चौपाल मन की बात

‘पीरियड’ एक फ़िल्म भर का मुद्दा नहीं है

जिस बात पर सबसे ध्यान देने की ज़रूरत है, वह यह है कि पीरियड में आप चाहें सेनिटरी पैड इस्तेमाल में ला रही हों, क्लॉथ-पैड का प्रयोग करती हों या फ़िर टैम्पॉन, कप जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करती हों, इसे बस औरतों की गुप-चुप बात न बनाए रखें. इसके बारे में बात करें, अपने घर के मर्दों से बात करें, घर पर काम करने आने वाली दीदीयों से बात करें, अपनी बेटी से बात करें, अपनी माँ से सवाल-जवाब करें, अपने किशोर होते बेटों को समझाएं ताकि उनके दिमाग में कोई अधूरी जानकारी घर न कर जाए.
साथ ही साथ सेनिटरी पैड वालों के किसी भी फ़िज़ूल के एड का भरोसा न करें. वे चाहे लाख कहें कि पीरियड में भी आपको आम दिनों की तरह रहना चाहिये, उतना ही काम करना चाहिये, उनकी बात न मानें. आप भी जानती हैं कि आपका शरीर इन दिनों उन हालात में नहीं रहता कि आप नॉर्मल रह पायें तो फ़िर बाज़ार की बकवास सुननी ही क्यों है?
खैर, बाज़ार अनजाने में भी कभी-कभी भली बात कर जाता है. शुक्र है कि फ़ायदे के लिए ही सही, सिनेमा जैसे वृहत माध्यम के ज़रिये पीरियड्स पर वह बात तो हो रही है जो आम-लोगों तक जायेगी, वर्ना सोशल मीडिया की बहस का क्या है, यहीं शुरू होती है, यहीं ख़त्म हो जाती है.

SBA विशेष स्वस्थ भारत अभियान

बालिका स्वास्थ्य का संदेश घर-घर पहुंचाने की सार्थक पहल

इस परिसंवाद की खास बात यह रही की इसमें बोलने, सुनने और करने वाले ज्यादातर युवा थे. हावर्ड से पब्लिक हेल्थ में मास्टर डीग्री हासिल कर लौटी डॉ अनन्या अवस्थी ने परिसंवाद के शुरू में ही अपनी बात रखते हुए कई सुझाव दिए.उनका मानना था कि आंगनवाड़ी जैसी ब्यवस्थाओं को और कौशलयुक्त एवं सूचनापरक बनाया जाये. स्वस्थ भारत न्यास के रविशंकर ने विषय प्रवेश कराते हुए, इस विषय की परिकल्पना, इसके विस्तार क्षेत्र को सूक्त शब्दों में रखा. वही न्यास के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने स्वस्थ क्षेत्र में किये गए अपने प्रयासों को साझा करते हुए कहा कि न्यास इस विषय को समाधानपरक बनाने की हर संभव कोशिश करेगा. वही धीप्रज्ञ द्विवेदी ने इस विषय को देश के हर कोने में ले जाने की घोषणा की और इस मुहीम में सभी को जुड़ने का आह्वान किया.

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कब तक ढोते रहेंगे बालिका भ्रूण हत्या जैसे कलंक

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 1981 में 0-6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1000-962 था जो 1991 में घटकर 1000-945 और 2001 में 1000-927 रह गया। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2001 से 2005 के अंतराल में करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण हत्याएं हुई हैं। इस लिहाज से देखें तो इन चार सालों में रोजाना 1800 से 1900 कन्याओं को जन्म लेने से पहले ही दफ्न कर दिया गया।