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चिंतन चौपाल

डिजिटल इंडिया को कुपोषण की चुनौती …

 मेक इन इंडिया,डिजिटल इंडिया,स्वच्छ भारत अभियान जैसे कई कार्यक्रमों को फॉलो कर रही राज्य सरकार जनस्वास्थ्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले से नजरें चुराए बैठी है..जब राज्य का भविष्य ही सांस बचाने की कवायद में लगा हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा..?

जयपुर / 25.10.2015 
डिजिटल होने जा रहे इंडिया का एक खौफ़नाक सच हैं कुपोषण…राजस्थान के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो बेहद शर्मनाक स्थिति सामने आ रही हैं। 1179 करोड़ रूपयों के वार्षिक खर्च के बावजूद प्रति हजार में से 74 बच्चे पांच साल से पहले ही कुपोषण के कारण अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। पिछड़े कहे जाने वाले बिहार,झारखंड और छत्तीसगढ़ भी पोषण के मामले में राजस्थान से कहीं आगे हैं..होने को तो प्रदेश में 147 कुपोषण उपचार केन्द्र हैं जिनके उपर 100 करोड़ रूपए प्रति माह खर्च हो रहे हैं, ऐसे में कुपोषण के मामले में राज्य का पूरे देश में पांचवें स्थान पर रहना बहुत कुछ कह रहा हैं..यह सौ करोड़ रूपये कहाँ जा रहा है,इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं हैं। कई जगह तो ये केन्द्र बंद ही पड़े हैं ऐसे में कुपोषण से हारते बचपन को बचाने की सरकारी कवायद कैसे सफल होगी..? समझ से बाहर हैं।आंकड़े राज्य सरकार और चिकित्सा महकमें के निक्कमेपन को चीख-चीख कर बयां कर रहे हैं। शर्मनाक बात ये है कि मेक इन इंडिया,डिजिटल इंडिया,स्वच्छ भारत अभियान जैसे कई कार्यक्रमों को फॉलो कर रही राज्य सरकार जनस्वास्थ्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले से नजरें चुराए बैठी है..जब राज्य का भविष्य ही सांस बचाने की कवायद में लगा हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा..?
 

भारत के स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए कुपोषण एक बहुत ही बड़ा प्रश्नचिन्ह है...
भारत के स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए कुपोषण एक बहुत ही बड़ा प्रश्नचिन्ह है…

क्या है कुपोषण 
यह एक ऐस चक्र है जिसके चंगुल में बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही फंस जाते हैं। उनके जीवन की नियति दुनिया में जन्म लेने के पहले ही तय हो जाती है। यह नियति लिखी जाती है गरीबी और भुखमरी की स्याही से। इसका रंग स्याह उदास होता है और स्थिति गंभीर होने पर जीवन में आशा की किरणें भी नहीं पनप पाती हैं। कुपोषण के मायने होते हैं आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास न होना, एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूध करने लगता है। बहुत छोटे बच्चों खासतौर पर जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का हास होता है और छोटी-छोटी बीमारियां उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं।
कुपोषण वास्तव में घरेलू खाद्य असुरक्षा का सीधा परिणाम है। सामान्य रूप में खाद्य सुरक्षा का अर्थ है ”सब तक खाद्य की पहुंच, हर समय खाद्य की पहुंच और सक्रिय और स्वस्थ्य जीवन के लिए पर्याप्त खाद्य”। जब इनमें से एक या सारे घटक कम हो जाते हैं तो परिवार खाद्य असुरक्षा में डूब जाते है। खाद्य सुरक्षा सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर निर्भर करती है। भारत का उदाहरण ले जहां सरकार खाद्यान्न के ढेर पर बैठती है (एक अनुमान के अनुसार यदि बोरियों को एक के उपर एक रखा जाए तो आप चांद तक पैदल आ-जा सकते हैं)। पर उपयुक्त नीतियों के अभाव में यह जरूरत मंदों तक नहीं पहुंच पाता है। अनाज भण्डारण के अभाव में सड़ता है, चूहों द्वारा नष्ट होता है या समुद्रों में डुबाया जाता है पर जन संख्या का बड़ा भाग भूखे पेट सोता है।
कुपोषण बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करता हैं। यह जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और 6 महीने से 3 वर्ष की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है। इसके परिणाम स्वरूप वृध्दि बाधिता, मृत्यु, कम दक्षता और 15 पाइंट तक आईक्यू का नुकसान होता है। सबसे भयंकर परिणाम इसके द्वारा जनित आर्थिक नुकसान होता है। कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10-15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5-10 प्रतिशत तक कम कर सकता है। कुपोषण के कारण बड़ी तादाद में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। कुपोषित बच्चे घटी हुई सिखने की क्षमता के कारण खुद को स्कूल में रोक नहीं पाते। स्कूल से बाहर वे सामाजिक उपेक्षा तथा घटी हुई कमाऊ क्षमता तथा जीवन पर्यंत शोषण के शिकार हो जाते है। इस कारण बड़ी संख्या में बच्चें बाल श्रमिक या बाल वैश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाते हैं। बड़े होने पर वे अकुशल मजदूरों की लम्बी कतार में जुड़ जाते हैं जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बनता है।
 
 

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