स्वस्थ भारत का सपना जरूर पूरा होगाः आशुतोष कुमार सिंह

आज स्वस्थ भारत अभियान के संयोजक आशुतोष कुमार सिंह का जन्म दिन है। उनके जन्म दिन के अवसर पर हम आपके लिए लेकर आए हैं विशेष बातचीत। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर आशुतोष कुमार सिंह का साक्षात्कार आकाशवाणी के एफएम रेंबो ने आशुतोष कुमार सिंह से स्वास्थ्य  के संबंध में विशेष चर्चा की थी। आप भी सुने और स्वस्थ भारत की उनकी परिकल्पना को साकार करने में उनका साथ दें।

यह विचार यात्रा है

https://www.youtube.com/watch?v=FHQTSEYMEnA&feature=youtu.be

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दुनिया के सबसे चर्चित शब्दों की बात की जाए तो उसमें से एक है ‘विकास’। विकास की दौड़ हम सभी लगा रहे हैं। हम सभी चाहते हैं कि व्यष्टिगत व समष्टिगत विकास हो। विकास की इस यात्रा में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि विकास किस रूप में हो? विकास की कसौटी क्या हो? विकास की विचारधारा क्या हो?
जब इन सवालों से हम जूझते हैं तो एक समाधान नजर आता है कि हम स्वस्थ हों। सब स्वस्थ हों। यानी स्वास्थ्य की राह से ही विकास तक पहुंचा जा सकता है। सच तो यह है कि विकास की कसौटी भी स्वास्थ्य ही हो सकती है। इस संदर्भ में हम भारतीय स्वास्थ्य चिंतन के मामले में पिछड़े हुए हैं। यदि पुरूष-महिला की दृष्टि से भारतीय स्वास्थ्य की स्थिति को देखें तो यह पायेंगे कि अभी भी महिला स्वास्थ्य की स्थिति चिंतनीय है। इसी चिंता को कम करने के उद्देश्य से हमने ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ की परिकल्पना की है। हमारा स्पष्ट रूप से मानना है कि देश को सही अर्थों में स्वस्थ होना है तो पुरूष-महिला दोनों के स्वास्थ्य पर समान रूप से ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे में महिलाओं, बच्चियों के स्वास्थ्य के प्रति समाज का नजरिया व घर वालों की लापरवाही स्वस्थ समाज की संकल्पना को बाधित करने वाली है। इस बाधा को लोगों को जागरूक कर के ही दूर किया जा सकता है। इसी संदर्भ में स्वस्थ भारत यात्रा की परिकल्पना की गई है। और आज हम ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ का संदेश लेकर पूरे देश में भ्रमण पर निकले हैं।
यह सिर्फ साइकिल यात्रा नहीं है बल्कि यह विचार यात्रा हैं। विचारों को परिवर्तित करने के लिए एक संकल्प यात्रा है। यह सकारात्मकता को फैलाने के लिए सकारात्मक शक्तियों की आह्वान यात्रा है। यह स्वस्थ भारत की संकल्पना को पूर्ण करने के लिए स्वास्थ्य यात्रा है। इस पूरी यात्रा में पुलिस ऑफिसर दलजिन्दर सिंह और डॉ. गणेश राख की उपस्थिति युवाओं को अपनी ओर आकृष्ट करेगी। साइक्लिस्ट दलजिन्दर सिंह यूनिक वर्ल्ड रिकार्डधारी हैं। हमें इस बात की खुशी है कि यात्रा टीम में एक से बढ़कर एक चिंतनशील व कर्मठ यात्री हैं। धीप्रज्ञ द्विवेदी जहां पर्यावरण की विशेषता के साथ टीम को संबंल प्रदान कर रहे हैं वहीं ऐश्वर्या सिंह अपनी प्रबंधकीय कौशल से टीम के एका को एक माला में पिरोने का काम कर रही हैं। रिजवान रजा जैसे अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता का साथ हमें मिल रहा है जो इस यात्रा के समन्वयक भी हैं।
इस पूरी यात्रा में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है। महात्मा गांधी भी भारतीयों के स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। स्वच्छता की बात हो अथवा स्वास्थ्य की वे सभी की चिंता करते थे। प्राकृत चिकित्सा को वो रामवाण मानते थे। गांधी जी का दर्शन आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो चुका है।
2012 में सबसे पहले हमने स्वस्थ भारत अभियान की परिकल्पना की थी उस समय मुझे अंदाजा नहीं था कि महज चार वर्षों में यह कारवां इतना विस्तारित हो जायेगा। स्वस्थ भारत अभियान के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवा को सुलभ, गुणवत्तायुक्त और सस्ता कराने का हमने संकल्प लिया था। उस संकल्प का सकारात्मक परिणाम भी सामने दिखने लगा है। नई सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बहुत सचेत व संजिदा नजर आ रही है। इस नाते हमें उम्मीद है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्थक बदलाव को और गति मिल सकेगी।
भारत स्वस्थ हो। देश की बेटियां स्वस्थ हों। समाज स्वस्थ हो। हम और आप स्वस्थ रहे और दूसरों को रखें। इसी कामना के साथ…
आपका
आशुतोष कुमार सिंह
चेयरमैन, स्वस्थ भारत (न्यास)

