SBA विशेष

पीएम जनऔषधि परियोजना को अंतिम जन तक पहुंचाने की कवायद

पीएमबीजेपी की अगर बात करें तो ऐसा पहली बार हो रहा है कि पीएमबीजेपी के टॉप मॉस्ट अधिकारी जनऔषधि संचालकों से मिल रहे हैं। उन्हें सेमिनार में बुलाया जा रहा है। उनकी समस्याएं सुनी जा रही हैं। ऐसा पहले नहीं देखने को मिल रहा था। जनऔषधि संचालकों को राम-भरोसे छोड़ दिया गया था। चिकित्सकों से इस योजना के बारे में चर्चा नहीं की जा रही थी। लेकिन अब आम लोग से लेकर चिकित्सक, फार्मासिस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता सभी को इस योजना से जोड़ा जा रहा है। और इस योजना को सफल बनाने की सार्थक कोशिश की जा  रही है। इसी कड़ी में इस पिछले सप्ताह 20 जुलाई को गुजरात के सूरत में जनऔषधि को लेकर पीएमबीजेपी ने एक सेमिनार आयोजित किया था। इस आयोजन में  जनऔषधि स्टोर चला रहे संचालकों एवं स्थानीय चिकित्सकों को भी बुलाया गया था। स्वास्थ्य के प्रति सजग एवं पीएमबीजेपी को मजबूत करने के इरादे से आयोजित यह सेमिनार बहुत सफल रहा। चिकित्सकों के मन में जेनरिक दवाइयों को लेकर व्याप्त भ्रम तो दूर हुआ ही साथ ही जनऔषधि संचालकों को काम करने की एक नई ऊर्जा भी मिली।

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काम की बातें समाचार

सैनेटरी पैड के सुरक्षित निपटारे के लिए नया उपकरण

देश भर में करीब 43.2 करोड़ उपयोग किए गए सैनेटरी नैपकिन हर महीने फेंक दिए जाते हैं। भविष्य में यह संख्या तेजी से बढ़ सकती है। सैनेटरी नैपकिन का सही ढंग से निपटारा न होने से चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं क्योंकि उपयोग किए गए सैनेटरी नैपकिन में कई तरह के रोगाणु होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक हो सकते हैं। कई बार उपयोग के बाद सैनेटरी नैपकिन इधर-उधर फेंक देने से जल निकासी भी बाधित हो जाती है।

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विविध समाचार

आदर्श ग्राम नागेपुर में धूमधाम से मनाया गया मासिक महोत्सव 

आदर्श ग्राम नागेपुर के लोक समिति आश्रम में विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस पर ‘मासिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत माहवारी पर केंद्रित परिचर्चा, कविता पाठ, पोस्टर प्रदर्शनी, अंताक्षरी प्रतियोगिता एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।कार्यक्रम की शुरुआत किशोरियों के साथ ग्रुप एक्टिविटी से की गई, जिसमें किशोरियों ने माहवारी पर अपनी समझ और अनुभवों को साझा किया। किशोरियों के अनुभवों के आधार पर मुहीम संस्था की स्वाती सिंह ने उन्हें माहवारी से स्वच्छता, स्वास्थ्य और भ्रांतियों जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों के बारे में जागरूक किया। साथ ही, किशोरियों को माहवारी प्रबंधन के लिए मौजूद विकल्पों के बारे में जानकारी देते हुए, माहवारी केंद्रित जानकारी पत्र ‘स्वस्थ पन्ना’ वितरित किया गया।

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मन की बात विविध

साक्षात्कारः पीरियड का मुद्दा सिर्फ ‘दाग़’ और ‘दर्द’ तक सीमित नहीं है: स्वाती सिंह

स्वस्थ समाज की कल्पना हम एक स्वस्थ माहौल के बिना नहीं कर सकते हैं, जिसकी शुरुआत हमें आज से करनी होगी| पीरियड के मुद्दे पर देखा जाए तो आज भी अधिकाँश लड़कियां पहली बार पीरियड आने पर डर जाती है, क्योंकि इसके बारे में उन्हें पहले कुछ भी नहीं बताया जाता| ऐसे में ज़रूरी है कि किशोरियों को पीरियड के बारे पहले से प्रशिक्षित किया जाए, जिससे उनके पहले पीरियड का अनुभव उनके लिए डरावना न हो।

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काम की बातें विविध समाचार

Menstrual Hygiene Day Period Fest’ 18 & Pad Yatra : All days are good days!

Post this, the Sachhi Saheli team escorted the crowd and gathered them for the pad yatra. The crowd bearing placards and banners with slogans such as “My Period My Proud”, “Break the Bloody Taboo” marched in unison around the inner circle in Connaught Place. The rally was later joined by day’s Chief guest Hon’ble Dy. Chief Minister Mr. Manish Sisodia as well.

