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SBA विशेष काम की बातें

उपभोक्ता जागरुकता से ही बदलेगी स्वास्थ्य सेवा की तस्वीर

आशुतोष कुमार सिंह
अपने अधिकारों एवं दायित्वों के प्रति जागरुक समाज ही खुद को बेहतर तरीके से विकसित कर सकता है। इस दिशा में भारत भी अग्रसर है। सभी क्षेत्रों के साथ-साथ अब स्वास्थ्य के क्षेत्र में जागरुकता बढ़ने लगी है। सरकारी-गैरसरकारी दोनों स्तरों पर भरपूर काम हो रहे हैं। इस आलेख का विषय है स्वास्थ्य क्षेत्र में उपभोक्ता जागरुकता। सबसे पहले हम जागरुकता शब्द को समझने का प्रयास करते है-
जागरुकता से अभिप्राय
जागरुकता शब्द प्रयोग करते ही दो प्रमुख बाते सामने आती है। जो हम खरीद रहें हैं, उसको लेकर हम कितने जागरुक हैं दूसरी बात यह कि खरीदने के बाद गर धोखाधड़ी के शिकार होते हैं तो इसके खिलाफ फरियाद करने का कोई अधिकार हमें हैं या नहीं। यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि जो खरीदार हैं वो उपभोक्ता है और जो बेच रहा है वो विक्रेता। ऐसे जब हम उपभोकता जागरुकता की बात करते हैं तो दो पक्ष सामने आते हैं एक खरीदने वाला और दूसरा बेचने वाला। ऐसे में उपभोक्ता वह व्यक्ति है, जो वस्तुओं अथवा सेवाओं को अपने अथवा अपनी ओर से अन्य के प्रयोग अथवा उपभोग के लिए खरीदता है। वस्तुओं में दैनिक उपभोग की तथा स्थायी वस्तुए सम्मिलत है। जबकि सेवाएं जिनके लिए भुगतान किया जाता है, में यातायात, बिजली, फिल्म देखना इत्यादि शामिल हैं। दूसरे अर्थों में उपभोक्ता को इस प्रकार से भी परिभाषित किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति, जो वस्तुओं एवं सेवाओं का चयन करता है, उन्हें प्राप्त करने के लिए पैसा खर्च करता है तथा अपनी आवश्यकता की पूर्ति हेतु उनका उपयोग करता है उपभोक्ता कहलाता है। भारत में उपभोक्ताओं को कानूनी संरक्षण देने के लिए 1986 में भारत सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 लेकर आई। उपभोक्ताओं के अधिकार देने के संबंध में यह अधिनियम मिल का पत्थर साबित हुआ। इस कानून ने उपभोक्ताओं को अपने अधिकार के प्रति जागरुक करने का काम किया। बाद में सरकार के स्तर पर भी जागो ग्राहक जागो कैंपेन शुरु किया गया। जिसके तहत सरकार ने प्रिंट, श्रव्य एवं दृश्य माध्यमों से लोगों को उनके अधिकारों में बारे में जागरुक करना शुरू किया।
स्वास्थ्य सेवा एवं उपभोक्ता संरक्षण

यहां पर आप स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

आयुर्वेद की जननी भारत भूमि का इतिहास बताता है कि यहां पर स्वास्थ्य सेवाओं को प्राचीन काल में परोपकार के नजरिए देखा जाता था। जब तक वैद्य परंपरा रही तब तक मरीज एवं वैद्य के बीच सामाजिक उत्तरदायित्व का बंधन रहा। लेकिन आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के उदय के बाद चिकित्सा एवं इससे जुड़ी हुई सेवाओं को क्रय-विक्रय के सूत्र में बांध दिया गया। चिकित्सकीय सेवा देने वाले एवं मरीज के बीच में उपभोगीय समझौते होने लगे। जैसे अगर आपको हर्निया का ऑपरेशन कराना है तो इतना हजार रुपये लगेगा, डिलेवरी कराना है तो इतना हजार रुपये। मरीज से कॉन्ट्रैक्ट फार्म पर हस्ताक्षर कराए जाने लगे। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह बाजार आधारित हो गईं। यहां पर लाभ-हानी की कहानी गढ़ी जाने लगीं। ऐसे में यह जरूरी हो गया कि इन सेवाओं को कानून के दायरे में लाया जाए ताकि खरीदार को कोई बेवकूफ न बना सके, उनसे ओवरचार्ज न कर सके। गलत ईलाज न कर सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतीय न्यायालय ने समय –समय पर दिए अपने आदेशों में यह स्पष्ट कर दिया है कि चिकित्सा संबंधी जितनी भी सेवाएं हैं उसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 के सेक्शन 2(1) के तहत अनुबंधित सेवा माना जायेगा। इस तरह स्वास्थ्य संबंधित सेवाएं कानून के दायरे में आ गईं। इसके इतर भी कुछ प्रमुख कानूनी अधिकार हैं, जो हमें स्वास्थ्य के अधिकार की ओर लेकर जाते हैं। ये अधिकार निम्न हैं-
• मानसिक स्वास्थ्य एक्ट, 2017
• एचआईवी एड्स एक्ट-2017
• खाद्य सुरक्षा एवं मानक एक्ट-2006
• ट्रांस्पलाटेंशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन एक्ट-1994
• उपभोगता संरक्षण एक्ट- 1986
• ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट-1940

