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हरियाणा की छह बालिकाएं बनेंगी स्वस्थ् बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल अम्बेसडर

 

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दिल्ली से जयपुर आने के क्रम में स्वस्थ भारत यात्रा का स्वागत रास्ते में नेस्टिवा हॉस्पिटल में उसकी टीम ने किया। टीम में डॉ अमित के नेतृत्व में नेस्टिवा अस्पताल के सभी कर्मचारियेां ने  यात्रा की सफलता की कामना की और कहा यह मकसद में कामयाव हो। इस अवसर पर नेस्टिवा के निदेशक अंकेश रंजन ने बताया कि नेस्टिवा अस्पताल स्वस्थ बालिका, स्वस्थ समाज की परिकल्पना को पूर्णत: समर्थन देता है। उन्होंने बताया कि इस अभियान को मजबूत करने की दिशा में उनका अस्पताल प्रयासरत है। बालिकाओं के इलाज में यह अस्पताल हरमुमकिन रियायत देने के लिए कृतसंकल्प है।
सुनील सैनी हुए गुरूग्राम के संयोजक

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इसी क्रम में यात्रा गुरूग्राम पहुंची। यहां आल इंडिया क्राइम रिफार्म आॅर्गनाइजेशन के गुरूग्राम शाखा ने सुेंनील कुमार सैनी के नेतृत्व में इफ्कोचौक पर स्वागत किया। इस अबसर पर स्वस्थ भारत (न्यास) ने हरियाणा में छह बालिकाओं को गुडविल अम्बेसडर बनाए जाने की घोषणा की। इनमें विदही(15 वर्ष), उर्वसी सैनी(16 वर्ष), प्रियंका मालवाल (11वर्ष), प्रिंसी मालवाल (11 वर्ष),दुहा(11 वर्ष) और प्राची सैनी(11 वर्ष) शामिल हैं। इस अवसर पर स्वस्थ भारत (न्यास) के चैयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने सुनील सैनी को स्वस्थ भारत अभियान का गुरूग्राम संयोजक मनोनित किया। इस मौके पर सुनील सैनी ने कहा कि बालिकाओं के हित में काम करना उनके लिए गर्व की बात है। टीम इसके बाद गुरूग्राम से जयपुर के लिए रवाना हुई।

गौरतलव है कि स्वस्थ भारत यात्रा भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वे वर्षगांठ पर आरंभ किया गया है। नई दिल्ली में मुख्तार अब्बास नकबी ने इसे हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था।इस यात्रा को गांधी स्मृति एंव दर्शन समिति, संवाद मीडिया,राजकमल प्रकाशन समूह, नेस्टिवा अस्पताल,मेडिकेयर अस्पताल, स्पंदन, जलधारा, हेल्प एंड होप सहित अन्य कई गैरसरकारी संस्थाओं का समर्थन है।

kumar krishnan (journalist)

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स्वास्थ्य क्षेत्र में परवान चढ़ती उम्मीदें

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स्वास्थ्य क्षेत्र में परवान चढ़ती उम्मीदें

——-प्रभांशु ओझा 

यह बात निर्विवाद है कि भारत में आजादी के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र के विकास पर उचित ध्यान नहीं दिया गया. यही कारण है कि स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां साल दर साल बीतने के बाद बढ़ती ही चली गयी हैं. वर्तमान सरकार जिन वैश्विक हालातों में सत्ता में आयी, उसमें नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया कराना सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दा ही नहीं था, बल्कि इसके लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से भारत पर दबाव भी था. संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्यों पर भारत ने इस प्रतिबद्धता के साथ हस्ताक्षर भी किये हैं कि भारत नागरिकों को ‘यूनिवर्सल हेल्थ केयर’ देने की दिशा में हो रही वैश्विक प्रगति के अनुरूप प्रयास करेगा. जाहिर था कि वर्तमान केंद्र सरकार के लिये यह कठिन चुनौती थी. लेकिन अब तक के कार्यकाल में किये गये प्रयासों से यह समझना मुश्किल नहीं है कि केंद्र सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र की हालत सुधारने के लिये गंभीरता से प्रयासरत है. उसने न सिर्फ इस दौरान महत्वपूर्ण योजनायें आरम्भ की हैं, बल्कि स्वास्थ्य स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे और बदलती जरूरतों को समझने का भी माद्दा दिखाया है.     

नेशनल हेल्थ एश्योरेंस मिशन

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार इस बात की वकालत की है कि सरकार का आदर्श लक्ष्य सभी नागरिकों को यूनिवर्सल हेल्थ केयर प्रदान करना है. इस प्रतिबद्धता के अनुरूप ही सरकार ने तकनीकी तौर पर नेशनल हेल्थ एश्योरेंस मिशन के तहत नागरिकों को यूनिवर्सल हेल्थ केयर प्रदान करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य स्वीकार किया. हालांकि इसका नीतिगत रूप अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन उम्मीद की जा रही कि भारत जल्द ही इसको स्पष्ट करते हुये लागू कर देगा. स्पष्ट है कि केंद्र सरकार अब तक सभी नागरिकों को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया कराने की अपनी प्रतिबद्धता से मुकरी नहीं है.

मिशन कायाकल्‍प की शुरूआत

कायाकल्प सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं प्रदान करने की दिशा में एक अहम पहल है. इस पहल को सार्वजनिक सुविधाओं में स्‍वच्‍छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण प्रचलनों को बढ़ावा देने के लिए प्रारंभ किया गया है। पहल के तहत  सार्वजनिक   स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं का मूल्‍यांकन किया जाएगा और ऐसी सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं जो स्‍वच्‍छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण के नवाचारों के असाधारण प्रदर्शन वाले मानदंडों को प्राप्‍त करेंगी उन्‍हें पुरस्‍कार और सराहना प्रदान की जाएंगी। इसके अतिरिक्‍त सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य  सुविधाओं में  स्‍वच्‍छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण प्रचलनों को बढ़ावा देने के लिए स्‍वच्‍छता दिशा-निर्देश 15 मई 2015 को जारी किये गये थे। ये दिशानिर्देश सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं में स्‍वच्‍छता को लेकर योजना निर्माण, बारंबारता, पद्धतियों , निगरानी आदि पर विस्‍तार से जानकारी मुहैया कराते हैं।

