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क्या आप जानते हैं ! 65 साल पहले भारत में आया जापानी इंसेफलाइटिस !

आशुतोष कुमार सिंह

भारत जैसे देश किसी भी नई बीमारी का पालनहाल आसानी से बन जाते हैं। सवा अरब से ज्यादा जनसंख्या को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे भारत में जब कोई बीमारी आयात होती है, तो उसकी खातिरदारी घर आए मेहमान की तरह की जाती है। उसके प्रति हमारा नजरिया, उसको रोकने के उपाय ठीक वैसे ही होते हैं जैसे घर आए दामाद खुद से चले जाएं तो ठीक है, नहीं तो उन्हें कौन कहे की आप अपने घर चले जाइए। ऐसी बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीमारियों के फलने-फूलने के लिए जरूरी खाद-पानी यहां पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। यहां पर नई बीमारियों की खेती करने में पूरा तंत्र सहयोग करता है। कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू एवं इबोला जैसी बीमारियों की खेती यहां पर खूब हो रही है। इनकी ब्रांडिंग कर के कुछ यहां के कुछ दूसरे मूल्कों की संस्थाएं अपनी आर्थिक स्वार्थों को पूर्ण करने में सफल भी हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ स्वस्थ मानव संसाधन की रीढ़ की हड्डी तोड़ने की कोशिश साकार होती दिख रही है।
इन सब बातों की चर्चा यहां पर इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इन दिनों एक और बीमारी की ब्रांडिंग जोरो पर है। वर्षों से इस बीमारी का जो बीज हमने बोए थे वे अब फलदायी हो गए हैं। अब पहले से ज्यादा मारक हो गई है यह बीमारी। अब मौतों की संख्या बढ़ाने में इस बीमारी ने महारत हासिल कर ली है। अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस बीमारी की इतनी तारीफ किए जा रहा हूं। जी हां, यह बीमारी है जापानी इंसेफलाइटिस(जेई)। इस बीमारी ने भारत के कई क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया है। और आज उसका हरेक निशाना सही लग रहा है। देश के नौनिहालों को निगलने में यह बीमारी बहुत ही सफल रही है। गोरखपुर के बीआडी अस्पताल में हो रही मौतों का सिलसिला थमा भी नहीं था कि यह झारखंड के जमशेदपुर में हाहाकार मचाने में सफल रही। बगल के रांची में भी इसने कोहराम मचा रखा है। बिहार के मुजफ्फरपुर का क्षेत्र हो अथवा गोरखपुर, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज एवं सिवान का भूगोल। इन क्षेत्रों में इंसेफलाटिस ने अपने आप को खूब फैलाया है।

लचर व्यवस्था ने ली जान

अब यहां पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इंसेफलाइटिस होता कैसे है? और भारत में इसने कब कदम रखा? इसकी मजबूती का राज क्या है?
उत्तर प्रदेश में इंसेफलाइटिस पर पिछले दिनों एपीपीएल ट्रस्ट ने एक अध्ययन किया था। उस अध्य्यन में कहा गया है कि यह रोग फ्लावी वायरस के कारण होता है। यह भी मच्छर जनित एक वायरल बीमारी है। जिसमें सिर में अचानक से दर्द शुरू होता है, शरीर कमजोर पड़ने लगता है। इसका लक्ष्ण भी बहुत हद तक सामान्य बुखार जैसा ही होता होता है। इसका असर शरीर के न्यूरो सिस्टम पर पड़ता है। यही कारण है कि इस बीमारी ने या तो बीमारों को मौत की नींद सुलाया है अथवा उन्हें विकलांग कर दिया है। इस बीमारी को फैलने वाले क्षेत्र के बारे मे इस शोध में कहा गया है कि धान की खेती एवं सुअर-पालन जिन क्षेत्रों में होता है, वहां पर यह बीमारी आसानी से फैलती है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका फैलाव व्यक्ति से व्यक्ति के रूप में नहीं होता है। यह बात तो इस बीमारी के सिम्टम्स की हुई।

65 वर्ष पहले भारत में आई थी यह बीमारी

भारत में यह बीमारी कब आई यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है। आज से 65 वर्ष पूर्व यानी 1952 में पहली बार महाराष्ट्र के नागपुर परिक्षेत्र में इस बीमारी का पता चला। वहीं सन् 1955 तमिलनाडू के उत्तरी एरकोट जिला के वेल्लोर में पहली बार क्लीनीकली इसे डायग्नोस किया गया। 1955 से 1966 के बीच दक्षिण भारत में 65 मामले सामने आए। धीरे-धीरे इस बीमारी ने भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। भारत में पहली बार इस बीमारी ने 1973 फिर 1976 में पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा तबाही मचाई। पंश्चिम बंगाल के वर्दवान एवं बांकुरा जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। 1973 में बांकुरा जिला में इस रोग से पीड़ित 42.6 फीसद लोगों की मौत हुई। 1978 आते-आते यह बीमारी देश के 21 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में फैल गयी। इसी दौरान भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 1002 मामले सामने आए जिसमें 297 मौतें हुई। सिर्फ यूपी की बात की जाए तो 1978 से 2005 तक यह बीमारी 10,000 से ज्यादा मौतों का कारण बनी। 2005 में जो हुआ उसने इस बीमारी की ताकत से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को परिचित कराया। सिर्फ गोरखपुर में 6061 केस सामने आए जिसमें 1500 जानें गईं। इसी तरह 2006 में 2320 मामलों में 528 बच्चों को अपनी जान गवानी पड़ी। 2007 में 3024 मामलों में 645 मौत। इस तरह 2007 तक देश में 103389 मामले सामने आए जिसमें 33,729 रोगियों को नहीं बचाया जा सका। इस शोध में यह बात भी कही गयी है कि 597,542,000 लोग जापानी इंसेफलाइटिस प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं और 1500-4000 मामले प्रत्येक वर्ष सामने आ रहे हैं। यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अभी तक हम लोग जिन आंकड़ों की बात कर रहे हैं, वे सब रिपोर्टेड हैं। बहुत से मामले ऐसे भी होंगे जो रिपोर्ट नहीं हुए होंगे। ऐसे में जब बिना रिपोर्ट किए गए मामलों की नज़र से इस बीमारी को हम देखें तो पता चलेगा कि यह बीमारी कितनी ताकतवर हो चुकी है। नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) जिसे पहले हमलोग राष्ट्रीय एंटी मलेरिया प्रोग्राम (एनएएमपी) के नाम से जानते थे, इन दिनों भारत में जेई के मामले को मोनिटर कर रही है। अभी तक देश के 26 राज्यों में कभी-कभार तो 12 राज्यों में अनवरत यह बीमारी अपना कहर बरपा रही है।
1951-52 में पहली बार भारत में लोकसभा चुनाव हुआ था। तब से लेकर अभी तक तमाम प्रधानमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री बने और चले गए लेकिन 1952 से चली आ रही इस बीमारी का ईलाज नहीं ढ़ूढ़ पाए। लोग मरते रहे और आज भी मर रहे हैं।

