चौपाल मन की बात

‘पीरियड’ एक फ़िल्म भर का मुद्दा नहीं है

जिस बात पर सबसे ध्यान देने की ज़रूरत है, वह यह है कि पीरियड में आप चाहें सेनिटरी पैड इस्तेमाल में ला रही हों, क्लॉथ-पैड का प्रयोग करती हों या फ़िर टैम्पॉन, कप जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करती हों, इसे बस औरतों की गुप-चुप बात न बनाए रखें. इसके बारे में बात करें, अपने घर के मर्दों से बात करें, घर पर काम करने आने वाली दीदीयों से बात करें, अपनी बेटी से बात करें, अपनी माँ से सवाल-जवाब करें, अपने किशोर होते बेटों को समझाएं ताकि उनके दिमाग में कोई अधूरी जानकारी घर न कर जाए.
साथ ही साथ सेनिटरी पैड वालों के किसी भी फ़िज़ूल के एड का भरोसा न करें. वे चाहे लाख कहें कि पीरियड में भी आपको आम दिनों की तरह रहना चाहिये, उतना ही काम करना चाहिये, उनकी बात न मानें. आप भी जानती हैं कि आपका शरीर इन दिनों उन हालात में नहीं रहता कि आप नॉर्मल रह पायें तो फ़िर बाज़ार की बकवास सुननी ही क्यों है?
खैर, बाज़ार अनजाने में भी कभी-कभी भली बात कर जाता है. शुक्र है कि फ़ायदे के लिए ही सही, सिनेमा जैसे वृहत माध्यम के ज़रिये पीरियड्स पर वह बात तो हो रही है जो आम-लोगों तक जायेगी, वर्ना सोशल मीडिया की बहस का क्या है, यहीं शुरू होती है, यहीं ख़त्म हो जाती है.