किलकारी एवं मोबाईल अकादमी

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गर्भवती महिलाओं, बच्‍चों के माता-पिता और क्षेत्र कार्यकर्ताओं के बीच नवजात देखभाल(एएनसी),  संस्‍थागत प्रसव, नवजात पश्‍चात देखभाल (पीएनसी) एवं प्रतिरोधन के महत्‍व के बारे में उचित जागरूकता सृजित करने के लिए चरणबद्ध तरीके से देशभर में किलकारी एवं मोबाईल अकादमी सेवाएं क्रियान्‍वित  करने का फैसला किया गया है। पहले चरण में 6 राज्‍यों उत्‍तराखंड, झारखंड, उत्‍तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्‍था न (एचपीडी) और मध्‍य प्रदेश में किलकारी प्रारंभ की जाएगी। चार राज्‍यों उत्‍तराखंड, झारखंड, राजस्‍थान एवं मध्‍य प्रदेश में मोबाईल अकादमी की शुरूआत की जाएगी।

किलकारी एक इंटरएक्टिव वॉइस रिस्‍पोन्‍स (आईवीआर) आधारित मोबाईल सेवा है, जो सीधे गर्भवती महिलाओं, बच्‍चों की माताओं एवं उनके परिवारों के मोबाईल फोन पर गर्भावस्‍था एवं शिशु स्‍वास्‍थ्‍य  के बारे में टाईम- सेन्‍सिटीव ऑडियो मैसेज (वॉइस कॉल) भेजती है।

राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला- दक्ष

स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के कौशल में सुधार लाने के लिए गुणवत्ता वाली  सेवाएं (प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य) प्रदान करने के लिए केंद्र  सरकार ने लिवरपूल ट्रॉपिकल मेडिसिन (एलएसटीएम) दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र  में पांच राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला “दक्ष” की स्थापना कर एक बड़ा कदम उठाया। इस पहल का उद्देश्य स्वास्थ्य सुविधाओं में कुशल कर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, सेवा पूर्व प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना और सतत नर्सिंग शिक्षा और चिकित्सा शिक्षा उपलब्ध कराना है। राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशालाओं  को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ा जा रहा है। 30 स्टैंड- अलोन कौशल प्रयोगशालाओं को गुजरात, हरियाणा , बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल,ओडिशा, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे अलग-अलग राज्यों में स्थापित किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि केंद्र सरकार की यह पहल महिलाओं का जीवन बचाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है.

तम्बाकू उत्पादों पर सख्ती

केंद्र सरकार ने जब तम्बाकू उत्पादों के 85 फीसदी हिस्से पर चित्रित चेतावनियां छापने को अनिवार्य किया तो उम्मीद की जा रही थी कि देश का तम्बाकू कारोबार सरकार पर निर्णय बदलने का दबाव बनायेगा. लेकिन केंद्र सरकार ने इस फैसले पर कायम रहते हुये समाज और देश के नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी. केंद्र सरकार का यह फैसला स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ा सबसे साहसी था. यह गौर तलब है कि सरकार के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी मुहर लगायी. कुछ दिनों पहले अपने निर्णय में न्यायालय ने कहा कि सिगरेट निर्माता कंपनियों को केंद्र सरकार की अधिसूचना के तहत सिगरेट पैकेट के 85 फीसदी हिस्‍से पर वैधानिक चेतावनी देनी ही होगी। स्पष्ट है कि तम्बाकू उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की समाज की तरफ कुछ जिम्मेदारी भी है। जितना ज्यादा तम्बाकू उत्पाद के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान को प्रचारित किया जाएगा उतना ही ज्यादा भारतीयों के जीवन को बचाया जा सकता है।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति- एक क्रांतिकारी कदम

केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद एक महत्वपूर्ण पहल देश की पहली  राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति पेश कर की. नीति का उद्देश्य सभी स्तरों पर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समझ बढ़ाना तथा मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में नेतृत्व को सुदृढ़ करके मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को व्यापक स्तर पर ले जाना था। वर्तमान में भारत में सिर्फ समाज के उच्च वर्ग में ही मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता है, लेकिन इस नीति से पहली बात देश में निर्धन तबकों को भी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया जा सकेगा.

यह गौर करने वाली बात है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए पूर्व कानून जैसे भारतीय पागलखाना अधिनियम, 1858 और भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 में मानवाधिकार के पहलू की उपेक्षा की गई थी और केवल पागलखाने में भर्ती म‍रीजों पर ही विचार किया गया था। आजादी के बाद भारत में इस संबंध में पहला कानून बनाने में 31 वर्ष का समय लगा और उसके 9 वर्ष के उपरांत मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य अधिनियम, 1987 अस्तित्‍व में आया। परंतु इस अधिनियम में कई खामियां होने के कारण इसे कभी भी किसी राज्‍य एवं केंद्र शासित प्रदेश में लागू नहीं किया गया। जाहिर है कि भारत में नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य को संबोधित करने के लिये एक नीति की आवश्यकता लगातार बनी हुयी थी.

नये मेडिकल संस्थानों की पहल

भारत में अच्छी गुणवत्ता और सेवाओं वाले मेडिकल संस्थानों की कमी एक बड़ी समस्या है. केंद्र सरकार ने इस समस्या का समाधान निकालने के लिये उल्लेखनीय प्रयास किये हैं. इसके लिये केंद्र सरकार ने भारत के कुछ चुनिंदा जिला स्वास्थ्य केन्द्रों को केंद्र मेडिकल कालेज में परिवर्तित करने की योजना बनायी है। इसे चिकित्सा क्षेत्र में रोजगार तथा कर्मियों की संख्या बढ़ाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है। भारत के कुल 671 जिलों में से 58 जिलों में, जिनमे अभी तक कोई मेडिकल कॉलेज नहीं है , सर्वप्रथम उन जिला सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को मेडिकल कॉलेज में परिवर्तित करने की योजना है। प्रत्येक मेडिकल कॉलेजों में MBBS की कम से कम 100 सीटें होंगी। सरकार ने अपने कार्यकाल में 150 जिला अस्पतालों को परिवर्तित करने का लक्ष्य बनाया है।

जानकारों की मानें तो भारत में एक मेडिकल कॉलेज बनाने पर लगभग 200 करोड़ रुपये की लागत आती है। सरकार ने इस लागत का 25 प्रतिशत राज्य सरकारों के हिस्से में तय किया है। पूर्वोत्तर और पहाड़ी इलाकों में लागत की 15 प्रतिशत हिस्सेदारी राज्य सरकारों की होगी, बाकि बचे 85 प्रतिशत केंद्र द्वारा मुहैय्या कराए जाएंगे। इस योजना के पहले चरण में 22 जिला अस्पतालों को मंजूरी मिल चुकी है तथा पहली किश्त के तौर पे 144 करोड़ रूपए भी जारी कर दिए गए हैं. संकेत हैं कि संसाधन कम होने पर यह योजना PPP मॉडल के अनुसार भी लागू हो सकती है। उस स्थिति में मेडिकल कॉलेज में निवेश निजी क्षेत्र करेगा। केंद्र सरकार की इस योजना से समाज के एक बड़े समूह को सुविधायें मुहैया करायी जा सकेंगी.