146 वर्ष पहले जापान में सबसे पहले इस बीमारी का पता चला

इंसेफलाइटिस की जड़ों को अगर हम ढूढ़ें तो पता चलता है कि इसका जन्म सबसे पहले जापान में हुआ था। शायद यहीं कारण है कि इसे जापानी इंसेफलाइटिस कहा जाता है। आज से 146 वर्ष पूर्व जापान में यह बीमारी सबसे पहले पहचान में आई। 53 वर्षों के बाद इस बीमारी ने अपना विकराल रूप दिखाया और 1924 में जापान में 6000 केस पंजीकृत हुए। यहां से इसका फैलाव एशिया के देशों में हुआ। 1960 के दशक में चलाए गए टिकाकरण अभियान के कारण इस पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया। जापान के अलावा, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों में इसने अपना पैर पसारा फिर जैसा की ऊपर बताया जा चुका है 1952 में इसका प्रवेश भारत में हुआ।

आश्चर्य का विषय यह है कि भारत सरकार इंसेफलाइटिस के सही कारणों को जानने में अभी तक नाकाम रही है। अभी जांच का फोकस गोरखपुर बना हुआ है। जबकि इस बीमारी का फैलाव देश के लगभग प्रत्येक कोने में है। दक्षिण भारत में यह बीमारी पहले आई लेकिन वहां पर वह उतना सफल नहीं हुई जितना उत्तर भारत में दिख रही है। ऐसे में शोध का बिंदु दक्षिण भारत भी होना चाहिए। इतना ही नहीं जांच का बिंदु एशिया के तमाम देश भी होने चाहिए जहां पर यह बीमारी अपना पांव पसार चुकी है। शायद तब जाकर हम इस बीमारी के कारणों की तह में जा पाएंगे एवं ईलाज ढूढ़ पाने के नजदीक पहुंचेंगे। अभी तो ऐसा लगता है कि सरकार चाहती ही नहीं है कि इस बीमारी का ईलाज संभव हो सके नहीं तो गर हमारी सरकारों ने इस बीमारी की भयावहता को पहले ही भांप कर समुचित कदम उठाया होता तो बीआरडी अस्पताल में जो चीख-पुकार सुनने को मिल रही है शायद वह नहीं मिलती।

यह लेख www.firstposthindi.com से साभार लिया गया है।

बेटियों का स्वस्थ होना स्वस्थ समाज की पहली कसौटी हैः डॉ अचला नागर

स्वस्थ भारत यात्रा दल का मुंबई में हुआ स्वागत

मुंबई की दो बालिकाएं बनी स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज की गुडविल एंबेसडर

मीरा-भाइंदर एवं मालाड में हुए आयोजन

बॉलीवुड के रचनाकारों से यात्रा दल की हुई मुलाकात

प्रथम चरण में यात्रा दल ने पूरी की 2700 किमी की यात्रा, दूसरा चरण कन्याकुमारी तक
स्वस्थ भारत यात्रा के प्रथम चरण में 5 राज्यों की 29 बालिकाएं बनी स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज की गुडविल एंबेसडर

मुंबई. 12.2.17

 

यात्रा दल को मिला डॉ अचला नागर का आशीर्वाद
स्वस्थ भारत यात्रा दल ने निकाह, बागवान सहित दर्जनों फिल्म लिखने वाली वरिष्ठ लेखिका डॉ अचला नागर से मुलाकात की। इस अवसर पर उन्होंने यात्रा के लिए अपनी शुभकामना देते हुए कहा कि बेटियों का स्वास्थ्य बहुत जरूरी है। वर्तमान स्थिति में बेटियों के स्वास्थ्य पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि जबतक बेटियां स्वस्थ नहीं होगी तब तक स्वस्थ देश अथवा समाज की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि आज बेटियों के लिए सारे दरवाजे खुले हुए हैं, बस जरूरत है कि वे सार्थक एवं अनुशासित तरीके से आगे बढ़ें। अपनी ताकत को समझें और समाज में अपनी आवाज को बुलंद करें। ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ राष्ट्रीय यात्रा की परिकल्पना की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि जबतक बेटियां सेहतमंद नहीं होंगी सेहतमंद समाज का सपना अधूरा ही रहेगा। एक घंटे तक चली बातचीत में यात्रा दल के वरिष्ठ यात्री एवं वरिष्ठ पत्रकार लतांत प्रसून ने उनके फिल्मी करियर को लेकर कई सवाल पूछे, जिसका उन्होंने सहजता से उत्तर दिया।
सरोज सुमन, डॉ. सागर एवं शेखर अस्तित्व से भी हुई मुलाकात
मुंबई प्रवास के दौरान यात्रा दल ने जाने-माने संगीतकार सरोज सुमन, गीतकार शेखर अस्तित्व एवं डॉ. सागर से मुलाकात की। सभी ने स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज की अभियान के लिए यात्रा दल को शुभकामनाएं दी। इस दौरान यात्रा दल ने कवयित्री रीता दास राम से भी मुलाकात की।

 

रत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के मार्गदर्शन में स्वस्थ भारत (न्यास) द्वारा शुरू हुई स्वस्थ भारत यात्रा का मुंबईकरों ने जोरदार तरीके से स्वागत किया। यात्रा दल सबसे पहले मीरा-भाइंदर के विवेकानंद किड्स स्कूल पहुंचा, जहां पर बच्चों एवं उनको अभिभावकों के बीच में स्वास्थ्य चर्चा हुई। यहां पर जलधारा एवं बेटी बचाओं बेटी पढाओं की टीम ने यात्रा दल का स्वागत किया। इसके बाद यात्रा दल ने दूसरा कार्यक्रम मुंबई के मालाड (ईस्ट) में किया। इस अवसर पर मुंबई की दो बालाकाओं को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर मनोनित किया गया। शरन्या सिगतिया और प्रीति सुमन को इस अभियान का गुडविल एंबेसडर बनाया गया। प्रीति सुमन जहां एक ओर निर्देशन के क्षेत्र में अपना नाम रौशन कर रही हैं वहीं उनकी गायकी के चर्चे भी चहुंओर हैं। शरन्या सिगतिया की उम्र अभी 12 वर्ष ही है लेकिन उन्होंने अपनी कक्षा में बेहतरीन परफॉमेंस दिया है। मालाड में आयोजित इस कार्यक्रम में स्वस्थ भारत (न्यास) के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि आज समय आ गया है कि हम अपनी सेहत को लेकर चिंतनशील हों। सेहत की चिंता हम सरकार के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं। सेहत से बड़ा पूंजी कुछ और नहीं है। यात्रा दल के मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत जी ने कहा कि महाराष्ट्र एवं गुजरात की धरती पर माताओं एवं बहनों के प्रति समाज ज्यादा संवेदनशील है। उन्होंने निगम का चुनाव लड़ रहीं 
संगीता ज्ञानमूर्ति शर्मा से कहा कि आप जीत के बाद स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज के इस संदेश को और व्यवस्थित तरीके से घर-घर ले जाएं. इस अवसर पर मालाड पूर्व के निगम पार्षद ज्ञानमूर्ति शर्मा ने दवाइयों में मची लूट के बारे में लोगों को जागरूक किया। इस अवसर पर कमलेश शाह, वरिष्ठ लेखिका अलका अग्रवाल सिगतिया, विनोद रोहिल्ला सहित सैकड़ों महिलाएं उपस्थित थीं। महाराष्ट्र में निगम चुनाव के गहमागहमी के बीच में मालाड के स्थानीय लोगों द्वारा आयोजित इस स्वास्थ्य चर्चा के लिए स्वस्थ भारत न्यास के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने उन्हें धन्यवाद ज्ञापित किया।