स्वास्थ्य सुरक्षा की जरूरत आखिर क्यों?

राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण के चेयरमैन ने सरकारी वेबसाइट पर दिए अपने संदेश में लिखा है कि भारतीय अंग्रेजी दवा व्यापार का वार्षिक टर्नओवर 1 लाख 28 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया है। जबकि भारत में 82 हजार करोड़ रुपये की दवा की खपत सिर्फ भारतीय बाजार में हैं। यानी हम भारतीय सिर्फ दवा पर एक वर्ष में 82 हजार करोड़ रुपये खर्च करते हैं।1 इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुरक्षा क कितनी जरुरत है।
सच्चाई यह है कि किसी भी राष्ट्र-राज्य के नागरिक-स्वास्थ्य को समझे बिना वहां के विकास को नहीं समझा जा सकता है। दुनिया के तमाम विकसित देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतनशील व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य राष्ट्र की प्रगति को तीव्रता प्रदान करता है। इतिहास गवाह रहा है कि जिस देश के लोग ज्यादा स्वस्थ रहे हैं, वहां की उत्पादन शक्ति बेहतर रही है। और किसी भी विकासशील देश के लिए अपना उत्पदान शक्ति का सकारात्मक बनाए रखना ही उसकी विकसित देश की ओर बढ़ने की पहली शर्त है। ऐसे में भारत को पूरी तरह कैसे स्वस्थ बनाए जाए यह एक अहम् प्रश्न है। अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय नागरिकों को पूर्ण रूपेण स्वास्थ्य-सुरक्षा कैसे दी जाए आज भी एक यक्ष प्रश्न है। यहां पर यह ध्यान देने वाली बात है कि 2008 में रिसर्च एजेंसी अर्नेस्ट एंड यंग व भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत के लोग अपने स्वास्थ्य बजट का 72 प्रतिशत दवाइयों पर खर्च करते हैं। इस रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया था कि महंगी दवाइयों के कारण प्रत्येक वर्ष भारत की 3 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से ऊबर नहीं पाती। इसका अर्थ यह हुआ कि देश की लगभग 4 करोड़ आबादी प्रत्येक वर्ष इसलिए गरीब रह जा रही है, क्योंकि उसके पास महंगी दवाइयां खरीदने की आर्थिक ताकत नहीं है। ऐसी स्थिति में गरीबों को दिए जाने वाला स्वास्थ्य कवरेज गरीबी को कम करने का एक ताकतवर साधन भी सिद्ध होगा, ऐसा समीक्षकों का मानना है।2
राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना
भारत के गरीब जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए भारत सरकार ने अप्रैल 2008 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की शुरूआत की थी। लेकिन इस योजना को धरातल पर लाने में पूर्ववर्ती सरकारें सफल नहीं हो पायीं। आंकड़ों की माने तो 31 अगस्त 2015, तक इस योजना के अंतर्गत 40,430,289 स्मार्ट कार्ड जारी किए जा चुके हैं जबकि 10,630,269 मरीज अस्पताल में भर्ती हुए। इसी सुरक्षा को आगे बढ़ाते हुए इस सरकार ने बीपीएल परिवार को 1 लाख रूपये का स्वास्थ्य बीमा देने का निर्णय किया है। आज के समय में जब स्वास्थ्य सेवा इतनी महंगी होती जा रही है स्वास्थ्य बीमा एक जरूरी हिस्सा बनता जा रहा है। इसके लिए देश के तमाम सरकारी-गैरसरकारी बीमा कंपनियां नई-नई स्कीमों के साथ बाजार में है। ऐसे में स्वास्थ्य के प्रति लोगों के मन जागरुकता भाव ही उन्हें बीमा कराने के लिए प्रेरित कर सकता है।
बचाव ही ईलाज है
किसी भी बीमारी से बचाव की पहली कसौटी यह होती है कि उस बीमारी के बारे में हम कितना जानते हैं। अगर हम उस बीमारी के बारे में जागरुक होंगे तो निश्चित रुप से उस बीमारी से बचाव आसान हो जाता है। यहीं कारण है कि भारत सरकार बीमारियों से बचाव के लिए समय-समय पर जागरुकता कार्यक्रम चलाती रही है। आइए इनके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा करें-
मलेरिया
