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दवा कंपनियों की मनमानी पर नकेल, 325 खिचड़ी दवाइयों पर प्रतिबंध

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आशुतोष कुमार सिंह

सवा अरब आबादी वाले भारत के सेहत का हाल बहुत ही बुरा है। न तो लोगों को अपनी सेहत का ख्याल है और न ही सरकार को। विगत 30 वर्षों में देश की दवा कंपनियों ने खिचड़ी दवा बनाकर देश की जनता को न केवल आर्थिक रूप से लूटा है बल्कि उनकी सेहत से भी खिलवाड़ किया है। इसी आलोक में 1988 से चली आ रही गड़बड़ियों को भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब जाकर कुछ हद तक दुरूस्त करने का काम  किया है। भारत में बन रहे एवं बिक रहे 325 ऐसी फिक्स डोज कंबिनेशन वाली दवाइयों को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है जो सेहत के  लिए हानीकारक थीं। इस प्रतिबंध से यह साफ हो गया है कि पिछले 30 वर्षों से दवा कंपनियां भारतीयों को किस तरह से झांसा देकर उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही थी।

14 सितंबर दवा कंपनियों के लिए काला दिन

14 सितंबर,2018 का दिन दवा कंपनियों के लिए काला दिन साबित हुआ। नई दिल्ली स्थित एफडीए भवन से एक चिट्ठी निकली। विषय में लिखा था-अधिसूचना एस.ओ.4379 (ई) से एस.ओ.4706 (ई) के संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा 328 फिक्स डोज कंबीनेशन को प्रतिबंधित करने के संबंध में। इस पत्र के निकलते ही दवा कंपनियों के मालिकों के होश उड़ गए। भारत के औषधि नियंत्रक डॉ.एस.ईश्वर.रेड्डी के हस्ताक्षर से निकले इस पत्र ने हड़कंप मचा दिया। इस पत्र में ड्रग कंट्रोलर ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत सरकार द्वारा 7.09.2018 को जारी गैजेट अधिसूचना एनओएस. एस.ओ.4379 (ई) से एस.ओ 4706 (ई) एवं ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के सेक्शन 26 ए के आलोक में 328 फिक्स डोज कंबिनेशन की दवा बनाना, बेचना एवं वितरित करना पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस पत्र में श्री रेड्डी ने स्पष्ट रूप से कहा कि औषधि तकनीक सलाहकार परिषद (DTAB) के अनुशंसा पर यह कदम उठाया गया है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि सलाहकार परिषद ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इन 328 फिक्स डोज कंबीनेशन में डाले गए तत्व या साल्ट का थिरैप्यूटिक (उपचारात्मक) उपयोग न्यापूर्ण नहीं है और मानव स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।

इस पत्र को देश के सभी फार्मा एवं केमिस्ट संगठनों, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, ड्रग कंट्रोल अधिकारियों के एसोसिएशन एवं सीडीएससीओ की वेबसाइट को प्रेषित किया गया है।

 2016 में ही इन दवाओं पर लगा था प्रतिबंध

गौरतलब है कि इससे पूर्व केंद्र सरकार ने 2016 के 10 मार्च को औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत मानव उपयोग के उद्देश्य से 344 एफडीसी के उत्पादन, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद सरकार ने समान प्रावधानों के तहत 344 एफडीसी के अलावा 5 और एफडीसी को प्रतिबंधित कर दिया था। हालांकि, इससे प्रभावित उत्पादकों या निर्माताओं ने देश के कई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से 15 दिसंबर, 2017 को सुनाए गए फैसले में दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए इस मसले पर दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड द्वारा गौर किया गया, जिसका गठन औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 5 के तहत हुआ था। इस बोर्ड ने इन दवाओं पर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी। दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड ने अन्य बातों के अलावा यह सिफारिश भी की कि 328 एफडीसी में निहित सामग्री का कोई चिकित्सीय औचित्य नहीं है और इन एफडीसी से मानव स्वास्थ्य को खतरा पहुंच सकता है। बोर्ड की सिफारिश थी कि औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत व्यापक जनहित में इन एफडीसी के उत्पादन, बिक्री या वितरण पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पिरामल की दर्द निवारक दवाई सेरीडॉन और दो अन्य दवाइयों- पिरिटन और डार्ट से फिलहाल प्रतिबंध हटा दिया है।

डीसीजीआई पर स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग ऑथोरिटी को बचाने का आरोप

सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए दवा मामलों के जानकार एवं उतराखंड के स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग ऑथोरिटी रह चुके हरे राम गुप्ता कहते हैं कि, फिक्स डोज कंबिनेशन पर प्रतिबंध बहुत पहले ही लग जाना चाहिए था। उनका कहना है कि उन स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग अधिकारियों को दंड दिया जाना चाहिए जिन्होंने बिना ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया की सहमति से न्यू ड्रग्स को बनाने एवं बेचने एवं वितरण करने की सहमति दी।

श्री गुप्ता ने सवाल उठाते हुए कहते हैं कि, जब तक स्टेट ड्रग कंट्रोलर बीएससी पास आदमी बनता रहेगा जिसे न तो फार्माक्लोजी मालूम है और न ही दवाइयों की महत्ता, तो इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहेगी। उन्होंने आगे कहा कि डीसीजीआई को स्टेट लाइसेंसिग ऑथोरिटी के लिए एक स्टैंडर्ड मानक बनाना चाहिए। इसके अभाव में राज्य की लाइसेंसिंग ऑथोरिटी बोरा भर कर दवाइयों का लाइसेंस गैर-कानूनी तरीके से देती रही हैं। उन्होंने डीसीजीआई पर आरोप लगाते हुए कहा कि डीसीजीआई स्टेट ड्रग लाइसेंसिंग ऑथोरिटी को बचाने का काम कर रही है।