यात्रा के प्रथम चरण में 29 बालिकाएं बनीं स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज की गुडविल एंबेसडर
 2700 किमी की प्रथम चरण की यात्रा में यात्री दल ने स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज अभियान से 29 बालिकाओं को जोड़ा। इन्हें इस अभियान का गुडविल एंबेसडर बनाया गया। हरियाणा में 6, राजस्थान में 4, मध्यप्रदेश में 15, गुजरात में 2 एवं महाराष्ट्र में 2 बालिकाओं को गुडविल एंबेसडर बनाकर सम्मानित किया गया है। 
गौरतलब है कि स्वस्थ भारत यात्रा ‘भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वें वर्षगांठ पर आरंभ किया गया है। नंई दिल्ली में मुख्तार अब्बास नकवी ने इसे हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इस यात्रा को गांधी स्मृति एंव दर्शन समिति, संवाद मीडिया, राजकमल प्रकाशन समूह, नेस्टिवा अस्पताल, मेडिकेयर अस्पताल, स्पंदन, जलधारा, हेल्प एंड होप, वर्ल्ड टीवी न्यूज़ सहित अन्य कई गैरसरकारी संस्थाओं का समर्थन है। 13 फरवरी को यह यात्रा पुणे होते हुए कन्याकुमारी जायेगी। जहां पर दूसरे चरण की यात्रा समाप्त होगी। 16000 किमी की जनसंदेशात्मक यह यात्रा अप्रैल में समाप्त होगी।
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यात्री दल से संपर्क
9891228151, 9811288151

स्वस्थ भारत ने बनाया कलगी को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर

आंख नहीं, दुनिया देखती हैं कलगी रावल
• स्वस्थ भारत ने बनाया कलगी को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर
• गोधरा के सरस्वती विद्या मंदिर एवं बापूनगर अहमदाबाद के वाणिज्य महाविद्यालय का यात्रा दल ने किया दौरा, बालिकाओं को दिया स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश
• शहीद ऋषिकेश रामाणी को दी श्रंद्धांजली

अहमदाबाद 8.2.17

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कहते हैं कि बालक-बालिकाओं में हुनर की कमी नहीं होती, जरूरत होती है उसे तराशने की, सही मार्गदर्शन की। एक बार उन्हें सही मार्गदर्शन मिल जाए तो वो अपनी मंजिल खुद ही बना लेती हैं। ऐसी ही एक नेत्रहीन बालिका हैं कलगी रावल। कलगी जन्मजात नेत्रहीन हैं। बावजूद इसके उन्होंने अपनी जिंदगी में अंधेरे अपने पास फटकने नहीं दिया। 10 वीं परीक्षा डायरेक्ट दीं और 76 फीसद अंकों से उतीर्ण हुईं। इतना ही नहीं उन्होंने अमेरिका जाकर 10000 ऑडियंस के बीच अपनी बात को रखा। रेडियो जॉकी के रूप में काम किया। सुगम्य भारत अभियान को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अपने जैसी बालिकाओं की सेवा करने की ठानी है और कल्गी फाउंडेशन के जरीए यह काम कर रही हैं। गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली कलगी के इसी आत्मविश्वास ने उन्हें स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर बनाया है। भारत भ्रमण पर निकली स्वस्थ भारत यात्रा दल ने अपने अभियान के लिए कलगी को चुना है। इस बावत कलगी ने कहा कि उन्हें स्वस्थ भारत के इस अभियान के बारे में जानकर बहुत खुश हूं, साथ ही इसका हिस्सा बनना मेरे लिए आनंद का विषय है।

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बापुनगर के बालिकाओं ने लिया स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज के संदेश को घर-घर पहुंचाने का संकल्प
गुजरात के अहमदाबाद स्थित बापूनगर में स्वस्थ भारत यात्रा दल ने वाणिज्य महिला महाविद्यालय की छात्राओं को संबोधित किया। इस अवसर पर स्वस्थ भारत न्यास के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि बालिका स्वास्थ्य की स्थिति बहुत दयनीय है. जबतक हम बालिकाओं में प्राथमिक स्तर से ही स्वास्थ्य चिंतन का बीच नहीं बो देंगे तब तक सही मायने में स्वास्थ्य धारा का प्रवाह नहीं हो पायेगा। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य हमारा मौलिक अधिकार है। ऐसे हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना, अपने परिवार को रखना ही सही मायने में न्याय है। प्लेटो के न्याय के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी स्वास्थ्य को नहीं बचायेंगे तो हम अपने, अपने परिवार एवं राष्ट्र के प्रति न्याय नहीं कर पायेंगे। भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर शुरू की गई इस यात्रा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि हम पूरे देश में जाकर बालिकाओं से संवाद करने का संकल्प लिया है। इस अवसर पर वाणिज्य महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने सुंदर गीत-संगीत प्रस्तुत किया। कलगी रावल को इस मंच से स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर मनोनित किया गया। कॉलेज की प्रधानाचार्य किंजलबेन कथिरिया, अल्काबेन सिरोया, हिम्मतभाई, प्रफुल्ल भाई सावलिया, सामाजिक कार्यकर्ता संजय भाई बेंगानी, भूषणभाई कुलकर्णी, सत्यनारायम वैष्णव सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।
शहीद वीर मेजर ऋषिकेश रामाणी को यात्रा दल ने दी श्रद्धांजलि

अहमदाबाद का नाम रौशन करने वाले शहीद ऋषिकेश रामाणी की प्रतिमा पर जाकर यात्रा दल ने उन्हें सलामी दी। साथ ही उनके नाम से चलाए जा रहे नगर निगम स्कूल का दौरा भी किया। शहीद वीर मेजर ऋषिकेश रमाणी स्कूल को वल्लभभाई ने गोद लिया है। वल्लभभाई के प्रति वहां के छात्रों में अपार स्नेह देखने को मिला। स्वस्थ भारत के आशुतोष कुमार सिंह ने उन्हें अपनी पत्रिका भेंट की और यात्रा के उद्देश्यों की जानकारी दी। इस अवसर पर शहीद के पिता वल्लभभाई रमाणी एवं शहीद के नाम से चलाए जा रहे नगर निगम स्कूल के प्राचार्य, रवि पटेल सहित शहर के कई लोग उपस्थित थे।

गोधरा ने भी किया स्वागत

देश के लोगों के मन में गोधरा को लेकर एक संशय की स्थिति आज भी बनी हुई है। लेकिन जिस अंदाज में गोधरा ने स्वस्थ भारत यात्रा का स्वागत किया व अतुलनीय है। गोधरा के स्थानीय पत्रकार रामजानी ए रहीम ने यात्रा दल को पंचमहल के जिला निगम अधिकारी एम.एस गडवी से मिलवाया। उनके सहयोग से यात्रा दल गोधरा के सरस्वती विद्या मंदिर बालिका विद्यालय में जाकर स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश दिया। इस स्कूल की बालिकाओं की परवरिश स्वस्थ तरीके से होते देख स्कूल प्रबंधन को स्वस्थ भारत की ओर से आशुतोष कुमार सिंह ने साधुवाद दिया। यात्रा दल में वरिष्ठ गांधीवादी लेखक एवं पत्रकार कुमार कृष्णनन एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार रोहिल्ला भी श्री आशुतोष के साथ हैं।

