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स्वस्थ भारत ने बनाया कलगी को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर

आंख नहीं, दुनिया देखती हैं कलगी रावल
• स्वस्थ भारत ने बनाया कलगी को स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर
• गोधरा के सरस्वती विद्या मंदिर एवं बापूनगर अहमदाबाद के वाणिज्य महाविद्यालय का यात्रा दल ने किया दौरा, बालिकाओं को दिया स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश
• शहीद ऋषिकेश रामाणी को दी श्रंद्धांजली

अहमदाबाद 8.2.17

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कहते हैं कि बालक-बालिकाओं में हुनर की कमी नहीं होती, जरूरत होती है उसे तराशने की, सही मार्गदर्शन की। एक बार उन्हें सही मार्गदर्शन मिल जाए तो वो अपनी मंजिल खुद ही बना लेती हैं। ऐसी ही एक नेत्रहीन बालिका हैं कलगी रावल। कलगी जन्मजात नेत्रहीन हैं। बावजूद इसके उन्होंने अपनी जिंदगी में अंधेरे अपने पास फटकने नहीं दिया। 10 वीं परीक्षा डायरेक्ट दीं और 76 फीसद अंकों से उतीर्ण हुईं। इतना ही नहीं उन्होंने अमेरिका जाकर 10000 ऑडियंस के बीच अपनी बात को रखा। रेडियो जॉकी के रूप में काम किया। सुगम्य भारत अभियान को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अपने जैसी बालिकाओं की सेवा करने की ठानी है और कल्गी फाउंडेशन के जरीए यह काम कर रही हैं। गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली कलगी के इसी आत्मविश्वास ने उन्हें स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर बनाया है। भारत भ्रमण पर निकली स्वस्थ भारत यात्रा दल ने अपने अभियान के लिए कलगी को चुना है। इस बावत कलगी ने कहा कि उन्हें स्वस्थ भारत के इस अभियान के बारे में जानकर बहुत खुश हूं, साथ ही इसका हिस्सा बनना मेरे लिए आनंद का विषय है।

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बापुनगर के बालिकाओं ने लिया स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज के संदेश को घर-घर पहुंचाने का संकल्प
गुजरात के अहमदाबाद स्थित बापूनगर में स्वस्थ भारत यात्रा दल ने वाणिज्य महिला महाविद्यालय की छात्राओं को संबोधित किया। इस अवसर पर स्वस्थ भारत न्यास के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि बालिका स्वास्थ्य की स्थिति बहुत दयनीय है. जबतक हम बालिकाओं में प्राथमिक स्तर से ही स्वास्थ्य चिंतन का बीच नहीं बो देंगे तब तक सही मायने में स्वास्थ्य धारा का प्रवाह नहीं हो पायेगा। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य हमारा मौलिक अधिकार है। ऐसे हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना, अपने परिवार को रखना ही सही मायने में न्याय है। प्लेटो के न्याय के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी स्वास्थ्य को नहीं बचायेंगे तो हम अपने, अपने परिवार एवं राष्ट्र के प्रति न्याय नहीं कर पायेंगे। भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर शुरू की गई इस यात्रा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि हम पूरे देश में जाकर बालिकाओं से संवाद करने का संकल्प लिया है। इस अवसर पर वाणिज्य महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने सुंदर गीत-संगीत प्रस्तुत किया। कलगी रावल को इस मंच से स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का गुडविल एंबेसडर मनोनित किया गया। कॉलेज की प्रधानाचार्य किंजलबेन कथिरिया, अल्काबेन सिरोया, हिम्मतभाई, प्रफुल्ल भाई सावलिया, सामाजिक कार्यकर्ता संजय भाई बेंगानी, भूषणभाई कुलकर्णी, सत्यनारायम वैष्णव सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।
शहीद वीर मेजर ऋषिकेश रामाणी को यात्रा दल ने दी श्रद्धांजलि

अहमदाबाद का नाम रौशन करने वाले शहीद ऋषिकेश रामाणी की प्रतिमा पर जाकर यात्रा दल ने उन्हें सलामी दी। साथ ही उनके नाम से चलाए जा रहे नगर निगम स्कूल का दौरा भी किया। शहीद वीर मेजर ऋषिकेश रमाणी स्कूल को वल्लभभाई ने गोद लिया है। वल्लभभाई के प्रति वहां के छात्रों में अपार स्नेह देखने को मिला। स्वस्थ भारत के आशुतोष कुमार सिंह ने उन्हें अपनी पत्रिका भेंट की और यात्रा के उद्देश्यों की जानकारी दी। इस अवसर पर शहीद के पिता वल्लभभाई रमाणी एवं शहीद के नाम से चलाए जा रहे नगर निगम स्कूल के प्राचार्य, रवि पटेल सहित शहर के कई लोग उपस्थित थे।

