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बच्चों! क्या आप अपने स्वास्थ्य को जानते हैं…

प्यारे बच्चों!
मैं जानता हूं कि आप लोग देश-दुनिया के बारे में बहुत कुछ जानना चाहते हैं। बहुत कुछ जानते भी हैं। लेकिन अपनी सेहत के बारे में हमें बहुत ही कम जानकारी रहती है। इसीलिए आपलोगों को कुछ और बताने का मन कर रहा है। थोड़ी-बहुत करे भी तो आप जैसे बहादुर बच्चे सहन कर ही सकते हैं। क्योंकि मैं जानता हूं कि आप खुद को व अपने मम्मी-पापा को स्वस्थ देखना चाहते हैं।
बच्चों! अब जो बताने जा रहा हूं उसे ध्यान से समझिए। कई बार हम जानने की प्रक्रिया में क्या जाने और क्या न जाने का फर्क नहीं कर पाते हैं। ऐसा ही विषय यह भी है। दवा व स्वास्थ्य से संबंधित पर्याप्त सूचना तो छोड़िए अर्ध जानकारी भी हमारी पाठ्यक्रम में उपलब्ध नहीं है। यदि हम भारत की बात करें तो प्रत्येक तीसरा व्यक्ति किसी न किसी बीमारी का शिकार है। परिणामतः उसे दवाइयों के चंगुल में फंसना पड़ता है। ऐसे में सबसे जरूरी बात तो यह है कि हम अपने शरीर के विज्ञान को समझें ताकि बीमारी को आने से पहले ही रोकने की कोशिश कर पाएं। यदि बीमारी आ भी जाए तो उसे प्राथमिक स्तर पर निदान कर पाएं। अगर यहां भी हम चुक गए तो हम कम से कम अऩुशासित तरीके से दवाइयों का सेवन करें।
बच्चों! आपलोगों ने अपने मम्मी-पापा या भाई-बहन के मुंह से एंटीबायोटिक्स (एक प्रकार की दवा) के बारे में जरूर सुना होगा। कई तरह की बीमारियों को ठीक करने में इसका उपयोग किया जाता है। लेकिन आज इसका उपयोग ठीक से नहीं हो रहा है। इससे हम और बीमार होते जा रहे हैं। एंटीबायोटिक्स से जुड़ी हुई एक छोटी सी रिपोर्ट आपके साथ साझा करना चाहता हूं ताकि इसे आप खुद भी पढ़ें और अपने मम्मी-पापा को भी पढ़ाएं ताकि वे सतर्क हो सकें।
एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग से बचें
बच्चों! विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्ल्यूएचओ ) ने ‘एंटीबायोटिकःहैंडल विथ केयर’ नामक वैश्विक कैंपेन की शुरूआत की है। 16-22 नवंबर,2015 तक पूरे विश्व में प्रथम विश्व एंटिबायोटिक जागरुकता सप्ताह मनाया गया। इस कैंपेन का मुख्य उद्देश्य यह था कि एंटिबायोटिक के बढ़ते खतरों से आम लोगों के साथ-साथ स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े नीति-निर्माताओं का भी ध्यान आकृष्ट कराई जाए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस की सामाजिक स्थिति को समझने के लिए 12 देशों में एक शोध किया है। इस शोध में बताया गया है कि एंटीबायोटिक के प्रयोग को लेकर लोग भ्रम की स्थिति में हैं। इस सर्वे में 64 फीसद लोगों ने माना है कि वे मानते हैं कि एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस उनके परिवार व उनको प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह कैसे प्रभावित करता है और वे इसको कैसे संबोधित करें, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। उदाहरणार्थ 64 फीसद लोग इस बात में विश्वास करते हैं कि सर्दी-जुकाम में एंटीबायोटिक का उपयोग किया जा सकता है, जबकि सच्चाई यह है कि एंटीबायोटिक वायरसों से छुटकारा दिलाने में कारगर नहीं है। लगभग एक तिहाई लोगों ( 32 फीसद ) का मानना था कि बेहतर महसूस होने पर वे एंटीबायोटिक का सेवन बंद कर देते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवा-कोर्स को पूर्ण करना चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के डी.जी डॉ. मारगरेट चान का कहना है कि, ‘एंटीबायोटिक रेसिस्टेंट का बढ़ना सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने बहुत बड़ी समस्या है। विश्व के सभी कोनों में यह खतरे के स्तर को पार कर चुका है।’
