फार्मा सेक्टर मन की बात विविध

फार्मासिस्ट भटक गए हैं! ऐसा मैंने क्यों कहा?

जहां तक मेरी समझ है वह यह है कि बाजार में जितने फार्मासिस्ट हैं उसमें ज्यादातर ऐसे हैं जिन्होंने पैसे के बल पर डिग्री तो ले ली है लेकिन फार्मा की पढ़ाई ठीक से नहीं की है। उनके अंदर इतनी काबीलियत नहीं है कि वे प्रतियोगिता फेस करें और दवा कंपनियों से लेकर तमाम जगहों पर अपनी उपयोगिता को सिद्ध कर पाएं। यहीं कारण है कि ये सिर्फ और सिर्फ दवा दुकानों तक खुद को समेटकर रखना चाहते हैं। दरअसल ये वही फार्मासिस्ट हैं जिनको अपने प्रोफेशन की इज्जत से कोई लेना-देना नहीं है। ये सिर्फ किसी तरह पैसा कमाना चाहते हैं। इसके लिए इन्होंने अपने जमीर को बेच दिया है। अपनी डिग्री-डिप्लोमा को किराए पर दे दिया है। ये खुद निकम्मे और निठल्ले हैं और किराए के पैसे से रोजी-रोटी चलाना चाहते हैं। दवा खऱीदने वाले उपभोक्ताओं को अच्छी दवा मिले या न मिले इससे इनको कोई सरोकार नहीं है। इनके कारण मेहनत से पढ़े-लिखे फार्मासिस्टों की नाक कटती रहती है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि किरायेबाज फार्मासिस्टों को बेनकाब किया जाए। और ऐसा करने में तमाम फार्मासिस्ट संगठन लगभग विफल रहे हैं।

यदि लेख/समाचार से आप सहमत है तो इसे जरूर साझा करें
समाचार

अब दवाइयों के जेनरिक नाम बड़े अक्षरों में लिखे जाएंगे: मनसुख भाई मांडविया, रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय जेनरिक दवाइयों को पॉपुलर बनाने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ने जा रहा है। अब दवा की स्ट्रीप पर ब्रांड का नाम छोटे अक्षर में जबकि जेनरिक नाम यानी मूल सॉल्ट का नाम बड़े अक्षरों में लिखा जायेगा। इस बावत नई दिल्ली में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री मनसुख भाई मांडविया ने पत्रकारों को बताया कि सरकार यह तैयारी कर रही है कि दवा की स्ट्रीप पर जेनरिक नाम बड़े अक्षरों में लिखा जाए। इससे जेनरिक दवाइयों की पॉपुलारिटी बढ़ेगी।

यदि लेख/समाचार से आप सहमत है तो इसे जरूर साझा करें