गोधरा ने भी किया स्वागत

देश के लोगों के मन में गोधरा को लेकर एक संशय की स्थिति आज भी बनी हुई है। लेकिन जिस अंदाज में गोधरा ने स्वस्थ भारत यात्रा का स्वागत किया व अतुलनीय है। गोधरा के स्थानीय पत्रकार रामजानी ए रहीम ने यात्रा दल को पंचमहल के जिला निगम अधिकारी एम.एस गडवी से मिलवाया। उनके सहयोग से यात्रा दल गोधरा के सरस्वती विद्या मंदिर बालिका विद्यालय में जाकर स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश दिया। इस स्कूल की बालिकाओं की परवरिश स्वस्थ तरीके से होते देख स्कूल प्रबंधन को स्वस्थ भारत की ओर से आशुतोष कुमार सिंह ने साधुवाद दिया। यात्रा दल में वरिष्ठ गांधीवादी लेखक एवं पत्रकार कुमार कृष्णनन एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार रोहिल्ला भी श्री आशुतोष के साथ हैं।

गौरतलब है कि भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर स्वस्थ भारत की टीम स्वस्थ भारत यात्रा पर निकली है। स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज का संदेश देने निकली इस टीम को गांधी स्मृति दर्शन समित, स्पंदन, नेस्टिवा, राजकमल प्रकाशन समूह, संवाद मीडिया, नेस्टिवा अस्पताल, मेडिकेयर, हेल्प एंड होप, जलधारा, वर्ल्ड टीवी न्यूज, आर्यावर्त लाईव सहित कई समाजसेवी संस्थाओं एवं मीडिया मित्रो सहयोग एवं समर्थन प्राप्त है।
#SwasthBalikaSwasthSamaj
#KnowYourMedicine
#SwasthBharatAbhiyan
नोटः यात्रा अहमदाबाद के बाद सूरत की ओर कूच कर गयी है। उसके बाद यात्रा मुंबई पहुंचेगी। संपर्क-9891228151, 9811288151

स्वस्थ भारत यात्रा २०१६-१७ सूरत पहुचीं

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गुरुग्राम, जयपुर, कोटा, भोपाल, इंदौर, झाबुआ, अहमदाबाद के बाद स्वस्थ भारत यात्रा #SwasthBharatYatra आज सूरत  पहुँच चुकी है।  रात्रि विश्राम के बाद यहाँ कल स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज के अन्तर्गत बालिका स्वास्थ को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जायेगा. यहाँ से यात्रा अपने अगले पड़ाव मुम्बई के लिए प्रस्थान करेगी।  मुम्बई में यात्रा २ दिनों तक रहेगी।  मुम्बई में यात्रा का पहला चरण पूरा होगा और द्वितीय चरण आरम्भ होगा।  वहां से यात्रा में लतांत प्रसून जी भी जुड़ जायेंगे।

यात्रा टीम दूरभाष : +९१-९८९१२२८१५१

देश में फार्मासिस्टों की कोई कमी नही है – केंद्र सरकार

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नई दिल्ली/2 फ़रवरी 2.17 : सर्राफा कारोबारियों के बाद अब मोदी सरकार ने दवा कारोबारियों को बड़ा झटका दिया है. केमिस्टों की सर्वोच्च संगठन आल इंडिया आर्गेनाईजेशन ऑफ़ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) फार्मासिस्टों की कमी का हवाला देकर 5 साल से अधिक समय तक दवा कारोबार करने वाले केमिस्ट को 6 माह का रिफ्रेसर कोर्स करवा कर फार्मासिस्ट का दर्ज़ा देने की मांग कर रहे थे.  इसे लेकर  संसद में यूपी के कई सांसद सवाल उठा रहे थे . फार्मासिस्ट की कमी को लेकर उठे सवालों को लेकर संसद में सरकार के तरफ से राज्य मंत्री फगन सिंह ने साफ़ किया कि देश में फार्मासिस्ट की कहीं कोई कमी नही है. मंत्री ने बताया कि देश भर में साढ़े सात लाख से कहीं ज्यादा ही फार्मासिस्ट है. उन्होंने  यह भी बताया कि देश की विभिन्न कॉलेजों से हर साल एक लाख छत्तीस हज़ार फार्मासिस्ट पास होकर निकलते हैं. स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम के तहत ट्रैंड किए जाने वाले फार्मेसी अस्सिटेंट सीधे तौर पर रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट के अधीन होंगे और उनके निर्देशों का पालन करेंगे. 

फार्मासिस्ट की कमी को लेकर लोक सभा में सरकार द्वारा दिए गए जबाब पर देश भर के फार्मासिस्टों ने ख़ुशी जताई है. फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने अपने फ़ेसबुक पर सबसे पहले “सत्यमेव जयते” लिखकर इस बाबत सूचना दी. विनय ने स्वस्थ्य मंत्रालय के प्रति आभार व्यक्त किया है. मध्य प्रदेश महाकौशल फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अखिलेश त्रिपाठी ने इसे सच्चाई की जीत बताया है. अविनव फार्मेसी अभियान, राजस्थान के प्रवक्ता ने विनोद नेरिया ने इसे अबतक की सबसे शानदार जीत बताते हुवे कहा की इसके साथ ही केमिस्टों के नापाक मनसूबे वेनकाब हुवे हैं. 

