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महात्मा गांधीः कुष्ठ उन्मूलन के योद्धा

आज कुष्ठ उन्मूलन दिवस है। गांधी की पुण्य तिथि को भारत सरकार एंटी लिपरेसी डे के रूप में मनाती है। गांधी ने अपने चंपारण प्रवास के दौरान कुष्ठ रोगियों की बहुत सेवा की थी। तब किसानो से जबरन नील की खेती कराई जाती थी। नील की खेती के साइड अफेक्ट के रूप में किसानों को कुष्ठ रोग होने लगा था। इसकी जानकारी गांधी को कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में मिली थी। फिर उन्होंने निश्चय किया था कि वो चंपारण से ही अपनी लड़ाई शुरू करेंगे। इस संदर्भ में डॉ. देबाशीष बोस का यह लेख बहुत ही सार्थक सूचना लेकर आया है। जरूर पढ़ें। संपादक

 

चम्‍पारण आन्‍दोलन गांधीजी का मानव शोषण के खिलाफ नफरत, स्‍वच्‍छ और स्‍वास्‍थ्‍य संवेदनाओं को उजागर करता है। लेकिन आजाद भारत में गांधी के उत्‍तराधिकारियों ने उनके सपनों को साकार करने का अब तक ईमानदार प्रयास नहीं किया और शोषण के खिलाफ कई कानून तो बने परन्‍तु  स्‍वास्‍थ्‍य का अधिकार और इससे संबंधित स्‍वस्‍थ्‍य नीति का इस देश में आज भी सर्वथा अभाव है।images

महात्‍मा गांधी के सत्‍याग्रह, स्‍वच्‍छ और स्‍वास्‍थ्‍य के संबंध में उनकी अवधारणाओं को जानने के लिये चम्‍पारण आंदोलन का विशेष महत्‍व हैा गांधी ने चम्‍पारण सत्‍याग्रह से चम्‍पारण वासियों को नील की खेती करने पर मजबूर करने वाले जमींदारों के आतंक तथा शोषण से मुक्ति दिलाई वहीं स्‍वच्‍छता और स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति लोगों को जागरूक कर अपनी अवधारणाओं को प्रतिपादित किया। यह स्‍वतंत्रता इतिहास का स्‍वर्णिम अध्‍याय का सृजन करता है।

अंग्रेजों ने एक लाख एकड़ से भी अधिक उपजाउ भूमि पर कब्‍जा कर लिया था और उन पर अपनी कोठियां स्‍थापित कर ली थी। ये लोग खुरकी और तीन कठिया व्‍यवस्‍था के द्वारा किसानों पर तरह-तरह के जुल्‍म बरपाते और उनका शोषण करते थे। खुरकी व्‍यवस्‍था के तहत अंग्रेज रैयतों को कुछ रूपये देकर कुल जमीन और घर आदि जरपेशगी रख कर उन्‍हीं से जीवन पर्यन्‍त नील की खेती कराते थे। इसी प्रकार तीन कठिया व्‍यवस्‍था के तहत किसानों को अपने खेत के प्रत्‍येक बीघा के तीन कठ्ठे के उपर नील की खेती करनी पड़ती थी। इसमें खर्च रैयतों का होता था और बगैर मुआवजा दिये नील अंग्रेज ले जाते थे। इतना ही नहीं अनेक तरह के टैक्‍स उनसे वसूले जाते थे। हजारों भूमिहीन मजदूर तथा गरीब किसान खाद्यान की बजाय नील की खेती करने के लिए बाध्‍य हो गये थे। उपर से बगान मालिक भी जुल्‍म ढा रहे थे।

इस शोषण की मार से चम्‍पारण के किसानों के बच्‍चे शिक्षा-स्वास्थ्य की मूलभूत सुविधाओं से वंचित थे। किसान शरीर से दुर्वल और बीमार रहते थे। नील के किसान क्षय रोग के शिकार हो रहे थे। गांधीजी चम्‍पारण की हालत सुनकर हतप्रभ हो गये और वहां चलकर लोगों को सत्‍याग्रह के माध्‍यम से आंदोलित करने का निर्णय लिया। अप्रैल 1917 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन होने के बाद गांधीजी कलकत्‍ता से चम्‍पारण आये और किसानों के आंदोलन का नेत़त्‍व संभाला। उनके दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। किसानों ने गांधीजी को अपनी सारी समस्‍याएं बताई।