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी अन्य उपलब्धियां और चुनौतियां

वास्तव में केंद्र सरकार ने अपने अब तक के कार्यकाल में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं. सरकार द्वारा इबोला और जीका वायरस से निपटने के प्रयासों को भी देश में हर तरफ से प्रशंसा मिली है. बावजूद इसके स्वास्थ्य क्षेत्र में चुनौतियां अब भी बरक़रार हैं. सबसे बड़ी चुनौती है स्वास्थ्य पर खर्च होने वाले बजट 1.04 ( सकल घरेलू उत्पाद)  को बढ़ाना और उसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी तय करना. भारत पर अब अपने स्वास्थ्य ढांचे को दुरुस्त करने का वैश्विक दबाव भी है. उम्मीद की जा सकती है कि केंद्र सरकार इन चुनौतियों से सही योजना और नजरिये से निपटेगी.

बजट 2016: नई स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की होगी शुरूआत, प्रति परिवार 1 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा

राष्‍ट्रीय डायलिसिस सेवा कार्यक्रम शुरू किया जाएगा

healthकेंद्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने आज लोकसभा में वित्‍त वर्ष 2016-17 का आम बजट पेश करते हुए एक नई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा योजना की घोषणा की है। संसद में अपनी बजट घोषणा में वित्‍त मंत्री ने चिंता जताई कि परिवार के सदस्‍यों की गंभीर बीमारी गरीबों एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालती है। ऐसे परिवारों की सहायता करने के लिए सरकार एक नई स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा योजना शुरू करेगी जो प्रति परिवार 1 लाख रुपए तक का स्‍वास्‍थ्‍य कवर प्रदान करेगी। वहीं घर के बुजु्र्ग को 35 हजार रुपये और कवर मिलेगा…।

वित्‍त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा कि किफायती दामों पर गुण्‍वत्‍तापूर्ण दवाओं का निर्माण करना एक बड़ी चुनौती रही है। उन्‍होंने कहा कि हम जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में फिर से तेजी लाएंगे और 2016-17 के दौरान प्रधानमंत्री की जन औषधि योजना के तहत 3000 स्‍टोर खोले जाएंगे। वित्‍त मंत्री ने एक ‘राष्‍ट्रीय डायलिसिस सेवा कार्यक्रम’ शुरू करने का प्रस्‍ताव रखा है। इसके लिए राशि पीपीपी मॉडल के जरिए राष्‍ट्रीयस्वास्थ्य य मिशन के तहत उपलब्‍ध कराई जाएगी जिससे कि सभी जिला अस्‍पतालों में डायलिसिस सेवाएं मुहैया कराई जा सके।

हम क्या चाहते हैं…


भारत को स्वस्थ बनाना…जाने कैसे…

 

किसी भी राज्य के विकास को समझने के लिए नागरिक-स्वास्थ्य को समझना आवश्यक होता है। नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य राष्ट्र की प्रगति को तीव्रता प्रदान करता है। दुनिया के तमाम विकसित देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतनशील व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दुस्तान में स्वास्थ्य चिंतन न तो सरकारी प्राथमिकता में है और न ही नागरिकों की दिनचर्या में। हिन्दुस्तान में स्वास्थ्य के प्रति नागरिक तो बेपरवाह है ही, हमारी सरकारों के पास भी कोई नियोजित ढांचागत व्यवस्था नहीं है जो देश के प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य का ख्याल रख सके।

स्वास्थ्य के नाम पर चहुंओर लूट मची हुई है। आम जनता तन, मन व धन के साथ-साथ सुख-चैन गवां कर चौराहे पर किमकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में है। घर की इज्जत-आबरू को बाजार में निलाम करने पर मजबूर है। सरकार के लाख के दावों के बावजूद देश के भविष्य कुपोषण के शिकार हैं, देश की जन्मदात्रियां रक्तआल्पता (एनिमिया) के कारण मौत की नींद सो रही हैं।

दरअसल आज हमारे देश की स्वास्थ्य नीति का ताना-बाना बीमारों को ठीक करने के इर्द-गीर्द घूम रही है। जबकि नीति निर्धारण बीमारी को खत्म करने पर केन्द्रित होने चाहिए। एक पोलियो से मुक्ति पाकर हम फूले नहीं समा रहे हैं, जबकि इस बीच कई नई बीमारियां देश को अपने गिरफ्त में जकड़ चुकी हैं।

मुख्यतः आयुर्वेद, होम्योपैथ और एलोपैथ एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से बीमारों का इलाज होता है। हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा एलोपैथिक पद्धति अथवा अंग्रेजी दवाइयों के माध्यम से इलाज किया जा रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि अंग्रेजी दवाइयों से इलाज कराने में जिस अनुपात से फायदा मिलता है, उसी अनुपात से इसके नुकसान भी हैं। इतना ही नहीं महंगाई के इस दौर में लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर पाना बहुत मुश्किल हो रहा है। ऐसे में बीमारी से जो मार पड़ रही है, वह तो है ही साथ में आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। इन सभी समस्याओं पर ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वास्थ्य की समस्या राष्ट्र के विकास में बहुत बड़ी बाधक है।

ऐसे में देश के प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ रखने के लिए सरकारी नीति बननी चाहिए न कि बीमार को स्वस्थ करने के लिए। ऐसे उपाय पर ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे कोई बीमार ही न हो। इस परिप्रेक्ष्य में स्वास्थ्य नीति बनाते समय सरकार को कुछ खास बिन्दुओं पर ध्यान जरूर देना चाहिए।

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को नागरिकों के उम्र के हिसाब से तीन भागों में विभक्त करना चाहिए। 0-25 वर्ष तक, 26-59 वर्ष तक और 60 से मृत्युपर्यन्त। शुरू के 25 वर्ष और 60 वर्ष के बाद के नागरिकों के स्वास्थ्य की पूरी व्यवस्था निःशुल्क सरकार को करनी चाहिए। जहाँ तक 26-59 वर्ष तक के नागरिकों के स्वास्थ्य का प्रश्न है तो इन नागरिकों को अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाना चाहिए। जो कमा रहे हैं उनसे बीमा राशि का प्रिमियम भरवाना चाहिए, जो बेरोजगार है उनकी नौकरी मिलने तक उनका प्रीमियम सरकार को भरना चाहिए।