12 देशों में किए गए सर्वे में एक देश भारत भी है। भारत में 1023 लोगों का ऑनलाइन साक्षात्कार किया गया। इस शोध के अनुसार 76 फीसद लोगों ने कहा कि उन्होंने पिछले 6 महीनों में एंटीबायोटिक्स का सेवन किया है। जिसमें 90 फीसद लोग प्रिस्किप्सन, डॉक्टर व नर्स के कहने पर एंटीबायोटिक लिए थे। 75 फीसद लोगों ने यह माना कि सर्दी-जुकाम में एंटीबायोटिक का उपयोग किया जा सकता है, जो कि गलत है; वहीं 58 फीसद लोगों ने माना कि वे जानते हैं कि एंटीबायोटिक के सेवन में डॉक्टर द्वारा निर्देशित कोर्स को पूरा करना चाहिए। हालांकि 75 फीसद भारतीयों ने माना कि एंटिबायोटिक्स रेसिस्टेंस विश्व-स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है।
इस तरह देखा जाए तो आज के वैश्विक माहौल में एंटीबायोटिक रेसिस्टेंसी मानव स्वास्थ्य के लिए एक बहुत ही बड़ी समस्या लेकर अवतरित हुआ है। जरूरत है इससे बचने की। तो प्यारे बच्चों विश्व स्वास्थ्य दिवस के दिन आप बच्चों को यह जानकारी जरूर जाननी चाहिए और इसे अपने दिनचर्चा में शामिल करनी चाहिए। अपने पैरेन्ट्स को भी इसके बारे में बताना चाहिए।
आप क्या कर सकते हैं…
आप जाग गए तो आपका ईलाज बेहतर हो सकता है। इसके लिए कुछ मुख्य बिन्दुओं पर ध्यान देने की जरूरत है।
साफ-साफ अक्षरों में दवाइयां लिखने के लिए डॉक्टर से कहें
आप यदि किसी डॉक्टर को शुल्क देकर अपना ईलाज करा रहे हैं तो यह आपका अधिकार है कि आप डॉक्टर से कह सके कि वह साफ-साफ अक्षरों में दवाइयों के नाम लिखे। साफ अक्षरों में लिखे दवाइयों के नाम से आपको दवा खरीदने से लेकर उसके बारे जानने-समझने में सुविधा होगी। केमिस्ट भी गलती से दूसरी दवा नहीं दे पायेगा। जिस फार्म्यूलेशन की दवा है, उसे आप एसेंशीयल मेडिसिन लिस्ट से मिला सकते हैं। ज्यादा एम।आर।पी होने पर आप इसकी शिकायत ड्रग इंस्पेक्टर से लेकर एनपीपीए तक को कर सकते हैं।
अपने डॉक्टर से कहें सबसे सस्ती दवा लिखें
जिस फार्म्यूलेशन का दवा आपको डॉक्टर साहब लिख रहे हैं, उसी फार्म्यूलेशन की सबसे सस्ता ब्रान्ड कौन-सा है, यह आप डॉक्टर से पूछे। केमिस्ट से भी आप सेम कम्पोजिशन की सबसे सस्ती दवा देने को कह सकते हैं। दवा लेने के बाद अपने डॉक्टर को जरूर दिखाएं। गौरतलब है कि डॉक्टरों पर सस्ती और जेनरिक नाम की दवाइयां लिखने के लिए सरकार कानून लाने की तैयारी कर रही है।
सेकेंड ओपेनियन जरूर लें
यदि कोई गंभीर बीमारी की बात आपका डॉक्टर कहता हैं, तो ईलाज शुरू कराने से पहले एक दो और डॉक्टरों से सलाह जरूर लें। कई बार गलत ईलाज हो जाने के कारण मरीज की जान तक चली जाती है।
मेडिकल हिस्ट्री जरूर माँगे
आप जहाँ भी ईलाज कराएं, ईलाज की पूरी फाइल संभाल कर रखें। यदि अस्पताल में आप भर्ती हैं तो डिस्चार्ज होते समय मेडिकल हिस्ट्री जरूर माँगे। इसको सम्भाल कर रखे। आपकी मेडिकल हिस्ट्री भविष्य में आपके ईलाज में बहुत सहायक साबित होगी।
प्यारे बच्चों! आज मैंने आप सब से ढेर सारी बातें कर ली है। अंत में यह कहना चाहता हूं कि जिस तरह से जीवन का व्याकरण (ग्रामर) होता है उसी तरह दवा का भी व्याकरण है। इस व्याकरण को सही तरीके से या तो चिकित्सक समझा सकता है अथवा फार्मासिस्ट। आर्थिक व शारीरिक रूप से खुद को स्वस्थ रखने के लिए यह जरूरी है कि हम दवा संबंधी ज्ञान में इज़ाफा करें। सामान्य ज्ञान के स्तर पर जितना हमें जानना चाहिए उतना जरूर जानें। आप माने या न माने मैं दावे के साथ कह सकता हूं प्रत्येक व्यक्ति को इस व्याकरण को जानने की जरूरत है।
आपका चाचा
आशुतोष कुमार सिंह
राष्ट्रीय संयोजक स्वस्थ भारत अभियान
 
 
 

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