SBA विशेष बचाव एवं उपचार मन की बात

मोदी सरकार के चार सालः टीकाकरण की दिशा में सार्थक पहल

टीकाकरण की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इस बात पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि आखिर यह टीका पेशेवर एवं प्रशिक्षित हाथों से कैसे दिलाया जाए। टीका के मामले में सबसे ज्यादा शिकायत इसी बात की होती है कि टीका देने वाले प्रशिक्षित नहीं है। अगर प्रशिक्षित हाथों से टीका नहीं पड़ा तो इसका गलत प्रभाव भी बच्चों पर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार को इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि टीका को टेंपरेचर मेंटेन हो और सुरक्षित हाथों से ही शिशुओं एवं गर्भवती महिलाओं को टीका दी जाए।

SBA विशेष

मोदी सरकार के चार सालःस्वास्थ्य सेवाओं में होता सुधार, अभी भी बहुत कुछ करने की है जरूरत

भारत बीमारियों का बढ़ते ग्राफ के बीच में इस तरह की खबरें निश्चित रूप से सुकुन देती हैं। वहीं मीडिया में कहीं से यह खबर आती है कि ऑक्सिजन की कमी के कारण शिशुओं की मौत हो गई या प्रसूता को अस्पताल में समय पर भर्ती नहीं किया गया और उसने सड़क पर बच्चे को जन्म दिया। लाश को ले जाने के लिए एंबुलेंस की सुविधा नहीं मिली, परिजन को अपने कंधे पर उठाकर कोषों दूर लाश ले जानी पड़ी। अस्पताल ने मृतक की लाश बिल भूगतान के लिए रोके रखा, परिजनों ने पुवाल का पुतला बनाकर अंतिम संस्कार करने की तैयारी की। इस तरह की खबरों को पढ़कर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की जर्जरता का अंदाजा लगता है। ऐसी खबरों को पढ़कर रोना आता है और इंसान सोचने पर मजबूर होता है कि आखिर कब भारत सच में स्वास्थ्य के क्षेत्र में अग्रणी बनेगा! फिलहाल कुछ अच्छी खबरें आई हैं, उसे पढ़कर मन को तसल्ली तो दिया ही जा सकता है!

SBA विशेष मन की बात

निपाह से डरे नहीं, समझे इसे

यहां यह ध्यान देने की बात है कि निपाह वायरस कोई नया वायरस नहीं है। आज से 20 वर्ष पूर्व 1998-99 में यह सबसे पहले मलेशिया एवं सिंगापुर में पाया गया था। 2001 में बाग्लादेश एवं भारत के पूर्वी हिस्सों में इसने अपना जाल फैलाया। भारत में सबसे पहले जनवरी-फरवरी-2001 में यह वायरस सिलीगुड़ी में फैला था। तब 66 केस सामने आए थे जिसमें 45 लोग यानी 68 फीसद लोगों को मृत्यु से नहीं बचाया जा सका। फिर सन 2007 में भारत के नादिया क्षेत्र में 5 लोग इस वायरस के परिक्षेत्र में आए और पांचों को अपनी जान गंवानी पड़ी। और एक बार फिर से केरल में इसने अपना पैर फैलाया है। इस बीमारी का लक्ष्ण जापानी बुखार, इंसेफलाइटिस जैसा ही है। बुखार आना, मांसपेसियों में दर्द होना एवं वोमेंटिंग इंटेंशन इस बीमारी के सामान्य लक्ष्ण बताए जा रहे हैं । चिकित्सकों के लिए मुसीबत यह है कि यह लक्ष्ण आमतौर पर पाए जाते हैं।

SBA विशेष फार्मा सेक्टर स्वस्थ भारत अभियान

स्वस्थ भारत ने मनाया अपना तीसरा स्थापना दिवस, गांधी का स्वास्थ्य चिंतन व जनऔषधि की अवधारणा विषय पर हुआ राष्ट्रीय परिसंवाद

अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से पेटेंट फ्री मेडिसिन को जेनरिक दवा कहा जाता है। लेकिन भारत में साल्ट के नाम से बिकने वाली दवा को सामान्यतया जेनरिक माना जाता रहा है। वैसे बाजार में जेनरिक दवाइयों को ‘ऐज अ ब्रांड’ बेचने का भी चलन है, जिसे आम बोलचाल में जेनरिक ब्रांडेड कहा जाता है। लेकिन ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना’ के अंतर्गत खुलने वाली सभी दवा दुकानों पर हम लोग विशुद्ध जेनरिक दवा रखते हैं। यहां पर स्ट्रीप पर साल्ट अर्थात रसायन का ही नाम लिखा होता है’ अपने लक्ष्य को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि,’बीपीपीआई का गठन 2008 में हुआ था। तब से लेकर 2014 तक उतनी सफलता नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी। लेकिन 2014 से सरकार ने इस दिशा में तेजी से काम किया है और आज हम 3350 से ज्यादा जनऔषधि केन्द्र खोलने में सफल रहे हैं। 2018-19 में जनऔषधि केन्द्रों की संख्या 4000 तक ले जाने का हमारा लक्ष्य है।