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चिंतन मन की बात विविध

 विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस पर विशेष: माहवारी है ईश्वर की सौगात , इस पर करें हम खुलकर बात

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की रिपोर्ट आई है जिसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में आज भी 62 प्रतिशत लड़कियां और महिलाएं पीरियड्स के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। इस सर्वे में 15 से 24 आयु वर्ग की महिलाओं को शामिल किया गया था। कई राज्यों में तो 80 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं पीरियड्स के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। 2015-16 सर्वे में खुलासा हुआ कि देश में महिलाएं आज भी पीरियड्स के लिए कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। बिहार में 82 प्रतिशत महिलाएं जहां कपड़े का इस्तेमाल करती हैं, वहीं उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। इन दोनों प्रदेशों में 81 प्रतिशत महिलाएं कपड़ा इस्तेमाल करती हैं। सर्वे ने पाया कि 42 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करतीहैं। वहीं 16 प्रतिशत महिलाएं लोकल तौर पर बनाए गए नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं।

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चौपाल मन की बात

‘पीरियड’ एक फ़िल्म भर का मुद्दा नहीं है

जिस बात पर सबसे ध्यान देने की ज़रूरत है, वह यह है कि पीरियड में आप चाहें सेनिटरी पैड इस्तेमाल में ला रही हों, क्लॉथ-पैड का प्रयोग करती हों या फ़िर टैम्पॉन, कप जैसी चीज़ों का इस्तेमाल करती हों, इसे बस औरतों की गुप-चुप बात न बनाए रखें. इसके बारे में बात करें, अपने घर के मर्दों से बात करें, घर पर काम करने आने वाली दीदीयों से बात करें, अपनी बेटी से बात करें, अपनी माँ से सवाल-जवाब करें, अपने किशोर होते बेटों को समझाएं ताकि उनके दिमाग में कोई अधूरी जानकारी घर न कर जाए.
साथ ही साथ सेनिटरी पैड वालों के किसी भी फ़िज़ूल के एड का भरोसा न करें. वे चाहे लाख कहें कि पीरियड में भी आपको आम दिनों की तरह रहना चाहिये, उतना ही काम करना चाहिये, उनकी बात न मानें. आप भी जानती हैं कि आपका शरीर इन दिनों उन हालात में नहीं रहता कि आप नॉर्मल रह पायें तो फ़िर बाज़ार की बकवास सुननी ही क्यों है?
खैर, बाज़ार अनजाने में भी कभी-कभी भली बात कर जाता है. शुक्र है कि फ़ायदे के लिए ही सही, सिनेमा जैसे वृहत माध्यम के ज़रिये पीरियड्स पर वह बात तो हो रही है जो आम-लोगों तक जायेगी, वर्ना सोशल मीडिया की बहस का क्या है, यहीं शुरू होती है, यहीं ख़त्म हो जाती है.

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SBA विशेष स्वस्थ भारत अभियान

बालिका स्वास्थ्य का संदेश घर-घर पहुंचाने की सार्थक पहल

इस परिसंवाद की खास बात यह रही की इसमें बोलने, सुनने और करने वाले ज्यादातर युवा थे. हावर्ड से पब्लिक हेल्थ में मास्टर डीग्री हासिल कर लौटी डॉ अनन्या अवस्थी ने परिसंवाद के शुरू में ही अपनी बात रखते हुए कई सुझाव दिए.उनका मानना था कि आंगनवाड़ी जैसी ब्यवस्थाओं को और कौशलयुक्त एवं सूचनापरक बनाया जाये. स्वस्थ भारत न्यास के रविशंकर ने विषय प्रवेश कराते हुए, इस विषय की परिकल्पना, इसके विस्तार क्षेत्र को सूक्त शब्दों में रखा. वही न्यास के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने स्वस्थ क्षेत्र में किये गए अपने प्रयासों को साझा करते हुए कहा कि न्यास इस विषय को समाधानपरक बनाने की हर संभव कोशिश करेगा. वही धीप्रज्ञ द्विवेदी ने इस विषय को देश के हर कोने में ले जाने की घोषणा की और इस मुहीम में सभी को जुड़ने का आह्वान किया.

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SBA विशेष

कब तक ढोते रहेंगे बालिका भ्रूण हत्या जैसे कलंक

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 1981 में 0-6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1000-962 था जो 1991 में घटकर 1000-945 और 2001 में 1000-927 रह गया। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2001 से 2005 के अंतराल में करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण हत्याएं हुई हैं। इस लिहाज से देखें तो इन चार सालों में रोजाना 1800 से 1900 कन्याओं को जन्म लेने से पहले ही दफ्न कर दिया गया।

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