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बेटियों के मसीहा डॉ. गणेश राख से मीलिए…

करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान॥

इस दोहे से जुड़ी कहानी को विद्यार्जन करने वाले लगभग विद्यार्थी जानते ही होंगे। एकं मंद बुद्धि के बालक से पंडित वरदराज बनने की यह कहानी सिर्फ कहानी नहीं है बल्कि सफलता का एक मूल सूत्र है। इस सूत्र को जो अपना लेता है उसे अपने कर्म-पथ पर पढ़ने से कोई रोक ही नहीं सकता। ऐसे ही एक कर्मयोगी हैं डॉ.गणेश राख, पुणे में अपना अस्पताल चला रहे हैं। जिनकी आंखों में नींद नहीं, शरीर में थकान नहीं बल्कि चेहरे पर एक दिव्य आभा है। उनके संपर्क में जो आया वह उनके सकारात्मक औरा में खुद को समर्पित किए बिना नहीं सका। 40 वर्षीय डॉ. राख एक जुनून का नाम है, जो बेटी बचाओं अभियान के संदेश को पूरे देश में फैलाना चाहता है। डॉ.राख एक ऐसे डॉक्टर हैं जो पुणे स्थित अपने अस्पताल में बेटी होने पर फी नहीं लेते, बेटी होने पर जश्न मनाते हैं, मिठाइयां बंटवाते हैं। गर डॉक्टर राख ऐसा कर पा रहे हैं तो इसमें उनके संस्कारों का अहम् योगदान है। कूली की नौकरी करने वाले उनके पिता आदीनाथ विट्ठल राख ने अपने बच्चे को पढाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। हमेशा कहते रहे कि तुम पढ़ो। ज्यादा पैसे की जरूरत होगी तो काम के घंटे को बढ़ा लूंगा। ऐसे मेहनतकश परिवार के घर 7 मई 1975 को इस होनहार-वीर्यवान बालक का जन्म हुआ। जन्म के ढेड महीने के बाद ही देश में 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा हो गयी। इस बालक की परवरीश में आपातकाल के 21 महीनों ने भी अपने संस्कार निश्चित रूप से छोड़े होंगे। समय बितता गया और सन् 2003 में डॉ. राख की माता श्री सिंदु आदीनाथ व पिता आदीनाथ ने इनकी शादी ट्रुप्ती गणेश राख से कर दी। समय आगे बढ़ा और 2006 में डॉ. राख दंपत्ति को एक पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम तनीषा रखा गया। बेटी को पाकर खुशियों से झूमने वाले डॉ. राख आज ‘बेटी बचाओ आंदोलन’ के एक बड़े संदेशवाहक बने हुए हैं। उनकी कर्म-यात्रा पर विस्तार से बातचीत की स्वास्थ्य कार्यकर्ता व पत्रकार आशुतोष कुमार सिंहडॉ. गणेश राख ने। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंशः-
 

डॉ. गणेश राख बेटी बचाओ आंदोलन के प्रणेता
डॉ. गणेश राख बेटी बचाओ आंदोलन के प्रणेता