 

ढाई करोड़ यात्रियों के स्वास्थ्य के साथ रेलवे कर रहा है खिलवाड़!

जरा सोचिए यदि आपको रेल यात्रा कर रहे हों आपके जेब में 100 रुपये से कम बचे हो और बहुत जोर की भूख लगी हो तो आप क्या करेंगे?

समता एक्सप्रेस, जिससे हमने 10 अक्टूबर को यात्रा की थी...

समता एक्सप्रेस, जिससे हमने 10 अक्टूबर को यात्रा की थी…

रेलवे कैटरर्स को ही न भोजन के लिए ऑर्डर करेंगे। ऑर्डर करते समय वह कहे कि भोजन की थाली 120 रुपये की है, फिर आप क्या करेंगे? शायद आप कहें कि भोजन की थाली में से दो सब्जी की जगह एक सब्जी व कुछ चपाती ही मिल जाए। इस पर जब   कैटरर यह कहे कि चार चपाती व एक सब्जी (वह भी मानक से आधा) के लिए आपको 80 रुपये देने पड़ेंगे। इस बार शायद तीव्र  भूख के कारण अाप अपनी जेब खाली करते हुए आप भोजन कर लें।

स्वस्थ भारत का यह एक्सक्लूसिव विडियो बता रहा है कि किस तरह रेलवे के भोजन में लूट मची है…विडियो पर क्लिक करें…

वहीं दूसरी तरफ जब आपको मालूम चले कि 40 रुपये के भोजन के लिए आपसे 80 रुपये लिए गए तब आपकी क्या हालत होगी! जरा सोचिए। सच कह रहा हूं यह स्थिति वर्तमान में देश के सभी रेल गाड़ियों में आम है। पिछले दिनों जब समता एक्सप्रेस से मैं और हमारे साथी मीडिया चौपाल में सरीक होने ग्वालियर जा रहे थे तब एक घटना घटी। कैटरर ने थाली की कीमत 120 रुपये बताया और एक सब्जी व चार चपाती की कीमत 80 रुपये। बातचीत में उसी ने बताया कि साउथ इंडिया की रेलगाड़ियों में आज भी भोजन 50-60 रुपये में मिल जाता है। फिर आखिर क्यों उत्तर-भारत की रेलगाड़ियों में यह खाना सस्ता व गुणवत्ता युक्त मिलता है। इसका जवाब है रेलवे की लापरवाही व गलत नीति। जितनी भी प्रीमियम ट्रेने हैं उन सब पर ठेकेदारों ने  कब्जा जमा लिया है। लोगों को न तो शुद्ध पानी मिल पाता है और नही शुद्ध भोजन। लेकिन ये ठेकेदार उनकी शुद्ध कमाई को गटक जरूर जाते हैं। देश के रेलवे में 700 करोड़ से अधिक का है खाने की आपूर्ति का बाजार। यहां यह बता दें कि 12,500 रेलगाड़ियों में हर रोज 2.40 करोड़ लोग यात्रा करते हैं। यानी लगभग ढ़ाई करोड़ यात्रियों के स्वास्थ्य के साथ रेलवे खिलवाड़ कर रही है।

