पीसीआई के अधिकारियों अध्यक्ष डॉ. बी सुरेश और सचिव अर्चना मुगदल को सबसे पहले तीन घंटे तक उनके चेम्बर में बंद रखा गया । अधिकारीयों की पुलिसिया धमकियों के बीच उन्हें बाध्य किया गया की वे असम से लेकर गुजरात और तमिलनाडु तक के हर एक मुद्दे और हर एक संगठन की बात सुनें और जबाब दें। पीसीआई के मुख्यालय में यह पहली घटना थी जब देश के कोने कोने से आए फार्मा एक्टिविस्टों ने कानून को हाथ में लेते हुवे सीधे सीधे पीसीआई के अध्यक्ष और सचिव को ना सिर्फ बुरी तरह लताड़ा बल्कि सीधे सीधे चेतावनी दी , की जल्द से जल्द फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया अपनी कार्यप्रणाली सुधारे । फार्मेसी के प्रति अपनी जबाबदेही तय करे । बहानेबाज़ी, कामचोरी और भरष्टाचार बर्दास्त नहीं की जायेगी ।

फार्मासिस्ट संगठन पीसीआई के अध्यक्ष बी. सुरेश और सचिव अर्चना मुगदल को उनके चेम्बर में फटकारते हुवे

फार्मासिस्ट संगठन पीसीआई के अध्यक्ष बी. सुरेश और सचिव अर्चना मुगदल को उनके चेम्बर में फटकारते हुवे

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पीसीआई के दफ्तर में जब फार्मासिस्ट अचानक जा घुसे और नारेबाजी करने लगे !

उग्र फार्मासिस्टों को मनाते पीसीआई प्रेसिडेंट डॉ. बी सुरेश !

पीसीआई के कार्यों का हिसाब किताब करते प्रदेशों से आये फार्मासिस्ट !

फार्मासिस्टों के लगातार हमले से अपना बचाव करते दिखे बी. सुरेश !

सचिव अर्चना मुगदल और डॉ. बी सुरेश पूरी तरह से दबाब में थे। मुख्यालय में घुसते ही दोनों ही को मुर्दाबाद के नारों से उनकी हेकड़ी  दिखा दी गयी थी। डरे सहमे दोनों ही ने माना की पीसीआई में कई कमियां है। दोनों ही ने वादा किया की वे पहले से ज्यादा ध्यान से काम करेंगे। फार्मासिस्ट को जो अबतक महज़ पैरामेडिकल स्टाफ तक सिमित था बहुत जल्द भारत में डॉक्टर की तरह फार्मासिस्ट को भी प्रोफेशनल होने का गर्व करवायेगे । बी सुरेश ने फार्मेसी प्रेक्टिस रेगुलेशन को लागु करवाने के लिए हामी भरी। घेराव के दौरान बात सिर्फ फार्मेसी एक्ट और  ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स के उलंघन तक ही सिमित नहीं थी । यहाँ हर उस मुद्दे को उठाया गया जो हर फार्मासिस्ट के सम्मान से जुडी हुई हैं जो पुरे फार्मासिस्ट कम्युनिटी के लिए अहमियत रखती है।

 

जंतर मंतर से ललकारते फार्मासिस्ट

जंतर मंतर से ललकारते फार्मासिस्ट

 

17 फ़रवरी 2015 पीसीआई मुख्यालय में काफी देर बहस हुई थी देर रात सभी मित्रों को विदा करते हुवे धरना की समाप्ति करने पर सहमति बनी। चूँकि अब मैं दिल्ली में वापस अकेला रह गया था आगे बढ़ना बिलकुल मुंकिन नहीं था । मित्रों को विदा करने के बाद जब मैंने पिछले चौबीस घंटे के कार्यों का आंकलन किया तो नतीजे पर पंहुचा की एक बड़ा फैसला महज़ सोशल मीडिया के भरोसे ले लिया था । यह काफी जोखिम भरा था । फेसबुक के लाइक और कॉमेंट का मतलब यह कतई नही लगा सकते की वाकई लोग अपने घरों से बाहर निकल कर अपना हक़ लेने के लिए सडकों पर उतर आयेगे। काफी कम रिसोर्सेस होने के वावजूद एक बड़ा रिस्क लेकर पीसीआई पर  दबाब बनाने की कोशिश की गई । आज भी कभी  कभी सोचता हूँ की अपने लक्ष्य में नाकाम रहा । पर यह सोच कर खुद को बहला लेता हूँ की कम से कम मैं उस नाकारा भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ…  जो चाहते तो बहुत कुछ हैं … पर घर बैठे स्मार्टफोन पर । खुश हूँ की झारखंड से दिल्ली तक लड़ा । अपनी छमता से ऊपर उठकर एक कोशिश की … इस करप्ट सिस्टम से टकराने की … खुश हूँ की मेरी गिनती उनमे नहीं की जायेगी जो दिन रात सोते जागते  सोशल मीडिया में चीखते चिल्लाते रहते है कि फार्मासिस्ट का शोषण हो रहा … मुझे मेरा हक़ चाहिए … सिस्टम ही करप्ट है … फलां होना चाहिए … फलां फलां … अगर मैंने कुछ लिख दिया तो तुरंत एंड्रॉएड और स्मार्ट फोन पर शुरू .. एक लाइक और एक कॉमेंट…  ज्यादा एहसान किया तो एक शेयर ।