गौरतलब है कि भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर स्वस्थ भारत की टीम स्वस्थ भारत यात्रा पर निकली है। स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश देने निकली इस टीम को गांधी स्मृति दर्शन समित, स्पंदन, नेस्टिवा, राजकमल प्रकाशन समूह, संवाद मीडिया, नेस्टिवा अस्पताल, मेडिकेयर, हेल्प एंड होप, जलधारा, वर्ल्ड टीवी न्यूज, आर्यावर्त लाईव सहित कई समाजसेवी संस्थाओं एवं मीडिया मित्रो सहयोग एवं समर्थन प्राप्त है।
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नोटः यात्रा अहमदाबाद के बाद सूरत की ओर कूच कर गयी है। उसके बाद यात्रा मुंबई पहुंचेगी। संपर्क-9891228151, 9811288151

6 छात्राओं को बनाया स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर

झाबुआ की 6 बालिकाएं बनी स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज की गुडविल एम्बेसडर

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भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर गंधिस्मृति एवं दर्शन समिति के मार्गदर्शन में निकली स्वस्थ भारत यात्रा टीम ने आज माँ त्रिपुरा कॉलेज ऑफ़ नर्सिंग की बालिकाओं को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का सन्देश दिया.
छात्राओं को संबोधित करते हुए स्वस्थ भारत न्यास के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि आपलोग नर्सिंग की छात्रा हैं, आप के ऊपर देश के स्वास्थ्य की बड़ी जिम्मेदारी हैं. सही मायने में स्वस्थ भारत की सिपाही आप ही लोग हैं. छात्राओं को उन्होंने antibaiotic के दुरूपयोग को लेकर भी जागरुक किया. साथ ही उनसे शुभ लाभ की अवधारणा पर इलाज करने का संकल्प कराया. इस अवसर पर गांधीवादी चिंतक कुमार कृष्णन ने भी अपनी बात रखी.
स्वस्थ भारत यात्री दल ने कॉलेज की तीन छात्राओं को स्वस्थ भारत की ओर से स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गूडविल अम्बेसडर मनोनीत किया.
गौरतलब है की झाबुआ प्रवास के प्रथम दिन भी उत्कृष्ट विद्यालय से तीन बालिकाओं को यात्री दल ने इस अभियान का गुड विल अम्बेसडर बनाया था. साथ ही यहां के पुलिस अधीक्षक महेश चंद जैन से मुलाकात कर यात्रा की जानकारी दी थी. उन्होंने यात्री दल को कम उम्र में बालिकाओं की हो रही शादी के प्रति भी लोगों को जागरूक करने का सुझाव दिया.

स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज की गुडविल अम्बेसडर

  1. मनीषा गाडडिया
  2. साक्षी सोलंकी
  3. ऋतू निनामा
    सभी उत्कृष्ट विद्यालय, झाबुआ

4 पूजा डोहरिया
5 नेहा डावर
6 इंदूबाला खेतेडीया

कार्यक्रम की शुरुवात दीपप्रज्वलन के साथ हुआ. कार्यक्रम का सञ्चालन श्री ओम शर्मा जी ने की. इस अवसर पर यात्री दल के विनोद कुमार रोहिला, कॉलेज के प्रधानाचार्य अल्पित गांधी सहित बड़ी संख्या में बीएससी नर्सिंग की छात्राएं उपस्थित थी.

16000 हजार किमी की यह यात्रा झाबुआ से अहमदाबाद, मुम्बई होते हुए कन्याकुमारी, फिर नार्थ इष्ट होते हुए दिल्ली तक जायेगी. इस यात्रा में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, राजकमल प्रकाशन समूह, नॅस्टिवा अस्पताल, संवाद मीडिया सहित कई समाजसेवी संस्थाएं सहयोग कर रही हैं.

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स्वस्थ भारत नें 9 बालिकाओं को बनाया ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ का गुडविल एंबेसडर

स्वस्थ भारत (न्यास) द्वारा गुडविल एंबेसडर बनी 9 बालिकाएं, साथ में जीएसडीएस के निदेशक एवं स्वस्थ भारत की टीम

स्वस्थ भारत (न्यास) द्वारा गुडविल एंबेसडर बनी 9 बालिकाएं, साथ में जीएसडीएस के निदेशक एवं स्वस्थ भारत की टीम

  • जम्मू कश्मीर, मध्यप्रदेश, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, असम, मणिपुर एवं अरुणाचल प्रदेश की बालिकाओं को मिला गुडविल एंबेसडर का प्रमाण-पत्र ।

  • पूरे देश में स्वस्थ भारत बनायेगा 300 बालिकाओं को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर

  • भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर स्वस्थ भारत ने शुरू किया स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज कैंपेन

  • गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, मेडिकेयर फाउंडेशन, नेस्टिवा अस्पताल, संवाद मीडिया, जलधारा, हेल्प एंड होप, सिंपैथी, स्पंदन, गोरखा फाउंडेशन एवं राजकमल प्रकाशन समूह ने दिया समर्थन

नई  दिल्ली/  गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति में आयोजित मूल्य निर्माण शिविर में स्वस्थ भारत न्यास ने देश के सात राज्यों की 9 बालिकाओं को ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ कैंपेन का गुडविल एंबेसडर मनोनित किया है। ज्ञात हो कि बालिकाओं के स्वास्थ्य को लेकर शुरू किए गए इस कैंपेन को पूरे देश में ले जाने के लिए न्यास की टीम स्वस्थ भारत यात्रा पर निकलने वाली है। गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति (जीएसडीएस), नेस्टिवा अस्पताल एवं मेडिकेयर फाउंडेशन, संवाद मीडिया, राजकमल प्रकाशन सहित देश के तमाम संगठनों के सहयोग से स्वस्थ भारत (न्यास) स्वस्थ भारत अभियान के अंतर्गत ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ कैंपेन चला रहा है। 2016-17 में 300 बालिकाओं को ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ का गुडविल एंबेसडर बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

स्वस्थ भारत (न्यास) द्वारा देश की 9 बालिकाओं को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर का प्रमाण पत्र देते हुए जीएसडीएस के निदेशक एवं स्वस्थ भारत की टीम

जीएसडीएस के सत्याग्रह मंडप में आयोजित मूल्य निर्माण शिविर में स्वस्थ भारत (न्यास) ने हैफलांग (असम) की केहुलैमइले निरियम, मणिपुर की म्यूचैमलुइ, कारगिल (जम्मू कश्मीर) की डिसकिट डोलमा एवं फिजा बानो, भोपाल (म.प्र.) की कनुप्रिया गुप्ता एवं फाल्गुनी पुरोहित, चुनार (उ.प्र.) से प्रीति राना, वेस्ट सियांग (अरुणाचल प्रदेश) से लिगमा बागरा एवं दिल्ली से प्रेरणा तिवारी को ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ’ समाज का गुडविल एंबेसडर बनाया गया है। इन 9 बालिकाओं में प्रेरणा तिवारी कथक नृत्य में पारंगत हैं, डिसकिट डोलमा एवं फिजा बानो स्वास्थ्य एवं शिक्षा के प्रति अपने क्षेत्र में आम लोगों को जागरूक कर रही हैं। कनुप्रिया गुप्ता भारत की पहली ब्रेल लिपी में छपने वाले अखबार द पीस गांग की संपादक हैं, फाल्गुनी पुरोहित अपनी आंखों से दुनिया को नहीं देख सकती हैं लेकिन अपने मधुर आवाज से दुनिया में शांति क संदेश फैला रही हैं, केहुलैमइले एवं म्यूचैमलुई नॉर्थ ईस्ट में शांति की दूत बनी हुई हैं।