डॉ. सबसे पहले मैं आपको अपनी पत्रिका की ओर से आपके अभियान के लिए ढेर सारी शुभकामना देता हूं। और बातचीत की शुरूआत आपकी बेटी से ही करता हूं। डॉ. साहब आप अपनी बेटी को क्या बनाना चाहते हैं?
शुक्रिया आशुतोष जी, मेरी बेटी अभी 9 वर्ष की है। पढ़ रही है। एक डॉक्टर होने के नाते मेरी ख्वाहिश तो यही है कि वो भी डॉक्टर बने। लेकिन मैं अपनी ख्वाहिश उस पर थोप नहीं सकता। आगे चलकर उसे जो भी बनना होगा मैं उसे सहयोग करूंगा। मैं बेटी को आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं। बढ़े, पढ़े खुशहाल रहे। किसी भी पिता की यही तमन्ना होती है और मेरी भी है।
डॉ. साहब जैसा कि आपको पता है यह साक्षात्कार आइएएस की तैयारी करने वाले ज्ञानार्थियों के लिए ले रहा हूं। आप एक डॉक्टर हैं। समाज में फैले बीमारियों को समझते हैं और उसका ईलाज करते हैं। उसी तरह प्रशासनिक अधिकारी भी समाज में फैले सामाजिक बुराइयों को खत्म करने का संकल्प लेकर इस प्रोफेशन को चुनते हैं। अपने संकल्प के साथ पढ़ाई करने वाले छात्रों में से कुछ लोग ही प्रशासनिक अधिकारी बन पाते हैं बाकी अपने कोअसफलमानते हैं। इस फिनोमिना को आप किस नज़रिए से देखते हैं?
प्रशासनिक सेवा में काम करने वालों को सरकार द्वारा प्रदत्त एक विशेष कार्य-पद्धति के अंतर्गत अपनी सेवा देनी होती है, वे देते भी हैं। लेकिन जो छात्र कथित रूप से आइएएस बनने में‘असफल’हो जाते हैं, उन्हें निराश होने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। इस समाज में करने के लिए बहुत कुछ है। आखिर में आप अधिकारी इसिलिए तो बनना चाहते थे कि आप समाज की सेवा कर सकें। अधिकारी बने बिना भी तो आप समाज की सेवा कर सकते हैं। आपके पास जो ज्ञान है उसका उपयोग आप समाज में सकारात्मक ऊर्जा फैलाने में लगा सकते हैं। कोई भी समाज आपको अच्छा काम करने से नहीं रोक सकता। आपके लिए सारा आकाश खुला हुआ है। किधर भी काम कर सकते हैं। काम करने वालों को भला किसी ने रोका है। बस जरूरत है कि आप जो भी करें ईमानदारी पूर्वक सच्चे दिल से करें। मैं मानता हूं सच्चाई की राह में अवरोध आते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मंजिल मिलेगी नहीं…बस कदम तो बढ़ाएं हम। समस्याएं हमेशा समाधान लेकर आती हैं। जिस तरह किसी वायरस का एंटीवायरस बनता है उसी तरह समाज में भी यह ताकत होता है कि वह समस्याओं का निदान प्रस्तुत कर सके। बस उसे सही संदर्भ में देखने-समझने की जरूरत है। जिस तरह मैं औषधीय चिकित्सक हूं उसी तह आप सोशल डॉक्टर (सामाजिक चिकित्सक) हो सकते हैं।
आइएएस की तैयारी करने वाले छात्र अमूमन 18-20 घंटे तक पढ़ाई करते हैं, चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ रहने के लिए उन्हें क्या सलाह देंगे?