 

ख़त्म करने से पहले एक बार उन तमाम फार्मासिस्ट साथियों को जोरदार सैल्यूट जरूर करना चाहूँगा, जिन्होंने बगैर किसी निजी स्वार्थ के 16 – 17 अगस्त 2015 के दिल्ली आकर फार्मासिस्ट आंदोलन में हिस्सा लिया । मेरे लिए अलग अलग राज्यों से दिल्ली पहुंचे वे मुट्ठी भर लोग उतने ही हीरो है जितनी मेरे आदर्श महाराष्ट्र के पूर्व एफडीए कमिशनर महेश झगड़े। थैंक्यू… टीम असम – झूमा चौधरी, संजीव तालुकदार, ज़ाकिर सिकदर , सोफियर रहमान, टीम झारखण्ड – धर्मेंदर सिंह, जीतेन्द्र शर्मा , मनोज झा , अरविन्द झा , अनिल साहू, शशि सिंह , टीम गुजरात -राम प्रवीण,  टीम राजस्थान – सर्वेश्वर शर्मा , शिवकरण मील , नविन आत्रेय , देव , सुरेन्द्र चौधरी , सीताराम कुमावत , टीम तमिलनाडु – पैटर्न राज , सेंथिल कुमारा एस , चंद्रशेखरन , टीम महाराष्ट्र – सुधांसु नेवरे , टीम यूपी – अमित श्रीवास्तव , संजय भारद्वाज , अरविन्द शुक्ला , क्षितज कुमार , कृष्णा प्रताप साहनी, संदीप चौरसिया, सत्येन्द्र त्रिपाठी, रजनीश कुशवाहा जसीम अख्तर  बिलासपुर टीम – अभिषेक सिंह , वैभव शास्त्री, युगल  समेत अन्य फार्मा एक्टिविस्ट, विशेषकर आभार दुबई में बैठे सफीक अहमद का जिन्होने अपनी उपस्थिति तो दर्ज़ नहीं कराई पर  सहयोग राशि सिर्फ इसलिए भेजी चूँकि उन्हें लगा हम कुछ कर पाएंगे ।  छमा प्रार्थी हूँ अगर किसी का नाम ना लिख पाया तो …

 

आंदोलन में भाग लेने आये फार्मा एक्टिविस्ट

आंदोलन में भाग लेने आये फार्मा एक्टिविस्ट

 

आज फिजां बदली जरूर है यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेंत कुछ राज्यों में पहले की अपेक्षा एक्टिविटी बढ़ी है। कई नए युवा फार्मा एक्टिविस्ट बनकर उभरे हैं… एकजुट होकर सडकों पर लड़ रहे। कोई दो राय नही इनके हौसले को देख भ्रष्ट अधिकारीयों और प्रशाशन की नींद हराम है। वहीँ दूसरी तरफ आज भी नब्बे फीसदी से ज्यादा फार्मासिस्ट आज सबकुछ देखते हुवे भी अपने स्मार्टफोन और इंटरनेट से बाहर नहीं निकल पा रहे। चंद फार्मासिस्ट संगठन के सीनियर पदाधिकारी सिर्फ अपने पद, प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए संगठनों को एक जुट नहीं होने देना चाह रहे । ज्यादातर  आज भी  ज्ञापन की कॉपी और प्रेस विज्ञप्ति लिए मीडिया के दफ्तर के चक्कर लगा रहे। एक बार अख़बार में नाम छप जाए बस … लगना तो फेसबुक पर ही है।