 फार्मेसी अस्सिस्टेंट को लेकर विवाद जारी

केमिस्ट संगठन भारत सरकार के स्किल डेवलपमेंट के जरिये फार्मेसी अस्सिस्टेंट को फार्मासिस्ट का विकल्प समझ बैठे थे. पर लोक सभा में उन्हें एकबार फिर मुह की खानी पड़ी. स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पस्ट किया कि ऐसे कार्यक्रम को चलाए जाने की योजना तो है ,पर यह केवल फार्मेसी में दवा के रख रखाव भर ही सिमित है. फार्मेसी अस्सिस्टेंट को रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट के निर्देशों पर ही कार्य करना होगा.  फार्मेसी अस्सिस्टेंट मरीज़ को दवा नही दे सकते.

छत्तीसगढ़ के बरिष्ठ फार्मासिस्ट रामसजीवन साहू ने कहा कि जैसा की डॉक्टर का असिस्सटेंट जूनियर डॉक्टर होता है. उसी तर्ज़ पर फार्मासिस्ट को असिस्ट करने के लिए भी जूनियर फार्मासिस्ट ही होना चाहिए. वहीँ रामपुर के फार्मासिस्ट मोहम्मद अली ने कहा कि ऐसे किसी भी अनपढ़ या कम पढ़े  लिखे इंसान जिसे दवा की बिलकुल जानकारी ना हो थोड़ी ट्रेनिंग दे देने भर से दवा के रख रखाव की तकनीक नही समझ सकता. अली ने आगे बताया कि फार्मासिस्ट को पाठ्यक्रम के दौरान कौन सी दवा को कितने टेम्प्रेचर में रखना है बतौर पढाई कराइ जाती है. अली ने एतराज जताया है कि दवा मार्किट में मिलने वाली अन्य खाद्य बस्तु नही है जो कोई भी मरीज़ को दे दे. गलत दवा दिए जाने से मरीज़ की मौत हो सकती है. राजस्थान के बरिष्ठ फार्मासिस्ट रामावतार गुप्ता ने कहा कि जहाँ दवा वहां फार्मासिस्ट के तर्ज़ पर व्यवस्था होना चाहिए.

झारखण्ड के फार्मासिस्ट मनोज झा ने कहा है कि केमिस्टों का भरोषा नही किया जा सकता. उन्होंने आशंका जताई है कि भले ही प्रशिक्षण पाकर अबतक दवा बाँट रहे दवा कारोबारी अस्सिस्टेंट का काम कर लेंगे. पर पुनः यही अनुभव के आधार पर फार्मासिस्ट होने का दावा करने लगेंगे. सरकार को चाहिए की फार्मेसी असिस्टेंट का काम के जूनियर फार्मासिस्ट से करायें जायें. मनोज ने साफ़ किया कि देश के फार्मासिस्टों को असिस्ट करने के लिए किसी अयोग्य व्यक्ति की जरुरत नही.

 

 

पीसीआई प्रेसिडेंट बी सुरेश और आंदोलनकारी फार्मासिस्टों के बीच झड़प का विडिओ हुवा वायरल

 

बिगत 17 अगस्त 2015 को दिल्ली जंतर मंतर पर धरना दे रहे देश भर के फार्मा एक्टिविस्ट अचानक उठे और फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया के दफ्तर को कब्जे में में ले लिया । आंदोलनकारी फार्मासिस्टों और पीसीआई प्रेसिडेंट बी सुरेश की बीच तीखी बहस हुई। इस विवादित विडिओ को झारखण्ड के फार्मा एक्टिविस्ट अरविन्द झा ने अपने फेसबुक पर डाल दिया है । वीडियो वायरल होने से पीसीआई प्रेसिडेंट डॉ. बी सुरेश की जहाँ जमकर आलोचना हो रही है, वही देश भर में फार्मासिस्टों का आक्रोश उबल पड़ा है।

विडिओ देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !!

आंदोलनकारी फार्मासिस्टों और पीसीआई प्रेसिडेंट डॉ. बी सुरेश से झड़प का वायरल विडिओ

आंदोलनकारी फार्मासिस्टों और पीसीआई प्रेसिडेंट डॉ. बी सुरेश से झड़प का वायरल विडिओ

 

 

फार्मासिस्ट संगठन समेत सोशल मीडिया पर चीख रहे फार्मासिस्टों की सच्चाई

काफी दिन से चाह रहा की फार्मासिस्ट आंदोलन और संगठनो समेत सोशल मीडिया पर चीख रहे फार्मासिस्टों की सच्चाई लिखूं । यह सोच कर रुक जाता की कई दिल टूट जायेगे… रिश्ते में खटास आ जायेगी । आज कोशिश करता हूँ की रिस्क ले ही लूँ … वैसे भी क्या फर्क पड़ेगा … जिन्हे बुरा लगे ज्यादा से ज्यादा  गालियां देंगे … उससे ज्यादा कुछ कर भी तो नहीं सकते !! 

