स्वास्थ्य का अधिकार

स्वास्थ्य के अधिकार की दरकार  

विगत दिनों छत्तीसगढ़ में हमारे देश के स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही का एक उदाहरण नसबंदी के दौरान हुई कई महिलाओं की मौत के रूप में दिखा था। इस घटना के बाद राजनीतिक हलकों में खूब हंगामा भी मचा था। मगर छत्तीसगढ़ में हुई उस घटना को राजनीति से उपर उठकर अगर बुनियादी तौर पर देखें तो वो हमारे बदहाल स्वास्थ्य तंत्र का एक लक्षण मात्र है। इसमें कोई दो राय नहीं कि एक राज्य के तौर पर भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था को जरूरत के अनुरूप तरजीह नही दी गयी है। भारत में स्वास्थ्य एक ऐसा  विषय है जिस पर कहने और दिखाने को तो सरकारी आंकड़ों में बहुत कुछ मिल जायेगा लेकिन वास्तविकता के धरातल पर जाकर देखा जाय तो मामला ढाक के तीन पात से ज्यादा कहीं नहीं ठहरता।

स्वास्थ्य का अधिकार

सबको मिले स्वास्थ्य का अधिकार

जीवन का अधिकार बेशक हमारे मूल अधिकारों का सबसे मजबूत पहलू है लेकिन आज तक हम यह नहीं निर्धारित कर पाए कि इस अधिकार के तहत जीवन जीने वाले नागरिकों का जीवन हो तो कैसा हो ? बुनियादी सवाल ये है कि क्या राईट टू लाइफ के दायरे में उन बहुसंख्यक बीमार,अस्वस्थ जीवन जी रहे व्यक्तियों को भी रखा जा सकता है जो किसी ना किसी कारण से स्वस्थ जीवन जीने से महरूम है ? सवाल ये भी है कि क्या किसी व्यक्ति का किसी भी हालात में  जिन्दा रहना मात्र ही उसे राईट टू लाइफ के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त मानक है ; या जीवन के इस अधिकार के तहत जीने वाले समाज के व्यक्तियों के जीवन यापन के और भी मानक होने चाहिए ?

स्वास्थ्य को लेकर भारत में हालात विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा तुलनात्मक रूप से बेहतर नहीं रहे हैं। गौरतलब है कि स्वास्थ्य के प्रति संजीदा होने के मामले में हम अपने निकटतम पड़ोसी मुल्क चीन से काफी पीछे नजर आते हैं। चीन में स्वास्थ्य पर उसके कुल सकल घरेलु उत्पाद का 5 फीसद  खर्च किया जाता है जबकि भारत सरकार कुल जीडीपी का मात्र 1 फीसद ही स्वास्थ्य के नाम पर खर्च करती  है, जो कि भारत में  स्वास्थ्य की वर्तमान जरुरतों  के हिसाब से नाकाफी साबित हो रहा है। अगर बीमारियों एवं बीमारों के नजरिये से भारत की तुलना अन्य देशों से करें तो भी हमारी स्थिति खस्ता हाल ही नजर आती है और हम सर्वाधिक बीमारों वाले देशों की फेहरिश्त में उपरी पायदान पर खड़े नजर आते हैं। चाहे एनीमिया रोग से मरने वाली महिलाओं की संख्या को देखा जाय या निमोनिया और डायरिया से मरने वाले बच्चो की संख्या पर नजर डाली जाय , हम पुरे विश्व को मात देते अग्रिम कतार में खड़े आसानी से दिख जाते हैं। यूनिसेफ द्वारा जारी एक आंकड़े के अनुसार दुनिया में निमोनिया एवं डायरिया से हुई एक साल में कुल 21 लाख बच्चों की मौतों में से सर्वाधिक ६ लाख बच्चों की मौतों के साथ भारत 73  देशों की सूची में शीर्ष पर रहा। सन् 2011 में आये एक अन्य सर्वे के मुताबिक़ भारत में खसरा से मरने वालों की संख्या पुरे विश्व में खसरा से हुई कुल मौतों की  47% है जो कि भारतीय स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्यंत ही चिंताजनक है। स्वास्थ्य के मामले में हमारे देश की आंतरिक बदहाली की फेहरिश्त यहीं खतम नहीं होती बल्कि तमाम और भी आंकड़े हैं जो स्वास्थ्य के प्रति हमारे सरकार के बीमार रवैये को दिखाते हैं। आज एक तरफ जहाँ  हम प्रति एक हजार की जनसँख्या पर एक चिकित्सक तक उपलब्ध करा पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं, तो वहीँ दूसरी तरफ  रोगियों की संख्या के अनुपात में चिकित्सकीय संसाधनो भारी का अभाव देखने को मिलता है। आंकड़ों के धरातल पर औसत उम्र के मामले में  हमारी स्थिति बांग्लादेश से भी गयी गुज़री है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदहाली को दिखा रहे इन आंकडो के आधार पर अगर हम इनकी खामियों पर नजर डाले तो बुनियादी तौर पर कुछ ऐसे तथ्य सामने आते है जो भारत की स्वास्थ्य नीति को ही सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं। स्वास्थ्य के परिप्रेक्ष्य में सबसे पहले इस तथ्य को देखना जरूरी है कि स्वास्थ्य को लेकर हमारे तंत्र का दृष्टिकोण किस तरह का है ? क्योंकि,पिछले कुछ सालों में बेशक हमारा तंत्र स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई ठोस कामयाबी हासिल नहीं कर पाया हो सिवाय पोलियो ड्रॉप पिलाने के, लेकिन चिकित्सा का निजीकरण धड़ल्ले से हुआ है । सरकारी अस्पतालों की तुलना में जिस तरह से आधुनिक चिकित्सकीय संसाधनों से संपन्न निजी अस्पतालों का विकास तेजी से हो रहा है इसे भारतीय स्वास्थ्य के नजरिये से विकास का मानक  समझना हमारी भूल के सिवा कुछ भी नही है। शायद हमारा तंत्र इस बात को भुल रहा है कि स्वास्थ्य हमारे  मुख्यधारा के जीवन से जुड़े राईट टू लाइफ से सीधा सरोकार रखने वाला विषय है एवं इस देश के हर नागरिक के जीवन को स्वस्थ रखने का दायित्व हमारे सरकार के कन्धों पर है।