आखिर कबतक …

 

(विनय कुमार भारती )

Email: activistvinay@gmail.com

यूपी में एक बार फिर केमिस्ट और फार्मासिस्ट आमने सामने

बदाऊं (यूपी)/15.01.2016

यूपी में एक बार फिर केमिस्ट और फार्मासिस्ट आमने सामने हो गए है। मामला यूपी में बरसों से चल रहे गैर क़ानूनी दवा दुकानो और अवैध ड्रग लाइसेंस प्रकरण से जुड़ा है। हाल में ही यूपी सरकार ने ड्रग लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी। जिससे पचास हज़ार से भी ज्यादा गैर क़ानूनी दवा दुकानो पर बंद होने का संकट मंडरा गया। इसे लेकर दवा कारोबारियों में हड़कंप मच गया। आनन फानन में दवा कारोबारियों ने ऑनलाइन सिस्टम का विरोध करने के साथ ही फार्मासिस्ट की अनिवार्यता ख़त्म करने की मांग कर दी। केमिस्ट संगठनों की इस मांग को लेकर सोशल मीडिया में खूब बबाल मचा और  फार्मासिस्टों ने केमिस्ट संगठनो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अलग अलग संगठन चला रहे फार्मासिस्ट एकजुट हो गए। वहीँ फार्मासिस्टों द्वारा की जा रही इस घेराबंदी से ड्रग डिपार्टमेंट के हाथ पाँव फूल गए है। डिपार्टमेंट हालात से निपटने की तैयारी कर रहा है। इस पुरे प्रकरण पर बात करते हुवे फार्मासिस्ट फाउंडेशन के प्रमुख अमित श्रीवास्तव ने कहा है ड्रग लाइसेंस में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुवा है। ऑनलाइन होने से केमिस्ट संगठन के नेताओ और ड्रग ऑफिस के भ्रष्ट अधिकारीयों के बीच सांठ गाँठ की परतें खुल रही है।

17 जनवरी को केमिस्ट संगठन ने बदाऊं ज़िले में सभा आयोजित की है. वही उसी दिन फार्मासिस्ट संगठनो ने महारैली आयोजित किया है। रैली का आरंभ हाइडिल ग्राउंड से सुबह 8 बजे से  होगा। अभिनव श्रीवास्तव ने बताया की 20 जनवरी को भी कानपूर में प्रदर्शन होना है.

आइए देखते है किसने क्या कहा:

“जब तक फुटकर मेडिकल पर अप्रशिक्षित व्यकित दवा वितरण करता रहेगा तब तक जनसाधारण का स्वास्थ खतरे में है” – संजय भारद्वाज, अध्यक्ष प्रो इंडिया

“फार्मेसी विषय का वर्तमान और भविष्य सुधारना केवल और केवल फार्मासिस्ट के ही हाथ में हैl” प्रोफेसर संदीप सिंह

“अब समय आगया है दवा व्यापार को फार्मासिस्टों को अपने हाथ में लेना ही होगा जिससे कि जनता को सही दवा और सही मात्रा दी जा सके। – उदय कुमार फार्मासिस्ट फाउंडेशन 

“सरकार हमारे लिये बहुत सी योजनायें ला रही है पर इन योजनाओ कोें बताना और फार्मासिस्टों तक पहुचाना भी आवश्यक है “ – अरविन्द, ग्रेट फार्मासिस्ट वेलफेयर सोसाइटी 

फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के ऑनलाइन होने से फ़र्ज़ी रूप से एक फार्मासिस्ट के कई जगह कार्यरत होने का भंडाफोड़ हुवा था। एक आंकड़े के मुताबिक यूपी के करीब 65 हज़ार फार्मासिस्ट है जिसमे करीब 15 हज़ार फार्मासिस्ट सरकार को अपनी सेवायें दे रहे  है। हज़ारों फार्मासिस्ट राज्य के बाहर रहते है, जिनमे अधिकांश फार्मासिस्ट निजी कंपनियों में काम करते है। यूपी की लगभग अस्सी फीसदी दवा दुकानो में फार्मासिस्ट मौजूद नहीं है जो ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और फार्मेसी एक्ट का उलंघन है। प्रदेश भर में लगभग एक लाख दवा की दुकानें है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई हज़ार दवा दुकान बगैर किसी ड्रग लाइसेंस के चल रही है। औषधी नियंत्रण ने जो डाटा वेबसाइट पर डाला है उसमे कई गलतियां है। खुद ड्रग कंट्रोलर इसे स्वीकार कर चुकें हैं।