गौरतलब है की स्वस्थ भारत (न्यास) पिछले 4 वर्षों से जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार काम कर रहा है। न्यास द्वारा स्वस्थ भारत अभियान के अंतर्गत ‘नो योर मेडिसिन’, ‘जेनरिक मेडिसिन लाएं पैसा बचाएं’, कंट्रोल मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस  एवं ‘तुलसी लगाएं रोग भगाएं’ जैसे जनकल्याणकारी कैंपेन चलाए जा रहे हैं।

स्वस्थ भारत पत्रिका का लोकार्पण

स्वस्थ भारत पत्रिका का लोकार्पण करते हुए जीएसडीएस के निदेशक्र दीपंकर श्री ज्ञान

स्वस्थ भारत पत्रिका का लोकार्पण करते हुए जीएसडीएस के निदेशक्र दीपंकर श्री ज्ञान

नई दिल्ली के जीएसडीएस स्थित सत्याग्रह मंडप में आयोजित कार्यक्रम में स्वस्थ भारत (न्यास) द्वारा प्रकाशित स्वस्थ भारत पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण जीएसडीएस के निदेशक श्री दीपंकर श्रीज्ञान, वरिष्ठ गांधीवादी श्री बसंत जी, वेदाभ्यास कुण्डु, स्वस्थ भारत न्यास के धीप्रज्ञ द्विवेदी, ऐश्वर्या सिंह, मणि शंकर एवं पत्रिका की संपादिका शशिप्रभा तिवारी की उपस्थिति में हुआ। इस पत्रिका में ‘स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज’ विषय पर देश के जानी मानी हस्तियों ने अपने लेख लिखे हैं। गोवा की राज्यपाल माननीय मृदुला सिन्हा, लोकगायिका मालिनी अवस्थी, अल्का अग्रवाल, शशिप्रभा तिवारी सहित तमाम लेखकों ने बालिकाओं के स्वास्थ्य पर चिंता जाहिर करते हुए उन्हें जागरूक करने पर बल दिया है। इस पत्रिका के प्रकाशन पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, खेल मंत्री विजय गोयल, गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के निदेशक दीपंकर श्री ज्ञान सहित तमाम हस्तियों ने अपनी शुभकामनाएं दी हैं।

 

स्वस्थ भारत का सपना जरूर पूरा होगाः आशुतोष कुमार सिंह

आज स्वस्थ भारत अभियान के संयोजक आशुतोष कुमार सिंह का जन्म दिन है। उनके जन्म दिन के अवसर पर हम आपके लिए लेकर आए हैं विशेष बातचीत। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर आशुतोष कुमार सिंह का साक्षात्कार आकाशवाणी के एफएम रेंबो ने आशुतोष कुमार सिंह से स्वास्थ्य  के संबंध में विशेष चर्चा की थी। आप भी सुने और स्वस्थ भारत की उनकी परिकल्पना को साकार करने में उनका साथ दें।

शिशुओं को निगल रहा है डायरिया

riya newsएक से पांच साल तक की उम्र में होने वाली मृत्यु में 17 प्रतिशत शिशुओं की मृत्यु की वजह डायरिया है। 7,60,000 पांच साल से कम उम्र के बच्चे प्रतिवर्ष डायरिया की भेंट चढ़ जाते हैं। भारत में आधिकारिक श्रोतों के अनुसार 01 से 04 साल तक की उम्र में जिन बच्चों की मृत्यु हो जाती है, उनमें 24 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मृत्यु की वजह डायरिया है और इसी प्रकार 05 से 14 वर्ष तक के 17 प्रतिशत बच्चे डायरिया की वजह से मौत के शिकार होते है। डायरिया की वजह से सबसे अधिक नवजात शिशुओं की मृत्यु 06 माह से लेकर 12 माह के बीच हुई है। जिन परिवारों में नवजात शिशु हो उनके लिए यह छह महीने अधिक संवेदनशील हैं और इन महीनों में सबसे अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत है।
दुनिया में विकासशील देशों के अंदर डायरिया (दस्त) एक आम बीमारी है। जिसकी चपेट में सबसे अधिक नवजात शिशु आते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक वर्ष दुनिया भर में पांच वर्ष से कम उम्र के नवजात आठ लाख बच्चे डायरिया की वजह से मौत के मुंह में चले जाते हैं। मरने वाले बच्चों में अधिकांश विकासशील देशों से होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार नवजात शिुशुओं की मृत्यु की वजह लगभग 90 फीसदी मामलों में गंदे पानी का इस्तेमाल, अस्वच्छता और साफ-सफाई की कमी है। डायरिया को लेकर द यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेंस एमरजेंसी फंड की राय भी कुछ ऐसी ही है। कई विकासशील देशों ने स्वच्छता और साफ-सफाई को लेकर जागरूकता अभियान चलाने में बहुत सारा पैसा खासतौर से पिछले दो दशकों में खर्च किया है। लेकिन इसका कोई खास असर बीमारी से हो रही मृत्यु पर पड़ता नहीं दिखा। डायरिया से आज भी औसतन 2200 बच्चों की मृत्यु प्रतिदिन हो रही है। यह मलेरिया और एड्स की वजह से मरने वाले कुल मरीजों की संख्या से भी अधिक बड़ी संख्या है।
यह तो हम जानते हैं कि मानव मल खुला ना छोड़कर और अपने आस-पास स्वच्छता का ख्याल रख कर डायरिया के संक्रमण से बच सकते हैं। कई बार स्वच्छता का ख्याल न रख पाने की वजह से और कई बार मक्खी, पौधे, मछली, दूसरे जानवारों, मिट्टी और पानी के माध्यम से भी बीमारी घर के अंदर दाखिल हो जाती है। इसलिए बीमारी से बचने के लिए हमें कुछ अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। मसलन टॉयलेट के इस्तेमाल के बाद हाथ की सफाई करना हमारी आदत में शामिल होना चाहिए। घर जिसमें हम रहते है, उसकी साफ-सफाई जरूरी है। जहां हम काम करते हैं और हमारी रसोई भी साफ सुथरी होनी चाहिए। पैर खाली नहीं होना चाहिए, हमें जूता या चप्पल पहनना चाहिए। यूनिसेफ से डायरिया से बचाव के लिए ‘वाशÓ का मंत्र दिया। वाश बना है, वाटर, सेनीटेशन और हाइजीन से। यह बात अब स्पष्ट है कि अस्वच्छ पानी और साफ-सफाई की कमी डायरिया की मुख्य वजह है। लेकिन इन कमियों का प्रभाव रोगी और रोग पर क्या पड़ता है, इस विषय पर अभी अध्ययन
हो रहा है।
पानी और सफाई किसी भी देश के टिकाऊ विकास के लिए जरूरी है। इस बात को संयुक्त राष्ट्र ने सितंबर 2015 में अपने 17 सस्टनेबल डेवलपमेंट गोल में शामिल करके अधिक स्पष्टता प्रदान की। 17 टिकाऊ विकास के लक्ष्यों में छ_ा लक्ष्य पानी और स्वच्छता को संयुक्त राष्ट्र 2030 तक हर एक व्यक्ति तक पहुंचाने की वकालत करता है। यह लक्ष्य आज की तारिख में भारत के लिए भी पा लेना एक बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद की भारत में प्रधानमंत्री के आग्रह पर स्वच्छता का अभियान देश में ‘स्वच्छ भारत अभियानÓ के नाम से जोर शोर से आंदोलन की तरह चलाया जा रहा है। 2014 विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि भारत उन 45 देशों के समूह में शामिल है, जहां स्वच्छता आधी आबादी की पहुंच में भी नहीं है। प्रतिशत में आंकड़ा पचास फीसदी से भी कम का है। जिसकी वजह से देश की बड़ी आबादी गंदगी के बीच जीने को विवश है। डायरिया में ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) देने की शुरूआत भारत में हुई। धीरे-धीरे इसे पूरी दुनिया में स्वीकार किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह रोग धीरे-धीरे नियंत्रित हो रहा है। जहां विकासशील देशों में प्रति हजार नवजात शिशुओं में 13.6 शिशुओं की मृत्यु 1982 तक हो जाती थी, 1992 में वह घटकर 5.6 हो गया और 2000 में वह 4.9 रह गया।
भारत सरकार भी डायरिया को लेकर गंभीर है। इसलिए सरकार ने डायरिया से बचाव का विशेष कार्यक्रम बनाया है। जिसके अंतर्गत साबून से हाथ की अच्छी तरह सफाई का प्रचार किया जा रहा है, सप्लाई की पानी की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार, सामुदायिक स्तर पर साफ-सफाई को प्रोत्साहन, डायरिया से बचाव के साधन जन साधारण तक सहजता से उपलŽध कराने का प्रयास, आंकड़े बताते हैं कि भारत में ओआरएस का प्रयोग बढ़ा है, इस संबंध में समाज को और अधिक जागरूक होने की जरूरत है। एक शोध पत्र में बताया गया है कि ग्रामीण बिहार में सिर्फ 3.5 प्रतिशत स्वास्थ्य कर्मचारी डायरिया के ईलाज के लिए ओआरएस इस्तेमाल करने की सलाह परिवारों को दे रहे हैं। इस तरह के अध्ययनों के बाद प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की आवश्यकता को भी महसूस किया गया है, जो सामुदायिक स्तर पर समाज को डायरिया के संबंध में जागरूक कर पाए।
एक अहम सवाल यह भी है कि बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर हमारी योजना क्या है? हम यानी आम लोग और सरकार किस तरह से इस समस्या से निजात पाना चाहते हैं। जब हम शिशुओं के स्वास्थ्य की बात करते हैं तो हमें मांओं के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना होगा। ऊपर के आंकड़े बता रहे हैं कि डायरिया से मरने वाले
ज्यादातर शिशुओं की उम्र 6 माह से 12 माह है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस उम्र के बच्चे अमूमन मां का दूध ही पीते हैं। ऐसे में उनके स्वास्थ्य का संबंध मां के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ता है। ऐसे में अगर डायरिया उन्मूलन को लेकर किसी भी तरह का अभियान या जागरूकता कैंपेन चलाने की पहल सरकार कर रही है तो उसे इन बिंदुओं पर भी गंभीरता से सोचना चाहिए। उसे अपने कैंपेन में माताओं के आहार-विहार को शामिल अवश्य करना चाहिए। यदि माताएं अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हो गयीं तो निश्चित रूप से डायरिया की बैक्ट्रिया से जूझने व लडऩे की ताकत शिशुओं में भी आयेगी। वैसे हम सब स्वाभाविक रूप से अपने स्वास्थ्य को लेकर कम सचेत व सजग रहते हैंं। भारतीय महिलाओं के संदर्भ में यह बात और भी प्रासंगिक है। शिशु को दूध पिला रही मां का स्वास्थ्य अगर किसी भी कारण से स्वास्थ्य-मानकों के अनुरूप नहीं है तो उसका असर दूध पी रहे शिशु के स्वास्थ्य पर निश्चित रूप से पड़ता है।
ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि सरकार डायरिया से जुड़े पुराने आंकड़ों के आधार पर डायरिया उन्मूलन के लिए प्राथमिकता तय करे और योजना बनाएं।  ताकि सही मायने में देश को  भविष्य में स्वस्थ मानव संसाधन मिल सके।साभारः दैनिक जागरण