जो काम दिल से किया जाता है, वहां पर समय कोई समस्या उत्पन्न नहीं करता है। जैसे मैं खुद दिन रात अपने अस्पताल में लगा रहता हूं। 18-20 घंटे अस्पताल में ही निकलते हैं लेकिन मुझे कभी थकान महूसस नहीं होता है। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि आप जब अपने सपने को जी रहे होते हैं तो आपको किसी चिकित्सकीय सहयोग की जरूरत नहीं पड़ती। यदि आप दिल से काम कर रहे हैं तो आपका स्वास्थ्य वैसे भी अच्छा ही रहेगा।
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डॉ. साहब पिछले दिनों आपको सदी के महानायक बीग बी यानी अमिताभ बच्चन जी के साथ टीवी स्क्रीन पर आने का मौका मिला। उनके साथ का अनुभव कैसा रहा?
अमिताभ बच्चन जी को काम करते हुए देखकर बहुत कुछ सीखने को मिला। 73 वर्ष की आयु में भी वे 17-18 घंटे काम करते हैं। उनकी फूर्ती व ऊर्जा कमाल की है। वैसे मैं आपको बता दूं अमिताभ बच्चन का मैं बहुत बड़ा फैन रहा हूं। उनकी एक-एक फिल्म 50-50 बार देख चुका हूं। उनके प्रति मेरी दिवानगी का आलम यह था कि जब मैं पांचवी में पढ़ता तब अमीत जी की फिल्म मर्द की शूटिंग चल रही थी। मैं उनके इंतजार में 5-6 दिनों तक शूटिंग स्थल पर जाता रहा, लेकिन इस बीच उनका कोई सीन नहीं था अतएव वो आए नहीं। वैसे बॉलीवुड में मेरी कोई पहचान थी नहीं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि अमिताभ बच्चन जी के साथ मुझे समय बिताने का समय मिलेगा।
बेटी बचाओ आंदोलन ने आपको एके नई पहचान दी है, इस पहचान से कितना  रोमांचित है?
बेटियों के लिए कुछ कर के मुझे खुद में आनंद की अनुभूति होती है। मैंने तो अपनी खुशी के लिए यह कार्य शुरू किया था। देखते-देखते यह अभियान की शक्ल ले लेगा यह मैंने सोचा नहीं था। मैंने यह कहा सोचा था कि कभी अमिताभ बच्चन जी के आमने-सामने बैठूंगा या आप जैसे मित्र दिल्ली से आकर मुझसे बात करेंगे। निश्चित रूप से इस पहचान ने मेरे आनंदित मन को और प्रफुल्लित किया है।
डॉ. साहब आपके प्रेरक कौन हैं?
मेरे लिए मेरे पिताजी सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं। उनकी मेहनत व तपस्या का फल है कि मैंने जो सोचा, उस दिशा में कुछ कर पा रहा हूं।
आपके इस अनुष्ठान में आपकी पत्नी का कितना योगदान है?
जब हमने अपने पुणे स्थित मेडिकेयर अस्पताल में बेटी होने पर फी न लेने की घोषणा की तो मेरी पत्नी डर गयीं थी। उन्हें लगा था कि अस्पताल का खर्चा कैसे चलेगा। लेकिन धीरे-धीरे उनका डर निकल गया है। अब वे जी-जान से इस कैंपेन की हिस्सा हैं। सच कहता हूं उनका सहयोग न मिला होता तो शायद आप मुझसे बात नहीं कर रहे होते।
रीयल हीरो डॉ. गणेश राख
रीयल हीरो डॉ. गणेश राख