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स्वस्थ भारत (न्यास) का तृतीय स्थापना दिवस के अवसर पर होगी जेनरिक दवाइयों की बात, मुख्य अतिथि विपल्व चटर्जी का होगा उद्बोधन

गौरतलब है कि स्वास्थ्य की दिशा में स्वस्थ भारत पिछले 3 वर्षों से लगातार काम कर रहा है। पिछले वर्ष स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश देने के लिए 21000 किमी की ‘स्वस्थ भारत यात्रा’ स्वस्थ भारत ने की थी। 2016 में स्वस्थ भारत की यूनर्जी टीम ने समुद्र के नीचे साइकिल चलाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। स्वस्थ भारत अभियान के अंतर्गत ‘जेनरिक लाइए पैसा बचाइए’ कैंपेन पिछले 6 वर्षों से चल रहा है। स्वस्थ भारत को वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय जी एवं लोकगायिका मालिनी अवस्थी जी का संरक्षण प्राप्त है।

SBA विशेष फार्मा सेक्टर स्वस्थ भारत अभियान

सस्ती एवं गुणवत्तायुक्त दवा उपलब्ध कराने का जन-अभियान है प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजनाः विप्लव चटर्जी, सीईओ

जनऔषधि एक सामाजिक आंदोलन की अवधारणा है। इसमें चिकित्सकों की भूमिका बहुत अहम हैं। इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए चिकित्सकों का सहयोग अपेक्षित है। यह सच है कि चिकित्सकों का सहयोग उस रूप में नहीं मिल पाया है, जिस रूप में मिलना चाहिए था। लेकिन हम आशान्वित हैं कि देश के चिकित्सक भी इस पुनीत अनुष्ठान में अपनी आहूति और तीव्रता के साथ देते रहेंगे।

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विश्व स्वास्थ्य दिवस विशेषः देश के बच्चों के नाम स्वस्थ भारत अभियान के संयोजक आशुतोष कुमार सिंह की पाती

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में जब वेलोग थे तो वहां के बच्चों से उन्होंने पूछा था कि वे मुंह कैसे धोते हैं? सबने बताया कि टूथपेस्ट से। उन्होंने उनको नीम के दातुन से मुंह धोने की सलाह दी। क्या आप बच्चों को नीम के पेड़ के बारे में कुछ जानकारी है। नहीं न!  मैं बताता हूं। नीम भी एक औषधीय पेड़ है। इसके तने, छाल, पत्ते एवं बीज सब के सब औषधि के रूप में प्रयोग में लाए जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अगर हम नीम से दातुन करें तो हमारे दांतों में कोई बीमारी नहीं फैलेगी और इसका फायदा हमारे पेट को भी होगा। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तो यह उठता है कि नीम से दातुन तो हम तब करेंगे, जब नीम के पेड़ होंगे। तो बच्चों!  क्या आपलोग उनकी एक सलाह मानेंगे। आप सभी लोग भी अपने आस-पास एक-एक नीम का पेड़ लगाइए। केरल के तिरुवनंतपुरम के बच्चों ने यह संकल्प लिया है कि वे नीम का पेड़ एवं तुलसी का पौधा ज्यादा से ज्यादा लगायेंगे। तो आप भी उनकी तरह यह संकल्प लीजिए कि नीम का पेड़ लगाएंगे। बच्चों! आपको मालूम है अभी हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि दुनिया में 5 वर्ष तक के 17 लाख बच्चे सिर्फ पर्यावरणीय प्रदुषण के कारण प्रत्येक वर्ष मर रहे हैं। ऐसे में बच्चों यह जरूरी हो जाता है कि हम पेड़-पौधे ज्यादा से ज्यादा लगाएं ताकि हम अपनी पर्यावरण की रक्षा कर सकें। क्यों सही कह रहा हूं न। मुझे मालूम है आपलोग बहुत अच्छे बच्चे हो और आप इस बात को मानेंगे भी।

