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SBA विशेष फार्मा सेक्टर स्वस्थ भारत अभियान

सस्ती एवं गुणवत्तायुक्त दवा उपलब्ध कराने का जन-अभियान है प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजनाः विप्लव चटर्जी, सीईओ

महंगी दवाइयों के कारण देश के 3 फीसद लोग गरीबी रेखा से नहीं ऊबर पा रहे हैं। एक तथ्य यह भी है कि भारत के लोग सालाना 82 हजार करोड़ रुपये की सिर्फ अंग्रेजी दवाई उपभोग कर रहे हैं। इतना ही नहीं एक शोध में यह भी कहा गया है कि आम भारतीयों को अपने स्वास्थ्य बजट का 72 फीसद केवल दवाइयों पर खर्च करना पड़ता है। यही कारण है कि अब भारत की सरकारें भी लोगों के सेहत को लेकर ज्यादा संवेदनशील हो चुकी हैं। विश्व स्वास्थ्य दिवस-2018 के अवसर पर देशवासियों को शुभकामना प्रेषित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि, ‘अच्छा स्वास्थ्य मानव प्रगति की आधारशीला है।’ प्रधानमंत्री का यह सोच सरकार की स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं में भी परिलक्षित होता रहा है। उसमें से एक है प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना। भारत सरकार ने लोगों को सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए इस परियोजना की शुरुआत की है। वर्तमान में इस जनसरोकारी परियोजना को देश भर में लागू करने की जिम्मेदारी व्यूरो ऑफ फार्मा पीएसयूस ऑफ इंडिया (फार्मास्यूटिकल्स विभाग, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन) के सीइओ विपल्व चटर्जी को सौंपी गई है। इस जिम्मेदारी को वे पूरी सिद्दत के साथ निभा भी रहे हैं। अभी तक देश भर में 3350 से ज्यादा जन औषधि केन्द्र खोलने का गौरव प्राप्त कर चुके विपल्व चटर्जी से स्वस्थ भारत डॉट इन के संपादक आशुतोष कुमार सिंह विस्तृत चर्चा की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंशः

पिछले 6 वर्षों से स्वस्थ भारत अभियान लोगों को जेनरिक दवाइयों को लेकर जागरुक करने का काम कर रहा है, आपका विभाग भी इस दिशा में सक्रीय है, वावजूद इसके आम लोगों जेनरिक दवाइयों को लेकर भ्रम बना हुआ है। आप जेनरिक दवाइयों किस रुप में परिभाषित करेंगे?
सबसे पहले तो हमें यह समझने की जरूरत है कि दवा एक केमिकल होता है। रसायन होता है। दवा कंपनियां अपने मुनाफा एवं विपरण में सहुलियत के लिए इन रसायनों को अलग से अपना ब्रांड नाम देती है। जैसे पारासेटामल एक साल्ट अथवा रसायन का नाम है लेकिन कंपनिया इसे अपने हिसाब से ब्रांड का नाम देती हैं और फिर उसकी मार्केंटिंग करती है। ब्रांड का नाम ए हो अथवा बी अगर उसमें पारासेटामल साल्ट है तो इसका मतलब यह है कि दवा पारासेटामल ही है। अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से पेटेंट फ्री मेडिसिन को जेनरिक दवा कहा जाता है। लेकिन भारत में साल्ट के नाम से बिकने वाली दवा को सामान्यतया जेनरिक माना जाता रहा है। वैसे बाजार में जेनरिक दवाइयों को ऐज अ ब्रांड बेचने का भी चलन है, जिसे आम बोलचाल में जेनरिक ब्रांडेड कहा जाता है। लेकिन प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के अंतर्गत खुलने वाली सभी दवा दुकानों पर हम लोग विशुद्ध जेनरिक दवा रखते हैं। यहां पर स्ट्रीप पर साल्ट अर्थात रसायन का ही नाम लिखा होता है