गांधीजी के आंदोलन से चम्‍पारण की पुलिस भी हरकत में आई। पुलिस अधीक्षक ने गांधीजी को जिला छोड़ने का आदेश दिया। गांधीजी ने आदेश मानने से इंकार कर दिया। अगले दिन गांधीजी को कोर्ट में हाजिर होना था। हजारों किसानों की भीड़ कोर्ट के बाहर जमा थी। गांधी के समर्थन में नारे लगाये जा रहे थे। हालात की गंभीरता को देखते हुए दण्‍डाधिकारी ने बगैर जमानत के गांधीजी को मुक्‍त करने का आदेश दिया। लेकिन गांधीजी ने कानून के अनुसार सजा की मांग की। फैसला स्‍थगित कर दिया गया। इसके बाद गांधीजी किसानों को आंदोलित और जागरूक करने के लिए निकल पड़े।

गांधीजी ने किसानों के बच्‍चों को शिक्षित करने के लिए ग्रामीण विद्यालय खुलवाया। लोगों को साफ सफाई से रहने का तरीका सिखाया गया। सारी गतिविधियां गांधीजी के आचरण से मेल खाती थी। स्‍वयंसेवकों ने मैला ढोने, धुलाई, झाडू-बुहारू तक का काम किया। स्‍वास्‍थ्‍य जागरूकता का पाठ पढाते हुए लोगों को उनके अधिकारों का ज्ञान कराया गया। ताकि किसान स्वस्थ रह सकें और अपने में रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित कर सकें।

चम्‍पारण आंदोलन को देखते हुए लेफि़टनेन्‍ट गवर्नर एडवर्ड ने गांधीजी को बुलावा पत्र भेजा और एफ स्‍लर्ड की अध्‍यक्षता में एक आयोग का गठन किया जिसमें गांधीजी को भी सदस्‍य बनाया गया। जांच-पड़ताल के बाद इस आयोग ने सर्वसम्‍मति से प्रतिवेदन तैयार कर सरकार को सौंप दी। सरकार ने रपट के आधार पर कानून बनाया जिसके जरिये तीन कठिया प्रथा गैरकानूनी करार दी गयी। गांधीजी ने अपनी आत्‍मकथा में लिखा है कि-‘ चम्‍पारण का यह दिन मेरी जिन्‍दगी में ऐसा था जो कभी भुलाया नहीं जा सकता, जहां मैंने ईश्‍वर का, अहिंसा का और सत्‍य का साक्षात्‍कार किया।’

गांधीजी ने स्‍वच्‍छ और स्‍वस्थ रहने के संदर्भ में कहा था कि हमें अपने संस्‍कारों और विधियों को नहीं भूलना चाहिए। स्‍वच्‍छ रहकर ही हम स्‍वस्‍थ्‍य रहेंगे। इसके पालन से ही मानव स्‍वस्‍थ्‍य रह सकेगा। उन्‍होंने कहा था कि हमारे संस्‍कार हमें प्रकृति के करीब लाता है लेकिन हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं और उसी का परिणाम है कि हम लगातार बीमारियों के जाल में फंसते जा रहे हैं। उन्‍होंने बल देते हुए कहा था कि अगर हम स्‍वास्‍थ्‍य चाहते हैं तो हमें फिर से पुरानी परंपराओं में छिपे स्‍वास्‍थ्‍य के मंत्रों को अपने जीवन में उतारना होगा। गांधीजी के अवधारणाओं को उनके उत्‍तराधिकारी आजादी के लगभग सात दशक गुजर जाने के बावजूद भी सरजमीन पर नहीं उतार पाए। लिहाजा लोगों को जहां स्‍वास्‍थ्‍य का अधिकार प्राप्‍त नहीं है वहीं यह क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं से महफूज है और जीवन रक्षक दवाएं भी महंगी खरीदनी पड़ रही हैं। जिसे रोक पाने में सरकारें अब तक असफल रही है। इसके लिए फिर से एक बार नये कलेवर के साथ गांधी के ‘चम्‍पारण आंदोलन’  की आवश्‍यकता हैा