2010 में नई खान-पान नीति लागू करने की घोषणा हुई थी

पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे अधिकारियों और खान-पान ठेकेदारों की सांठ-गांठ खत्म करने के लिए नई खानपान नीति-2010 लागू करने की घोषणा की थी। वे चाहती थीं कि रेलवे में गिने चुने ठेकेदारों का वर्चस्व खत्म हो और नए प्लेयर भी आ सकें। लेकिन ममता बनर्जी के रहते यह कार्य हो नहीं सका। उनके जाने के बाद रेलवे ने अपने नियमों में कुछ ऐसे बदलाव कर दिए जिससे टेंडर प्रक्रिया से छोटे ठेकेदार बाहर हो गए। यहीं कारण रहा है कि लगातार ठेकेदारों की पेट बढ़ती गयी और आम लोगों की पेट गंगाजल दाल से भरने लगा।

स्वस्थ भारत अभियान की मांग

स्वस्थ भारत अभियान मांग करता है कि सरकार रेल-यात्रियों की भोजन की समुचित व्यवस्था कराए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि लोगों को मानक के आधार पर गुणवक्ता युक्त भोजन मिले। आर्थिक रूप से उन्हें लूटा न जाए।

…तो हम भी करेंगे ऑनलाइन फार्मेसी का समर्थन: AIOCD

14 अक्टूबर को दवा दुकाने रहेंगी बंद

फार्मासिस्टों ने किया बंद का विरोध

सरकार लगा सकती है एस्मा

नई दिल्ली/13.10.15

14 अक्टूबर को होने जा रहे दवा दुकानों के बंद के संदर्भ में मीडिया से रूबरू होते AIOCD के सदस्य

14 अक्टूबर को होने जा रहे दवा दुकानों के बंद के संदर्भ में मीडिया से रूबरू होते AIOCD के सदस्य

14 अक्टूबर को ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) देश भर के दवा दुकानों को बंद कराने जा रही है। बंद के समर्थन में अब तक जहां केमिस्ट एसोसिएशन यह कहते रहे थे कि वे ऑनलाइन फार्मेसी का विरोध कर रहे हैं और उनकी बात सरकार नहीं सुन रही है वहीं दूसरी तरफ आज उनके नेता ऑनलाइन के पक्ष में बयान देते नज़र आए। इस बावत आज जब नई दिल्ली के प्रेस क्लब में मीडिया से एआईओसीडी के अध्यक्ष जगन्नाथ शिंदे रूबरू हुए तो उनका सुर बदला हुआ नजर आया। उनका कहना था कि यदि ऑनलाइन फार्मेसी को हरी झंडी देनी ही है तो सरकार उनके साथ मिलकर काम करे। मीडिया के तीखे सवालों का जवाब शिंदे दे नहीं पा रहे थे। जब मीडिया ने पूछा कि क्या आप देश में सस्ती दवाइयों का विरोध कर रहे हैं तो शिंदे व उनकी टीम इसका ठीक से जवाब नहीं दे पायी।

सरकार को व्लैकमेल करने पर उतर आई है केमिस्ट एसोसिएशन!

पिछले 6 अक्टूबर को एनपीपीए ने एक पत्र लिखकर दवा संबंधी सभी संगठनों को यह चेता दिया था कि किसी भी सूरत में बंद को स्वीकार नहीं किया जायेगा। वहीं दूसरी तरफ मरीजों की असुविधा का ख्याल रखे बिना केमिस्ट एसोसिएशन अपनी अतार्तिक मांगों को पूरा कराने के लिए सरकार पर अनावश्यक दबाव डालने का प्रयास करती हुए नज़र आई। सूत्रों की माने तो केेमिस्ट एसोसिएशन ऑनलाइन फार्मेसी के विरोध के बहाने इस सेक्टर में खूद की हिस्सेदारी चाहती हैं। वे चाहते हैं कि सरकार कोई ऐसा कदम न उठाएं जिससे उनका मुनाफा कम हो।

सवालों का जवाब नहीं दे पाए एसोसिएशन के सदस्य

जब मीाडिया ने केमिस्टों कर्तव्यों को लेकर सवाल उठाना शुरू किया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। एआईओसीडी के महासचिव सुरेश गुप्ता ने जब यह कहा कि हमलोगों को लगभग 10 हजार करोड़ रुपये की बची दवाइयां मरीजों से वापस लेनी पड़ती है, लेकिन ऑनलाइन फार्मेसी से लोग बची हुई दवाइयां लौटा नहीं पायेंगे। इस पर काउंटर करते हुए मीडियाकर्मियों ने पूछा कि आपके केेमिस्ट स्ट्रीप से दवाइयां काटकर देते ही नहीं तो फिर आप लौटाते कैसे होंगे? इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था। उन्होंने एक मुद्दा उठाया कि ऑनलाइन वाले 30 फीसद तक छुट कैसे दे सकते हैं जब रिटेलर को 13.5 फीसद का ही मुनाफा है। उनके इस तर्क के काउंटर में जब स्वस्थ भारत डॉट इन ने उनसे पूछा कि दवाइयों पर जो बोनस मिलता उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? इस सवाल का भी सार्थक कोई उत्तर वे लोग नहीं दे पाए। अपना पक्ष रखते हुए एआईओसीडी के अध्यक्ष श्री शिंदे ने कहा कि ऑनलाइन फार्मेसी से बच्चों में नशा की लत बढ़ेगी। इस बात में सच्चाई हो सकती है लेकिन क्या किसी भी ऑनलाइन दवा प्रोवाडर को यह अधिकार है कि वह बिना प्रिस्किपसन के शेड्यूल  X व नार्कोटिक दवाइयां दे सकती हैं, क्या उन्हें अधिकार है कि वे बिना जांच पड़ताल के शिड्यूल एच-1 की दवाइयां दें।  सच्चाई तो यह है कि ऐसा वे कानूनन कर ही नहीं सकते और न ही सरकार उन्हें इस तरह खुला रूप से ऐसी दवाइयां बेचने की ईजाजत देगी।  तो फिर विरोध क्यों?

देखिए एक्सक्लूसिव विडियो

फार्मासिस्ट का अस्तित्व खतरे में!

बंद का विरोध करते राजस्थान के फार्मासिस्ट

बंद का विरोध करते राजस्थान के फार्मासिस्ट

एक तरफ जहां केमिस्ट एसोसिएशन फार्मासिस्टों बाध्यता को खत्म करने की बात कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ ऑनलाइन फार्मेसी के फार्मेट को लेकर फार्मासिस्टों में भ्रम की स्थिति है। ई-फार्मेसी के कॉन्सेप्ट पर न तो सरकार ठीक से गाइड कर रही है और न ही इसका विरोध करने वाले केमिस्ट एसोसिएशन! ई-फार्मेसी का विरोध पूरे देश के फार्मासिस्ट भी कर रहे हैं लेकिन इसके लिए केमिस्ट एसोसिएशन ने जो हथकंडा अपनाया है उसकी वे खिलाफत कर रहे हैं। यहीं कारण है कि 14 के बंद के विरोध में है देश भर के फार्मासिस्ट एसोसिएशन। फार्मासिस्टों की मांग है कि ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 नियम 1945 और फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा 42 में कोई भी बदलाव न हो और दवा मरीज के हाथों पहुंचाने व उसकी काउंसेलिंग की जिम्मेदारी हर हाल में उसी के हाथ में हो ताकि लोगों को सुरक्षित हाथों से व्यवस्थित दवा मिल सके।