शुरू के 25 वर्ष नागरिकों को उत्पादक योग्य बनाने का समय है। ऐसे में अगर देश का नागरिक आर्थिक कारणों से खुद को स्वस्थ रखने में नाकाम होता है तो निश्चित रूप से हम जिस उत्पादक शक्ति अथवा मानव संसाधन का निर्माण कर रहे हैं, उसकी नींव कमजोर हो जायेगी और कमजोर नींव पर मजबूत इमारत खड़ी करना संभव नहीं होता। किसी भी लोक कल्याणकारी
राज्य-सरकार का यह महत्वपूर्ण दायित्व होता है कि वह अपने उत्पादन शक्ति को मजबूत करे।

अब बारी आती है 26-59 साल के नागरिकों पर ध्यान देने की। इस उम्र के नागरिक सामान्यतः कामकाजी होते हैं और देश के विकास में किसी न किसी रूप से उत्पादन शक्ति बन कर सहयोग कर रहे होते हैं। चाहे वे किसान के रूप में, जवान के रूप में अथवा किसी व्यवसायी के रूप में हों कुछ न कुछ उत्पादन कर ही रहे होते हैं। जब हमारी नींव मजबूत रहेगी तो निश्चित ही इस उम्र में उत्पादन शक्तियाँ मजबूत इमारत बनाने में सक्षम व सफल रहेंगी और अपनी उत्पादकता का शत् प्रतिशत देश हित में अर्पण कर पायेंगी। इनके स्वास्थ्य की देखभाल के लिए इनकी कमाई से न्यूनतम राशि लेकर इन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाने की जरूरत है। जिससे उन्हें बीमार होने की सूरत में इलाज के नाम पर एक रूपये भी खर्च नहीं करने पड़े।

अब बात करते हैं देश की सेवा कर चुके और बुढ़ापे की ओर अग्रसर 60 वर्ष की आयु पार कर चुके नागरिकों के स्वास्थ्य की। इनके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सरकार को पूरी तरह उठानी चाहिए। और इन्हें खुशहाल और स्वस्थ जीवन यापन के लिए प्रत्येक गांव में एक बुजुर्ग निवास खोलने चाहिए जहां पर गांव भर के बुजुर्ग एक साथ मिलजुल कर रह सकें और गांव के विकास में सहयोग भी दे सकें।

आदर्श स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार को निम्न सुझाओं पर गंभीरता-पूर्वक अमल करने की जरूरत है। प्रत्येक गाँव में सार्वजनिक शौचालय, खेलने योग्य प्लेग्राउंड, प्रत्येक स्कूल में योगा शिक्षक के साथ-साथ स्वास्थ्य शिक्षक की बहाली हो। प्रत्येक गाँव में सरकारी डॉक्टरों की एक टीम हो जिनके ऊपर प्राथमिक उपचार की जिम्मेदारी रहे। प्रत्येक गाँव में सरकारी दवा की दुकान, वाटर फिल्टरिंग प्लांट जिससे पेय योग्य शुद्ध जल की व्यवस्था हो सके, सभी कच्ची पक्की सड़कों के बगल में पीपल व नीम के पेड़ लगाने की व्यवस्था के साथ-साथ हर घर-आंगन में तुलसी का पौधा लगाने हेतु नागरिकों को जागरूक करने के लिए कैंपेन किए जाए।

उपरोक्त बातों का सार यह है कि स्वास्थ्य के नाम किसी भी स्थिति में नागरिकों पर आर्थिक दबाव नही आना चाहिए। और इसके लिए यह जरूरी है कि देश में पूर्णरूपेण कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

यदि उपरोक्त ढ़ाचागत व्यवस्था को हम नियोजित तरीके से लागू करने में सफल रहे तो निश्चित ही हम ‘स्वस्थ भारत’ का सपना बहुत जल्द पूर्ण होते हुए देख पायेंगे।

 

बजट का खेल और सबका स्वास्थ्य

देश की बड़ी आबादी के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं कितनी कम हैं। इससे यह भी साफ है कि यदि हमें सबको स्वास्थ्य का सपना साकार करना है तो इसके दस-बीस गुणे बजट की आवश्यकता पड़ेगी, जो वर्तमान स्थिति में संभव ही नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, जिसका जवाब ढूढ़ना प्रत्येक भारतीय व सरकार का कर्तव्य है । आखिर कब तक स्वास्थ्य के नाम पर बजट का खेल चलता रहेगा…आखिर कितना बजट चाहिए पूरे देश को स्वस्थ रखने के लिए…प्रत्येक वर्ष जो अरबों रूपये बहाए जा रहे हैं उन खर्चों का प्रतिफल तो कहीं दिख नहीं रहा है! आखिर कब तक बजट-बजट हम खेलते रहेंगे…

 

Budget 2016बजट का मौसम प्रत्येक वर्ष आता है। चर्चाएं होती हैं। आलोचनाएं होती हैं। फिर यह मौसम चला जाता है। सभी आलोचक दूसरे मुद्दों पर अपनी आलोचना योग्य कच्चा माल ढूढ़ने में मसगूल हो जाते हैं। और चर्चा जहाँ से शुरू हुई थी वहीं पर खत्म हो जाती है। आज जो बजट आना है, उस पर चर्चा करने से पूर्व इसके पूर्ववर्ती बजटों, स्वास्थ्य नीतियों व उनके प्रभाव-अभाव को एक बार फिर से याद कर लेना ज्यादा श्रेयस्कर होगा।

सबसे पहला मुद्दा है सबके लिए स्वास्थ्य। इसके लिए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन चला रखा है। पिछली सरकार ने शहरी स्वास्थ्य मिशन की भी शुरूआत की थी परंतु उसे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बजट में ही रखा गया था। वर्तमान सरकार ने दोनों को अलग-अलग कर दिया है। परंतु सवाल है कि क्या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन सबको स्वास्थ्य के लक्ष्य को पूरा कर सकता है?

ध्यान देने वाली बात यह है कि देश की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाई गई वर्ष 1983 में जिसमें पहली बार सभी नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था। यानी कि स्वाधीनता मिलने के लगभग 46 वर्ष बाद सरकार को देश के स्वास्थ्य की थोड़ी-बहुत चिंता हुई। इसके बाद देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और इसके उप केंद्र खोले जाने लगे। परंतु इनकी संख्या देश की जनसंख्या के अनुपात में काफी कम थी। 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2011 तक देश में 1 लाख 76 हजार 820 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (ब्लॉक स्तर), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-केंद्र स्थापित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त देश में 11 हजार 493 सरकारी अस्पताल हैं और 27 हजार 339 आयुष केंद्र। देश में (एलोपैथ के) 8 लाख 83 हजार 812 डॉक्टर हैं। नर्सों की संख्या 18 लाख 94 हजार 968 बताई गई है। परंतु दूसरी ओर देश में 5 लाख से अधिक गांव हैं और अधिकतर गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच रही हैं।

अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति खराब है। कोई भी डॉक्टर गांवों में जाने के लिए तैयार नहीं है। जिन्हें भेजा जाता है, वे केंद्रों में बैठते नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब एमबीबीएस के छात्रों के लिए गांवों में एक वर्ष के लिए सेवा देना अनिवार्य किए जाने पर डाक्टरों ने तीखा विरोध किया था। ऐसे में यह चिंतनीय हो जाता है कि यदि पर्याप्त संख्या में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोल भी दिए जाएंगे तो उसके लिए डॉक्टर कहां से लाए जाएंगे। हालांकि वर्ष 2012 के भारत सरकार के आंकड़ों को देखें तो प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों के लिए कुल 24 हजार 49 डाक्टरों की आवश्यकता थी और इसके लिए सरकार ने 31 हजार 867 डाक्टरों को नियुक्त करने की व्यवस्था की जिनमें से 28 हजार 984 डाक्टर केंद्रों में तैनात भी हैं। इस पर भी कुल 903 केंद्र डाक्टरविहीन हैं और 14873 केंद्रों में केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध है। 7 हजार 676 केंद्रों में लैब तकनीशियन नहीं है तो 5 हजार 549 केंद्रों में फार्मास्यूटिकल नहीं है। केवल 5 हजार 438 केंद्रों में महिला डाक्टर उपलब्ध हैं। दूसरी ओर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डाक्टरों की संख्या और भी दयनीय है। आवश्यकता है 19 हजार 332 विशेषज्ञों की जबकि सरकार केवल 9 हजार 914 की ही व्यवस्था कर पाई है और उनमें से भी 5 हजार 858 ही कार्यरत हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि देश की बड़ी आबादी के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं कितनी कम हैं। इससे यह भी साफ है कि यदि हमें सबको स्वास्थ्य का सपना साकार करना है तो इसके दस-बीस गुणे बजट की आवश्यकता पड़ेगी, जो वर्तमान स्थिति में संभव ही नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, जिसका जवाब ढूढ़ना प्रत्येक भारतीय व सरकार का कर्तव्य है । आखिर कब तक स्वास्थ्य के नाम पर बजट का खेल चलता रहेगा…आखिर कितना बजट चाहिए पूरे देश को स्वस्थ रखने के लिए…प्रत्येक वर्ष जो अरबों रूपये बहाए जा रहे हैं उन खर्चों का प्रतिफल तो कहीं दिख नहीं रहा है! आखिर कब तक बजट-बजट हम खेलते रहेंगे…

स्वास्थ्य बजट अलग से क्यों नहीं…

कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेल बजट की तर्ज पर स्वास्थ्य के लिए भी अलग से बजट लाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य पर और ध्यान देते हुए स्वास्थ्य बजट में और पारदर्शिता लाए। इसके लिए आवश्यक है कि रेल बजट की तरह स्वास्थ्य बजट भी अलग से पेश किया जाए।

Budget_healthएक पुरानी और सर्वमान्य संकल्पना है कि पढ़ाई, दवाई और लड़ाई यानी कि शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तीनों पूरी तरह निःशुल्क होने चाहिएं। स्वाधीन भारत के संविधान निर्माताओं ने संभवतः इसी बात को ध्यान में रख कर भारत को एक कल्याणकारी राज्य घोषित किया था और इसको ही ध्यान में रख कर सरकार हर वर्ष बजट बनाती है। बजट में हजारों करोड़ रूपये स्वास्थ्य के लिए आबंटित भी किए जाते हैं। परंतु दुःख का विषय यह है कि तमाम सरकारी प्रयत्नों के बावजूद ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है।

पिछले वर्ष नई सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट में भी स्वास्थ्य के लिए पिछली सरकार की ही भांति प्रावधान किए गए थे। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 21912 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया था। इसके अतिरिक्त नए एम्स खोलने के लिए 500 करोड़ रूपये दिए गए थे। एकीकृत बालविकास सेवाओं हेतु 18691 करोड़ रूपये दिए गए और आयुष के लिए कुल 411 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया गया था। साथ ही फार्मास्यूटिकल रिसर्च के लिए 87 करोड़ रूपये दिए गए थे। इस प्रकार देखा जाए तो स्वास्थ्य के लिए सरकार ने बजट में कुल 41601 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया था। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सरकार ने पिछली यूपीए सरकार के बजट के 37300 करोड़ रूपयों की तुलना में कहीं अधिक बजट स्वास्थ्य के लिए आबंटित किया था।

 

तब के बजट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं की झलक साफ दिखाई दी थी, जेटली अपने घोषणापत्र के हर राज्य में एम्स का वादा पूरा करने की दिशा में बढ़े। उन्होंने आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र में विदर्भ और यूपी के पूर्वाचल में एम्स जैसे चार संस्थानों के लिए 500 करोड़ आवंटित किए। 12 मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा भी की। गांवों के विकास के लिए ग्रामीण हेल्थ रिसर्च सेंटर खोलने का भी ऎलान किया। प्रधानमंत्री के एक वादे “सबके लिए स्वास्थ्य” का इस्तेमाल करते हुए कहा वित्त मंत्री ने कहा कि, नि:शुल्क औषधि सेवा और नि:शुल्क निदान सेवा प्राथमिकता का आधार पर शुरू की जाएगी। इस प्रकार बजट को स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक-ठाक कहा जा सकता है। परंतु देश के जनस्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मानें तो यह बजट पर्याप्त नहीं था।

कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेल बजट की तर्ज पर स्वास्थ्य के लिए भी अलग से बजट लाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य पर और ध्यान देते हुए स्वास्थ्य बजट में और पारदर्शिता लाए। इसके लिए आवश्यक है कि रेल बजट की तरह स्वास्थ्य बजट भी अलग से पेश किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य पर किया जाने वाला यह खर्च विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। दूसरा तर्क यह है कि सरकार द्वारा कम बजट और सुविधाएं दिए जाने के कारण लोगों को निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की ओर जाना पड़ता है। निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की भागेदारी आज सरकार से कहीं आधिक हो गई है। 2008-09 के एक अध्ययन के अनुसार देश के स्वास्थ्य-व्यय का 71.62 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है और केवल 26.7 प्रतिशत सरकार द्वारा। इससे स्वास्थ्य सेवाएं मंहगी और गरीबों की पहुंच से दूर हो रही हैं।

बजट और स्वास्थ्यःस्वस्थ भारत का सपना

एक पुरानी और सर्वमान्य संकल्पना है कि पढ़ाई, दवाई और लड़ाई यानी कि शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तीनों पूरी तरह निःशुल्क होने चाहिएं। स्वाधीन भारत के संविधान निर्माताओं ने संभवतः इसी बात को ध्यान में रख कर भारत को एक कल्याणकारी राज्य घोषित किया था और इसको ही ध्यान में रख कर सरकार हर वर्ष बजट बनाती है। बजट में हजारों करोड़ रूपये स्वास्थ्य के लिए आबंटित भी किए जाते हैं। परंतु दुःख का विषय यह है कि तमाम सरकारी प्रयत्नों के बावजूद ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है।