इस बावत न्यूरो सर्जन डॉ. मनीष कुमार कहते हैं कि, यह फैसला सही हुआ है। दुनिया के देशों का हवाला देते हुए डॉक्टर मनीष कहते हैं कि भारत ही एक ऐसा देश हैं जहां पर इतनी खिचड़ी दवाइयां मिलती हैं। ऑर्थोपेडिक सर्जन एवं नी ट्रांस्प्लांट एक्सपर्ट के रूप में जाने जा रहे डॉ. अनुराग अग्रवाल का मानना है कि इस तरह की दवाइयां रेसीस्टेंसी को बढ़ा रही है। भोपाल के डॉ. सुनील निगम भी इस फैसले का स्वागत करते हुए कहते हैं कि निश्चित रूप से यह एक बेहतर फैसला है।

सोशल मीडिया पर सरकार के फैसले का स्वागत

किसी विषय को लेकर सोशल मीडिया का पर किस तरह की चर्चा चल रही है उसको देखकर उस विषय को समझना आसान हो जाता है। फिक्स डोज कंबिनेशन बैन मामले को लेकर भी दवा के जानकार फार्मासिस्ट, डॉक्टर्स एवं इससे संबंधित लोग अपनी बात खुल कर रख रहे हैं। फेसबुक पर दीपेश गौंड ने लिखा है कि  पता नही क्यों हमारे देश मे सिंगल साल्ट वाली दवा नहीं मिल पाती मजबूरी में कांबिनेशन ही खाना पड़ता है। उदाहरण के लिए कहूं तो अच्छे दर्द-निवारक सिंगल साल्ट में कम ही मिलते हैं। वहीं फार्मा एक्टीविस्ट विनय कुमार भारती एफडीए में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए लिखते हैं कि, हमारे देश में दो एफडीए काम करती है एक सेंट्रल एफडीए जिसे सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन कहते हैं केन्द्र सरकार के नियंत्रण में हैं। दूसरा स्टेट एफडीए जिसका संचालन राज्य सरकार करती है। फिक्स डोज़ कंबिनेशन को लेकर जो मसला है वह दोनों एफडीए के बीच आपसी खिंचतान का नतीजा है। स्टेट एफडीए के भ्रष्ट अधिकारियों ने अपना हिस्सा लेकर अप्रूवल दे दिया और कंपनियों ने जमकर फिक्स डोज़ कंबिनेशन बनाए और बेचे। अब जाकर सेंट्रल एफडीए की नींद खुली है और इन दवाइयों को बैन किया गया है।

वहीं फार्मा मामलों पर नज़र रखने वाले चंदन गिरी कहते हैं कि, आज स्वास्थ्य का क्षेत्र सेवा का न होके पैसा का क्षेत्र बन गया है। जिसमें से फार्मक्यूटिकल इंडस्ट्री का बहुत बड़ा हाथ है। निजी हॉस्पिटल, निजी मेडिकल संस्थान सब की मिली भगत है, किसी एक की गलती नही है,  इस क्षेत्र में सुधार के लिए सरकार को बहुत बड़ा कदम उठाना पड़ेगा। चंदन मानते हैं स्वास्थ्य क्षेत्र में सबकुछ सरकार के नियंत्रण में रहना चाहिए। इसमें निजी घुसपैठ उचित नहीं है।

आशीष मिश्रा ने अपने एफबी वाल पर लिखा है कि, मुझे यह देर से उठाया सही कदम लगा लेकिन इस फैसले के व्यवहारिक पक्ष भी ध्यान में रखने चाहिए। करोड़ो रूपये के स्टॉक में फंसे व्यापारियों को राहत कौन देगा? गलत कॉम्बिनेशन को अनुमति के लिए हर्जाना व्यापारियों को क्यों देना पड़े? साथ ही साथ यह भी ध्यान रखना है कि जब यह प्रमाणित हो गया है कि ये औषधियां मानव स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है तो उन्हें बेचने में राहत देने का कोई प्रश्न नहीं उठाना चाहिए।

फार्मा मामलों के जानकार डॉ. आत्माराम पंवार का मानना है कि  जहां तक एफडीसी दवाइयों का सवाल है इसके सुरक्षा एवं उपयोगिता को लेकर कोई भी तथ्यपरक साहित्य उपलब्ध नहीं है। ये दवाइयां किसी भी विकसित देश में उपलब्ध नहीं हैं। 2007 के बाद दवा निर्माताओं से जरूरी क्लिनिकल डाटा मांगा जा रहा है। 2012 में भी  सरकार ने इस बावत बहुत कड़ाई बरती थी। लेकिन ये दवा निर्माता  डाटा नहीं दे  पाए। इसका मतलब यह हुआ कि ये दवा निर्माता यह जानते थे कि एफडीसी के पक्ष में उनके पास वैज्ञानिक तथ्य कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि सरकार ने इन दवाइयों को प्रतिबंधित किया है। यह सराहनीय है।

30 साल से चल रहा था गोरखधंधा

खिचड़ी दवाई बनाने का काम दवा कंपनियां पिछले 30 वर्षों से करती आ रही हैं। और जानबूझकर देश की सेहत के साथ ये खेलती रही। अब जब इनकी सच्चाई पूरी तरह से सामने आ चुकी है, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पिछले 30 वर्षों में बीमारी की खेती करने वाली इन दोषी दवा कंपनियों एवं दोषी सरकारी अफसरान के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।

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