दुकान चलाने के लिए अधिकारियोें को पैसा देना पड़ता है

एआईओसीडी के महासचिव सुरेश गुप्ता ने कहा कि दुकान चलाने के लिए हमें फार्मासिस्ट का रजिस्ट्रेशन चाहिए होता है और इसे खुद एफडीए के अधिकारी मुहैया कराते हैं, जिसके बदले में केमिस्ट को पैसा देना पड़ता है। यूपी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वहां पर महज 22 हजार फार्मासिस्ट हैं जबकि 72 हजार लाइसेंसी रिटेल की दुकाने हैं। उनके इस जवाब पर जब स्वस्थ भारत डॉट इन ने सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या इन सभी फर्जी व गैरकानूनी दवा दुकानों की लाइसेंस को रद्द नहीं कर देना चाहिए? इस पर उग्र होते हुए उनका जवाब था कि आखिर केमिस्ट ही क्यों निशाना बनें. जिन लोगों ने लाइसेंस दिया है उनको आप मीडिया वाले क्यों नहीं कुछ कहते। इस संदर्भ में उन्होेंने यह भी कहा कि पूरे देश में सिर्फ 1.5 लाख फार्मासिस्ट रिटेलर हैं। इस संदर्भ में  फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि एआईओसीडी के पदाधिकारी गलत बयानी कर रहे हैं और अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। हम मांग करते हैं कि यदि फार्मासिस्ट दोषी है तो उसे भी सजा मिले लेकिन इस आड़ में केमिस्ट आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करें! उन्होंने आरोप लगाया कि एओआईसीडी खुद अपनी ई-कामर्स कंपनियां खोलने की फिराक में है, केमिस्टों को एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति का विरोध

बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति का विरोध करते हुए जगन्नाथ शिंदे कहा कि वे चाहते हैं कि बेतहाशा बढ़ी हुई दवा की कीमतें कम हों और इसके लिए सरकार द्वारा दवाइयों के मूल्यों को नियंत्रित करने का जो फार्म्यूला लाया गया है व जनहित में नहीं है।

ई-फार्मेसी को लॉच करने की साजिश तो नहीं…

जिस तरह से ई-फार्मेसी के मुद्दे को आगे बढ़ाया जा रहा है उससे यह आशंका हो रही है कि ई-फार्मेसी के लिए भारत का बाजार खोलने की पूरी

इस विज्ञापन को देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि ऑनलाइन का बाजार बहुत जल्द फैलने वाला है...

इस विज्ञापन को देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि ऑनलाइन का बाजार बहुत जल्द फैलने वाला है…

कवायद की जा रही है। इसमें दवा कंपनियों से लेकर, इ-कॉमर्स व आईटी के दिग्गज भी बड़े पैमाने पर अपना भाग्य आजमाने की कोशिश में लगे हैं। जाहिर है कि देश का घरेलू दवा बाजार पिछले 10 वर्षों में 32 हजार करोड़ से बढ़कर 70 हजार करोड़ रूपये का आंकड़ा पार कर चुका है। चूंकि सरकार भी मान चुकी है कि दवाइयों में 1000 फीसद तक का मुनाफा है, तो ऐसे में इन बड़े प्लेयरों का आना स्वभाविक ही लगता है। लेकिन इन सब के बीच में अगर किसी को नुक्सान होने वाला है तो वह  है आम जनता, जिसे मालूम ही नहीं है कि उसके स्वास्थ्य के साथ किस कदर एक्सपेरिमेंट किया जा रहा है! इस संदर्भ में स्वस्थ भारत अभियान का मानना है कि देश का दवा बाजार 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नहीं होना चाहिए। इसका आंकड़ा 70 हजार करोड़ इसलिए पार कर चुका है क्योंकि दवाइयों में मुनाफाखोरी चरम पर है और उसकी एमआरपी पर सरकार का नियंत्रण लगभग न के बराबर है। पिछले दिनों जिस रफ्तार से ऑनलाइन फार्मेसी का विज्ञापन मीडिया में दिया जा रहा है उससे यह आशंका तो जाहिर की ही जा सकती है कि इस खेल में कहीं सभी (सरकार, दवा कंपनिया व केमिस्ट संगठन) की हिस्सेदारी तो नहीं!

आखिर ई-फार्मेसी है क्या?