आपको बेटी बचाओ अभियान की प्रेरणा कहाँ से मिली आखिर ऐसी क्या सूझी की आप बेटी बचाने निकल पड़े?
सबसे पहले हमें देखना होगा की आखिर गर्भ में बेटियों को मार कौन रहा है! किसे पता होता है की गर्भ में बेटा है या बेटी? जाहिर है डॉक्टर का नाम सबसे पहले आता है। जब -जब कन्या भ्रूण हत्या की मामले आते है तब-तब एक डॉक्टर चिकित्सकीय नैतिकता को ताक पर रखा होता है। सेवा भाव से परे चंद पैसों के लिए अपनी कसम तोड़ी होती है। आज जितनी भी बेटियां जन्म लेने से पहले गर्भ में ही मार दी गई हैं उन सबके पीछे किसी न किसी डॉक्टर का ही हाथ है। मेरा मानना है की कन्या भ्रूण हत्या की शुरूआत जब डॉक्टर ने ही की तो इसे ख़त्म भी डॉक्टर ही करेंगे! ऐसे में मैंने तय किया इस कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाऊंगा। मैंने अपने पिता को जब यह बात बताई तो उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए अपना आशीर्वाद दिया। और फिर शुरू हुआ मंजिल पाने तक न रूकने वाला एक अभियान जिसका नाम है ‘बेटी बचाओ अभियान…’
इस आर्थिक युग में डिलेवरी चार्ज न लेना, सुनने वालों को विश्वास नहीं होता। आखिर आपके मन में ऐसी कौन-सी बात खटकी कि आपने लड़की होने पर फी न लेने की ठानी?
मैं अक्सर नोटिस करता था कि जब मेरे अस्पताल में कोई लड़का जन्म लेता है तो माता-पिता पेमेंट देने में तनिक भी नहीं हिचकते। कई बार तो साथ आये रिश्तेदार भी पैसे देने लगते हैं। वहीं दूसरी तरफ जब बेटी के जन्म की सूचना दी जाती थी तो उनके चेहरे पर मायूसी छा जाती। कई बार तो ऐसा हुआ की बेटी के जन्म होने पर परिजन पेमेंट में डिस्काउंट मांगते थे या फिर फी देने में आनाकानी तक करते थे। बेटी होने की खबर मात्र से कईयों का व्यवहार इतना चिड़चिड़ा हो जाता कि अस्पताल कर्मचारियों से भी उलझ बैठते थे। कई बार अस्पताल के कर्मचारी हिंसा के भी शिकार हुए हैं। अस्पताल कर्मचारियों के लिए तो बेटी होने कि सूचना देना अपने आप में चुनौती भरा काम था। ऐसा लगता मानो कोई अप्रिय सूचना दे रहे हों। पिताजी की सहमति मिलते ही मैंने अपने अस्पताल के कर्मचारीयों को जब बेटी होने पर फ्री डिलेवरी वाला आईडिया सुझाया तो पहले तो वे नाराज़ हुए फिर सबने अपनी सहमति जता दी और तन मन से लग गए।
तो आपको नुकसान की चिंता नहीं हुई? अपने कर्मचारिओं का वेतन अस्पताल का खर्च वगैरह
सबसे पहले तो यह बताऊँ की मुझे अपने अस्पताल के कर्मचारीयों पर गर्व है। बगैर उनके सहयोग से मैं ‘बेटी बचाओ अभियान’के बारे में सोच भी नहीं सकता था। उनके बगैर एक कदम नहीं बढ़ पाता। मेरे सारे कर्मचारी इस बात से सशंकित थे की फ्री डिलेवरी वाले आईडिया से उनके वेतन में कटौती की जा सकती है। अस्पताल कर्मियों ने आपस में बातचीत कर अपना वेतन भत्ते की कटौती तक का प्रस्ताव खुद ही मेरे सामने रख दिया। हालांकि मैंने कर्मचारियों के वेतन में कटौती से मना किया। हाँ, कई बार बजट की समस्या आई। कई बार उन्हें देर से वेतन मिला। पर आज तक किसी कर्मचारी ने इसकी शिकायत नहीं की। चूँकि मेरे लिए वे केवल अस्पताल कर्मी नहीं बल्कि एक परिवार की तरह हैं।
बेटियों के जन्म पर खुशियां ही खुशियां और संग में मिठाइयां भी...
बेटियों के जन्म पर खुशियां ही खुशियां और संग में मिठाइयां भी…