स्वास्थ्य क्षेत्र में परवान चढ़ती उम्मीदें

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स्वास्थ्य क्षेत्र में परवान चढ़ती उम्मीदें

——-प्रभांशु ओझा 

यह बात निर्विवाद है कि भारत में आजादी के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र के विकास पर उचित ध्यान नहीं दिया गया. यही कारण है कि स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां साल दर साल बीतने के बाद बढ़ती ही चली गयी हैं. वर्तमान सरकार जिन वैश्विक हालातों में सत्ता में आयी, उसमें नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया कराना सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दा ही नहीं था, बल्कि इसके लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से भारत पर दबाव भी था. संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्यों पर भारत ने इस प्रतिबद्धता के साथ हस्ताक्षर भी किये हैं कि भारत नागरिकों को ‘यूनिवर्सल हेल्थ केयर’ देने की दिशा में हो रही वैश्विक प्रगति के अनुरूप प्रयास करेगा. जाहिर था कि वर्तमान केंद्र सरकार के लिये यह कठिन चुनौती थी. लेकिन अब तक के कार्यकाल में किये गये प्रयासों से यह समझना मुश्किल नहीं है कि केंद्र सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र की हालत सुधारने के लिये गंभीरता से प्रयासरत है. उसने न सिर्फ इस दौरान महत्वपूर्ण योजनायें आरम्भ की हैं, बल्कि स्वास्थ्य स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे और बदलती जरूरतों को समझने का भी माद्दा दिखाया है.     

नेशनल हेल्थ एश्योरेंस मिशन

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार इस बात की वकालत की है कि सरकार का आदर्श लक्ष्य सभी नागरिकों को यूनिवर्सल हेल्थ केयर प्रदान करना है. इस प्रतिबद्धता के अनुरूप ही सरकार ने तकनीकी तौर पर नेशनल हेल्थ एश्योरेंस मिशन के तहत नागरिकों को यूनिवर्सल हेल्थ केयर प्रदान करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य स्वीकार किया. हालांकि इसका नीतिगत रूप अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन उम्मीद की जा रही कि भारत जल्द ही इसको स्पष्ट करते हुये लागू कर देगा. स्पष्ट है कि केंद्र सरकार अब तक सभी नागरिकों को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया कराने की अपनी प्रतिबद्धता से मुकरी नहीं है.

मिशन कायाकल्‍प की शुरूआत

कायाकल्प सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं प्रदान करने की दिशा में एक अहम पहल है. इस पहल को सार्वजनिक सुविधाओं में स्‍वच्‍छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण प्रचलनों को बढ़ावा देने के लिए प्रारंभ किया गया है। पहल के तहत  सार्वजनिक   स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं का मूल्‍यांकन किया जाएगा और ऐसी सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं जो स्‍वच्‍छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण के नवाचारों के असाधारण प्रदर्शन वाले मानदंडों को प्राप्‍त करेंगी उन्‍हें पुरस्‍कार और सराहना प्रदान की जाएंगी। इसके अतिरिक्‍त सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य  सुविधाओं में  स्‍वच्‍छता, सफाई एवं संक्रमण नियंत्रण प्रचलनों को बढ़ावा देने के लिए स्‍वच्‍छता दिशा-निर्देश 15 मई 2015 को जारी किये गये थे। ये दिशानिर्देश सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं में स्‍वच्‍छता को लेकर योजना निर्माण, बारंबारता, पद्धतियों , निगरानी आदि पर विस्‍तार से जानकारी मुहैया कराते हैं।