दिनांक १२ जनवरी जब फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने दिल्ली में कदम रखा

दिनांक १२ जनवरी जब फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने दिल्ली में कदम रखा

करीब एक साल हो गए दिल्ली आए… सोचा था दिल्ली के बड़े फार्मासिस्ट संगठनो को थोड़ा समय देकर उन्हें सक्रीय करूँगा। उनके कुछ काम निपटा दूंगा। जब थोड़ा एक्टिव जायें तो विस्तार करने की सोचूंगा। जब लगे की सब ठीक है तब कुछ बड़े कदम उठाने की सोचूंगा। कोशिश तो यही थी की सारे फार्मासिस्ट चाहे नौकरी पेशा हों या वेरोजगार सबके मुद्दे को एक एक कर सूचीबद्ध करूँ। फिर एक एक कर टीम बनाकर हर मुद्दे और समस्याओं के समाधान हेतु प्रयाश करूँ । एक्सपर्ट की कोई कमी नहीं। सोशल मीडिया पर कई ऐसे दिग्गज मित्र मिले जो कहीं ना कहीं संगठन को तकनिकी सुझाव दे सकते थे। बस स्ट्रेटेजी बनाकर उसे धरातल पर इम्प्लीमेंट करना है । मेरा हमेशा से ही मानना रहा है की समस्या चाहे कितनी भी बड़ी या जटिल क्यों ना हो कोई ना कोई समाधान जरूर होता है। जरुरत होती है योजना बनाकर काम करने की। दिल्ली के करीब सभी बड़े फार्मासिस्ट संगठन नकारात्मकता से भरे अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं । राष्ट्रीय स्तर के बड़े संगठन अबतक इंतज़ार कर रहे की लोग सदस्य बनेंगे जब फण्ड इकठ्ठा हो जाएगा तब जाकर काम कर पायेंगे। दूसरी तरफ फार्मासिस्ट इंतज़ार कर रहे की जब बड़े संगठन काम करेंगे तभी उनपर भरोषा करेंगे या उनकी सदस्यता लेंगे। दोनों ही एक दूसरे का इंतज़ार बर्षों से कर रहे… आज भी वही आलम है।

संगठनो की बात भी एक हद तक सही ही थी की बगैर फण्ड के वे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते थे। उनका अपना बुरा अनुभव भी रहा हो… ऐसे में मैंने भी एक कोशिश की अपने फेसबुक के जरिए राष्ट्रीय संगठन से जुड़ने की अपील की। बात सदस्यता शुल्क पर आई तो मैंने फार्मासिस्टों को मेम्बरशिप जमा करने कहा । यहाँ कुछ नहीं छुपा… कइयों ने हमेशा की तरह सदस्यता अपील को फेसबुक पर लाइक तक नहीं किया और आगे बढ़ गए। ऐसा भी नहीं की सदस्यता के रूप में राशि नहीं मिली। थोड़ी ही सही पर बैंक में गए। संगठन से बात कर मैंने सदस्यता राशि की डिटेल वेबसाइट पर डालने को कहा ताकि ट्रांसपेरेंसी बनी रहे । कोई भी सदस्य कभी भी अकाउंट डिटेल देख सके। पर ऐसा नहीं किया गया । इस बात ने मुझे भी आहत किया । फिर मैंने संगठनों के काम से तौबा कर अकेले काम करने की सोची । पीसीआई और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया के अधिकारीयों से मिलने जुलने के क्रम में  इतना तो आभास हो ही गया था की मामला इतना भी आसान नहीं। यहाँ एक से बढ़कर एक चालबाज़ अधिकारी है। इन्हे देश में फार्मेसी के बदतर हालात हमसे कही ज्यादा बेहतर पता है। देश के कोने कोने से हज़ारों फार्मासिस्ट आरटीआई करते है, सूचना मांगते है, ज्ञापन देते हैं।  फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया हो या ड्रग कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया का कार्यालय दोनों ही एक दूसरे को लेटर लिखते है। यहाँ दो एक्ट पर बात होती है ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और फार्मेसी एक्ट  … पीसीआई कहती है की हमारा काम फार्मेसी एक्ट 1948 तक ही सिमित है। पर बात जब फार्मेसी एक्ट को इम्प्लीमेंट करने की आती है तो वे खुद कुछ नहीं करते पूरी तरह फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन पर निर्भर है । फार्मेसी एक्ट इम्प्लीमेंटेशन सम्बन्धी पत्राचार ड्रग कॉट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया को करतें हैं। कभी कभी स्टेट गवर्नमेंट को भी लेटर जारी करती है। मेरी जब अर्चना मुगदल (पीसीआई सेक्रेटरी) से पहली बार बात हो रही थी, तो मैंने इस बात को जोरदार तरीके से रखने की कोशिश की थी कि पीसीआई के लाख लेटर लिखने के बाद भी जब ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया , स्टेट ड्रग कंट्रोलर , स्टेट फार्मेसी कौंसिल या राज्यों के स्वास्थ्य सचिव या हेल्थ डायरेक्टर जैसे अधिकारी कोई एक्शन नहीं लेते…  ऐसे में पीसीआई क्या एक्स्ट्रा एफर्ट लगाती है ? पीसीआई का जबाब था इसके सिवा हम ज्यादा से ज्यादा एक रिमाइंडर लगा देते है और भला हम कर भी क्या सकते हैं ? मैडम के चेहरे पर भले ही लाचारी के भाव थे पर वावजूद इसके उन्हें इस बात का जरा भी मलाल नहीं था कि इस संबादहीनता और नॉन इफेक्टिव परफॉरमेंस से फार्मेसी का कितना नुकसान हो रहा है। ऐसे में जब फार्मेसी कौंसिल ऑफ़ इंडिया की कोई नहीं सुनेगा तो फिर फार्मेसी की अहमियत ही कहाँ रह जायेगी ? फिर मतलब क्या रह जाएगा कड़े एक्ट और कानून का ? सेक्रेटरी  अर्चना मुगदल के इस गैर जिम्मेदाराना जबाब से एक बार तो मैं भी हताश हो गया कि पीसीआई ने पल्ला झाड़ लिया । अब आगे काम कैसे करूँगा ? पर कुछ ना कुछ रास्ता तो निकालना ही था सो ड्रग कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया के दफ्तर जाकर डिप्टी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया सुदीप्तो डे से मिला । इस मुलाकात में डिप्टी डायरेक्टर से जोरदार बहस हुई । गाली गलौज तक की नौबत आ गयी । डिप्टी ड्रग कंट्रोलर ऑफ़ इंडिया साहेब सबकुछ जानने के बाद भी न तो जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थे ना ही कोई विशेष एक्शन प्लान बनाने के पक्ष में। सुदीप्तो डे कह रहे थे की जैसा चल रहा चलने दो अब कुछ नही किया जा सकता । गुस्सा तब आ गया जब उनकी ही जारी की गई कुछ पत्राचार की प्रतियां दिखाई गई जिसमे उन्होंने छत्तीसगढ़ के ड्रग कंट्रोलर को निर्देश देते हुए ड्रग कंट्रोलर को ड्रग एक्ट के उलघ्घन पर करवाई करने को लिखा था । पहले तो इंकार कर दिया फिर कहा जब हमारे पास शिकायत आती है हम केवल ड्रग कंट्रोलर्स को लेटर फॉरवर्ड करते है। इसके अलावा हम कुछ नहीं कर सकते चूँकि हमारा काम नहीं है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया डॉ. ज़ी एन  सिंह से मिलने नहीं दे रहे। कई कोशिशें की  पर मुझे अप्पोइटमेंट नहीं दिया गया दिया गया और हर बार मिलने से रोका गया ।