जेनरिक दवाइयों को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि इनकी गुणवत्ता ठीक नहीं होती है? इस पर आप क्या कहेंगे?
बीपीपीआई अपने रिटेल चेन की दवाओं की गुणवत्ता का विशेष ख्याल रखता है। देश में 10,500 दवा कंपनियां हैं, लेकिन 1400 दवा कंपनियां ही डब्ल्यूएचओ जीएमपी सर्टीफाइड हैं। हम सार्वजनिक उपक्रम की दवा कंपनियों एवं डबल्यूएचओ जीएमपी सर्टीफाएड मैन्यूफैक्चरर से ही दवा खरीदते हैं। इतना ही नहीं हमने सेंट्रल वेयर हाउस बनाने में भी अंतरराष्ट्रीय मानको का ख्याल रखते हैं। अपने यहां आपूर्ति हुई दवाइयों का औचक सैंपलिंग एनएबीएल में भेजते हैं। अगर कोई गड़बड़ी मिलती हैं तो तुरंत प्रभाव से डिफेक्टेड प्रोडक्ट वापस लेते हैं। साथ ही मैन्यूफैक्चरर पर डेबिट नोट भी जारी करते हैं। हम आपको आश्वस्त करना चाहते हैं कि जनऔषधि केन्द्र पर मिलने वाली किसी भी दवा के गुणवत्ता से हम किसी भी सूरत में समझौता नहीं कर सकते हैं।
जेनरिक ब्रांडेड के नाम पर जो मुनाफाखोरी है, इससे जनऔषधि परियोजना की सफलता में बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं, ऐसा आपको नहीं लगता?
बाजार का अपना गणित होता है। वह उस हिसाब से चलता है। यह सही है कि जेनरिक ब्रांडेड दवाइयों पर आर्टीफिसियल एमआरपी का लेबल देखने को मिल रहा है। लेकिन हमलोग एक्सक्लूसिव रिटेल चेन खोल रहे हैं। हमारे यहां की दवाइयों की कीमत बाजार की दवाइयों से 10 टाइम तक कम है। जहां तक बाधा उत्पन्न होने की बात है तो हमारा मकसद है लोगों को सस्ती एवं सुलभ दवा पहुंचाना। यह एक सामाजिक आंदोलन है। और आम लोगों का हित हमारे साथ है।
आपको नहीं लगता कि जनऔषधि केन्द्र उस अनुपात में नहीं खुल पाए हैं जिस अनुपात में खुलने चाहिए थे?

 
बीपीपीआई का गठन 2008 में हुआ था। तब से लेकर 2014 तक उतनी सफलता नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी। लेकिन 2014 से सरकार ने इस दिशा में तेजी से काम किया है और आज हम 3350 से ज्यादा जनऔषधि केन्द्र खोलने में सफल रहे हैं। 2018-19 में जनऔषधि केन्द्रों की संख्या 4000 तक ले जाने का हमारा लक्ष्य है।
जिस रफ्तार में जनऔषधि केन्द्र खुलने चाहिए, वो नहीं खुल पाए हैं, इसमें फार्मासिस्टों की अनुपलब्धता को एक कारण बताया जाता रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि अभी भी देश में लाखों फार्मासिस्ट बेरोजगार हैं?
ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट के अनुसार बिना फार्मासिस्ट के न तो दवा की दुकान का पंजीकरण किया जा सकता है और न ही संचालन। ऐसे में बिना फार्मासिस्ट के जनऔषधि केन्द्र भी नहीं खुल सकते हैं। हमारे नोडल अधिकारियों के पास कुछ फीडबैक आए हैं, जिसमें फार्मासिस्टों की उपलब्धता की समस्या बताई गई है। इस दिशा में भी हम जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। फार्मासिस्टों के लिए भी जनऔषधि एक बेहतर बिजनेस ऑपरचूनिटी है, साथ-साथ सामाज के लोगों को सस्ती दवा पहुंचाना एक नेक कार्य भी है। अच्छा काम करने का अपना अलग सटिस्फेक्शन होता है। हम चाहते हैं कि फार्मासिस्ट भी इस मुहिम में सहभागी बनें। अपना स्टोर खोलें और लोगों की सेवा करें।
जनऔषधि केन्द्र को चलाने के लिए यह जरूरी है कि देश के चिकित्सक जेनरिक दवा लिखें। लेकिन चिकित्सकों का कहना है कि जेनरिक दवा की उपलब्धता नहीं है ऐसे में वो कैसे लिखें? वहीं दूसरी ओर जनऔषधि संचालक कहते हैं कि चिकित्सक दवा लिखते नहीं तो दवा बिकेगी कैसे? ऐसे में जनऔषधि केन्द्रों की सस्टनेबिलिटी का मसला उभर कर सामने आ रहा है। इसमें समन्वय बिठाने के लिए बीपीपीआई क्या कर रही है?

