कातिल डॉक्टर या सरकारी नीति!

इमरजेंसी के अनुभव से बदनाम होने और तमाम अध्ययनों के जरिए यह सचाई सामने आने के बाद कि ‘शिक्षा तथा खुशहाली ही सबसे कारगर गर्भनिरोधक हैं, पिछले अनेक वर्षो में सरकारी स्वास्थ्य व परिवार कल्याण तंत्र में नसबंदी के टाग्रेटों का आतंक काफी घट गया थाै पिछली सरकार ने तो बाकायदा नीति तय कर, कम से कम केंद्र की ओर से इस तरह की टाग्रेटिंग बंद करा दी थी लेकिन, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में नसबंदी संबंधी टाग्रेटों के इस आतंक की वापसी हो गयी लगती है

राजेंद्र शर्मा drug

जैसा कि अनुमान लगाया जा सकता था, छत्तीसगढ़ के नसबंदी कांड के सिलसिले में, डॉ आर के गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया है। डॉक्टर गुप्ता की ही देखरेख में, बिलासपुर जिले के गांव पेंडरी में निजी चिकित्सा शोध संस्था में लगाए गए शिविर में छह घंटे से भी कम समय में लैप्रोस्कोपिक विधि से 86 महिलाओं का नसबंदी ऑपरेशन किया गया था। इनमें से चौदह गरीब महिलाओं ने, जिनमें ज्यादातर आदिवासी थीं, दम तोड़ दिया, जबकि दर्जनों अन्य गंभीर दशा में अस्पतालों में भर्ती हैं। इस प्रकरण पर चौतरफा शोर मचने और खुद प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद, मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अस्पताल में भर्ती पीड़िताओं का हाल जानने के लिए बिलासपुर पहुंचने के बाद ऐलान किया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। और इसी के साक्ष्य के रूप में एक ओर पूरे प्रकरण की न्यायिक जांच के आदेश जारी कर दिए गए तो दूसरी ओर, डॉ गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया। वैसे डॉ गुप्ता तथा चिकित्सा विभाग में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत अन्य दो-तीन डाक्टरों को निलंबित तो पहले ही किया जा चुका था। लेकिन मुख्यमंत्री ने, इस भयावह प्रकरण के लिए राज्य के स्वास्थ्य मंत्री या स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से जांच के नतीजों की प्रतीक्षा के बहाने से इंकार कर दिया। उन्होंने दलील भी दी कि फिलहाल पहली प्राथमिकता पीड़ित महिलाओं को बचाने की है और स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे से इसमें कोई मदद नहीं मिलेगी। अचरज नहीं कि डॉ गुप्ता ने सरकार पर आरोप लगाया है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है। उनके आरोप से चाहे कोई सहमत न भी हो, तब भी कम से कम यह बात तो डॉ. गुप्ता समेत जिन डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की गयी है, उन पर भी लागू होती ही है कि उनके खिलाफ कार्रवाई से भी, पीड़ितों को बचाने में कोई मदद नहीं मिलेगी!