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

इनसे bosemadhepura@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

बजट और स्वास्थ्यःस्वस्थ भारत का सपना

एक पुरानी और सर्वमान्य संकल्पना है कि पढ़ाई, दवाई और लड़ाई यानी कि शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तीनों पूरी तरह निःशुल्क होने चाहिएं। स्वाधीन भारत के संविधान निर्माताओं ने संभवतः इसी बात को ध्यान में रख कर भारत को एक कल्याणकारी राज्य घोषित किया था और इसको ही ध्यान में रख कर सरकार हर वर्ष बजट बनाती है। बजट में हजारों करोड़ रूपये स्वास्थ्य के लिए आबंटित भी किए जाते हैं। परंतु दुःख का विषय यह है कि तमाम सरकारी प्रयत्नों के बावजूद ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है।

बजट और स्वस्थ भारत का सपना

योजना के अगस्त अंक में प्रकाशित लेख

इस वर्ष नई सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट में भी स्वास्थ्य के लिए पिछली सरकार की ही भांति प्रावधान किए गए हैं। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 21912 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है। इसके अतिरिक्त नए एम्स खोलने के लिए 500 करोड़ रूपये दिए गए हैं। एकीकृत बालविकास सेवाओं हेतु 18691 करोड़ रूपये दिए गए हैं और आयुष के लिए कुल 411 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया गया है। साथ ही फार्मास्यूटिकल रिसर्च के लिए 87 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इस प्रकार देखा जाए तो स्वास्थ्य के लिए सरकार ने बजट में कुल 41601 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सरकार ने पिछली यूपीए सरकार के बजट के 37300 करोड़ रूपयों की तुलना में कहीं अधिक बजट स्वास्थ्य के लिए आबंटित किया है।

देखा जाए तो इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं की झलक साफ दिखाई देती है। जेटली अपने घोषणापत्र के हर राज्य में एम्स का वादा पूरा करने की दिशा में बढ़े। उन्होंने आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र में विदर्भ और यूपी के पूर्वाचल में एम्स जैसे चार संस्थानों के लिए 500 करोड़ आवंटित किए। 12 मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा भी की। गांवों के विकास के लिए ग्रामीण हेल्थ रिसर्च सेंटर खोलने का भी ऎलान किया। प्रधानमंत्री के एक वादे “सबके लिए स्वास्थ्य” का इस्तेमाल करते हुए कहा वित्त मंत्री ने कहा कि, नि:शुल्क औषधि सेवा और नि:शुल्क निदान सेवा प्राथमिकता का आधार पर शुरू की जाएगी। इस प्रकार बजट को स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक-ठाक कहा जा सकता है। परंतु देश के जनस्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मानें तो यह बजट पर्याप्त नहीं है।

कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेल बजट की तर्ज पर स्वास्थ्य के लिए भी अलग से बजट लाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य पर और ध्यान देते हुए स्वास्थ्य बजट में और पारदर्शिता लाए। इसके लिए आवश्यक है कि रेल बजट की तरह स्वास्थ्य बजट भी अलग से पेश किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य पर किया जाने वाला यह खर्च विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। दूसरा तर्क यह है कि सरकार द्वारा कम बजट और सुविधाएं दिए जाने के कारण लोगों को निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की ओर जाना पड़ता है। निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की भागेदारी आज सरकार से कहीं आधिक हो गई है। 2008-09 के एक अध्ययन के अनुसार देश के स्वास्थ्य-व्यय का 71.62 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है और केवल 26.7 प्रतिशत सरकार द्वारा। इससे स्वास्थ्य सेवाएं मंहगी और गरीबों की पहुंच से दूर हो रही हैं।

सबको स्वास्थ्य का सपना

बहरहाल इस बजट के कुछ प्रमुख मुद्दे हैं जिन पर अलग से चर्चा की जानी आवश्यक प्रतीत होती है। सबसे पहला मुद्दा है सबके लिए स्वास्थ्य। इसके लिए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन चला रखा है। पिछली सरकार ने शहरी स्वास्थ्य मिशन की भी शुरूआत की थी परंतु उसे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बजट में ही रखा गया था। इस सरकार ने दोनों को अलग-अलग कर दिया है। परंतु सवाल है कि क्या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन सबको स्वास्थ्य के लक्ष्य को पूरा कर सकता है?