जनऔषधि एक सामाजिक आंदोलन की अवधारणा है। इसमें चिकित्सकों की भूमिका बहुत अहम हैं। इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए चिकित्सकों का सहयोग अपेक्षित है। यह सच है कि चिकित्सकों का सहयोग उस रूप में नहीं मिल पाया है, जिस रूप में मिलना चाहिए था। लेकिन हम आशान्वित हैं कि देश के चिकित्सक भी इस पुनीत अनुष्ठान में अपनी आहूति और तीव्रता के साथ देते रहेंगे।

आपको नहीं लगता कि जेनरिक दवाइयों को लेकर जिस स्तर पर जागरुकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है, उस स्तर पर जागरुकता नहीं चल पाई है?
ऐसी बात नहीं हैं कि जेनरिक को लेकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास नहीं किया गया है। हमलोग अपने सीमित संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। यह कष्टपूर्क कह रहा हूं कि इतना नेक काम हम कर रहे हैं लेकिन जागरुकता फैलाने में मीडिया का सहयोग उतना नहीं मिल पाया है, जितना मिलना चाहिए था। कई बार मुझे लगता है कि इस योजना को भी राजनीतिक चश्में से देखा जा रहा है। मैं उम्मीद करता हूं कि मीडिया इस पूनीत कार्य में हमें भरपूर सहयोग करेगा। मैं आपको बता दूं कि जब से मैं इस परियोजना से जुड़ा हूं खुद भी डायबिटिज की दवा जनऔषधि की ही खा रहा हूं। 2600 रुपये की जगह अब मुझे 360 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
जनऔषधि केन्द्रों के लिए फार्मासिस्टों की अनुपलब्धता को देखते हुए आपको नहीं लगता कि ‘जन-फार्मासिस्ट’ बनाने के लिए सरकारी स्तर पर सर्टीफिकेट कोर्स शुरू किया जाना चाहिए, जिन्हें इस तरह से ट्रेंड किया जाए कि वे जन-औषधि केन्द्र खोलने एवं जन-औषधि बेचने के कानूनी अधिकारी हो जाएं? इससे जन-सेवक उद्यमियों का एक समूह तैयार हो सकेगा। इस तरह की किसी अवधारणा पर सरकार काम कर रही है क्या?
इस मुद्दे पर बोलने के लिए मैं अधिकारी नहीं हूं।
जनऔषधि केन्द्रों में दवाइयों की संख्या कम है अर्थात रेंज कम है, इसकी शिकायत अक्सर मिलते रहती है। इस दिशा में आपलोग क्या कर रहे हैं?

केन्द्रीय उर्वरक एवं रसायन मंत्री अनंथ कुमार एवं राज्यमंत्री मनसुख भाई मांडवीया के साथ जनऔषधि के सीईओ विपल्व चटर्जी एवं अन्य

वर्तमान समय में जनऔषधि केन्द्रों पर सबसे ज्यादा लिखी जाने वाली 700 औषधियों का रेंज उपलब्ध है। जल्द ही हम इसे 1000 तक बढ़ाने वाले हैं। साथ ही हम ओटीसी उत्पादों को भी बेचने का अधिकार जनऔषधि विक्रेताओं को दे रहे हैं। दवाइयों के आपूर्ति चेन को डिजटलाइज करने की ओर हम बढ़ रहे हैं ताकि स्टोर में अनुपलब्ध दवाइयों की सूचना हमें मिलती रहे और उसके अनुसार हम आपूर्ति करते रहेंगे। इससे दवाइयों की उपलब्धता की जो समस्या कभी-कभी सामने आती है, वह भी दूर हो जायेगी।
देश में जितने लोग जनऔषधि केन्द्र खोल चुके हैं अथवा जो खोलना चाहते हैं और एक जन-सेवक उद्यमी बनना चाहते हैं, उनसे स्वस्थ भारत डॉट इन के माध्यम से क्या कहना चाहेंगे?
स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक व स्वस्थ भारत डॉट इन के संपादक आशुतोष कुमार सिंह प्रधानमंत्री जनऔषधि परियोजना के सीईओ को स्वस्थ भारत पत्रिका की प्रति भेंट करते हुए…

देश के सभी उद्यमी प्रवृति के लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे इस परियोजना से जुड़े। जेनरिक दवाइयों के अपनाएं एवं लोगों के आर्थिक बोझ को कम करने में सहायता करें। खासतौर से देश के नौजवानों से कहना चाहता हूं कि उद्यमी बनने का यह बेहतरीन अवसर है। आप अपना हाथ बढ़ाइए, थामने के लिए हम तैयार हैं।
 

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दांव पर चिकित्सकों की साख!

1 comment

Nishant gupta April 15, 2018 at 3:25 pm

Sir news paper add important h

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