किलकारी एवं मोबाईल अकादमी

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गर्भवती महिलाओं, बच्‍चों के माता-पिता और क्षेत्र कार्यकर्ताओं के बीच नवजात देखभाल(एएनसी),  संस्‍थागत प्रसव, नवजात पश्‍चात देखभाल (पीएनसी) एवं प्रतिरोधन के महत्‍व के बारे में उचित जागरूकता सृजित करने के लिए चरणबद्ध तरीके से देशभर में किलकारी एवं मोबाईल अकादमी सेवाएं क्रियान्‍वित  करने का फैसला किया गया है। पहले चरण में 6 राज्‍यों उत्‍तराखंड, झारखंड, उत्‍तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्‍था न (एचपीडी) और मध्‍य प्रदेश में किलकारी प्रारंभ की जाएगी। चार राज्‍यों उत्‍तराखंड, झारखंड, राजस्‍थान एवं मध्‍य प्रदेश में मोबाईल अकादमी की शुरूआत की जाएगी।

किलकारी एक इंटरएक्टिव वॉइस रिस्‍पोन्‍स (आईवीआर) आधारित मोबाईल सेवा है, जो सीधे गर्भवती महिलाओं, बच्‍चों की माताओं एवं उनके परिवारों के मोबाईल फोन पर गर्भावस्‍था एवं शिशु स्‍वास्‍थ्‍य  के बारे में टाईम- सेन्‍सिटीव ऑडियो मैसेज (वॉइस कॉल) भेजती है।

राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला- दक्ष

स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के कौशल में सुधार लाने के लिए गुणवत्ता वाली  सेवाएं (प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य) प्रदान करने के लिए केंद्र  सरकार ने लिवरपूल ट्रॉपिकल मेडिसिन (एलएसटीएम) दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र  में पांच राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशाला “दक्ष” की स्थापना कर एक बड़ा कदम उठाया। इस पहल का उद्देश्य स्वास्थ्य सुविधाओं में कुशल कर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, सेवा पूर्व प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना और सतत नर्सिंग शिक्षा और चिकित्सा शिक्षा उपलब्ध कराना है। राष्ट्रीय कौशल प्रयोगशालाओं  को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जोड़ा जा रहा है। 30 स्टैंड- अलोन कौशल प्रयोगशालाओं को गुजरात, हरियाणा , बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल,ओडिशा, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे अलग-अलग राज्यों में स्थापित किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि केंद्र सरकार की यह पहल महिलाओं का जीवन बचाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है.

तम्बाकू उत्पादों पर सख्ती

केंद्र सरकार ने जब तम्बाकू उत्पादों के 85 फीसदी हिस्से पर चित्रित चेतावनियां छापने को अनिवार्य किया तो उम्मीद की जा रही थी कि देश का तम्बाकू कारोबार सरकार पर निर्णय बदलने का दबाव बनायेगा. लेकिन केंद्र सरकार ने इस फैसले पर कायम रहते हुये समाज और देश के नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी. केंद्र सरकार का यह फैसला स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ा सबसे साहसी था. यह गौर तलब है कि सरकार के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी मुहर लगायी. कुछ दिनों पहले अपने निर्णय में न्यायालय ने कहा कि सिगरेट निर्माता कंपनियों को केंद्र सरकार की अधिसूचना के तहत सिगरेट पैकेट के 85 फीसदी हिस्‍से पर वैधानिक चेतावनी देनी ही होगी। स्पष्ट है कि तम्बाकू उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की समाज की तरफ कुछ जिम्मेदारी भी है। जितना ज्यादा तम्बाकू उत्पाद के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान को प्रचारित किया जाएगा उतना ही ज्यादा भारतीयों के जीवन को बचाया जा सकता है।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति- एक क्रांतिकारी कदम

केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद एक महत्वपूर्ण पहल देश की पहली  राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति पेश कर की. नीति का उद्देश्य सभी स्तरों पर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समझ बढ़ाना तथा मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में नेतृत्व को सुदृढ़ करके मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को व्यापक स्तर पर ले जाना था। वर्तमान में भारत में सिर्फ समाज के उच्च वर्ग में ही मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता है, लेकिन इस नीति से पहली बात देश में निर्धन तबकों को भी मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया जा सकेगा.

यह गौर करने वाली बात है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए पूर्व कानून जैसे भारतीय पागलखाना अधिनियम, 1858 और भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 में मानवाधिकार के पहलू की उपेक्षा की गई थी और केवल पागलखाने में भर्ती म‍रीजों पर ही विचार किया गया था। आजादी के बाद भारत में इस संबंध में पहला कानून बनाने में 31 वर्ष का समय लगा और उसके 9 वर्ष के उपरांत मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य अधिनियम, 1987 अस्तित्‍व में आया। परंतु इस अधिनियम में कई खामियां होने के कारण इसे कभी भी किसी राज्‍य एवं केंद्र शासित प्रदेश में लागू नहीं किया गया। जाहिर है कि भारत में नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य को संबोधित करने के लिये एक नीति की आवश्यकता लगातार बनी हुयी थी.

नये मेडिकल संस्थानों की पहल

भारत में अच्छी गुणवत्ता और सेवाओं वाले मेडिकल संस्थानों की कमी एक बड़ी समस्या है. केंद्र सरकार ने इस समस्या का समाधान निकालने के लिये उल्लेखनीय प्रयास किये हैं. इसके लिये केंद्र सरकार ने भारत के कुछ चुनिंदा जिला स्वास्थ्य केन्द्रों को केंद्र मेडिकल कालेज में परिवर्तित करने की योजना बनायी है। इसे चिकित्सा क्षेत्र में रोजगार तथा कर्मियों की संख्या बढ़ाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है। भारत के कुल 671 जिलों में से 58 जिलों में, जिनमे अभी तक कोई मेडिकल कॉलेज नहीं है , सर्वप्रथम उन जिला सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को मेडिकल कॉलेज में परिवर्तित करने की योजना है। प्रत्येक मेडिकल कॉलेजों में MBBS की कम से कम 100 सीटें होंगी। सरकार ने अपने कार्यकाल में 150 जिला अस्पतालों को परिवर्तित करने का लक्ष्य बनाया है।

जानकारों की मानें तो भारत में एक मेडिकल कॉलेज बनाने पर लगभग 200 करोड़ रुपये की लागत आती है। सरकार ने इस लागत का 25 प्रतिशत राज्य सरकारों के हिस्से में तय किया है। पूर्वोत्तर और पहाड़ी इलाकों में लागत की 15 प्रतिशत हिस्सेदारी राज्य सरकारों की होगी, बाकि बचे 85 प्रतिशत केंद्र द्वारा मुहैय्या कराए जाएंगे। इस योजना के पहले चरण में 22 जिला अस्पतालों को मंजूरी मिल चुकी है तथा पहली किश्त के तौर पे 144 करोड़ रूपए भी जारी कर दिए गए हैं. संकेत हैं कि संसाधन कम होने पर यह योजना PPP मॉडल के अनुसार भी लागू हो सकती है। उस स्थिति में मेडिकल कॉलेज में निवेश निजी क्षेत्र करेगा। केंद्र सरकार की इस योजना से समाज के एक बड़े समूह को सुविधायें मुहैया करायी जा सकेंगी.