राईट टू लाइफ से सीधे तौर पर जुड़े स्वस्थ जीवन के मसले को चिकित्सा के क्षेत्र में खड़े हो रहे महंगे बाजारों के भरोसे छोड़ दिया जाना, कहीं ना कहीं जीवन जीने के मूल अधिकार पर सवालिया निशान खड़ा करता है। आज चिकित्सा में बढते निजीकरण का ही प्रभाव है कि चिकित्सा जन सरोकारी विषय ना रह कर बाजार का विषय बनती जा रही है। आज गिने-चुने सरकारी अस्पतालों के हालात इस बात की गवाही देते हैं कि निजी अस्पतालों के बढते बाजार ने व्यक्ति के मूल अधिकार से जुड़े इस विषय को हाशिए पर ला दिया है। बीमारियों की ब्रांडिंग का एक खतरनाक कल्चर इस देश में पैदा कर दिया गया है। एनीमिया से इस देश में लाखों महिलायें मरती हैं लेकिन सरकार का खजाना एनीमिया से ज्यादा एड्स  के नाम पर खर्च होता है। जबकि एड्स से प्रभावित लोगों की तादाद एनीमिया की तुलना में नगण्य है। सवाल ये है कि क्या एनीमिया इसलिए हाशिये की बीमारी है क्योंकि उस बीमारी की ब्रांडिंग नहीं है जबकि एड्स ब्रांडेड बीमारी है ? उत्तरप्रदेश के गोरखपुर शहर में हर साल हजारों मासूम इन्सेफ्लाईटिस बुखार से मरते है लेकिन उन बच्चों की मौत सरकार के लिए कभी मुद्दा नहीं बन पाती।

स्वास्थ्य जैसी बुनियादी और व्यक्ति के जीवन से जुड़ी समस्या को लेकर अगर हमारी सरकार इस तरह से बेपरवाह काम कर रही है तो निश्चित तौर पर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार से जोड़कर देखने की बजाय इसे स्वतंत्र रूप से एक मूल अधिकार का स्वरूप दिये जाने की जरुरत है ? क्या स्वास्थ्य को हर नागरिक के अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ? क्या ऐसा नहीं लगता कि जीवन जीने के अधिकार के साथ साथ हर व्यक्ति को स्वस्थ रहने का भी अधिकार है और सरकार का यह दायित्व है कि वह सीधे तौर पर अपने नागरिकों के स्वास्थ्य हितों पर काम करे बजाय कि निजी कंपनियों का सहारा लेकर ?

मोदी सरकार द्वारा स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है। ऐसे में अपेक्षा इस बात की भी है कि स्वच्छ भारत अभियान के तर्ज पर  स्वस्थ भारत अभियान की मुहीम पर भी मोदी सरकार बल दे।

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