बजट और स्वस्थ भारत का सपना

योजना के अगस्त अंक में प्रकाशित लेख

इस वर्ष नई सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट में भी स्वास्थ्य के लिए पिछली सरकार की ही भांति प्रावधान किए गए हैं। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 21912 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है। इसके अतिरिक्त नए एम्स खोलने के लिए 500 करोड़ रूपये दिए गए हैं। एकीकृत बालविकास सेवाओं हेतु 18691 करोड़ रूपये दिए गए हैं और आयुष के लिए कुल 411 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया गया है। साथ ही फार्मास्यूटिकल रिसर्च के लिए 87 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इस प्रकार देखा जाए तो स्वास्थ्य के लिए सरकार ने बजट में कुल 41601 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सरकार ने पिछली यूपीए सरकार के बजट के 37300 करोड़ रूपयों की तुलना में कहीं अधिक बजट स्वास्थ्य के लिए आबंटित किया है।

देखा जाए तो इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं की झलक साफ दिखाई देती है। जेटली अपने घोषणापत्र के हर राज्य में एम्स का वादा पूरा करने की दिशा में बढ़े। उन्होंने आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र में विदर्भ और यूपी के पूर्वाचल में एम्स जैसे चार संस्थानों के लिए 500 करोड़ आवंटित किए। 12 मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा भी की। गांवों के विकास के लिए ग्रामीण हेल्थ रिसर्च सेंटर खोलने का भी ऎलान किया। प्रधानमंत्री के एक वादे “सबके लिए स्वास्थ्य” का इस्तेमाल करते हुए कहा वित्त मंत्री ने कहा कि, नि:शुल्क औषधि सेवा और नि:शुल्क निदान सेवा प्राथमिकता का आधार पर शुरू की जाएगी। इस प्रकार बजट को स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक-ठाक कहा जा सकता है। परंतु देश के जनस्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मानें तो यह बजट पर्याप्त नहीं है।

कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेल बजट की तर्ज पर स्वास्थ्य के लिए भी अलग से बजट लाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य पर और ध्यान देते हुए स्वास्थ्य बजट में और पारदर्शिता लाए। इसके लिए आवश्यक है कि रेल बजट की तरह स्वास्थ्य बजट भी अलग से पेश किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य पर किया जाने वाला यह खर्च विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। दूसरा तर्क यह है कि सरकार द्वारा कम बजट और सुविधाएं दिए जाने के कारण लोगों को निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की ओर जाना पड़ता है। निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की भागेदारी आज सरकार से कहीं आधिक हो गई है। 2008-09 के एक अध्ययन के अनुसार देश के स्वास्थ्य-व्यय का 71.62 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है और केवल 26.7 प्रतिशत सरकार द्वारा। इससे स्वास्थ्य सेवाएं मंहगी और गरीबों की पहुंच से दूर हो रही हैं।

सबको स्वास्थ्य का सपना

बहरहाल इस बजट के कुछ प्रमुख मुद्दे हैं जिन पर अलग से चर्चा की जानी आवश्यक प्रतीत होती है। सबसे पहला मुद्दा है सबके लिए स्वास्थ्य। इसके लिए सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन चला रखा है। पिछली सरकार ने शहरी स्वास्थ्य मिशन की भी शुरूआत की थी परंतु उसे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बजट में ही रखा गया था। इस सरकार ने दोनों को अलग-अलग कर दिया है। परंतु सवाल है कि क्या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन सबको स्वास्थ्य के लक्ष्य को पूरा कर सकता है?

ध्यातव्य है कि देश की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाई गई वर्ष 1983 में जिसमें पहली बार सभी नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था। यानी कि स्वाधीनता मिलने के लगभग 46 वर्ष बाद सरकार को देश के स्वास्थ्य की चिंता हुई। इसके बाद देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और इसके उप केंद्र खोले जाने लगे। परंतु इनकी संख्या देश की जनसंख्या के अनुपात में काफी कम थी। 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2011 तक देश में 1 लाख 76 हजार 820 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (ब्लॉक स्तर), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-केंद्र स्थापित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त देश में 11 हजार 493 सरकारी अस्पताल हैं और 27 हजार 339 आयुष केंद्र। देश में (एलोपैथ के) 8 लाख 83 हजार 812 डॉक्टर हैं। नर्सों की संख्या 18 लाख 94 हजार 968 बताई गई है। परंतु दूसरी ओर देश में 5 लाख से अधिक गांव हैं और अधिकतर गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच रही हैं।

अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति खराब है। कोई भी डॉक्टर गांवों में जाने के लिए तैयार नहीं है। जिन्हें भेजा जाता है, वे केंद्रों में बैठते नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब एमबीबीएस के छात्रों के लिए गांवों में एक वर्ष के लिए सेवा देना अनिवार्य किए जाने पर डाक्टरों ने तीखा विरोध किया था। ऐसे में यह चिंतनीय हो जाता है कि यदि पर्याप्त संख्या में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोल भी दिए जाएंगे तो उसके लिए डॉक्टर कहां से लाए जाएंगे। हालांकि वर्ष 2012 के भारत सरकार के आंकड़ों को देखें तो प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों के लिए कुल 24 हजार 49 डाक्टरों की आवश्यकता थी और इसके लिए सरकार ने 31 हजार 867 डाक्टरों को नियुक्त करने की व्यवस्था की जिनमें से 28 हजार 984 डाक्टर केंद्रों में तैनात भी हैं। इस पर भी कुल 903 केंद्र डाक्टरविहीन हैं और 14873 केंद्रों में केवल एक ही डॉक्टर उपलब्ध है। 7 हजार 676 केंद्रों में लैब तकनीशियन नहीं है तो 5 हजार 549 केंद्रों में फार्मास्यूटिकल नहीं है। केवल 5 हजार 438 केंद्रों में महिला डाक्टर उपलब्ध हैं। दूसरी ओर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डाक्टरों की संख्या और भी दयनीय है। आवश्यकता है 19 हजार 332 विशेषज्ञों की जबकि सरकार केवल 9 हजार 914 की ही व्यवस्था कर पाई है और उनमें से भी 5 हजार 858 ही कार्यरत हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि देश की बड़ी आबादी के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएं कितनी कम हैं। इससे यह भी साफ है कि यदि हमें सबको स्वास्थ्य का सपना साकार करना है तो इसके दस-बीस गुणे बजट की आवश्यकता पड़ेगी, जो वर्तमान स्थिति में संभव ही नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? यदि हम रोगों की बात करें तो वर्तमान में जो रोग देश में व्यापक हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश हमारी जीवनशैली और खान-पान में आए बदलाव के कारण बढ़ रहे हैं। चाहे वह हृदय रोग हो या रक्तचाप, मधुमेह हो या फिर मोटापे की। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में भी मलेरिया, डायरिया और तपेदिक जैसी बीमारियां ही अधिक देखी जा रही हैं। वर्ष 2012 में जिन बीमारियों के कारण अधिक मौतें हो रही हैं उनकी सूची इस प्रकार है