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…तो फार्मासिस्टों पर लाठीचार्ज की तैयारी थी।

 

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मध्य प्रदेश स्टेट फार्मेसी काउंसिल का घेराव 8 जनवरी को …

 

भोपाल/ 06.12.2015

मध्य प्रदेश फार्मेसी काउंसिल में भ्रष्टाचरियों की फ़ौज़ भरी पड़ी है। कई सालों से चुनाव नहीं हुवे । रजिस्ट्रेशन से लेकर रेनुअल तक के कामो में बाबू और रजिस्ट्रार रिश्वत मांगते है। पुरे राज्य भर में फार्मेसी एक्ट का उलंघन हो रहा है और मध्य प्रदेश स्टेट फार्मेसी काउंसिल में गैर फार्मासिस्ट पदाधिकारी बने बैठे है जिन्हे फार्मेसी से कोई सरोकार नहीं है। अब समय आ गया है की  गैर फार्मासिस्टों को काउंसिल से बाहर का रास्ता दिखाया जाए। उक्त बातें प्रांतीय फार्मासिस्ट एसोसिएशन के पदाधिकारी विवेक मौर्य ने कही।

 

फार्मासिस्टों का प्रदर्शन 8 फ़रवरी को

फार्मासिस्टों का प्रदर्शन 8 फ़रवरी को

 

मध्य प्रदेश फार्मेसी काउंसिल और औषधी नियंत्रण प्रशासन में फैले भ्रष्टाचार से तंग आकर मध्य प्रदेश के फार्मासिस्टों ने खुली जंग छेड़ दी है। संगठन के सदस्य विभिन्न जिलों में लगातार प्रदर्शन कर रहे है। संगठन के सदस्यों ने सरकार को चेतावनी दी है अगर फार्मेसी काउंसिल अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आती है। तो वे फार्मेसी काउंसिल के साथ औषधी नियंत्रण विभाग में ताले जड़ देंगे। संगठन के अध्यक्ष अम्बर चौहान ने दिनांक 8 जनवरी को स्टेट फार्मेसी काउंसिल का घेराव करने का एलान किया है! अम्बर ने बताया की रैली दोपहर 12 बजे बोर्ड ऑफिस, भोपाल से निकलेगी। अम्बर ने प्रदेश के फार्मासिस्टों को बड़ी संख्या में प्रदर्शन में शामिल होने को कहा है।
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एलोपैथी प्रिस्क्रिप्सन के अधिकार को लेकर आमने – सामने हुवे आयुष और फार्मासिस्ट

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अब मध्यप्रदेश में ड्रग लाइसेंस घोटाला…

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ऑनलाइन दवा बेचनेवाले ई कॉमर्स कंपनियों को तुरंत बंद करने का फरमान

 

नई दिल्ली/

ऑनलाइन दवा वेचनेवाले ई फार्मेसी पर सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ेड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन (CDSCO) ने सख्त रुख अपना लिया है। जॉइंट ड्रग कंट्रोलर ई ऐश्वर्या रेड्डी ने देश भर के स्टेट ड्रग कंट्रोलर को पत्र लिखकर ई कॉमर्स कंपनियों पर क़ानूनी  करवाई करने का आदेश जारी किए हैं। इसे देखते हुवे दिल्ली मुंबई पुणे अहमदाबाद हैदराबाद समेंत कई बड़े शहरों में दवा का ऑनलाइन कारोबार करने वाली ई कॉमर्स कंपनियों ने अपने वेबपोर्टल ब्लॉक करना शुरू कर दिए हैं। ज्ञात हो कि महाराष्ट्र एफडीए ने पिछले दिनों गैर क़ानूनी रूप से दवा वेचने पर कुछ नामी ऑनलाइन कंपनियों पर छापे मारे थे। चूँकि मामला देश भर में अवैध चल रहे गैरकानूनी ई फार्मेसी का था। जिसे देखते हुवे महाराष्ट्र रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया को पत्र लिखकर रोक लगाने की मांग की थी। देश भर के फार्मासिस्ट संगठनों ने ख़ुशी जाहिर की है।

 

कोटला रोड, नई दिल्ली स्थित ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया का मुख्यालय

कोटला रोड, नई दिल्ली स्थित ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया का मुख्यालय