SBA विशेष काम की बातें

उपभोक्ता जागरुकता से ही बदलेगी स्वास्थ्य सेवा की तस्वीर

आयुर्वेद की जननी भारत भूमि का इतिहास बताता है कि यहां पर स्वास्थ्य सेवाओं को प्राचीन काल में परोपकार के नजरिए देखा जाता था। जब तक वैद्य परंपरा रही तब तक मरीज एवं वैद्य के बीच सामाजिक उत्तरदायित्व का बंधन रहा। लेकिन आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के उदय के बाद चिकित्सा एवं इससे जुड़ी हुई सेवाओं को क्रय-विक्रय के सूत्र में बांध दिया गया। चिकित्सकीय सेवा देने वाले एवं मरीज के बीच में उपभोगीय समझौते होने लगे। जैसे अगर आपको हर्निया का ऑपरेशन कराना है तो इतना हजार रुपये लगेगा, डिलेवरी कराना है तो इतना हजार रुपये। मरीज से कॉन्ट्रैक्ट फार्म पर हस्ताक्षर कराए जाने लगे। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह बाजार आधारित हो गईं। यहां पर लाभ-हानी की कहानी गढ़ी जाने लगीं। ऐसे में यह जरूरी हो गया कि इन सेवाओं को कानून के दायरे में लाया जाए ताकि खरीदार को कोई बेवकूफ न बना सके, उनसे ओवरचार्ज न कर सके। गलत ईलाज न कर सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतीय न्यायालय ने समय –समय पर दिए अपने आदेशों में यह स्पष्ट कर दिया है कि चिकित्सा संबंधी जितनी भी सेवाएं हैं उसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 के सेक्शन 2(1) के तहत अनुबंधित सेवा माना जायेगा। इस तरह स्वास्थ्य संबंधित सेवाएं कानून के दायरे में आ गईं।

SBA विशेष अस्पताल दस्तावेज

जानिए किस तरह लूटते हैं दिल्ली के बड़े अस्पताल…

दिल्ली के मैक्स, गुरुग्राम एवं बसंतकुंज के फोर्टिज अस्पताल, सरिता बिहार के अपोलो अस्पताल सहित देश की राजधानी के कई नामचीन अस्पतालों की सच्चाई लोगों के पास आनी शुरू हो गई है। जनता जागी तो सरकारों के कान भी बजने लगे हैं। सरकार भी इन अस्पतालों के खिलाफ कमर कस चुकी है। इसी कड़ी में बीते दिसंबर को दिल्ली सरकार ने मेडिकल निग्लीजेंस के मामले में दिल्ली के शालिमारबाग स्थित मैक्स अस्पताल का लाइसेंस रद्द करने का फैसला लिया।  इस फैसले ने पूरी मेडिकल क्षेत्र में हो रही लापरवाही एवं लूट के मामले को देश की मुख्यधारा मीडिया में ला दिया है। हालांकि बाद में अस्पताल का लाइसेंस बहाल कर दिया गया। यह बहाली भी कटघरे में ही है।

SBA विशेष दस्तावेज

NMC-2017: स्वास्थ्य शिक्षा की बदलेगी तस्वीर…

स्वास्थ्य शिक्षा किसी भी देश के स्वास्थ्य व्यवस्था को सुचारू रुप से चलाने के लिए जरूरी घटक होता है। स्वास्थ्य व्यवस्था को गतिमान बनाने के लिए एक ऐसी विधायी व्यवस्था की जरूरत होती है जो समय के साथ-साथ कदम ताल मिलाए। यही सोचकर सरकार ने एनएमसी बिल जल्द से जल्द पास कराना चाहती है। ऐसा नहीं है कि भारत में इस बिल के पहले स्वास्थ्य शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं रही है। 6 दशक पहले भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम,1956 के अंतर्गत मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया का गठन किया गया था। इसके ऊपर देश की चिकित्सा सेवा एवं व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानको के अनुरूप रखने की जिम्मेदारी थी। लेकिन कालांतर में यह संस्था भ्रष्टाचार के गिरफ्त में आ गई और मेडिकल कॉलेजों से ऐसे लोग पास होकर निकलने लगे, जिनकी चिकित्सकीय योग्यता कटघरे में रही। हद तो उस समय हुई जब इस संस्था का अध्यक्ष एक मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने के बदले घुस लेने के आरोप में सीबीआई के हाथों पकड़ा गया। 23 अप्रैल, 2010 का वह दिन एमसीआई के इतिहास का काला दिन साबित हुआ। उस दिन अध्यक्ष केतन देसाई के संग-संग एमसीआई का ही एक पदाधिकारी जेपी सिंह एवं उक्त मेडिकल कॉलेज का प्रबंधक भी गिरफ्तरा हुआ। एमसीआई भ्रष्टाचार की कहानियां मीडिया में खूब सूर्खियों में रही। दूसरी ओर देश के कोने-कोने से एमसीआई को भंग करने की मांग की जाने लगी। आगे चलकर एमसीआई को भंग करना पड़ा। और आज यह कहानी आईएमसी अधिनियम-1956 की जगह एनएमसी बिल,2017 के रूप में अपने अंतिम निष्कर्ष की ओर है।