मलेरिया परजीवी से फैलने वाली एक गंभीर बीमारी है। मच्छरों की 9 प्रमुख प्रजातियां मलेरिया कारण बनती है। 1940-50 के दशक में मलेरिया ने भारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। यहीं कारण है आजादी के बाद भारत सरकार ने 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की। इस दौरान लोगों को मलेरिया के बारे में जागरुक किया जाता रहा। डीटीडी का छिड़काव भी होता रहा और अगले 5 वर्षों में मलेरिया से मरने वालों की संख्या में काफी हत तक कमी आई। 1958 में सरकार ने मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम का दायरा बढ़ाते हुए इसका नाम मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम रखा। वर्तमान में मलेरिया से होने वाली मौतों पर हम रोक लगाने में भारत लगभग सफल हो चुका है। अब प्रति 1000 व्यक्ति पर मलेरिया से पीड़ितों की संख्या से 2 से भी कम है। 3
फाइलेरिया
लिम्फैिटिक फाइलोरिएसिस एक ऐसी गंभीर बीमारी हे, जो शरीर के अंगों को काफी कमजोर और अयोग्यि बना देती है। यह बीमारी क्यूरलेक्सस क्वीरनक्यू फेसीएटम नाम विषाणु से फैलती है। मच्छ्र इस विषाणु के वाहक हैं। वर्ष में एक बार सामूहिक रूप से फाइलेरिया निरोधी दवा पिलाकर विश्व स्तर पर 2020 तक इसके उन्मूपलन का लक्ष्य रखा गया है।4
डेंगू बुखार
वर्तमान समय में डेंगू बुखार से दिल्ली सहित भारत के कई क्षेत्र परेशान हैं। इससे बचाव एवं रोकथाम के लिए दिल्ली सरकार बड़े-बड़े होर्डिग्स एवं बैनरों तथा अखबारों में विज्ञापन देकर लोगों को जागरुक करने का प्रयास कर रही हैं। इस बीमारी की पहचान 60 के दशक में कोलकाता परिक्षेत्र में हुई थी। चूंकि डेंगू का कोई विशेष उपचार अभी तक आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के पास नहीं है अतः इससे बचाव ही इसका ईलाज है। और बचाव के लिए जागरुकता जरूरी है।5
चिकनगुनिया
यह भी मच्छर जनित बीमारी है। अतः इससे बचने के लिए भी मच्छरों बचने का सुझाव सरकार देते रहती हैं।6
जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई)-अभी हाल ही में जापानी इंसेफलाइटिस एवं एक्यूट इंसेफलाइटिस से भारत के उत्तरप्रदेश राज्य के गोरखपुर में हजारों बच्चों की जान गई है। जिसकी चर्चा मीडिया में की खूब हुई। इस बीमारी से 1952 में भारत में इस बीमारी का पहला मामला आया था। तब से लेकर अब तक इस बीमारी ने बहुत तबाही मचाई है। इसको लेकर सरकार प्रभावित क्षेत्रों में जागरुकता अभियान चलाते रहती हैं। लेकिन जबतक सरकार द्वारा जारी की गई एडवाइजरी (सलाह) को हम नहीं मानेंगे इस तरह की बीमारियों से बचाव आसान नहीं है।7
कालाज़ार
इस बीमारी से निजात पाने के लिए सरकार ने वर्ष 1990-91 में कालाजार नियंत्रण कार्यक्रम की शुरूवात की है। सरकार की ओर से डीटीटी का छिड़काव कराने के साथ-साथ गहन सामाजिक जाकरुकता पर सरकार का बल है।8
क्षयरोग (टीवी)
भारत में टीवी यानी क्षय रोग एक गंभीर समस्या है। आज भी इस बीमारी से सालाना लाखों लोगों की मौत हो रही है। इस बीमारी से निजात पाने के लिए सरकार 1962 से लगी हुई है। इस वर्ष राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था। अगर इस बीमारी का उन्मूलन नहीं हो पाया है इसका मतलब यह है कि इसके प्रति लोगों के बीच में जागरुकता का अभाव है।9
अस्वच्छता जनित बीमारियां
साफ-सफाई की कमी के कारण भी तमाम तरह की बीमारियां होती हैं। इसलिए स्वस्थ रहने की पहली कसौटी है कि साफ-सफाई। इस दिशा में भारत सरकार ने 2 अक्टूबर 2014 से स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान के अंतर्गत सरकार ने प्रत्येक भारतीयों को स्वच्छता के फायदे बताने का काम कर रही है। स्वच्छ भारत अभियान बीमारियों से बचाव की दिशा में उठाया गया अब तक का सबसे बड़ा कैंपेन है।10
सोशल मीडिया में स्वास्थ्य संबंधी जागरुकता
सोशल मीडिया पर स्वस्थ भारत अभियान का यह पेज बहुत पॉपुलर है…