सोशल मीडिया के जरिये देश भर के कई एक्टिव फार्मासिस्ट मित्रों व संगठनो की मदद से दिल्ली में एक बड़ा आंदोलन करने की योजना बनी। चूँकि फार्मासिस्ट दूर दूर से आ रहे थे फोर्मलिटी करने का कोई इरादा नहीं था। कॉन्फ्रेंस आयोजन के बहाने ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया और फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया को घेरने की कोशिश के साथ ही उनपर दबाब बनाकर सबकी जबाबदेही तय करनी थी । तय हुवा की जंतर मंतर पर अनिश्चित कालीन हड़ताल पर बैठेंगे। फिर भी काम ना बने तो भूख हड़ताल पर चले जायेगे। सारी तैयारियां फेसबुक के चैटबॉक्स और व्हाट्सऐप ग्रुप में चल रही थी। सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था उम्मीद की जा रही थी पांच सौ लोग भी आ गए तो डट कर सामना करेंगे। पीसीआई और डीसीजीआई को घुटने टेकने पर मजबूर करेंगे । जबतक कोई कारगर समाधान ना निकले । यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान में एक्टिविटी ज्यादा दिख रही थी इनसे उम्मीदें भी ज्यादा की गई। ज्यादा से ज्यादा लोगों को साथ लाने को कहा गया । दिल्ली से दुरी को देखते हुवे पूर्वोत्तर राज्यों असम और तमिलनाडु  पर ज्यादा दबाब नहीं दिया गया था । दिल्ली के सभी बड़े संगठनो को खास कर न्योता दिया गया। ताकि वे डायरेक्ट देश भर के फार्मासिस्ट और संगठनो के सामने अपनी बात रख सकें। चूँकि हर काम अकेले को ही करना था । सामने एक बड़ी चुनौती इंतज़ार कर रही थी। दिल्ली में ज्यादा फार्मासिस्ट मित्र नहीं जुड़े थे । सोशल मीडिया ही एक मात्र सहारा था । इसलिए सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया गया ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा फार्मासिस्ट आंदोलन से जुड़ सकें। साथियों ने भी खूब प्रचार प्रसार किया। वावजूद इसके कॉन्फ्रेंस  में उपस्थिति देख कर एकबारगी इतना तो यकीं हो गया की सिस्टम से लड़ने से ज्यादा चुनौती अपने लोगों ने ही खड़ी कर रखी है । जिनके लिए आप लड़ रहे हैं वे खुद एक बड़ी चुनौती बने हुवे हैं। उम्मीद से बिपरीत काफी कम संख्या में लोगों को देख थोड़ा दुःख तो हुवा, पर काफी कम संख्या के बीच भी कुछ ऐसे फार्मासिस्ट भी थे जो देश के आखिरी छोर से दो दिन ट्रेन में गुजारने के बाद भी बगैर थकान के मुस्कुराते हुवे गले लगे थे। असम, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से आए चंद मुट्ठी भर लोगों ने हौशला बढ़ा दिया था। झारखण्ड से सिंघभूम फार्मासिस्ट एसोसिएशन की एक बड़ी टीम साथ में थी जिन्होंने मंच का कार्यभार संभाल लिया। वहीँ छत्तीसगढ़ और यूपी के संगठनों ने साथी मेहमानो की देखरेख व अन्य इंतज़ाम देखे। महज़ 24 घंटे के भीतर हर एक को जिम्मेदारी दी गयी कॉन्फ्रेंस और जंतर मंतर पर  अनिश्चित कालीन धरना दोनों ही रणनीति को इम्प्लीमेंट करने को तैयार किया गया ।

