समाचार स्वस्थ भारत अभियान

स्वस्थ भारत जेनरिक दवाइयों की उपलब्धता को लेकर प्रधानमंत्री को लिखे पत्र को आप यहां पढ़ सकते हैं

इन सब के बीच में मेरा अनुभव यह कहता है कि भारत में जनऔषधि केन्द्र की जरूरत ही नहीं है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि वैध-अवैध मिलाकर देश में 7 लाख से अधिक अंग्रेजी दवा दुकाने चल रही हैं। भारत का घरेलु दवा बाजार 90 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया है। ऐसे में अगर कुछ हजार जनऔषधि केन्द्र खुल भी जायेंगे तो कितना फायदा हो जायेगा। क्या सच में इससे समस्या का समाधान हो पायेगा। मेरी समझ में तो बिल्कुल भी नहीं। यहां पर यह भी समझना जरूरी है कि आज के समय में देश में जितनी भी दवाइयां बिक रही हैं उनमें से 90 फीसद या उससे भी ज्यादा दवाइयों की पेटेंट अवधि समाप्त हो चुकी हैं और वे बाजार में जेनरिक हो चुकी हैं। और भारत में जितनी दवा कंपनियां हैं उनके पास अपने पेटेंट वाली कितनी दवाइयां हैं या भारत सरकार के पास अपनी पेटेंटेड दवाइयों की कितनी संख्या है। न के बराबर। इसका मतलब यह हुआ कि भारत में जो ब्रांड के नाम पर दवाइयां बेची जा रही हैं, वो भी जेनरिक ही हैं। फिर उनकी इतनी कीमत क्यों हैं? इसके जवाब में ही महंगी दवाइयों से निजात पाने का समाधान है।

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