सोशल मीडिया के प्रभाव का असर स्वास्थ्य जागरुता पर भी पड़ा है। स्वास्थ्य संबंधी जागरुता में फेसबुक, यूट्यूब, स्वास्थ्य वेब पोर्टलों ने अहम भूमिका निभानी शुरू कर दी है। अगर फेसबुक ट्वीटर की बात करें तो दर्जनों हैशटैग ऐसे हैं जिनके माध्यम से आम लोगों को जागरुक किया जा रहा है। उनमें से कुछ नीचे दिए जा रहे हैं-
 #SwachbharatAbhiyan (स्वच्छ भारत अभियान)
 #SwasthBharatAbhiyan (स्वस्थ भारत अभियान)
 #SwasthBharat (स्वस्थ भारत)
 #HealthyIndia (हेल्थी इंडिया)
 #SecondOpinion (सेकेंड ओपिनियन)
 #KnowyourMedicine (नो योर मेडिसिन)
 #KnowYourPharmacist (नो योर फार्मासिस्ट)
 #ControlMedicineMaximumeRetailPrice (कंट्रोल मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस)
 #PMBJP (Pradhanmantri Bhartiya Janaushadhi Pariyojana) (पीएमबीजेपी)
 #SwasthBalikaSwasthSamaj (स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज)
टीवी शो/फिल्म/यात्रा से स्वास्थ्य जागरुकता
21 हजार किमी की स्वस्थ भारत यात्रा के माध्यम से 1 लाख 50 हजार से ज्यादा बालिकाओं को प्रत्यक्ष रुप से स्वास्थ्य के प्रति जागरुक किया

देश के लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करने के लिए कई स्तरों पर जागरुक्ता अभियान चलाए जा रहे हैं। इसे टीवी शो, फिल्म एवं यात्राओं का भी योगदान है। दूरदर्शन पर चलने वाला स्वस्थ भारत कार्यक्रम देश के दर्जनों भाषाओं में बीमारियों के बारे में लोगों को जागरुक करता रहा है। 11
सत्यमेव जयते टीवी शो के माध्यम से आमीर खान ने जेनरिक दवाइयों को लेकर जन-जागरुकता फैलाने का काम किया…

मेडिकल साइंस में सेकेंड ओपिनियन का बहुत बड़ा महत्व है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए एबीपी न्यूज ने सेकेंड ओपिनियन नामक सत्य घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम दिसंबर, 2012 में दिखाया था। 12 इसके अलावा सरकारी गैरसरकारी स्तर पर लोगों को जागरुक करने के लिए यात्राएं भी निकाली जाती रही हैं। हाल ही में भारत के कुछ युवाओं ने 21000 किमी की स्वस्थ भारत यात्रा निकाली थी। इसमें उन्होंने देश भर में घूमकर लोगों को स्वास्थ्य-चिंतन के बारे में जागरुक किया। 20 सदस्यों का एक यात्री दल मानसिक स्वास्थ्य को लेकर देश भ्रमण पर निकला हुआ है। इसी तरह पिछले दिनों ‘अंकूर अरोड़ा मर्डर केश’ नामक एक हिन्दी फीचर फिल्म प्रदर्शित हुई थी, जिसमें मेडिकल निगलीजेंस को फिल्माया गया था। सत्यमेव जयते में आमीर खान ने जेनरिक मेडिसिन पर लोगों को जागरुक करने वाले कार्यक्रम किए।
एबीपी न्यूज ने एक टीवी शो सेकेंड ओपेनियन के नाम से दिखाया था, जिसका बहुत ही सकारात्मक प्रभाव आम लोगों पर पड़ा