ध्यातव्य है कि देश की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाई गई वर्ष 1983 में जिसमें पहली बार सभी नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था। यानी कि स्वाधीनता मिलने के लगभग 46 वर्ष बाद सरकार को देश के स्वास्थ्य की चिंता हुई। इसके बाद देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और इसके उप केंद्र खोले जाने लगे। परंतु इनकी संख्या देश की जनसंख्या के अनुपात में काफी कम थी। 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2011 तक देश में 1 लाख 76 हजार 820 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (ब्लॉक स्तर), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-केंद्र स्थापित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त देश में 11 हजार 493 सरकारी अस्पताल हैं और 27 हजार 339 आयुष केंद्र। देश में (एलोपैथ के) 8 लाख 83 हजार 812 डॉक्टर हैं। नर्सों की संख्या 18 लाख 94 हजार 968 बताई गई है। परंतु दूसरी ओर देश में 5 लाख से अधिक गांव हैं और अधिकतर गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच रही हैं।

अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति खराब है। कोई भी डॉक्टर गांवों में जाने के लिए तैयार नहीं है। जिन्हें भेजा जाता है, वे केंद्रों में बैठते नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब एमबीबीएस के छात्रों के लिए गांवों में एक वर्ष के लिए सेवा देना अनिवार्य किए जाने पर डाक्टरों ने तीखा विरोध किया था। ऐसे में यह चिंतनीय हो जाता है कि यदि पर्याप्त संख्या में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोल भी दिए जाएंगे तो उसके लिए डॉक्टर कहां से लाए जाएंगे। हालांकि वर्ष 2012 के भारत सरकार के आंकड़ों को देखें तो प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों के लिए कुल 24 हजार 49 डाक्टरों की आवश्यकता थी और इसके लिए सरकार ने 31 हजार 867 डाक्टरों को नियुक्त करने की व्यवस्था की जिनमें से 28 हजार 984 डाक्टर केंद्रों में तैनात भी हैं। इस पर भी कुल 903 केंद्र डाक्टरविहीन हैं और 14873 केंद्रों में केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध है। 7 हजार 676 केंद्रों में लैब तकनीशियन नहीं है तो 5 हजार 549 केंद्रों में फार्मास्यूटिकल नहीं है। केवल 5 हजार 438 केंद्रों में महिला डाक्टर उपलब्ध हैं। दूसरी ओर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डाक्टरों की संख्या और भी दयनीय है। आवश्यकता है 19 हजार 332 विशेषज्ञों की जबकि सरकार केवल 9 हजार 914 की ही व्यवस्था कर पाई है और उनमें से भी 5 हजार 858 ही कार्यरत हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि देश की बड़ी आबादी के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं कितनी कम हैं। इससे यह भी साफ है कि यदि हमें सबको स्वास्थ्य का सपना साकार करना है तो इसके दस-बीस गुणे बजट की आवश्यकता पड़ेगी, जो वर्तमान स्थिति में संभव ही नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? यदि हम रोगों की बात करें तो वर्तमान में जो रोग देश में व्यापक हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश हमारी जीवनशैली और खान-पान में आए बदलाव के कारण बढ़ रहे हैं। चाहे वह हृदय रोग हो या रक्तचाप, मधुमेह हो या फिर मोटापे की। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में भी मलेरिया, डायरिया और तपेदिक जैसी बीमारियां ही अधिक देखी जा रही हैं। वर्ष 2012 में जिन बीमारियों के कारण अधिक मौतें हो रही हैं उनकी सूची इस प्रकार है

क्र. रोग                  मामले    मौतें     मौत दर (%)