 

कोटला रोड दिल्ली का ग़ालिब ऑडिटोरियम में प्रवेश करते विनय कुमार भारती आंदोलन का आगाज़ यहीं किया गया

कोटला रोड दिल्ली का ग़ालिब ऑडिटोरियम में प्रवेश करते विनय कुमार भारती आंदोलन का आगाज़ यहीं किया गया

 

अबतक सब ठीक ठाक था इस बीच कार्यक्रम की शुरुवात में ही मध्य प्रदेश के स्टेट फार्मासिस्ट एसोसिएशन के चंद नेताओं ने कई बातों को लेकर खींचतान शुरू की। अबतक इतने सवाल उन्होंने अपनी सरकार से नहीं पूछे होंगे जितनी आंदोलन को लेकर मुझे सड़क पर पूछे जाने लगे । अगर जबाब मुझसे ही लेना था तो दिल्ली आने की जहमत क्यों ? मैं तो खुद उनके सवालों को लेकर सरकार के नुमाइंदो को कटघरे में करने की तैयारी में था। स्टेट फार्मासिस्ट एसोसिएशन (मप्र) के पदाधिकारी कॉन्फ्रेंस शुरुवात से पहले ही अपने नफे नुकसान का हिसाब लेना चाह रहे थे । इनकी बातें भी वेतुकी थी  – “इस कांफ्रेंस से हमारा क्या होगा ? बाकियों कि हम नहीं जानते  वे क्यों आये है?  सड़क पर खड़े खड़े संगठन ने  आरोप भी जड़े की उनकी खातिरदारी ठीक से नहीं हुई। उनके लीडर को सम्मान नहीं दिया गया। उनकी संस्था का लोगो कहीं नहीं दिख रहा है। अब उन्हें कैसे समझाता की बेटी की शादी कर रहा होता तो उनके अरमान पुरे करता। इलेक्शन या सम्मान समारोह अयोजित करता तो सबके कलरफुल पोस्टर बनाकर होर्डिंग चौराहे पर लगा देता। यहाँ तो सिस्टम के साथ आर पार की जंग की तैयारी चल रही थी। हाई रिस्क ज़ोन में काम करना था। पुरे कांफ्रेंस को दिल्ली पुलिस की एक टुकड़ी कवर कर रही थी । यहाँ तो यह संभव था की  दिल्ली पुलिस डंडे मारते हुवे जेल में भेज देगी । जबकि उन्हें अच्छे से पता था की जो लोग जमा है, आधे खुद किसी ना किसी फार्मासिस्ट संगठन के अध्यक्ष या सचिव है, जो एक दूसरे संगठन के सदस्यों के साथ तालमेल बिठाते हुए एक दूसरे की मदद कर रहे … खतिरदारी व ख्याल रख रहे। कई अन्य राज्यों के अध्यक्ष और सचिव तक खुद चाय पानी की व्यवस्था में दिखे । ऐसे में मध्य प्रदेश संगठन के प्रमुखों के नखरे तकलीफ दे रहे थे।

 

ग़ालिब ऑडिटोरियम में कांफ्रेंस के दौरान फार्मासिस्ट की टीम

ग़ालिब ऑडिटोरियम में कांफ्रेंस के दौरान फार्मासिस्ट की टीम

 

खैर मध्य प्रदेश के रूठे फार्मासिस्ट नेताओं  को मानाने की कोशिश कर आंदोलन से जुड़ने की अपील करते जब हर संगठन के लोग हार मान गए तो उन्हें वापस मध्य प्रदेश जाने को कहा गया। स्टेट फार्मासिस्ट एसोसिएशन के प्रधान बड़ी संख्यां में अपने कार्यकर्ताओं के साथ वापस हो गए। हमने पीछे मुड़ने की बजाय आगे बढ़ने की ठानी और बढ़ते गए। पहले दिन कॉन्फ्रेंस में हर किसी की ने अपने राज्यों की बातें शेयर करते हुवे अपने राज्यों का हालात सामने रखा। अंततः फैसला हुवा की सब मिलकर जंतर मंतर पर जुटेंगे । संख्या भले ही कम थी पर हौसले बुलंद । दूसरे दिन महज़ पच्चीस से तीस लोग जंतर मंतर पर जमा हुवे । अगर स्टेट वाइस नाम लूँ तो सबसे पहले झारखण्ड , असम , तमिलनाडु , महाराष्ट्र, यूपी और राजस्थान के फार्मासिस्ट  एक्टिविस्ट शरीक हुवे मध्य प्रदेश का जत्था वापस जा चूका था । अच्छी तरह याद है सईद अहमद को छोड़ दिल्ली से कोई जंतर मंतर पर नहीं पंहुचा।