इसी तरह रांची से निकलने वाला दैनिक पत्र प्रभात खबर ने ‘डॉक्टर कथा’ नाम से कई स्टोरी प्रकाशित की थी ताकि लोगों को उनके स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों के प्रति सचेत किया जा सके। www.swasthbharat.in एवं www.medicarenews.in जैसे वेब मंच लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करने लिए निजी रुप से लगे हुए हैं। सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण पिछले पांच वर्षो में स्वास्थ्य रिपोर्टिंग में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
 
उपभोक्ता-उत्तरदायित्व
उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकारें लगातार उपाय करती रही हैं। लेकिन यहां पर यह भी जरूरी है कि उपभोक्ता अपने उत्तरदायित्व को भी समझे। इसे निम्न बिन्दुओ से समझा जा सकता है।
स्वयं सहायता का दायित्व : ग्राहकों को कोई भी सामान खरीदने के पूर्व उससे संबंधी जानकारी प्राप्त कर लेना चाहिए। दुकानदार को अंतिम सोर्स मानने की भूल ग्राहक को नहीं करनी चाहिए। शुरू से ही जागरूक हो जाना एवं अपने आपको तैयार कर लेना हानि होने अथवा क्षति पहुंचाने के पश्चात उसका निवारण करने से, सदा श्रेष्ठ होता है।
लेन-देन का प्रमाण : उपभोक्ता का दूसरा दायित्व क्रय का प्रमाण एवं स्थायी वस्तुओं के क्रय से संबंधित प्रपत्रों को प्राप्त करे एवं उसे सुरक्षित रखे। जैसे अगर आपने कोई दवा खरीदी है तो उसका पक्का बिल जरूर लें ताकि बाद में जरूरत पड़ने पर आप कंपनी अथवा दुकानदार को उपभोक्ता फोरम में चैलेंज कर सकें।
उचित दावा : उपभोक्ता का एक और दायित्व, जो उसे मस्तिष्क में रखना चाहिए, है कि शिकायत करते समय एवं हानि अथवा क्षति होने पर उसकी पूर्ति का दावा करते समय अनुचित रूप से बड़ा दावा नहीं करें। कभी-कभी उपभोक्ता अपने निवारण के अधिकार का उपयोग न्यायालय में करता है। ऐसे भी मामले सामने आये हैं जिनमें उपभोक्ता ने बिना किसी उचित कारण के क्षतिपूर्ति की बड़ी राशि का दावा किया है।13
स्वास्थ्य संबंधी सूचना के विभिन्न सरकारी मंच
स्वास्थ्य संबंधी सरकारी जानकारी का उत्तम श्रोत

सरकार ने विभिन्न माध्यमों से लोगों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पहुंचाने के प्रयास किए हैं। मोबाइल एप, वेबपोर्टल एवं टोल फ्री नंबरों के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को सुनने एवं उसके समाधान के दिशा में सरकार के ये प्रयास बेहतरीन है। इसे आप भी जानें-
यहां पर आपको यह पता चल जायेगा कि किस दवा की सरकारी कीमत क्या है…

 राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल- भारत सरकार ने राष्टीय स्वास्थ्य पोर्टल की शुरूआत की है जहां पर स्वास्थ्य संबंधी सभी जानकारियां उपलब्ध कराई जा रही है। इतना ही नहीं यदि स्वास्थ्य संबंधी कोई जानकारी प्राप्त करनी हैं तो राष्ट्रीय हेल्प लाइन संख्या-1800-180-1104 पर संपर्क किया जा सकता हैं। अंग्रेजी, हिंदी, तमिल, बांग्ला एवं गुजराती भाषा में यहां से सूचना प्राप्त की जा सकती है। 14
 अगर स्टेंट की कमी का मामला कहीं सामने आता हैं तो आप सीधे इसकी सूचना/शिकायत 1800-111-255 पर दी जा सकती है।15
 फार्मा संबंधी समस्याओं की शिकायत करने के लिए भारत सरकार के रसायन मंत्रालय के अधिन आने वाले राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण ने फार्मा जन समाधान कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत आप 1800-111-255 पर फोन कर के अपनी समस्या जैसे दवा नहीं मिलना, दवाइयों पर ओवरचार्जिंग जैसे मुद्दों को पंजीकृत करा सकते हैं।16
यहां पर आप स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को प्राप्त कर सकते हैं