1  रैबीज                 212     212    100.00

2  एक्यूट इसेफ्लाइटिस     8344    1256   15.05

3  टिटेनस               3421    248    7.25

4  मेनिंगकोकल मेनिनजाइटिस        5609   413    7.36

5  तपेदिक (2011)        1515872 63265  4.17

6  स्वाइन फ्लू            5044    405    8.03

7  टिटेनस (नवजात)       748     42     5.61

8  डिप्थिरिया             3902    60     1.54

इससे यह स्पष्ट है कि इनमें से अधिकांश रोगों में ऑपरेशन की कोई आवश्यकता नहीं है और यह भी कि इनमें से अधिकांश रोग देशज चिकित्सा पद्धतियों यानी कि आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा तथा वैकल्पिक पद्धतियों यानी कि होमियोपैथ, यूनानी आदि से भी ठीक की जा सकती हैं। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि ये पद्धतियां अनुभवसिद्ध हैं और सस्ती भी हैं। इसलिए आयुष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। परंतु आयुष को लेकर सरकार की नीतियां न तो तब ठीक थीं और न ही अब ठीक हैं।

आयुषः भारतीय व वैकल्पिक पद्धतियां

वर्तमान में देश में आयुष क्षेत्र के तहत बुनियादी ढांचे में 62 हजार 649 बिस्तरों की क्षमता के साथ 3 हजार 277 अस्पतालों, 24 हजार 289 औषधालयों, 495 अंडर ग्रेजुएट कॉलेजों, 106 स्नातकोत्तर विभागों वाले कॉलेज और देश में भारतीय चिकित्सा पद्धति और होम्योपैथी के 7 लाख 85 हजार 185 पंजीकृत चिकित्सक हैं। परंतु दुःख की बात यह है कि सरकार ही आयुर्वेद व होमियोपैथ के डाक्टरों के साथ भेदभाव करती है। आयुर्वेद के डाक्टरों को शल्य चिकित्सा यानी कि ऑपरेशन करने की छूट नहीं है। हालांकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का विशद् वर्णन है और इसका काफी गौरवपूर्ण इतिहास भी रहा है। माना जाता है कि सुश्रुत मस्तिष्क का ऑपरेशन करने वाले दुनिया के पहले चिकित्सक थे। इस पर भी अंग्रेजी सरकार ने देश की परतंत्रता के कालखंड में आयुर्वेद पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगा रखे थे जो आज भी यथावत् चले आ रहे हैं।

इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतिबंध था पंजीकृत किए जाने का। आयुर्वेद एक परंपरागत ज्ञान परंपरा है और इस कारण बड़ी संख्या में इसके विशेषज्ञ आज की पढ़ाई से दूर हैं। इस कारण उनका पंजीकरण नहीं हो सकता। परंतु अंग्रेजी कानूनों के अनुसार केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर ही चिकित्सा कार्य कर सकता है। इस कारण बड़ी संख्या में आयुर्वेदिक वैद्य अवैध सिद्ध हो जाते हैं। दुःखद यह है कि स्वाधीनता के 67 वर्षों के बाद भी भारत सरकार इसका कोई समाधान नहीं निकाल पाई। वास्तव में देख जाए तो प्रारंभ में सरकार का आयुर्वेद के प्रति काफी उपेक्षा का भी रवैया था। अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारतीय सरकारों ने आयुर्वेद को समाप्त कर इसके स्थान पर एलौपैथ को स्थापित करने पर ही पूरी ताकत लगाई। इसका ही परिणाम है कि आज भी 41 हजार करोड़ रूपयों के स्वास्थ्य बजट में केवल 411 करोड़ रूपये ही आयुष को दिए गए हैं और उसमें से भी आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा के लिए केवल 217 करोड़ रूपये ही आबंटित किए गए हैं।