 

जंतर मंतर पर डटे फार्मा एक्टिविस्ट

जंतर मंतर पर डटे फार्मा एक्टिविस्ट

 

जंतर मंतर पर नारेबाजी करते फार्मासिस्ट युवाओं की विडिओ

जंतर मंतर पर हमेशा ही भीड़ रहती है। हज़ारों की भीड़ में पच्चीस लोगों को शायद ही मिडिया तवज़्ज़ो दे। बमुश्किल असम और तमिल की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने थोड़ा बहुत  कवर किया असम की टीम और तमिल की टीम ने अगुवाई की और मीडिया हैंडल किया। सबसे दिलचस्प बात रही की जब असम की मीडिया कवर कर रही थी तो जंतर मंतर पर उपस्थित सभी फार्मासिस्टों ने असामी भाषा में नारेबाजी की यह अपने आप में सांस्कृतिक एकता के साथ राष्ट्रीय फार्मासिस्ट एकता का भी परिचय दिया । संख्या कम थी लोग दूर से आये थे उन्हें लौटना भी था उम्मीद की जा रही थी की दिल्ली व आसपास के लोगों को रोक कर धरना अनिश्चित काल के लिए आगे बढ़ाया जाएगा । ऐसी स्थिति में स्पॉट पर फैसला लेना था । सब इस बात पर तैयार हुवे की चुपचाप धरने पर बैठकर टाइमपास और फॉरमैलिटी करने से अच्छा है आज  ही पीसीआई पर धावा बोलेंगे और घेराव करेंगे। महज़ आधे घंटे में सभी जंतर मंतर से उठकर फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया के मुख्यालय कोटला रोड दिल्ली के दफ्तर पहुंचे और कैंपस की घेराबंदी कर दी। पीसीआई के अधिकारियों अध्यक्ष डॉ. बी सुरेश और सचिव अर्चना मुगदल को सबसे पहले तीन घंटे तक उनके चेम्बर में बंद रखा गया । अधिकारीयों की पुलिसिया धमकियों के बीच उन्हें बाध्य किया गया की वे असम से लेकर गुजरात और तमिलनाडु तक के हर एक मुद्दे और हर एक संगठन की बात सुनें और जबाब दें। पीसीआई के मुख्यालय में यह पहली घटना थी जब देश के कोने कोने से आए फार्मा एक्टिविस्टों ने कानून को हाथ में लेते हुवे सीधे सीधे पीसीआई के अध्यक्ष और सचिव को ना सिर्फ बुरी तरह लताड़ा बल्कि सीधे सीधे चेतावनी दी , की जल्द से जल्द फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया अपनी कार्यप्रणाली सुधारे । फार्मेसी के प्रति अपनी जबाबदेही तय करे । बहानेबाज़ी, कामचोरी और भरष्टाचार बर्दास्त नहीं की जायेगी ।

फार्मासिस्ट संगठन पीसीआई के अध्यक्ष बी. सुरेश और सचिव अर्चना मुगदल को उनके चेम्बर में फटकारते हुवे

फार्मासिस्ट संगठन पीसीआई के अध्यक्ष बी. सुरेश और सचिव अर्चना मुगदल को उनके चेम्बर में फटकारते हुवे

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पीसीआई के दफ्तर में जब फार्मासिस्ट अचानक जा घुसे और नारेबाजी करने लगे !

उग्र फार्मासिस्टों को मनाते पीसीआई प्रेसिडेंट डॉ. बी सुरेश !

पीसीआई के कार्यों का हिसाब किताब करते प्रदेशों से आये फार्मासिस्ट !

फार्मासिस्टों के लगातार हमले से अपना बचाव करते दिखे बी. सुरेश !