 स्वस्थ भारत मोबाइल एप- भारत सरकार ने एक एप बनाया है, जिसमें स्वास्थ्य संबंधी सुझाव एवं बीमारियों के लक्ष्णों को बताया गया है। इस एप को आप इस लिंक (https://www.nhp.gov.in/mobile-app-swasth) पर जाकर डाउनलोड कर सकते हैं अथवा गुगल प्ले स्टोर से भी इसे डाउनलोड किया जा सकता है।17
 फार्मा सही दाम- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने फार्मा सही दाम के नाम से एक सर्च इंजन (http://nppaindia.nic.in/nppaprice/pharmasahidaamweb.aspx) बनाया हैं जहां पर आप जाकर दवाइयों के राष्ट्रीय मूल्य को जान सकते हैं। इसी नाम से मोबाइल एप भी बनाया गया है जिसे आप इस लिंक (https://play.google.com/store/apps/details?id=com.nic.app.searchmedicineprice) से डाउनलोड कर सकते हैं। कई बार आपसे तय मूल्य से ज्यादा कीमत वसूली जाती है। ऐसे में यह ऐप बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है।18
 राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन- भारत सरकार ने उपभोक्ताओं के अधिकारों के हनन के संबंध में शिकायत करने के लिए जागो ग्राहक जागों कैंपेन के तहत राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन शुरु किया है। कोई भी उपभोक्ता जिसे लगता है कि उसके साथ धोखाधड़ी हुई है वो 1800-11-4000 इस नंबर पर शिकायत कर सकता है। 19
अन्य महत्वपूर्ण हेल्पलाइन्स (20)

• नेशनल टोबैको क्वीट लाइन-1800-11-2356
• किलकारी एमहेल्थ सेवा-1800-3010-1703। ध्यान रहे झारखंड, उडीसा, उत्तरप्रदेश उत्तराखंड एवं मध्यप्रदेश तथा राजस्थान के कुछ जिलों में ही यह सेवा अभी लागू है।
• आशा मोबाइल अकादेमी-1800-3010-1704। ध्यान रहे यह न. झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं उत्तराखंड के लिए ही वैध है)
• टीबी कंट्रोल प्रोग्राम मिस्ड कॉल सेंटर-1800-11-6666। यह न. पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ एवं दिल्ली के लिए वैध है।
• एड्स हेल्पलाइन-1097
• एंटी प्वाजन हेल्प लाइन-1066
• एंबुलेंस हेल्पलाइन-102
निष्कर्ष
स्वास्थ्य का क्षेत्र बहुत बड़ा है। इस क्षेत्र में आर्थिक लेन-देन का दायरा भी व्यापक है। ऐसे में जब तक उपभोक्ता अपने अधिकारों एवं दायित्वों के प्रति जागरुक नहीं हो जाता है, तब तक भारत में स्वास्थ्य की स्थिति में बेहतर सुधार की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। बीमार होने से अच्छा है की बीमार न पड़े इसके लिए काम किए जाएं। ऐसे में अगर हम सभी अपने-अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरुक हो जायेंगे तो निश्चित रूप से हम गांधी के स्वस्थ भारत के सपने को पूर्ण कर पाएंगे। दरअसल स्वास्थ्य केवल सरकार का मसला नहीं है बल्कि यह हम सबका अपना मामला है। स्वास्थ्य को प्राथमिक स्तर से एक विषय के रूप में गर पढाना शुरू किया जाए, तो यह स्वास्थ्य जागरुकता एवं स्वास्थ्य उपभोक्ता जागरुकता की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हो सकता है।
———————————————————————————————–
संदर्भ-
1- http://www.nppaindia.nic.in/
2- www.swasthbharat.in
3,4,5,6,8,9-https://archive.india.gov.in/hindi/sectors/health_family/index.php?id=8
7,10-www.swasthbharat.in
11-https://www.youtube.com/watch?v=YclpJWSmUb0
12-http://swasthbharat.in/category/sba-videos
13https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE
14-https://www.nhp.gov.in/national-health-helpline-toll-free-number-1800-180-1104-nhp-voice-web_pg
15-http://www.newsbharati.com/Encyc/2017/5/4/Stents-Shortage
16-http://www.nppaindia.nic.in/
17- https://www.nhp.gov.in
18-http://www.nppaindia.nic.in/
19-http://www.nationalconsumerhelpline.in/online-complaint-system.aspx
20- https://www.nhp.gov.in/national-help-lines-_pg

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