इन देशज प्रणालियों की ओर सरकार का ध्यान स्वाधीनता मिलने के 17 वर्ष बाद 1964 में गया था जबकि पहली स्वास्थ्य नीति 1952 में ही बनी थी। 1964 में सरकार ने आयुर्वेदिक औषधालय खोलने का निर्णय लिया था, परंतु इसकी चाल इतनी धीमी थी कि वर्ष 2007 तक केवल 31 औषधालय ही खोले गए थे। हालांकि इस क्षेत्र में कितनी अधिक संभावनाएं थी, इसका पता केवल इस एक बात से लगाया जा सकता है कि आज देश में 24 हजार 289 आयुर्वेदिक औषधालय हैं और वह भी न्यूनतम बजट के बावजूद। इसके बाद भी आयुर्वेद जैसी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध, विकास और इनके अस्पतालों की स्थापना पर सरकार का ध्यान 1995 में गया यानी कि स्वाधीनता से पूरे 48 वर्ष बाद। मार्च 1995 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होमियोपैथी विभाग की रचना की गई और बात में वर्ष 2003 में इसका नाम बदल कर आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी विभाग (आयुष) कर दिया गया। हालांकि सिद्ध और यूनानी जैसी पद्धतियां काफी कम ही प्रचलित हैं, परंतु इससे सरकार का ध्यान आयुर्वेद की ओर से कम ही हो गया। आयुष की स्थापना के बावजूद यह सब लंबे समय तक सरकारी दिखावा ही बना रहा। हजारों करोड़ के स्वास्थ्य मंत्रालय के बजट में से आयुष को केवल कुछ सौ करोड़ रूपये ही मिलते रहे हैं। इतना ही नहीं, ऐलोपैथ के शोध, शिक्षण आदि के लिए भी इससे कहीं अधिक रूपये दिए जाते रहे हैं।

इस भेदभाव के बावजूद आयुष तेज गति से आगे बढ़ा। एक तो ये पद्धतियां सस्ती हैं, इस कारण कम बजट में भी ये तेजी से फैलीं। साथ ही एलौपैथी चिकित्सा पद्धति की अनेक खामियां और अनेक रोगों के इलाज में इसकी असमर्थता उजागर होने के बाद आम जनता उससे दूर जाने लगी। वास्तव में देखा जाए तो चिकित्सकीय विकास के तमाम दावों के बावजूद देश की स्वास्थ्य समस्याओं में कोई कमी नहीं आई है। आम आदमी को परेशान करने वाले मलेरिया, डायरिया, तपेदिक, दमा, कैंसर आदि रोग पहले से कहीं अधिक जटिल और खतरनाक हो गए हैं। एलौपैथ का इलाज काफी मंहगा और आम जनता की पहुंच से दूर है। ऊपर हम देख चुके हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त संख्या में डाक्टर ही नहीं हैं और सामुदायिक केंद्रों में भी विशेषज्ञ डाक्टरों का घोर अभाव है। डाक्टर मूलतः शहरों में बैठे हैं और ऊंची फीस वसूल कर ही ईलाज कर रहे हैं। सरकारी अस्पताओं में दुर्व्यवस्थाओं का यह आलम है कि मध्यम वर्ग तक इनमें जाने से घबराता है। संभवतः सरकार ने भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया प्रतीत होता है और संभवतः इसी कारण देश में और अधिक एम्स खोले जाने का प्रयास हो रहा है। परंतु वर्तमान एम्स का ही स्तर काफी गिर गया है। ऐसे में नए खुलने वाले एम्सों की दुर्गति वर्तमान सरकारी अस्पतालों जैसी नहीं हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी है?

चिकित्सा और व्यावसायीकरण

सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों की दुरावस्था का सबसे बड़ा कारण है एलौपैथी चिकित्सा का अत्यंत मंहगा होना और इस कारण इसका व्यावसायीकरण। निजी संस्थानों से एमबीबीएस की पढ़ाई करने में आम तौर पर 30-40 लाख रूपयों का खर्च आता है। सरकारी संस्थानों से पढ़ाई करने में भी 4-5 लाख रूपये खर्च हो जाते हैं। स्वाभाविक ही है कि जो इतनी मंहगी शिक्षा ले रहा है, वह समाजसेवा तो नहीं ही करेगा। इसमें भी ध्यान देने की बात यह है कि इस पद्धति में रोग पहचानने में ही सर्वाधिक व्यय हो जाता है। रोग पहचानने की मशीनें काफी मंहगी हैं और उनके कारण इसका ईलाज भी काफी मंहगा है। एक एलौपैथ के अस्पताल के स्थापित करने का खर्च कई करोड़ में आएगा। इतना खर्च करने वाली संस्था समाजसेवा नहीं ही कर सकती। भले ही उसे जमीन सरकार ने दी हो। स्वाभाविक ही है कि एलौपैथ ही चिकित्सा के व्यावसायीकरण के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है।