ऑनलाइन या ई-फार्मेसी से सीधा-सा मतलब है दवा का ऑनलाइन कारोबार!  यानी जिस तरह से आप अपने घर बैठे अपने मनपसंद की कोई भी वस्तु ऑनलाइन प्लैटफार्म से ऑर्डर कर के मंगाते हैं ठीक वैसे हीं आप दवाइयों को भी मंगा सकेंगे।

कैसे काम करती है ई-फार्मेसी

कुछ गिनी चुनी ई-फार्मेसी वर्तमान में दिख रही हैं लेकिन बहुत जल्द इनकी संख्या बढ़ने वाली हैं। ई-फार्मेसी कंपनियों ने अपने वेबपोर्टल और एप्स बना रखे हैं ! इन कंपनियों के कॉल सेंटर में फार्मासिस्ट मरीज़ों को दवा के डोज़ एलर्जी रिएक्शन समेत कई तरह की जानकारी उपलब्ध कराते हैं ! प्रिस्क्रिप्सन वेबपोर्टल पर अपलोड होने से लेकर डिलीवरी तक फार्मासिस्ट का रोल अहम होता है। ऑनलाइन वेबसाइट्स पाटर्नर फार्मेसियों से दवा खरीद कर उपभोक्ता के घर तक दवाओं की डिलीवरी करती हैं। कुछ फार्मेसियां ऑनलाइन ऑर्डर पर अपने आउटलेट के जरिए दवा पहुंचाती हैं।

स्वस्थ भारत अभियान जानना चाहता है

  • आखिर कब तक जनता को भ्रमित करते रहेंगे ये संगठन व सरकार के लोग?
  • सस्ती दवाइयां सही मायने में कब उपलब्ध होंगी?
  • आखिर क्यों इस बाजार में उतरने के लिए इतनी मारामारी है?
  • क्या सच में मेडिकल केयर एक उद्योग हो गया है, इसे अब सामाजिक सेवा भाव से कोई लेना देना नहीं है?
  • डिजिटल इंडिया की आड़ में कहीं आम लोगों को धोखा तो नहीं दिया जा रहा है?
  • सरकार की जेनरिक स्टोर खोलने की बात की थी, कितनी दुकाने खुलीं?
  • कहीं ऐसा तो नहीं देश के स्वास्थ्य से पल्ला झाड़ना चाहती है सरकार?

आप भी हमारे फेसबुक पेज से जुड़ सकते हैं, जुड़ने के लिए क्लिक कीजिए स्वस्थ भारत अभियान

यूपी के फार्मासस्टों को भरमा रहे हैं ड्रग कंट्रोलर !

देखिए एक्सक्लूसिव विडियो

लखनऊ।

देश का स्वास्थ्य किस कदर बिगड़ता जा रहा है,इसका नमूना देखने को मिला 28 सितम्बर,2015 को।  तकरीबन 500 फार्मासिस्ट उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में इकट्ठा हुए। स्वास्थ्य भवन को घेरा और फिर चल दिए एफडीए के दफ्तर। स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह इस पूरे  घटनाक्रम के गवाह बने। एफडीए दफ्तर में फार्मासिस्टों व अधिकारियों के बीच  जो बातचीत हुई उसे स्वस्थ भारत ने अपने कैमरे में कैद किया। उस एक्सक्लूसिव विडियो को देश के सभी फार्मासिस्टों को जरूर देखना चाहिए। नीचे विडियो का लिंक साझा किया जा रहा है। विडियो में किस बेशरमी से अधिकारी गण फार्मासिस्टों को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं आप भी देख सकते हैं। हद तो यह है कि ड्रग कंट्रोलर यह तो मान रहे हैं कि फर्जी दवा दुकाने चलाई जा रही हैं लेकिन उनपर कार्रवाई करने के लिए उनके पास मैन पावर ही नहीं है।

स्वास्थ्य मंत्रालय को संपादक ने लगाई फटकार…

चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय ने डेंगू के मसले को जोरदार तरीके से उठाया

