SBA विशेष काम की बातें चिंतन

साहब! एड्स नहीं आंकड़ों का खेल कहिए…

आज चारों ओर बाजार का दबदबा है। उसने हमारे मनोभाव को इस कदर गुलाम बना लिया है कि हम उसके कहे को नकार नहीं पाते। वह जो कहता है, वही जीवन-आधार और सुख का मानक हो जाता है! इसी बाजार ने एक बीमारी दी, जिसको वर्तमान में एड्स के नाम से जाना जाता है। इसके लिए बाजार ने बहुत ही शातिर तरीके से सुख-खोजी प्रवृत्ति को सुख-भोगी बना दिया है! भोग-बाजार के विस्तार ने पारिवारिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया, संबंध और रिश्तों के अनुशासन को बाजार के हवाले कर दिया और जरूरतों को वस्तुवादी बना दिया। फिर हम खुद भी बाजार के लिए एक वस्तु बन गए! वर्तमान में बीमारियों में सबसे बड़े ब्रांड के रूप में एड्स की पहचान है! पहले भोगी बना कर बाजार ने कमाई की और अब उसके दुष्परिणाम को बेच कर बाजार अपना विस्तार पा रहा है। बाजार-विस्तार को सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर मालूम चलता है कि बाजार ने हमें बीमारू किस तरह से बना दिया है।

यदि लेख/समाचार से आप सहमत है तो इसे जरूर साझा करें
SBA विशेष

एड्स : बचाव ज़रूरी है

एक व्यक्ति से दूसरे में एचआईवी की प्रक्रिया तब होती है, जब एचआईवी सवंमित व्यक्ति का आंतरिक तरल एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति की तहत तक पहुंचता है, जिसमें ब्लडस्ट्रीम शामिल होती है, तब वह दूसरे में पहुंचता है. आमतौर पर एचआईवी कई तरह दूसरे में पहुंचता है, जैसे एक ही सुई का इस्तेमाल, अनप्रोटेक्टेड एनल, वैजाइनल और कभी-कभी ओरल सेक्स और मां से शिशु में अगर उसे डिलीवरी से पहले इसकी समस्या हो साथ ही स्तनपान से भी. एचआईवी असुरक्षित तरीके से कई साथियों के साथ यौन संबंध बनाने से, रक्त के उत्पादों को लेने से, मां से शिशु में (जन्म से पहले या इसके दौरान या फिर स्तनपान के समय) और सहवास के दौरान (वैजाइनल और एनल). जेनिटल और रेक्टम में एचआईवी सीधे म्यूकस में ब्रेन्स को संक्रमित कर सकता है या फिर कटने से भी या ज़ख़्म से भी सहवास के दौरान इसका संक्रमण संभव है. इसको ज़्यादातर लोग ध्यान नहीं देते हैं. वैजाइनल और एनल सहवास में सबसे ज़्यादा इसकी आशंका रहती है.

यदि लेख/समाचार से आप सहमत है तो इसे जरूर साझा करें
SBA विशेष

‘एड्स’ का बाजारशास्त्र !

Ashutosh Kumar Singh For SBA भारत एक ‘सुख-खोजी’ देश रहा है। भारतीय सांस्कृतिक चेतना का विस्तार सुखानुभूति पर आधारित रही है। सुख की खोज भारतीयों को आध्यात्म से जोड़ता है। जब मन-मस्तिष्क आध्यात्म की सीमा में प्रवेश करता है, तब आप मानवतावादी हो जाते हैं, सही मायने में धार्मिक हो जाते हैं। क्या करें? क्या […]

यदि लेख/समाचार से आप सहमत है तो इसे जरूर साझा करें
SBA विशेष

‘एड्स’ का समाजशास्त्र

एड्स को ले के फैली भ्रांतियों के हालात इतने गंभीर हैं कि महानगरों के बड़े अस्पताल व डाक्टर एचआईवी संक्रमितों का इलाज अपने यहां करने से परहेज करते हैं। ऐसे लोगों को काम नहीं मिलता, ऐसे में एचआईवी ग्रस्त लोगों की बड़ी संख्या बेरोजगार के रूप में अर्थ व्यवस्था को आहत कर रही है। यहां जानना जरूरी है कि अभी तक उजागर एड्स के मामलों में 78 फीसदी अलग-अलग तरह के यौन संबंधों से पनपे हैं। गौरतलब है कि 20 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लोग सर्वाधिक यौन सक्रिय होते हैं। चिंता का विषय है कि जब इस आयुवर्ग के लोग एड्स जैसी बीमारी से ग्रस्त होंगे तो देश को सक्रिय मानव शक्ति का कितना नुकसान होगा।

यदि लेख/समाचार से आप सहमत है तो इसे जरूर साझा करें