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चौपाल मन की बात

'पीरियड' एक फ़िल्म भर का मुद्दा नहीं है

फेसबुक वाल पर अनुशक्ति सिंह

कल इंटरनेट पर विचरते हुए ट्विंकल खन्ना की एक तस्वीर दिखी. उनके साथ राधिका आप्टे भी थीं. दोनों देवियों ने सेनिटरी पैड के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट की हुई थी और सोशल मीडिया पर उपस्थित महिला शक्तियों से सेल्फी विद पैड का चैलेंज लेने की अपील की थी. पहली दफ़ा देखने पर तस्वीर में कुछ अनुचित नहीं लगा. लगना भी नहीं चाहिए, ट्विंकल और राधिका आप्टे सेनिटरी पैड को शर्म के दायरे से बाहर निकालने की कोशिश कर रहीं थीं.
मगर, जो चीज़ मेरी समझ में नहीं आयी, वह यह थी कि इन अभिनेत्रियों को ऐसी चुनौतियों को लेने-देने की ज़रूरत तब ही क्यों पड़ती है जब उनकी कोई फ़िल्म सामने होती है? खैर, अगर उस बहस पर गए तो बॉलीवुड प्रसारित स्त्री-विमर्श की विचारधारा पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाएगा.
जो बात अभी गौर करने लायक है वह यह है कि ‘पीरियड’ या ‘मासिक-धर्म’ स्त्रियों के लिए कोई नया मुद्दा नहीं है. इसका इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि स्त्री का होना. सबसे ज़रूरी बात जो इस मद्देनज़र है, वह यह है कि इस मुद्दे पर जितनी सार्थक चर्चा होनी चाहिये, वह अब भी नहीं हुई है.
पिछले दफ़े जब सबरीमाला मंदिर में रजस्वला औरतों के प्रवेश की पाबंदी पर सवाल उठाया गया था तब बहस पीरियड से उठ कर स्त्री-पुरुष अधिकारों के रास्ते चली गयी थी. अब, जब पैडमैन रिलीज़ होने को है तो चर्चा सिमट कर ‘सेनिटरी पैड’ तक रह जा रही है.
मेरा सवाल यह है कि क्या सेनिटरी पैड ‘पीरियड’ से जुड़ा हुआ इकलौता मुद्दा है? क्या इस पर और बात करने की ज़रूरत नहीं है?
जहाँ से मैं देख रही हूँ, मुझे सेनिटरी पैड वाली क्रांति बाज़ार की क्रांति नज़र आती है, और ये पैड वाले कितनी क्रांति करना जानते हैं वह उनके नाम से ही पता चलता है. एक नामी पैड मेकिंग ब्रांड है ‘व्हिस्पर’ जिसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ है ‘फुसफुसाहट.’ मुझे नहीं पता कि इस ब्रांड का नाम ‘व्हिस्पर’ क्यों रखा गया? शायद इसे बनाने वाली कंपनी ने सोचा होगा कि यह मुद्दा ऐसा है जिस पर औरतें फुसफुसा कर ही बात कर सकती हैं.
वैसे, क्या आपको याद है कि कभी किसी पैड बनाने वाली कंपनी ने पीरियड का स्त्राव दिखाने के लिए नीले रंग की स्याही के अलावा किसी और रंग का इस्तेमाल किया हो? उन एड्स को देखकर मुझे यह समझ नहीं आता कि खून का रंग नीला कब हुआ? पैड कंपनी के ये तरीके और कुछ नहीं, पीरियड को एक चुप-चुप मुद्दा बनाये रखने की कोशिश है.
और आज जब एक फ़िल्म रिलीज़ हो रही है, उस वक़्त ये ब्रांड्स सेनिटरी पैड चैलेंज के ज़रिये क्रांति की बात करें या फिर इन ब्रांड्स के ज़रिये क्रांति की बात की जाए तो पेट पकड़ कर हँसने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता है.
खैर, जिस बात पर सबसे ध्यान देने की ज़रूरत है, वह यह है कि पीरियड में आप चाहें सेनिटरी पैड इस्तेमाल में ला रही हों, क्लॉथ-पैड का प्रयोग करती हों या फ़िर टैम्पॉन, कप जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करती हों, इसे बस औरतों की गुप-चुप बात न बनाए रखें. इसके बारे में बात करें, अपने घर के मर्दों से बात करें, घर पर काम करने आने वाली दीदीयों से बात करें, अपनी बेटी से बात करें, अपनी माँ से सवाल-जवाब करें, अपने किशोर होते बेटों को समझाएं ताकि उनके दिमाग में कोई अधूरी जानकारी घर न कर जाए.
साथ ही साथ सेनिटरी पैड वालों के किसी भी फ़िज़ूल के एड का भरोसा न करें. वे चाहे लाख कहें कि पीरियड में भी आपको आम दिनों की तरह रहना चाहिये, उतना ही काम करना चाहिये, उनकी बात न मानें. आप भी जानती हैं कि आपका शरीर इन दिनों उन हालात में नहीं रहता कि आप नॉर्मल रह पायें तो फ़िर बाज़ार की बकवास सुननी ही क्यों है?
खैर, बाज़ार अनजाने में भी कभी-कभी भली बात कर जाता है. शुक्र है कि फ़ायदे के लिए ही सही, सिनेमा जैसे वृहत माध्यम के ज़रिये पीरियड्स पर वह बात तो हो रही है जो आम-लोगों तक जायेगी, वर्ना सोशल मीडिया की बहस का क्या है, यहीं शुरू होती है, यहीं ख़त्म हो जाती है.

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