संतोष भारतीय, संपादक, चौथी दुनिया

संतोष भारतीय, संपादक, चौथी दुनिया

आज समय आ गया है कि देश के सभी संपादक अपनी भूमिका को सही तरीके से समझे। इस दिशा में चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय जी के इस पहल का स्वस्थ भारत अभियान स्वागत करता है। संतोष भारतीय ने अपने विडियो-संदेश में देश की केन्द्र सरकार व दिल्ली सरकार को स्पष्ट शब्दों में जनता की आवाज को पहुंचाया है। उन्होंने कहा है कि अगर ये सरकारें, डॉक्टर व अस्पताल नहीं सुधरेंगे तो तो फिर जनता इन्हें सुधार देगी।  दिल्ली सरकार द्वारा डेंगू का टेस्ट 50 रुपये में कराए जाने की घोषणा के संदर्भ में एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न  संतोष भारतीय ने उठाया है। वे पूछते हैं कि जब आज ये निजी पैथोलॉजी वाले डेंगू का टेस्ट 50 रुपये में कर सकते हैं तो इसके पूर्व वो जो टेस्ट के नाम पर लूट  रहे थे, उसका हिसाब कौन देगा?

संतोष भारतीय की तरह यदि सभी संपादक स्वास्थ्य-व्यवस्था की अव्यवस्था की चर्चा करने लगें तो निश्चित ही स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता आयेगी।

उनके संदेश को देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक कीजिए….

एक डॉक्टर की मौतः जरूर देखें!

यह फिल्म हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रही है। बेशक यह फिल्म 24 वर्ष पहले बनी हैं लेकिन आज इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गयी है। ‘एक डॉक्टर की मौत’ हमारे देश की व्यवस्था को बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है। आप जरूर देखें इस फिल्म को और अपनी प्रतिक्रिया भी दें…(साभारः पैलरल सिनेमा आर्ट मूवी)

https://www.youtube.com/watch?v=lSDnqlOdAbI

Directed by Tapan Sinha

Produced by NFDC

Written by Ramapada Choudhury, (story, Abhimanyu)

Tapan Sinha (screenplay)

Music by Vanraj Bhatia

Cinematography   Soumendu Roy

Edited by               Subodh Roy

Cast-Ek_Doctor_Ki_Maut,_1990_filmPankaj KapoorShabana Azmi,Anil chatterjee,Irfan Khan,Deepa Sahi,Vijayendra GhatgeSushant Sanyal

 

गुजरातः370 बरातियों ने किया रक्तदान…!

beti ki shadi me angdan

बेटी की शादी में डॉ. आर.बी.बेसानिया ने कराया अंगदान!

जरा सोचिए! आपको बरात में बुलाया जाया और यह शर्त हो की आपको बारात में रक्तदान करना है, तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? शायद आप न जाना चाहें, लेकिन गुजरात के रहने वाले इएनटी विशेषज्ञ डॉ. आर.बी. बेसानिया ने अपनी बेटी की शादी में सभी बरातियों से रक्तदान करवाया  व अंग दान के लिए शपथ भी दिलायी। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी बेटी-दामाद को भी अंग-दान के लिए शपथ दिलायी। डॉ. आर.बी बेसानिया हमारे समाज के लिए एक चेतना के केन्द्र हैं।स्वस्थ भारत अभियान उनके इस नेक कार्य की प्रशंसा करता है।

आप खुद डॉ. साहब को रक्तदान के महत्व के बारे में बोलते हुए यहां देख सकते हैं।

डॉ.आर.बी. बेसानिया, रक्तदान व देहदान की महत्ता को बखूबी समझ रहे हैं। गुजराती के लोगों में डॉ.आर.बी.बेसानिया की बातों को बहुत अहमियत दी जाती है।

सेकेंड ओपिनियनः जरूर देखें इस विडियो को

मेडिकल साइंस में सेकेंड ओपिनियन का बहुत बड़ा महत्व है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए एबीपी न्यूज ने सेकेंड ओपिनियन नामक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम दिसंबर, 2012 में दिखाया था…यह कार्यक्रम इतना जीवनोपयोगी है कि इसे हिन्दुस्तान के सभी नागरिकों को जरूर देखना चाहिए। एबीपी के इस प्रयास को स्वस्थ भारत अभियान ने तब भी सराहना की थी, आज भी कर रहे हैं…संपादक