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जेनरिक दवाइयां और भ्रम

पहले दवा बनती है, न की जेनरिक दवा या ब्रांडेड
पहले दवा बनती है, न की जेनरिक दवा या ब्रांडेड

 
आशुतोष कुमार सिंह
 
हिन्दुस्तान के बाजारों में जो कुछ भी बिक रहा है अथवा बेचा जा रहा है उसकी मार्केटिंग का एक बेहतरीन फार्मुला है भ्रम फैलाओं, लोगों को डराओं और मुनाफा कमाओं। जो जितना भ्रमित होगा, जितना डरेगा उससे पैसा वसूलने में उतनी ही सहुलियत होगी। डर और भ्रम को बेचकर मुनाफा कमाने की परंपरा तो बहुत पुरानी रही है, लेकिन वर्तमान में इसकी होड़ मची हुई है। लाभ अब शुभ नहीं रह गया है। लाभालाभ के इस होड़ में मानवता कलंकित हो रही है। मानवीय स्वास्थ्य से जुड़ी हुई दवाइयों को भी इस होड़ ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। दवाइयों की भी ब्रान्डिंग की जा रही है। दवाइयों को लेकर कई तरह के भ्रम फैलाएं जा रहे हैं। दवाइयों के नाम पर लोगों को डराया जा रहा है।
ब्रांडेड व जेनरिक दवाइयों को लेकर हिन्दुस्तान के मरीजों को भी खूब भ्रमित किया जा रहा है। मसलन जेनरिक दवाइयां काम नहीं करती अथवा कम काम करती हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हिन्दुस्तान में वैधानिक तरीके से जो भी दवा बनती है अथवा बनाई जाती है, वह इंडियन फार्मा कॉपी यानी आईपी के मानको पर ही बनती हैं। कोई दवा पहले ‘दवा’ होती है बाद में जेनरिक अथवा ब्रांडेड। दवा बनने के बाद ही उसकी ब्रांडिंग की जाती है यानी उसकी मार्केटिंग की जाती है। मार्केटिंग के कारण जिस दवा की लागत 2 रुपये प्रति 10 टैबलेट है उपभोक्ता तक पहुँचते-पहुँचते कई गुणा ज्यादा बढ़ जाती है। फलतः दवाइयों के दाम आसमान छुने लगते हैं। ये तो हुई ब्रांड की बात। अब बात करते हैं जेनरिक की।
सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि जेनरिक दवा क्या है? इसका सीधा-सा जवाब है, जो दवा पेटेंट फ्री है वह जेनरिक है। इसको एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मोहन की दवा कंपनी ने वर्षों शोध कर एक नई दवा का निर्माण किया। अब उस दवा पर विशेषाधिकार मोहन की कंपनी का हुआ। इस दवा को ढूढ़ने से लेकर बनाने तक जितना खर्च होता है, उसकी बजटिंग कंपनी की ओर से किया जाता है। उसका खर्च बाजार से निकल आए इसके लिए सरकार उसे उस प्रोडक्ट का विशेषाधिकार कुछ वर्षों तक देती है। अलग-अलग देशों में यह समय सीमा अलग-अलग है। भारत में 20 तक की सीमा होती है। बाजार में आने के 20 वर्षों के बाद उस दवा के उस फार्मुले पर से शोधकर्ता कंपनी पेटेंट खत्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में कोई भी दूसरी फार्मा कंपनी सरकार की अनुमति से उस दवा को अपने ब्रांड नेम अथवा उस दवा के मूल साल्ट नेम के साथ बेच सकती है। जब दूसरी कंपनी उस दवा को बनाती है तो उसी दवा को समझने-समझाने के लिए जेनरिक दवा कहा जाने लगता है। इस तरह से यह स्पष्ट होता है कि जेनरिक दवा कोई अलग किस्म या प्रजाति की दवा नहीं हैं। उसमें भी मूल साल्ट यानी मूल दवा वहीं जो पहले वाली दवा में होती है। केवल दवा बनाने वाली कंपनी का नाम बदला है, दवा नहीं बदली है।