सुना है बेटी होने पर आपके अस्पताल में उत्सव मनाया जाता है?
चूँकि बेटी के जन्म पर हमने मेहनत की है तो जाहिर है सबसे पहले उत्सव मनाने का हक़ भी हमें है। बेटी के जन्म पर केक काटे जाते हैं। गीत गाए जाते हैं। यहाँ तक की परिजनों को मिठाइयाँ भी अस्पताल ही खिलाता है। ये मौका हम नहीं छोड़ते (डॉ. साहब हंसते हुए)
हाल में ही आपने दहेज़ के लिए जलाई गई लड़कियों के लिए मुफ्त बर्न सेवा भी शुरू की है। चूँकि बर्न स्पेशलिस्ट डॉक्टर का खर्च, आईसीयू में महँगे मशीनो, कर्मचारियों, महँगी दवाई जैसे अन्य खर्च। पहले से ही नुकसान उठा रहे डॉ. गणेश राख ने एक और नुक्सान की शुरूआत की। नुक्सान उठाने के भी आनंद हैं, क्यों?
हमें मालूम है की आर्थिक नुकसान है। क्योंकि मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल है तो तरह-तरह के केस आते हैं। मेरे अस्पताल में जब दहेज़ के कारण जली हुई लड़कियों के केस आते है तो हमलोग मुफ्त इलाज़ करते हैं। हम और आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि उस माता-पिता की क्या स्थिति होती होगी जिसकी अपनी बेटी दहेज़ ना देने के कारण जला दी गई। अगर उसके पास पैसे होते तो वे अस्पताल तक ऐसी हालत में पहुँचते ही नहीं। ऐसे कामों में नुक्सान तो होता है पर खुशियां बहुत ज्यादा मिलती हैं। आपने सही कहा इस नुक्सान का अपना अलग ही आनंद है।
आपको क्या लगता है बेटियों को लेकर लोगों की मानसिकता में पहले की अपेक्षा कुछ बदलाव हुए हैं
निश्चित तौर पर सामाजिक जागरूकता बढ़ी है। माहौल तेज़ी से बदल रहा हैं। परन्तु आज भी लोगों में बेटे की चाहत ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है। हालत बदले जरूर हैं पर अब भी लिंग अनुपात को बराबर करने के लिए हर स्तर पर मेहनत करने की जरुरत है। ऐसे में सबकी सहभागिता जरूरी है।
मुलगी वाचवा (बेटी बचाओ अभियान) को लेकर आपकी क्या आशाएं हैं, आखिर बेटियों को बचाने का आपका सपना कैसे पूर्ण होगा?
देखिये, हम डॉक्टर इस बात से कभी इंकार नहीं कर पायेंगे की कन्या भ्रूण हत्या में हम डॉक्टरों का ही हाथ है। आज जब बेटियों को बचाने बात आई है तो डॉक्टर समुदाय को ही आगे आना होगा। मैं इस पत्रिका के माध्यम से देश के तमाम डॉक्टरों से अपील करता हूँ की अपने जीवन में कम से कम एक बेटी के जन्म पर कोई शुल्क न लें और उसके जन्म पर खुशियां बाँटे। एक डॉक्टर या अस्पताल के लिए एक डिलीवरी फ्री करना मुश्किल काम नहीं। यह बहुत छोटी-सी बात है पर इससे समाज में जागरूकता का सन्देश जायेगा। डॉक्टरी पेशे की छवि भी सुधरेगी ज्यादा आर्थिक नुक्सान भी नहीं होगा। बेटी होने पर एक फ्री डिलीवरी वाली मुहीम बेटी बचाओ अभियान को आगे बढ़ाने के लिए काफी मददगार होगी। मैं तो यही चाहता हूं कि बेटी के जन्म को सभी लोग उत्साह पूर्वक स्वीकार करें। मिठाइयां बांटे। खुशियां मनाएं। यदि यह भाव हम सभी में आ जायेगा तो यह अभियान व्यष्टिगत होते हुए समष्टिगत उद्देश्य को प्राप्त करेगा।
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नोटः डॉ. गणेश  राख का यह साक्षात्कार दृष्टि द विज़न करेंट अफेयर्स टुडे में प्रकाशित हो चुका है।
 

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1 comment

Devendra Nagwan February 18, 2016 at 3:31 pm

बेटी बचाने के लिए अपने आपको पूर्ण रूप से झोंकने वाले डॉ. गणेश राख के प्रयास वास्तव में काबिले तारीफ हैं, उनके इस कार्य से यदि देश के अन्य चिकित्सक भी प्रेरणा ले तो देश बेटियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का नया कीर्तिमान रच सकता हैं !
#SaluteDrRakh

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