SBA विशेष काम की बातें

उपभोक्ता जागरुकता से ही बदलेगी स्वास्थ्य सेवा की तस्वीर

आयुर्वेद की जननी भारत भूमि का इतिहास बताता है कि यहां पर स्वास्थ्य सेवाओं को प्राचीन काल में परोपकार के नजरिए देखा जाता था। जब तक वैद्य परंपरा रही तब तक मरीज एवं वैद्य के बीच सामाजिक उत्तरदायित्व का बंधन रहा। लेकिन आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के उदय के बाद चिकित्सा एवं इससे जुड़ी हुई सेवाओं को क्रय-विक्रय के सूत्र में बांध दिया गया। चिकित्सकीय सेवा देने वाले एवं मरीज के बीच में उपभोगीय समझौते होने लगे। जैसे अगर आपको हर्निया का ऑपरेशन कराना है तो इतना हजार रुपये लगेगा, डिलेवरी कराना है तो इतना हजार रुपये। मरीज से कॉन्ट्रैक्ट फार्म पर हस्ताक्षर कराए जाने लगे। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह बाजार आधारित हो गईं। यहां पर लाभ-हानी की कहानी गढ़ी जाने लगीं। ऐसे में यह जरूरी हो गया कि इन सेवाओं को कानून के दायरे में लाया जाए ताकि खरीदार को कोई बेवकूफ न बना सके, उनसे ओवरचार्ज न कर सके। गलत ईलाज न कर सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतीय न्यायालय ने समय –समय पर दिए अपने आदेशों में यह स्पष्ट कर दिया है कि चिकित्सा संबंधी जितनी भी सेवाएं हैं उसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 के सेक्शन 2(1) के तहत अनुबंधित सेवा माना जायेगा। इस तरह स्वास्थ्य संबंधित सेवाएं कानून के दायरे में आ गईं।

समाचार

Ceiling Prices fixed for 530 Medicines

Pursuant to the announcement of National Pharmaceutical Pricing Policy, 2012, the Government has notified Drugs (Prices Control) Order, 2013 (DPCO, 2013) on 15/05/2013. All the medicines specified in the national List of Essential Medicines 2011 (NLEM) have been included in the First Schedule of DPCO, 2013 and brought under price control. Out of total 680 NLEM medicines (628 net medicines) under scheduled category of DPCO, 2013, National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) has already fixed the ceiling prices in respect of 530 medicines under provisions of the said order. As a result of reduction in the prices of scheduled medicines under price control, the price benefit accrued to the common man is estimated to the extent of Rs. 2422 crores. This includes 47 formulations for cancer, 20 formulations for AIDS/HIV, 6 formulations for Diabetes and 53 for cardiovascular diseases.

SBA विशेष

बीमार एनपीपीए की नैया राम-भरोसे!

नई दिल्ली/आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश को सस्ती व सुलभ दवाइयां उपलब्ध कराने का दावा करने वाला सरकारी नियामक नेशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइसिंग ऑथोरिटी (एन.पी.पी.ए) बिना चेयरमैन के चल रहा है ! जो पाठक एन.पी.पी.ए का नाम पहली बार सुन रहे हैं उनको यह जानना जरूरी है कि एन.पी.पी.ए ही पूरे भारत में दवाइयों की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने वाली सरकारी एजेंसी है। ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर को लागू करने की जिम्मेदारी एन.पी.पी.ए पर ही है। अर्थात् यदि आपको 2 रुपये की जगह 20 रुपये में दवाइयां मिल रही हैं, तो जिम्मेदार एन.पी.पी.ए ही है। कंपनियों से दवाइयों का उत्पादन डिटेल मंगाने से लेकर दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने तक की जिम्मेदारी इस प्राधिकरण पर है। इतनी बड़ी जिम्मेदारी है के बावजूद पिछले 6 महीनों से एनपीपीए ने अपने चेयरमैन की नियुक्ति नहीं की है।

समाचार

नहीं बढ़े है कैंसर के दवा के दाम…

नहीं बढ़े है कैंसर के दवा के दाम…8000 की दवा को 108000 बताने वाली रिपोर्ट गलत है…आज swasthbharat.in से बात करते हुए एन.पीपीए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह खबर झूठी है। साथ ही 24 सितंबर के पीआईबी के उस रिलिज का हवाला दिया जिसे उर्वरक मंत्रालय ने जारी किया था और दवा […]