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अच्छे डॉक्टर मिल जाए तो जिंदगी बदल जाती है…ऐसी ही यह कहानी हैं…देखें चार मिनट में…

डॉ. मनीष कुमार, न्यूरो सर्जन हैं। वे हमेशा इस तरह का काम करते रहते हैं कि सुनकर विश्वास न हो। इस बार उन्होंने ट्राइजैमनल न्यूरोलजिया की एक मरीज की सर्जरी की है। पांच दिनों में वो बिल्कुल ठीक हो गई। क्या कहती है मरीज, आप खुद सुनिए उसके जुबानी…

SBA विशेष दस्तावेज

NMC-2017: स्वास्थ्य शिक्षा की बदलेगी तस्वीर…

स्वास्थ्य शिक्षा किसी भी देश के स्वास्थ्य व्यवस्था को सुचारू रुप से चलाने के लिए जरूरी घटक होता है। स्वास्थ्य व्यवस्था को गतिमान बनाने के लिए एक ऐसी विधायी व्यवस्था की जरूरत होती है जो समय के साथ-साथ कदम ताल मिलाए। यही सोचकर सरकार ने एनएमसी बिल जल्द से जल्द पास कराना चाहती है। ऐसा नहीं है कि भारत में इस बिल के पहले स्वास्थ्य शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं रही है। 6 दशक पहले भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम,1956 के अंतर्गत मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया का गठन किया गया था। इसके ऊपर देश की चिकित्सा सेवा एवं व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानको के अनुरूप रखने की जिम्मेदारी थी। लेकिन कालांतर में यह संस्था भ्रष्टाचार के गिरफ्त में आ गई और मेडिकल कॉलेजों से ऐसे लोग पास होकर निकलने लगे, जिनकी चिकित्सकीय योग्यता कटघरे में रही। हद तो उस समय हुई जब इस संस्था का अध्यक्ष एक मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने के बदले घुस लेने के आरोप में सीबीआई के हाथों पकड़ा गया। 23 अप्रैल, 2010 का वह दिन एमसीआई के इतिहास का काला दिन साबित हुआ। उस दिन अध्यक्ष केतन देसाई के संग-संग एमसीआई का ही एक पदाधिकारी जेपी सिंह एवं उक्त मेडिकल कॉलेज का प्रबंधक भी गिरफ्तरा हुआ। एमसीआई भ्रष्टाचार की कहानियां मीडिया में खूब सूर्खियों में रही। दूसरी ओर देश के कोने-कोने से एमसीआई को भंग करने की मांग की जाने लगी। आगे चलकर एमसीआई को भंग करना पड़ा। और आज यह कहानी आईएमसी अधिनियम-1956 की जगह एनएमसी बिल,2017 के रूप में अपने अंतिम निष्कर्ष की ओर है।

SBA विशेष समाचार

एक डॉक्टर जिसने दी 7 साल के रोहित को दी नई रौशनी

ब्रेन ट्यूमर। एक ऐसी बीमारी जिसने 7 साल के रोहित को अपने गिरफ्त में कर लिया था। गोरखपुर से होते हुए रोहित के परिजन दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में पहुंचे थे। यहां पर उन्हें तारीख मिली, वह भी 9 महीने बाद की। ऑपरेशन जल्द न कराने पर रोहित की जिंदगी से रौशनी चले जाने का डर था। उसके पिता राकेश पूरी तरह से डर गए थे। अब क्या होगा। दिल्ली के निजी अस्पतालों ने तीन लाख रूपये तक का खर्च बताया। एक गरीब परिवार के लिए इतनी राशि जुटा पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।