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी अन्य उपलब्धियां और चुनौतियां

वास्तव में केंद्र सरकार ने अपने अब तक के कार्यकाल में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं. सरकार द्वारा इबोला और जीका वायरस से निपटने के प्रयासों को भी देश में हर तरफ से प्रशंसा मिली है. बावजूद इसके स्वास्थ्य क्षेत्र में चुनौतियां अब भी बरक़रार हैं. सबसे बड़ी चुनौती है स्वास्थ्य पर खर्च होने वाले बजट 1.04 ( सकल घरेलू उत्पाद)  को बढ़ाना और उसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी तय करना. भारत पर अब अपने स्वास्थ्य ढांचे को दुरुस्त करने का वैश्विक दबाव भी है. उम्मीद की जा सकती है कि केंद्र सरकार इन चुनौतियों से सही योजना और नजरिये से निपटेगी.

एंटीबायोटिक्स खाने का सीधा असर दिमाग पर

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लंबे समय तक एंटीबायोटिक्स का सेवन वैसे तो साइड इफेक्ट्स को जन्म देता है लेकिन सबसे गंभीर है कि इन दवाओं को खाने से इसका सीधा असर दिमाग पर पड़ता है।

यह सामने आया है हाल ही में जर्नल सेल रिपोट्र्स में प्रकाशित की गई एक रिसर्च में। बर्लिन में मैक्स डेलब्रक सेंटर फॉर मॉलिक्यूलर मेडिसिन में यह रिसर्च की गई है। इसमें बताया गया है कि दिमाग को तेज रखने के लिए आंत में हैल्दी बैक्टीरिया की आवश्यकता होती है।

एक विशेष प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिका बेक्टीरिया और दिमाग के बीच मध्यस्थता का काम करती है। आंत और ब्रेन से निकलने वाले हार्मोन सीधा तंत्रिका संपर्क के सहारे एक-दूसरे के साथ संवाद कायम करते हैं।

इस स्टडी में रिसर्चर्स ने एंटीबायोटिक के सहारे चूहे की आंत के माइक्रोबायोम (आंतों में मौजूद जीवाणु) को खत्म कर दिया। एंटीबायोटिक इलाज न पाने वाले चूहों की तुलना में इलाज पाने वाले चूहों के मस्तिष्क के हिप्पोकैंपस में बेहद कम संख्या में नई मस्तिष्क कोशिकाओं (मेमोरी के लिए महत्वपूर्ण) का निर्माण हुआ।

कम कोशिकाओं के निर्माण से इन चूहों की मेमोरी डिफेक्ट पाया गया। साथ ही रिसर्चर्स ने इन चूहों में विशेष प्रतिरक्षा कोशिकाओं एलवाई6सी (एचआई) मोनोसाइट की संख्या में भी कमी दर्ज की।

साभार : राजस्थान पत्रिका

 

तीन नये चिकित्‍सा महाविद्यालयों का शिलान्‍यास

The Union Minister for Health & Family Welfare, Shri J.P. Nadda and the Chief Minister of Jammu and Kashmir, Ms. Mehbooba Mufti laying the foundation stone for the new Medical College, at Baramulla, in Jammu and Kashmir on April 15, 2016. 	The Minister of State for Development of North Eastern Region (I/C), Prime Minister’s Office, Personnel, Public Grievances & Pensions, Department of Atomic Energy, Department of Space, Dr. Jitendra Singh and other dignitaries are also seen.

श्री जे.पी. नड्डा ने राजौरी, अनंतनाग एवं बारामूला में तीन नये चिकित्‍सा महाविद्यालयों का शिलान्‍यास किया
क्षेत्र में तृतीयक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल एवं चिकित्‍सा शिक्षा को बड़ा प्रोत्‍साहन : जे.पी.नड्डा

केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री श्री जे.पी.नड्डा ने आज जम्‍मू एवं कश्‍मीर में राजौरी, अनंतनाग एवं बारामूला में तीन नये चिकित्‍सा महाविद्यालयों का शिलान्‍यास किया। श्री नड्डा ने कहा कि ‘नये चिकित्‍सा महाविद्यालय चिकित्‍सा ढांचे को मजबूत बनाएंगे और क्षेत्र में तृतीयक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल एवं चिकित्‍सा शिक्षा को काफी प्रोत्‍साहित करेंगे।’ उन्‍होंने कहा कि प्रत्‍येक चिकित्‍सा महाविद्यालय के लिए 189 करोड़ रुपये के कुल परिव्‍यय के साथ तीनों नये चिकित्‍सा महाविद्यालय प्रति महाविद्यालय 100 सीटों के साथ राज्‍य में प्रति वर्ष 300 एमबीबीएस सीटों की वृद्धि करेंगे। इसके अतिरिक्‍त, प्रति महाविद्यालय से संबद्ध 300 बिस्‍तर सुविधा की वृद्धि के साथ जिलों में चिकित्‍सा बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाया जाएगा।

इस अवसर पर आयोजित समारोहों के दौरान जम्‍मू और कश्‍मीर की मुख्‍यमंत्री सुश्री महबूबा मुफ्ती, पूर्वोत्‍तर क्षेत्र विकास राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार), प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्‍य मंत्री, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्‍य मंत्री डॉ. जितेन्‍द्र सिंह, जम्‍मू एवं कश्‍मीर के स्‍वास्‍थ्‍य एवं चिकित्‍सा शिक्षा मंत्री श्री बलि भगत एवं स्‍वास्‍थ्‍य एवं चिकित्‍सा शिक्षा राज्‍य मंत्री सुश्री आईसा नकाश भी उपस्थित थीं।

केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने कहा कि इन नई पहलों के अतिरिक्‍त, जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य में जम्‍मू स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एवं श्रीनगर स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज का प्रति चिकित्‍सा महाविद्यालय 120 करोड़ रुपये (केंद्र सरकार का योगदान 115 करोड़ रुपये एवं राज्‍य सरकार का 5 करोड़ रुपये) के परिव्‍यय के साथ पीएमएसएसवाई के तहत उन्‍नयन के लिए चयन किया गया है। उन्‍होंने कहा कि राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मिशन (एनएचएम) के तहत स्‍वीकृत कार्यक्रमों के क्रियान्‍वयन के लिए जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य को शुरूआत से 2194.8 करोड़ रुपये तथा पिछले दो वित्‍त वर्षों के दौरान 688.8 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। श्री नड्डा ने कहा कि जम्‍मू एवं कश्‍मीर पूर्वोत्‍तर राज्‍यों की तरह प्रति व्‍यक्ति अधिक आवंटन प्राप्‍त कर रहा है। राज्‍य के पास हार्ड एरिया भत्‍ता का भी प्रावधान है, जहां चिकित्‍सा अधिकारी को अधिकतम 20 हजार रुपये प्रदान किए जाते हैं।

श्री नड्डा ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री ने 7 नवंबर, 2015 को जम्‍मू एवं कश्‍मीर के लिए विकास पैकेज की घोषणा की थी जिसमें एम्‍स जैसे दो संस्‍थानों का निर्माण शामिल है। इसके अतिरिक्‍त, जम्‍मू एवं कश्‍मीर में दो राज्‍य कैंसर संस्‍थानों के लिए प्रति संस्‍थान 120 करोड़ रुपये तक की एक बार की मंजूरी तथा कुपवाड़ा, किस्‍तवाड़ एवं उधमपुर जिलों में जिला अस्‍पताल में तीन तृतीयक देखभाल कैंसर केंद्रों (टीसीसीसी) में से प्रत्‍येक के लिए 45 करोड़ रुपये तक को भी मंजूरी दे दी गई है। श्री नड्डा ने कहा कि ये सभी नये कदम राज्‍य में स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल सुविधाओं को उल्‍लेखनीय रूप से बेहतर बनाने में योगदान देंगे।