ढाई करोड़ यात्रियों के स्वास्थ्य के साथ रेलवे कर रहा है खिलवाड़!

जरा सोचिए यदि आपको रेल यात्रा कर रहे हों आपके जेब में 100 रुपये से कम बचे हो और बहुत जोर की भूख लगी हो तो आप क्या करेंगे?

समता एक्सप्रेस, जिससे हमने 10 अक्टूबर को यात्रा की थी...

समता एक्सप्रेस, जिससे हमने 10 अक्टूबर को यात्रा की थी…

रेलवे कैटरर्स को ही न भोजन के लिए ऑर्डर करेंगे। ऑर्डर करते समय वह कहे कि भोजन की थाली 120 रुपये की है, फिर आप क्या करेंगे? शायद आप कहें कि भोजन की थाली में से दो सब्जी की जगह एक सब्जी व कुछ चपाती ही मिल जाए। इस पर जब   कैटरर यह कहे कि चार चपाती व एक सब्जी (वह भी मानक से आधा) के लिए आपको 80 रुपये देने पड़ेंगे। इस बार शायद तीव्र  भूख के कारण अाप अपनी जेब खाली करते हुए आप भोजन कर लें।

स्वस्थ भारत का यह एक्सक्लूसिव विडियो बता रहा है कि किस तरह रेलवे के भोजन में लूट मची है…विडियो पर क्लिक करें…

वहीं दूसरी तरफ जब आपको मालूम चले कि 40 रुपये के भोजन के लिए आपसे 80 रुपये लिए गए तब आपकी क्या हालत होगी! जरा सोचिए। सच कह रहा हूं यह स्थिति वर्तमान में देश के सभी रेल गाड़ियों में आम है। पिछले दिनों जब समता एक्सप्रेस से मैं और हमारे साथी मीडिया चौपाल में सरीक होने ग्वालियर जा रहे थे तब एक घटना घटी। कैटरर ने थाली की कीमत 120 रुपये बताया और एक सब्जी व चार चपाती की कीमत 80 रुपये। बातचीत में उसी ने बताया कि साउथ इंडिया की रेलगाड़ियों में आज भी भोजन 50-60 रुपये में मिल जाता है। फिर आखिर क्यों उत्तर-भारत की रेलगाड़ियों में यह खाना सस्ता व गुणवत्ता युक्त मिलता है। इसका जवाब है रेलवे की लापरवाही व गलत नीति। जितनी भी प्रीमियम ट्रेने हैं उन सब पर ठेकेदारों ने  कब्जा जमा लिया है। लोगों को न तो शुद्ध पानी मिल पाता है और नही शुद्ध भोजन। लेकिन ये ठेकेदार उनकी शुद्ध कमाई को गटक जरूर जाते हैं। देश के रेलवे में 700 करोड़ से अधिक का है खाने की आपूर्ति का बाजार। यहां यह बता दें कि 12,500 रेलगाड़ियों में हर रोज 2.40 करोड़ लोग यात्रा करते हैं। यानी लगभग ढ़ाई करोड़ यात्रियों के स्वास्थ्य के साथ रेलवे खिलवाड़ कर रही है।

2010 में नई खान-पान नीति लागू करने की घोषणा हुई थी

पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे अधिकारियों और खान-पान ठेकेदारों की सांठ-गांठ खत्म करने के लिए नई खानपान नीति-2010 लागू करने की घोषणा की थी। वे चाहती थीं कि रेलवे में गिने चुने ठेकेदारों का वर्चस्व खत्म हो और नए प्लेयर भी आ सकें। लेकिन ममता बनर्जी के रहते यह कार्य हो नहीं सका। उनके जाने के बाद रेलवे ने अपने नियमों में कुछ ऐसे बदलाव कर दिए जिससे टेंडर प्रक्रिया से छोटे ठेकेदार बाहर हो गए। यहीं कारण रहा है कि लगातार ठेकेदारों की पेट बढ़ती गयी और आम लोगों की पेट गंगाजल दाल से भरने लगा।

स्वस्थ भारत अभियान की मांग

स्वस्थ भारत अभियान मांग करता है कि सरकार रेल-यात्रियों की भोजन की समुचित व्यवस्था कराए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि लोगों को मानक के आधार पर गुणवक्ता युक्त भोजन मिले। आर्थिक रूप से उन्हें लूटा न जाए।

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