बेशक, इसका फैसला तो मुकम्मल चिकित्सकीय जांच के बाद ही हो पाएगा कि इस भयावह घटना के फौरी कारण क्या थे? वैसे लैप्रेस्कोपी जैसी बेहद सुरक्षित समझी जाने वाली विधि से इतनी बड़ी संख्या में मौतें होना, अनुमान से परे था। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ये मौतें ऑपरेशन की प्रक्रिया में चूक की वजह से हुई हैं या फिर जैसा कि डॉ गुप्ता का दावा है कि ऑपरेशनों के फौरन बाद तक सब ठीक-ठाक था। सारी गड़बड़ी उसके बाद दी गयी दवाइयों ने की है। राज्य सरकार ने उक्त दवाओं की आपूत्तर्िकर्ता लेकर, उनका स्थानीय रूप से उत्पादन करने वाली फर्मो तक पर छापेमारी की है। खबरों के अनुसार, दवा बनाने वाली फर्म पर छापेमारी में जल्दबाजी में दवाएं जलाए जाने के सबूत भी मिले हैं। वास्तव में शुरुआती जांच इस ओर इशारा करती बतायी गयी है कि नसबंदी के ऑपरेशन के बाद दी गयी दवा में चूहे मारने की दवा की मिलावट इसके लिए जिम्मेदार हो सकती है। ठीक-ठीक कारणों का पता पूरी जांच से ही चल पाएगा, पर ज्यादा संभावना इसी की है कि इस दुर्घटना में ऑपरेशन और ऑपरेशन के बाद, दोनों चरणों की गड़बड़ियों का योगदान रहा होगा। यह भी संयोग नहीं है कि खुद डॉ गुप्ता ने इतना तो माना है कि ऑपरेशन करने के बाद उनके पास, मरीजों को दी जा रही दवाओं को जांचने-परखने न व्यवस्था थी और न फुर्सत। याद रहे कि पूरे मामले पर मीडिया की रोशनी पड़ने के बाद, इन ऑपरेशनों की परिस्थितियों की जो जानकारियां सामने आयी हैं, वह अपने में काफी विचलित करने वाली हैं। आठ नवंबर को पेंडरी में लगा नसबंदी शिविर एक निजी चिकित्सकीय शोध केंद्र में लगाया गया था, जहां इतनी बड़ी संख्या में ऑपरेशनों के लिए जरूरी सुविधाओं का पूरी तरह अभाव था। यही नहीं, इसके दो दिन बाद, 10 नवंबर को पेंडरा में लगाया गया शिविर अर्से से बंद पड़े प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में लगाया गया, जहां आप्ॅारेशन के लिए महिलाओं को जमीन पर गद्दों पर लिटाकर ही काम चलाया जा रहा था। दूसरी सुविधाओं की बात छोड़ भी दी जाए तो, ऑपरेशन के बाद रोगी को इन्फेक्शन से बचाने के लिए जरूरी एहतियात बरतनी पड़ती है जिस पर किसी का कोई ध्यान नहीं था। बल्कि डॉ गुप्ता के बयानों के मुताबिक, जिस मशीन से ऑपरेशन किए जा रहे थे, उसकी हालत काफी खस्ता थी। वास्तव में एक ही लैप्रोस्कोप को ऑपरेशन के लिए अलग-अलग शिविरों में ले जाया जा रहा था, जो बहुत ही चिंतनीय है। इस सिलसिले में यह भी महत्वपूर्ण है कि मानक प्रक्रिया के अनुसार, लैप्रोस्कोप मशीन को एक के बाद दूसरे मरीज पर सुरक्षित तरीके से प्रयोग के लिए तैयार किए जाने में लगने वाले समय को मिलाकर, एक ऑपरेशन में कम से कम आधा घंटा लगना चाहिए। लेकिन, एक ही मशीन से डॉ गुप्ता ने पांच घंटे से कुछ ही अधिक समय में पेंडरी में 86 ऑपरेशन निपटाए यानी चार मिनट से कम समय में एक ऑपरेशन। यह भी गौरतलब है कि पेंडरी के शिविर में ऑपरेशनों के बाद बड़ी संख्या में मौत की खबरें आने और शासन के शिविर लगाने से रोकने के आदेश के बाद भी, पैंडरा- गैरोला में शिविर ही नहीं लगाया गया, बल्कि एक घंटे में 44 ऑपरेशन निपटाए गए यानी दो मिनट से भी कम समय में एक ऑपरेशन। अचरज नहीं कि इस शिविर के ऑपरेशन भी कुछ मौतों का कारण बने हैं। जाहिर है, शासन के दबाव-प्रोत्साहन- महिमामंडन के चलते ही, तमाम जरूरी सुविधाओं की तरफ से आंखें मूंद, शिविर लगा इस तरह से ताबड़तोड़ नसबंदी ऑपरेशन किए जा रहे थे। यह विडंबनापूर्ण सचाई है कि अब जेल में डाल दिए गए डॉ गुप्ता को मौजूदा छत्तीसगढ़ सरकार ने इसी गणतंत्र दिवस पर, पचास हजार नसबंदी ऑपरेशन करने की ‘असाधारण उपलब्धि’ के लिए सम्मानित किया था। याद रहे कि एक ऑपरेशन में आधा घंटे के मानक समय के हिसाब से डॉ गुप्ता चौबीस घंटे लगातार ऑपरेशन कर भी तीन साल से ज्यादा समय में ही इतने ऑपरेशन कर सकते थे। आठ घंटे की काम की शिफ्ट हों तो इसमें पूरे दस साल लगने चाहिए थे वह भी तब जब वह अपने काम का एक-एक पल, नसबंदी के ऑपरेशनों में ही लगा रहे होते!

इमरजेंसी के नसबंदी कार्यक्रम की याद दिलाने वाले बिलासपुर नसबंदी कांड के पीछे भी, दमनकारी उपायों से आबादी घटाने का इमरजेंसी वाला आग्रह काम करता दिख रहा था। सरकारों के स्वास्थ्य विभागों के पूरे तानेबाने पर ऊपर से नीचे तक नसबंदी के टाग्रेट थोपे जाना, इस दमनकारी नीति का मुख्य हथियार है। इमरजेंसी के अनुभव से इस तरीके के पूरी तरह बदनाम हो जाने और तमाम अध्ययनों के जरिए यह सचाई सामने आने के बाद कि ‘शिक्षा तथा खुशहाली ही सबसे कारगर गर्भनिरोधक हैं’, पिछले अनेक वर्षो में सरकारी स्वास्थ्य व परिवार कल्याण तंत्र में नसबंदी के टाग्रेटों का आतंक काफी घट गया था। पिछली यूपीए सरकार ने तो बाकायदा नीति तय कर, कम से कम केंद्र की ओर से इस तरह की टाग्रेटिंग बंद करा दी थी। लेकिन, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में टाग्रेटों के इस आतंक की वापसी हो गयी लगती है। इसी अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा आबादी पर अंकुश के लिए विशेष रूप से जोर वाले 11 राज्यों को भेजे पत्र में, इस आतंक- पल्रोभन की वापसी की पदचाप सुनी जा सकती है। इन राज्यों के लिए नसबंदी के लिए मरीज, डॉक्टर, सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, सभी के लिए भुगतानों में बढ़ोतरी की गयी है। बिलासपुर की घटना इसी का कुफल है। इस नीति को अगर इसी तरह आगे बढ़ाया जाता रहा, तो बिलासपुर जैसी घटनाओं का दुहराया जाना तय है। हां! शासन को शायद इससे बहुत फर्क भी न पड़े क्योंकि आखिरकार, ऐसे पल्रोभन-दबाव और लापरवाही की मार मुख्यत: गरीब ग्रामीण महिलाओं पर ही पड़ रही होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

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