क्र. रोग                  मामले    मौतें     मौत दर (%)

1  रैबीज                 212     212    100.00

2  एक्यूट इसेफ्लाइटिस     8344    1256   15.05

3  टिटेनस               3421    248    7.25

4  मेनिंगकोकल मेनिनजाइटिस        5609   413    7.36

5  तपेदिक (2011)        1515872 63265  4.17

6  स्वाइन फ्लू            5044    405    8.03

7  टिटेनस (नवजात)       748     42     5.61

8  डिप्थिरिया             3902    60     1.54

इससे यह स्पष्ट है कि इनमें से अधिकांश रोगों में ऑपरेशन की कोई आवश्यकता नहीं है और यह भी कि इनमें से अधिकांश रोग देशज चिकित्सा पद्धतियों यानी कि आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा तथा वैकल्पिक पद्धतियों यानी कि होमियोपैथ, यूनानी आदि से भी ठीक की जा सकती हैं। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि ये पद्धतियां अनुभवसिद्ध हैं और सस्ती भी हैं। इसलिए आयुष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। परंतु आयुष को लेकर सरकार की नीतियां न तो तब ठीक थीं और न ही अब ठीक हैं।

आयुषः भारतीय व वैकल्पिक पद्धतियां

वर्तमान में देश में आयुष क्षेत्र के तहत बुनियादी ढांचे में 62 हजार 649 बिस्तरों की क्षमता के साथ 3 हजार 277 अस्पतालों, 24 हजार 289 औषधालयों, 495 अंडर ग्रेजुएट कॉलेजों, 106 स्नातकोत्तर विभागों वाले कॉलेज और देश में भारतीय चिकित्सा पद्धति और होम्योपैथी के 7 लाख 85 हजार 185 पंजीकृत चिकित्सक हैं। परंतु दुःख की बात यह है कि सरकार ही आयुर्वेद व होमियोपैथ के डाक्टरों के साथ भेदभाव करती है। आयुर्वेद के डाक्टरों को शल्य चिकित्सा यानी कि ऑपरेशन करने की छूट नहीं है। हालांकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का विशद् वर्णन है और इसका काफी गौरवपूर्ण इतिहास भी रहा है। माना जाता है कि सुश्रुत मस्तिष्क का ऑपरेशन करने वाले दुनिया के पहले चिकित्सक थे। इस पर भी अंग्रेजी सरकार ने देश की परतंत्रता के कालखंड में आयुर्वेद पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगा रखे थे जो आज भी यथावत् चले आ रहे हैं।

इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतिबंध था पंजीकृत किए जाने का। आयुर्वेद एक परंपरागत ज्ञान परंपरा है और इस कारण बड़ी संख्या में इसके विशेषज्ञ आज की पढ़ाई से दूर हैं। इस कारण उनका पंजीकरण नहीं हो सकता। परंतु अंग्रेजी कानूनों के अनुसार केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर ही चिकित्सा कार्य कर सकता है। इस कारण बड़ी संख्या में आयुर्वेदिक वैद्य अवैध सिद्ध हो जाते हैं। दुःखद यह है कि स्वाधीनता के 67 वर्षों के बाद भी भारत सरकार इसका कोई समाधान नहीं निकाल पाई। वास्तव में देख जाए तो प्रारंभ में सरकार का आयुर्वेद के प्रति काफी उपेक्षा का भी रवैया था। अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारतीय सरकारों ने आयुर्वेद को समाप्त कर इसके स्थान पर एलौपैथ को स्थापित करने पर ही पूरी ताकत लगाई। इसका ही परिणाम है कि आज भी 41 हजार करोड़ रूपयों के स्वास्थ्य बजट में केवल 411 करोड़ रूपये ही आयुष को दिए गए हैं और उसमें से भी आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा के लिए केवल 217 करोड़ रूपये ही आबंटित किए गए हैं।

इन देशज प्रणालियों की ओर सरकार का ध्यान स्वाधीनता मिलने के 17 वर्ष बाद 1964 में गया था जबकि पहली स्वास्थ्य नीति 1952 में ही बनी थी। 1964 में सरकार ने आयुर्वेदिक औषधालय खोलने का निर्णय लिया था, परंतु इसकी चाल इतनी धीमी थी कि वर्ष 2007 तक केवल 31 औषधालय ही खोले गए थे। हालांकि इस क्षेत्र में कितनी अधिक संभावनाएं थी, इसका पता केवल इस एक बात से लगाया जा सकता है कि आज देश में 24 हजार 289 आयुर्वेदिक औषधालय हैं और वह भी न्यूनतम बजट के बावजूद। इसके बाद भी आयुर्वेद जैसी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध, विकास और इनके अस्पतालों की स्थापना पर सरकार का ध्यान 1995 में गया यानी कि स्वाधीनता से पूरे 48 वर्ष बाद। मार्च 1995 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होमियोपैथी विभाग की रचना की गई और बात में वर्ष 2003 में इसका नाम बदल कर आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी विभाग (आयुष) कर दिया गया। हालांकि सिद्ध और यूनानी जैसी पद्धतियां काफी कम ही प्रचलित हैं, परंतु इससे सरकार का ध्यान आयुर्वेद की ओर से कम ही हो गया। आयुष की स्थापना के बावजूद यह सब लंबे समय तक सरकारी दिखावा ही बना रहा। हजारों करोड़ के स्वास्थ्य मंत्रालय के बजट में से आयुष को केवल कुछ सौ करोड़ रूपये ही मिलते रहे हैं। इतना ही नहीं, ऐलोपैथ के शोध, शिक्षण आदि के लिए भी इससे कहीं अधिक रूपये दिए जाते रहे हैं।