वैसे भी पहले दवा ही बनती है, बाद में उसकी ब्रांडिग होती है। यदि भारत जैसे देश में जहां पर आधिकारिक तौर पर गरीबी दर29.8 फीसद है या कहें 2010 के जनसांख्यिकी आंकड़ों के हिसाब से यहां साढ़े तीन सौ मिलियन लोग गरीब हैं। वास्तविक गरीबों की संख्या इससे काफी ज्यादा है। जहां पर दो वक्त की रोटी के लिए लोग जूझ रहे हैं, वैसी आर्थिक परिस्थिति वाले देश में यदि दवाइयों के दाम जानबूझकर ब्रांड के नाम पर आसमान में रहे तो आम जनता अपने स्वास्थ्य की रक्षा कैसे कर पायेगी!
मुंबई में पिछले दिनों स्वस्थ भारत अभियान के अंतर्गत चलाएं जा रहे जेनरिक लाइए पैसा बचाइए कैंपेन के तहत तीन-चार सभाओं में बोलने का मौका मिला था। मुंबई के पढ़े-लिखे लोगों के मन में भी जेनरिक को लेकर अजीब तरह का भ्रम था। किसी को लग रहा था कि ये दवाइयां सस्ती होती है, इसलिए काम नहीं करती। ज्यादातर लोग तो ऐसे थे जिन्होंने जेनरिक शब्द ही कुछ महीने पहले सुना था। कुछ लोगों को लग रहा था कि जेनरिक दवाइयां विदेश में बनती हैं। इसी संदर्भ में सामाजिक कार्यकर्ता अफजल खत्री ने एक वाकया सुनाया। उन्होंने बताया कि जब वे ठाकुर विलेज स्थित एक दवा दुकान पर गए और दवा दुकानदार से डायबिटिज की जेनरिक दवा माँगे तो वहाँ खड़ी एलिट क्लास की कुछ महिलाएं मुँह-भौ सिकुड़ते हुए उनसे कहाँ कि जेनरिक दवाइयां गरीबों के लिए बनती है, वो यहाँ नहीं मिलेगी किसी झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाके के दवा दुकान पर चले जाइए। अफजल खत्री के जिद पर दवा दुकानदार ने जेनरिक दवा उनको आखिरकार दी। शायद यहीं कारण है डॉ. राकेश त्रिपुरे ( अस्सिटेंट कमिश्नर, एफडीए, मुम्बई) का कहना है कि    ‘जहाँ तक मेडिकल इथिक्स का सवाल है, प्रत्येक मेडिकल प्रैक्टिशनर को हरसंभव जेनरिक दवा ही लिखनी चाहिए।’
उपर की बातों से स्पष्ट हो जाता है कि आज भी हमारा पढ़ा-लिखा समाज सच्चाई जाने बिना आधे-अधूरे जानकारी के आधार पर किसी चीज के बारे में गलत-सही जो धारणा-अवधारणा बना लेता है, उसे त्यागने के लिए वह तैयार नहीं है। फिर भी हमारे लिए यह सुखद रहा कि जेनरिक दवाइयों के बारे में व्याप्त भ्रम के बारे में पूरी बात जानने के बाद सभा में आए ज्यादातर लोग इस भ्रम से निकल चुके हैं।
जेनरिक दवाइयों के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी

  • भारत को फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता है
  • भारत दुनिया का सबसे बड़ा दवा उत्पादक है।
    पत्येक साल 42 हजार करोड़  रुपये की दवा एक्सपोर्ट करता है।
  • यनिसेफ अपनी जरुरत की 50 फीसदी दवाएं भारत से खरीदता है
  • 1994 में तमिलनाडु में निःशुल्क दवा योजना शुरू की गयी…ये सभी दवाइयां जेनरिक होती हैं
  • राजस्थान में 2009 में जेनरिक मेडिसिन का कैंपेन शुरू हुआ…
  • इंटरनेशनल डिसपेंसरी एसोसिएशन 80 प्रतिशत दवा भारत से खरीदता है….
  • देश में 3000 हजार सरकारी जन औषधि जेनरिक स्टोर खोलने का लक्ष्य
  • 29.12.13 तक 117 जेनरिक स्टोर खुल चुके हैं।
  • इंटरनेशनल डिसपेंसरी एसोसिएशन 80 प्रतिशत दवा भारत से खरीदता है
  • 25 नवंबर, 2008 को पहला जन औषधि जेनरिक स्टोर सिविल अस्पताल अमृतसर में खोला गया।

 
 
 

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