अभी दो तरह से चल रही है ई-फार्मेसी

देश में वर्तमान में दो तरह से ई-फार्मेसी का कारोबार चल रहा है। कुछ ऑनलाइन वेबसाइट्स पाटर्नर फार्मेसियों से दवा खरीद कर उपभोक्ता के घर तक दवाओं की डिलीवरी करती हैं। कुछ फार्मेसियां ऑनलाइन ऑर्डर पर अपने आउटलैट के जरिए दवा पहुंचाती है। ऑनलाइन फार्मेसी की हो जांच देश में ऑनलाइन फार्मेसी को अधिक कारगर और उपभोक्ता हितों के अनुकूल बनाने के लिए सरकार को ऑनलाइन फार्मेसी लाइसेंस जारी करने के लिए विस्तृत जांच करनी होगी। देखने में आया है कि कुछ ऑनलाइन फार्मेसी अपना फर्जी आईपी एड्रेस देती हैं। जिसके चलते गलत अथवा अवधिपार दवा उपभोक्ता को मिलने की स्थिति में ऑनलाइन फार्मेसी का पता ही नहीं चल पाता है। संबंधित ऑनलाइन फार्मेसी को लाइसेंस देने से पहले उसका ट्रेक रिकॉर्ड, बैंक स्टेटमेंट और अन्य जानकारियां भी सरकार के पास होनी चाहिए। ऑनलाइन फार्मेसी नियमन के लिए समिति ऑनलाइन फार्मेसी के नियमन के लिए केंद्र ने महाराष्ट्र के खाद्य एवं दवा प्रशासन (एफडीए) कमिश्नर डॉ. हर्षदीप कांबळे की अध्यक्षता में उपसमिति गठित की है। जिसमे आईटी एक्सपर्ट समेंत कई राज्यों के एफडीए अफसर और केमिस्ट संगठनो के प्रतिनिधि है जिन्हे भारत में ऑनलाइन दवा कारोबार को समझकर ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट के नियमों में बदलाव हेतु मंथन कर समाधान तलाशना है! महाराष्ट्र रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष कैलाश तांदळे ने एफडीए कमिश्नर डॉ. हर्षदीप कांबळे को पत्र लिखा कर फार्मासिस्ट सदस्यों को भी सलाहकार समिती जगह बनाने को कहा है!

 

मुंबई में उठे थे विरोध के सुर

ऑनलाइन फार्मेसी पर सबसे पहले विरोध महाराष्ट्र रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट संगठन ने मुंबई में शुरू किया फिर धीरे धीरे पुरे देश भर में जोर शोर से बिरोध शुरू हो गया ! यह तस्बिर महाराष्ट्र ड्रग कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन के बाहर प्रदर्शन कर रहे फार्मासिस्टों की है यहाँ एफडीए मुख्यालय, बांद्रा में एमआरपीए के सदस्यों ने 31 अगस्त 2015 को चाय वेचकर आंदोलन का आगाज़ किया था

ऑनलाइन दवा विक्री के विरोध में MRPA के सदस्य

ऑनलाइन दवा विक्री के विरोध में MRPA के सदस्य

 

 

“ऑनलाइन दवा खरीद के लिए डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन के आधार पर दवाएं खरीदी जा सकेंगी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। बिना प्रेस्क्रिप्शन के दवा खरीदना बेहद जोखिम भरा होगा। हां, व्यक्ति प्रेस्क्रिप्शन को स्कैन करके दवा कंपनी को भेजा जा सकता है और कंपनी में विशेषज्ञ फार्मासिस्ट उसे पढ़कर दवाएं भेज भी सकता है। लेकिन, दवा लिखने वाले की प्रामाणिकता को जांचने की जिम्मेदारी दवा कंपनियां ले पाएंगी, इसमें भारी संदेह है। वर्तमान में खुदरा दवा विक्रेता डॉक्टर की लिखी दवाइयों पर असमंजस की स्थिति में फोन पर डॉक्टर से संपर्क करके संतुष्टि भी कर लेता है। क्या इतनी विश्वसनीयता के साथ ऑनलाइन दवा बिक्री कंपनियां सेवाएं दे पाएंगी? यह बात समझ से परे है। अगर किसी ने फ़र्ज़ी प्रिस्क्रिप्सन पर नशीली दवाई या गर्व निरोधक दवाई का आर्डर कर दिया तो उसे आसानी से प्राप्त कर सकता है।“ – कैलाश तांदळे, अध्यक्ष, महाराष्ट्र रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट एसोसिएशन।

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