पूर्वोत्तर राज्यों में पीसीआई के कायदे कानून कागजी खानापूर्ति

गुवाहाटी (असम)/ 30.11.2015

फार्मेसी जगत  में झूमा चौधरी तालुकदार की सक्रियता हमेशा से ही रही है। डिब्रुगढ़ जिले के मोरन टी स्टेट हॉस्पिटल में कार्यरत झूमा चौधरी अपने रूटीन कार्यों के निपटारे के साथ फार्मासिस्ट संगठनो के बीच भी सक्रीय रहती है। झूमा चौधरी की लोकप्रियता बिगत दिनों राष्ट्रीय फार्मासिस्ट अधिवेशन में देखने को मिली जब देश भर के फार्मासिस्ट  संगठनों के प्रतिनिधि दिल्ली पहुंचे थे। करीब 2443 किलोमीटर का सफर कर झूमा चौधरी की टीम शामिल हुई। एक महिला होने के बाद भी अपने वेवाक विचारों और तर्कों को बिभिन्न मंचों के साथ ही सोशल मीडिया में रखने के लिए झूमा को फार्मा जगत में आयरन लेडी भी कहते है।

असम समेत पूर्वोत्तर राज्यों में फार्मेसी की बात करें तो सबकुछ अस्त व्यस्त दिखता है। चाहे सरकारी अस्पताल हो, निजी नर्सिग या दवा की दुकान। हर तरफ अव्यवस्था का माहोल है। बड़ी ही आसानी से कोई भी शख्स दवा बाँट देता है। स्वस्थ भारत डॉट इन ने इस बावत असम की जानी मानी और सक्रीय महिला फार्मासिस्ट झूमा चौधरी तालुकदार से बात की। पेश है यह रिपोर्ट …

झूमा चौधरी तालुकदार (फ़ाइल फोटो)

झूमा चौधरी तालुकदार (फ़ाइल फोटो)

पूर्वोत्तर राज्यों में फार्मेसी के हालात में चिंता जाहिर करते हुवे झूमा बताती है कि फार्मेसी अन्य पेशों से हटकर हैं। मरीज़ों के साथ सीधा संबाद कर उन्हें दवा के साथ बीमारीयों से बचाव की जानकारी मुहैया कराना अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी का काम है। फार्मासिस्ट स्वस्थ व्यवस्था की अहम कड़ी है। बात असम की करें तो यहाँ दवा वितरण प्रणाली में ढेर सारी कमियां है। इसका सीधा असर आम जन से स्वस्थ पर पड़ता है। राज्य में फार्मेसी के बदतर हालत के लिए जितना ही दोषी सरकार है उतने ही यहाँ के  फार्मासिस्ट। असम के कई सरकारी और गैर अस्पतालों में फार्मासिस्ट नियुक्त ही नहीं किए गए है। बरसों से फार्मासिस्ट के कई पद लंबित है। कर्मचारियों को मिलने वाला पे ग्रेड अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है। ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट और फार्मेसी एक्ट में स्पस्ट है प्रावधान है कि बगैर फार्मासिस्ट दवा बांटना जुर्म है। वावजूद इसके सरकार कोई कठोर कदम नहीं उठा रही। एक तरफ पुरे असम में गैर फार्मासिस्ट दवा दुकानों का सञ्चालन कर रहे है, वही हज़ारों युवा फार्मासिस्ट बेरोजगार घूम रहे है। झूमा आगे बताते हुवे कहती हैं की हमारे संगठन ने कई बार सरकार से पत्राचार किया है। हाल में ही हाईकोर्ट में एक याचिका भी लगाई गई है, जिसपर हमारे पक्ष में फैसला भी आया है। फिर भी ना ही सरकार दिलचस्पी ले रही ना ही असम फार्मेसी काउंसिल। ऐसे में सरकार कि मंशा का साफ़ पता चलता है।

समस्या है तो समाधान भी हैं 

झूमा चौधरी तालुकदार ने कहा कि असम समेत पूर्वोत्तर राज्यों में बहुत समस्या हैं। देश के अन्य राज्यों की तुलना में यहाँ भ्रष्टाचार बहुत है। फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया, सेन्ट्रल स्टैंडर्ेड ड्रग कंट्रोल आर्गेनाईजेशन  या केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय,दिल्ली … पूर्वोत्तर राज्यों में कायदे कानून देर से पहुँचते है या यूं कहे की राजधानी दिल्ली का हस्तक्षेप यहाँ कागज़ी खानापूर्ति और रस्मअदायगी भर ही है। यहाँ की सरकार को चाहिए फार्मेसी मामले में सक्रियता बढ़ाये। समस्या तो हैं पर समाधान पर भी चर्चा होनी चाहिए। समाधान तभी मुंकिन है जब फार्मासिस्ट एकजुटता दिखायें । झूमा ने कहा की फार्मेसी पेशे की गरिमा बरक़रार रखने के लिए युवाओं को आगे आना होगा। लोकतंत्र में हर किसी को अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने की आजादी है। देश भर में फार्मेसी को लेकर आंदोलन चल रहे है। ऐसे में पूर्वोत्तर राज्यों के फार्मासिस्टों को भी चाहिए की फार्मासिस्ट संगठन से जुड़कर अपनी आवाज़ उठायें।

मध्यम वर्ग में पली बढ़ी झूमा चौधरी तालुकदार फ़िलहाल डिब्रुगढ़ स्थित टी गार्डन अस्पताल में कार्यरत है साथ ही फार्मासिस्ट संगठन के साथ जुड़कर जागरूकता अभियान चला रही हैं।

स्वास्थ्य जगत से जुड़ी खबर से अपडेट रहने के लिए स्वस्थ भारत अभियान के फेसबुक पेज को लाइक कर दें ।

0 replies

Leave a Reply

Want to join the discussion?
Feel free to contribute!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *