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स्वस्थ भारत के लिए जरूरी है गौसंरक्षण

गाय के स्वास्थ्य संबंधी पहलू इतने ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि अगर एक बार इसे समझ जाएँ तो धार्मिक पक्ष आड़े नहीं आयेगा। अंग्रेजों ने भारत को बीमार करने और संसाधनों की लूट में ऐसा जहर बोया कि गाय के व्यापारिक पक्ष एवं गुंडा तत्व ने अन्य लाभ पीछे करवा दिये। गाय से जुड़े स्वास्थ्य संबन्धित विभिन्न वैज्ञानिक पक्षों को समझने के बाद हम गाय का आर्थिक मॉडल समझ जाते हैं। अमित त्यागी के यह आलेख इंगित कर रहा है कि  अगर हम गौ संवर्धन पर ध्यान दे पाये तो गौसंरक्षण खुद ब खुद हो जायेगा एवं भारत स्वस्थ भी हो जाएगा।- संपादक

अमित त्यागी
बेहतर स्वास्थ्य के क्रम में रसायन मुक्त खाद्य पदार्थ, शुद्ध आहार एवं शाकाहार महत्वपूर्ण तत्व है। इन सभी पक्षों की बात करते समय गाय के वैज्ञानिक पक्ष  पर चर्चा जरूरी हो  जाती है। गाय के प्रति हिन्दुस्तानी जनमानस में गर श्रद्धा का भाव है तो इसके  पीछे सिर्फ धर्म ही कारक नहीं है बल्कि तमाम वैज्ञानिक कारण निहित हैं। गाय के गोबर एवं गौमूत्र में असंख्यक जीवाणु होते हैं जो मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। कृषि के संदर्भ में यह जीवाणु खेती को पल्लवित करने वाले कारक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गाय के दूध में उपस्थित तत्व अन्य दूध की अपेक्षा ज़्यादा पौष्टिकता एवं ताजगी प्रदान करते हैं इसलिए गाय को माता का दर्जा दिया गया। सिर्फ हिन्दू धर्म में ही गाय पूजनीय हो ऐसा नहीं है, मुस्लिम धर्म के जानकारों के अनुसार हदीस में भी गाय के दूध को शिफा एवं गोश्त को नुकसानदेह बताया गया है।
अंग्रेजों ने बोये बीज़, काट रहे हैं हम
भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देने में अंग्रेजों ने अहम भूमिका निभाई। जब सन् 1700 ई. में अंग्रेज़ भारत में व्यापारी बनकर आए थे, उस वक्त तक यहां गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था। हिन्दू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते, लेकिन अंग्रेज़ इन दोनों ही पशुओं के मांस का सेवन बड़े चाव से करते हैं। भारत मे पहला कत्लखाना 1707 ईस्वी ने रॉबर्ट क्लाइव ने खोला था। उस समय हजारों  गाए काटी जाती थी और उनका मांस एक्सपोर्ट किया जाता था। 18वीं सदी के आखिर तक बड़े पैमाने पर गौ हत्या होने लगी। यूरोप की ही तर्ज पर अंग्रेजों की बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों ने देश भर में कसाईखाने बनवाएं। गौ-हत्या और सुअर-हत्या की वजह से अंग्रेज़ों को हिन्दू और मुसलमानों में फूट डालने का भी मौका मिल गया। अंग्रेजों के शासनकाल में गाय-बैलों का दुर्दांत कत्ल आरम्भ हुआ और गोवंश का मांस, चमड़ा, सींग, हड्डियां बड़े लाभ वाले व्यवसाय बन कर उभरे। ब्रिटिश फ़ौज में गोमांस पूर्ति हेतु  ब्रिटिश सरकार ने मुस्लिम कसाइयों को इस धंधे में लगाया ताकि हिन्दू-मुसलामानों का आपस में बैर बढे। अगर हम इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटते हैं तो पता चलता है कि बाबरनामे में दर्ज एक पत्र में बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को नसीहत देते हुए कहा था कि तुम्हें गौहत्या से दूर रहना चाहिए। ऐसा करने से तुम हिन्दुस्तान की जनता में प्रिय रहोगे। इस देश के लोग तुम्हारे आभारी रहेंगे और तुम्हारे साथ उनका रिश्ता भी मजबूत हो जाएगा। आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र ने भी 28 जुलाई 1857 को बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था। साथ ही यह भी चेतावनी दी थी कि जो भी गौ-हत्या करने या कराने का दोषी पाया जाएगा उसे मौत की सज़ा दी जाएगी। उस समय गौ-हत्या के खिलाफ अलख जगाने का काम करने वाले उर्दू पत्रकार मोहम्मद बाकर को बगावती तेवरों के लिए मौत की सजा सुनाई गयी थी।
गौवंश का संरक्षण नहीं संवर्धन है समस्या का हल :
क्या दूध न देने वाली गायों के लिए हम आर्थिक लाभ के नज़रिए से हटकर गौशालाओं  की व्यवस्था करने को तैयार हैं ? और इन सबसे बड़ा सवाल, क्या हमारी सरकार गौरक्षा एवं विकास विषय को अपनी प्राथमिकता-सूची में लाकर केन्द्रीय कानून बनाकर स्वास्थ्य की दृष्टि से गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने को तैयार है? हम लोग चर्चाओं में गौ संरक्षण की बात करते हैं। गौ-संरक्षण तो समस्या का उपचार प्रदान कर रहा है। क्यों न हम ऐसा ढांचा विकसित कर लें जिसमे गाय हमारी जीवन शैली का हिस्सा बन जाये। प्राचीन समय में जीवन की औसत आयु आज की औसत आयु से काफी ज़्यादा थी। लोग मांसाहार से दूर थे क्योंकि उन्हे दाल एवं  गाय के दूध से भरपूर प्रोटीन और अन्य तत्व मिलते रहते थे।  ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सरकारी स्तर पर गाय की उपयोगिता के आधार पर एक बिज़नस मॉडल बने और लोग खुद ब खुद गौ संरक्षण को मजबूर हो जाएं। गौ आधारित उत्पादों की स्वास्थ्य के संदर्भ में उपयोगिता समझना जरूरी है।  इसके लिए सबसे पहले हमें खेती से गाय को जोड़ना होगा। गौ आधारित ज़ीरो बजट कृषि पर लौटना होगा। पदमश्री सुभाष पालेकर जी इस पद्धति  के द्वारा वृद्ध और कमजोर गायों को भी उपयोगी बना देते हैं। जरूरत इस बात की है कि उनके इस पद्धति का प्रचार-प्रसार किया जाए।

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