हालांकि आयुर्वेद का भी कुछ हद तक व्यावसायीकरण होना प्रारंभ हो गया है परंतु फिर भी इस क्षेत्र में अनेक लोग और संस्थाएं निस्स्वार्थ रूप से कार्यरत हैं। इसके अलावा देश के गांव-गांव में देसी वैद्य पाए जाते हैं। अधिकांश आयुर्वेदिक दवाएं घर में भी बनाई जा सकती हैं। लोग बनाते भी हैं। उनकी विधियां सर्वसुलभ हैं। सीधी-सी बात है कि इसका व्यावसायीकरण न तो फलदायक है और न ही संभव है। सरकार यदि आयुर्वेद को स्कूली शिक्षा से ही बढ़ाना शुरू कर दे, तो स्वास्थ्य पर किया जाने वाला बजट काफी कम हो जा सकता है।

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है अंतरराष्ट्रीय दबाव-समूहों के कारण लिए जाने वाले फैसले। उदाहरण के लिए सभी गर्भवती स्त्रियों के लिए एड्स की जांच करवाना सरकार ने अनिवार्य करवा रखा है। यह एक व्यर्थ की कवायद है। इसमें केवल सरकार का खर्च होना है। यह जांच वैकल्पिक की जानी चाहिए। इसी प्रकार और भी कई व्यवस्थाएं हैं, जो जरूरी नहीं होने पर भी सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से थोपी जा रही हैं और जिसमें काफी खर्च भी किया जा रहा है। इसका प्रभाव आम आदमी पर भी पड़ रहा है।

आयुर्वेदिक वैद्य प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों को भी सक्रिय कर सकते हैं। थोड़े से प्रशिक्षण से गांव के वैद्य को गांव में होने वाली सामान्य बीमारियों जैसे कि मलेरिया, डायरिया, खांसी-जुकाम, ज्वर, गैस्ट्रिक आदि का ईलाज करने योग्य बनाया ही जा सकता है। इतना तो वे पहले से भी जानते ही हैं, केवल एक पंजीकरण की आवश्कता होती है जो पूरी की जा सकती है। उन्हें इन केंद्रों में बैठाया जा सकता है। साथ ही एमबीबीएस डाक्टर उपलब्ध न होने पर बीएएमएस डाक्टरों को भी बैठाया जा सकता है। इससे आयुर्वेद की महत्ता भी बढ़ेगी और उसकी शिक्षाओं का भी प्रचार प्रसार होगा। साथ ही चिकित्सा का व्यावसायीकरण भी रूकेगा। देखा जाए तो शल्य क्रिया यानी कि ऑपरेशन के अलावा और किसी भी रोग के ईलाज के लिए आयुर्वेद व अन्य चिकित्सा प्रणालियां पर्याप्त सक्षम हैं। इसलिए देश भर में मंहगे अस्पतालों की उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, बनिस्पत कि सामान्य बीमारियों को प्रारंभ में ही रोक देने वाले सामान्य अस्पतालों की।

कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं से अधिक देश में स्वास्थ्य शिक्षा की आवश्यकता है। अच्छी स्वास्थ्य शिक्षा से आधी से अधिक बीमारियां होने से रोकी जा सकती हैं। इससे न केवल सरकार, बल्कि जनता के भी पैसों की बचत होगी। सरकार को बजटीय प्रावधान करते हुए इसका भी ध्यान रखना चाहिए। आयुर्वेद जैसी भारतीय चिकित्सा प्रणालियां इसी अव्यवसायिक और ईलाज से परहेज अच्छा वाले चिकित्सकीय तंत्र को मजबूत करती हैं। यही कारण भी था कि महात्मा गांधी ने 1909 में लिखी अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में देश से डाक्टरों को पूरी तरह हटाए जाने की बात कही थी और मृत्यु पर्यंत अपनी बात पर डटे रहे थे। आज एक बार फिर महात्मा गांधी जी के उसी भविष्य-दृष्टि को सामने रख कर देश का स्वास्थ्य बजट बनाए जाने की आवश्यकता है। केवल तभी सबको स्वास्थ्य का सपना साकार किया जा सकता है।