इस भेदभाव के बावजूद आयुष तेज गति से आगे बढ़ा। एक तो ये पद्धतियां सस्ती हैं, इस कारण कम बजट में भी ये तेजी से फैलीं। साथ ही एलौपैथी चिकित्सा पद्धति की अनेक खामियां और अनेक रोगों के इलाज में इसकी असमर्थता उजागर होने के बाद आम जनता उससे दूर जाने लगी। वास्तव में देखा जाए तो चिकित्सकीय विकास के तमाम दावों के बावजूद देश की स्वास्थ्य समस्याओं में कोई कमी नहीं आई है। आम आदमी को परेशान करने वाले मलेरिया, डायरिया, तपेदिक, दमा, कैंसर आदि रोग पहले से कहीं अधिक जटिल और खतरनाक हो गए हैं। एलौपैथ का इलाज काफी मंहगा और आम जनता की पहुंच से दूर है। ऊपर हम देख चुके हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त संख्या में डाक्टर ही नहीं हैं और सामुदायिक केंद्रों में भी विशेषज्ञ डाक्टरों का घोर अभाव है। डाक्टर मूलतः शहरों में बैठे हैं और ऊंची फीस वसूल कर ही ईलाज कर रहे हैं। सरकारी अस्पताओं में दुर्व्यवस्थाओं का यह आलम है कि मध्यम वर्ग तक इनमें जाने से घबराता है। संभवतः सरकार ने भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया प्रतीत होता है और संभवतः इसी कारण देश में और अधिक एम्स खोले जाने का प्रयास हो रहा है। परंतु वर्तमान एम्स का ही स्तर काफी गिर गया है। ऐसे में नए खुलने वाले एम्सों की दुर्गति वर्तमान सरकारी अस्पतालों जैसी नहीं हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी है?

चिकित्सा और व्यावसायीकरण

सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों की दुरावस्था का सबसे बड़ा कारण है एलौपैथी चिकित्सा का अत्यंत मंहगा होना और इस कारण इसका व्यावसायीकरण। निजी संस्थानों से एमबीबीएस की पढ़ाई करने में आम तौर पर 30-40 लाख रूपयों का खर्च आता है। सरकारी संस्थानों से पढ़ाई करने में भी 4-5 लाख रूपये खर्च हो जाते हैं। स्वाभाविक ही है कि जो इतनी मंहगी शिक्षा ले रहा है, वह समाजसेवा तो नहीं ही करेगा। इसमें भी ध्यान देने की बात यह है कि इस पद्धति में रोग पहचानने में ही सर्वाधिक व्यय हो जाता है। रोग पहचानने की मशीनें काफी मंहगी हैं और उनके कारण इसका ईलाज भी काफी मंहगा है। एक एलौपैथ के अस्पताल के स्थापित करने का खर्च कई करोड़ में आएगा। इतना खर्च करने वाली संस्था समाजसेवा नहीं ही कर सकती। भले ही उसे जमीन सरकार ने दी हो। स्वाभाविक ही है कि एलौपैथ ही चिकित्सा के व्यावसायीकरण के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है।

हालांकि आयुर्वेद का भी कुछ हद तक व्यावसायीकरण होना प्रारंभ हो गया है परंतु फिर भी इस क्षेत्र में अनेक लोग और संस्थाएं निस्स्वार्थ रूप से कार्यरत हैं। इसके अलावा देश के गांव-गांव में देसी वैद्य पाए जाते हैं। अधिकांश आयुर्वेदिक दवाएं घर में भी बनाई जा सकती हैं। लोग बनाते भी हैं। उनकी विधियां सर्वसुलभ हैं। सीधी-सी बात है कि इसका व्यावसायीकरण न तो फलदायक है और न ही संभव है। सरकार यदि आयुर्वेद को स्कूली शिक्षा से ही बढ़ाना शुरू कर दे, तो स्वास्थ्य पर किया जाने वाला बजट काफी कम हो जा सकता है।

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है अंतरराष्ट्रीय दबाव-समूहों के कारण लिए जाने वाले फैसले। उदाहरण के लिए सभी गर्भवती स्त्रियों के लिए एड्स की जांच करवाना सरकार ने अनिवार्य करवा रखा है। यह एक व्यर्थ की कवायद है। इसमें केवल सरकार का खर्च होना है। यह जांच वैकल्पिक की जानी चाहिए। इसी प्रकार और भी कई व्यवस्थाएं हैं, जो जरूरी नहीं होने पर भी सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से थोपी जा रही हैं और जिसमें काफी खर्च भी किया जा रहा है। इसका प्रभाव आम आदमी पर भी पड़ रहा है।

आयुर्वेदिक वैद्य प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों को भी सक्रिय कर सकते हैं। थोड़े से प्रशिक्षण से गांव के वैद्य को गांव में होने वाली सामान्य बीमारियों जैसे कि मलेरिया, डायरिया, खांसी-जुकाम, ज्वर, गैस्ट्रिक आदि का ईलाज करने योग्य बनाया ही जा सकता है। इतना तो वे पहले से भी जानते ही हैं, केवल एक पंजीकरण की आवश्कता होती है जो पूरी की जा सकती है। उन्हें इन केंद्रों में बैठाया जा सकता है। साथ ही एमबीबीएस डाक्टर उपलब्ध न होने पर बीएएमएस डाक्टरों को भी बैठाया जा सकता है। इससे आयुर्वेद की महत्ता भी बढ़ेगी और उसकी शिक्षाओं का भी प्रचार प्रसार होगा। साथ ही चिकित्सा का व्यावसायीकरण भी रूकेगा। देखा जाए तो शल्य क्रिया यानी कि ऑपरेशन के अलावा और किसी भी रोग के ईलाज के लिए आयुर्वेद व अन्य चिकित्सा प्रणालियां पर्याप्त सक्षम हैं। इसलिए देश भर में मंहगे अस्पतालों की उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, बनिस्पत कि सामान्य बीमारियों को प्रारंभ में ही रोक देने वाले सामान्य अस्पतालों की।

कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं से अधिक देश में स्वास्थ्य शिक्षा की आवश्यकता है। अच्छी स्वास्थ्य शिक्षा से आधी से अधिक बीमारियां होने से रोकी जा सकती हैं। इससे न केवल सरकार, बल्कि जनता के भी पैसों की बचत होगी। सरकार को बजटीय प्रावधान करते हुए इसका भी ध्यान रखना चाहिए। आयुर्वेद जैसी भारतीय चिकित्सा प्रणालियां इसी अव्यवसायिक और ईलाज से परहेज अच्छा वाले चिकित्सकीय तंत्र को मजबूत करती हैं। यही कारण भी था कि महात्मा गांधी ने 1909 में लिखी अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में देश से डाक्टरों को पूरी तरह हटाए जाने की बात कही थी और मृत्यु पर्यंत अपनी बात पर डटे रहे थे। आज एक बार फिर महात्मा गांधी जी के उसी भविष्य-दृष्टि को सामने रख कर देश का स्वास्थ्य बजट बनाए जाने की आवश्यकता है। केवल तभी सबको स्वास्थ्य का सपना साकार किया जा सकता है।

साभारः योजना अगस्त-2014