साभारः योजना अगस्त-2014

2 लाख आंगनवाड़ी केन्द्रों को मिलेगी छत

 

आशुतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली/ नई राजग सरकार ने आते ही नीतिगत फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। इस कड़ी में सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2 लाख आगनवाड़ी केन्द्र की इमारतें बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।2013-14 में 20000, 2014-15 में 50,000, 2015-16 में 60,000 व 2016-17 में 70,000 आंगनवाड़ी केन्द्रों को क्रमशः अपना छत नसीब होगा।

राज्यसभा में दिए लिखित उत्तर में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने बताया कि इन इकाईयों का निर्माण 4.5 लाख रुपये प्रति इकाई के दर से किया जाएगा, जिसके खर्च का वहन केन्द्र और राज्यों के बीच 75:25 के अनुपात में होगा, जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए यह अनुपात 90:10 है।

उन्होंने यह भी बताया कि अब तक राज्यों को 44,709 आंगनवाड़ी केन्द्र इमारतों के निर्माण को मंजूरी दी गई है, जिसमें ओड़िशा में 5556 इमारतों का निर्माण शामिल है। बजट आवंटन के संबंध में उन्होंने बताया कि वर्ष 2013-14 में राज्यों/ केन्द्रशासित प्रदेशों को 72,334.01 लाख रुपये की पहली किस्त जारी कर दी गई है।

सरकार के इस फैसले से बिना छत के चल रहे आंगनवाड़ी केन्द्रों को अपना छत मिल जायेगा। इस फैसले का आंगनवाणी कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है।

 

मधुमेह की दवाइयां हुई 79 फीसद सस्ती!

  • डेस्कमहंगी दवाइयों की गुंज अब संसद में भी सुनाई देने लगी है। पिछले दो-तीन वर्षों से महंगी दवाइयों को लेकर लगातार आंदोलन होता रहा है। रसायन व उर्वरक राज्य मंत्री निहाल चंद ने राज्यसभा में पूछे गए महंगी दवाइयों के सवाल के जवाब में लिखित उत्तर देते हुए कहा कि, मधुमेह और हृदय रोग के उपचार से संबंधित गैर-अधिसूचित 108 दवाओं के सदंर्भ में अधिकतम खुदरा मूल्‍य (एमआरपी) की सीमा तय करने के लिए राष्‍ट्रीय औषधीय मूल्‍य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की पहल के परिणामस्‍वरूप इन दवाओं की कीमतों में लगभग 01 प्रतिशत से लेकर 79 प्रतिशत तक कमी आई है।’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये 108 दवाएं अनिवार्य दवाओं की राष्‍ट्रीय सूची में शामिल नहीं हैं और औषधि मूल्‍य नियंत्रण आदेश, 2013 के पैरा 19 के अधीन इनकी कीमतों में कमी की गई है। उनका यह भी कहना था कि कुछ दवा निर्माता संघों ने एनपीपीए द्वारा इन संबंधित अधिसूचनाओं को वापस लेने की मांग की है।

    इस बावत स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशुतोष कुमार सिंह का कहना है कि जब देश में दवाइयों का मुनाफा 1000 फीसदी हो वहां पर 50-100 फीसदी दाम कम हो जाने से बहुत फायदा नहीं होने वाला है। श्री आशुतोष ने सरकार को दवाइयों के निर्माण में खुद आगे आने की अपील की और कहा की जिस देश का घरेलु दवा बाजार 1 लाख हजार करोड़ रूपये के आस-पास हो, वहां की सरकार इसे निजी हाथों में कैसे छोड़ सकती है!

    नोटःयह खबर बियोंड हेडलाइन्स डॉट कॉम पर प्रकाशित है