सचिव अर्चना मुगदल और डॉ. बी सुरेश पूरी तरह से दबाब में थे। मुख्यालय में घुसते ही दोनों ही को मुर्दाबाद के नारों से उनकी हेकड़ी  दिखा दी गयी थी। डरे सहमे दोनों ही ने माना की पीसीआई में कई कमियां है। दोनों ही ने वादा किया की वे पहले से ज्यादा ध्यान से काम करेंगे। फार्मासिस्ट को जो अबतक महज़ पैरामेडिकल स्टाफ तक सिमित था बहुत जल्द भारत में डॉक्टर की तरह फार्मासिस्ट को भी प्रोफेशनल होने का गर्व करवायेगे । बी सुरेश ने फार्मेसी प्रेक्टिस रेगुलेशन को लागु करवाने के लिए हामी भरी। घेराव के दौरान बात सिर्फ फार्मेसी एक्ट और  ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स के उलंघन तक ही सिमित नहीं थी । यहाँ हर उस मुद्दे को उठाया गया जो हर फार्मासिस्ट के सम्मान से जुडी हुई हैं जो पुरे फार्मासिस्ट कम्युनिटी के लिए अहमियत रखती है।

 

जंतर मंतर से ललकारते फार्मासिस्ट

जंतर मंतर से ललकारते फार्मासिस्ट

 

17 फ़रवरी 2015 पीसीआई मुख्यालय में काफी देर बहस हुई थी देर रात सभी मित्रों को विदा करते हुवे धरना की समाप्ति करने पर सहमति बनी। चूँकि अब मैं दिल्ली में वापस अकेला रह गया था आगे बढ़ना बिलकुल मुंकिन नहीं था । मित्रों को विदा करने के बाद जब मैंने पिछले चौबीस घंटे के कार्यों का आंकलन किया तो नतीजे पर पंहुचा की एक बड़ा फैसला महज़ सोशल मीडिया के भरोसे ले लिया था । यह काफी जोखिम भरा था । फेसबुक के लाइक और कॉमेंट का मतलब यह कतई नही लगा सकते की वाकई लोग अपने घरों से बाहर निकल कर अपना हक़ लेने के लिए सडकों पर उतर आयेगे। काफी कम रिसोर्सेस होने के वावजूद एक बड़ा रिस्क लेकर पीसीआई पर  दबाब बनाने की कोशिश की गई । आज भी कभी  कभी सोचता हूँ की अपने लक्ष्य में नाकाम रहा । पर यह सोच कर खुद को बहला लेता हूँ की कम से कम मैं उस नाकारा भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ…  जो चाहते तो बहुत कुछ हैं … पर घर बैठे स्मार्टफोन पर । खुश हूँ की झारखंड से दिल्ली तक लड़ा । अपनी छमता से ऊपर उठकर एक कोशिश की … इस करप्ट सिस्टम से टकराने की … खुश हूँ की मेरी गिनती उनमे नहीं की जायेगी जो दिन रात सोते जागते  सोशल मीडिया में चीखते चिल्लाते रहते है कि फार्मासिस्ट का शोषण हो रहा … मुझे मेरा हक़ चाहिए … सिस्टम ही करप्ट है … फलां होना चाहिए … फलां फलां … अगर मैंने कुछ लिख दिया तो तुरंत एंड्रॉएड और स्मार्ट फोन पर शुरू .. एक लाइक और एक कॉमेंट…  ज्यादा एहसान किया तो एक शेयर ।

 

ख़त्म करने से पहले एक बार उन तमाम फार्मासिस्ट साथियों को जोरदार सैल्यूट जरूर करना चाहूँगा, जिन्होंने बगैर किसी निजी स्वार्थ के 16 – 17 अगस्त 2015 के दिल्ली आकर फार्मासिस्ट आंदोलन में हिस्सा लिया । मेरे लिए अलग अलग राज्यों से दिल्ली पहुंचे वे मुट्ठी भर लोग उतने ही हीरो है जितनी मेरे आदर्श महाराष्ट्र के पूर्व एफडीए कमिशनर महेश झगड़े। थैंक्यू… टीम असम – झूमा चौधरी, संजीव तालुकदार, ज़ाकिर सिकदर , सोफियर रहमान, टीम झारखण्ड – धर्मेंदर सिंह, जीतेन्द्र शर्मा , मनोज झा , अरविन्द झा , अनिल साहू, शशि सिंह , टीम गुजरात -राम प्रवीण,  टीम राजस्थान – सर्वेश्वर शर्मा , शिवकरण मील , नविन आत्रेय , देव , सुरेन्द्र चौधरी , सीताराम कुमावत , टीम तमिलनाडु – पैटर्न राज , सेंथिल कुमारा एस , चंद्रशेखरन , टीम महाराष्ट्र – सुधांसु नेवरे , टीम यूपी – अमित श्रीवास्तव , संजय भारद्वाज , अरविन्द शुक्ला , क्षितज कुमार , कृष्णा प्रताप साहनी, संदीप चौरसिया, सत्येन्द्र त्रिपाठी, रजनीश कुशवाहा जसीम अख्तर  बिलासपुर टीम – अभिषेक सिंह , वैभव शास्त्री, युगल  समेत अन्य फार्मा एक्टिविस्ट, विशेषकर आभार दुबई में बैठे सफीक अहमद का जिन्होने अपनी उपस्थिति तो दर्ज़ नहीं कराई पर  सहयोग राशि सिर्फ इसलिए भेजी चूँकि उन्हें लगा हम कुछ कर पाएंगे ।  छमा प्रार्थी हूँ अगर किसी का नाम ना लिख पाया तो …

 

आंदोलन में भाग लेने आये फार्मा एक्टिविस्ट

आंदोलन में भाग लेने आये फार्मा एक्टिविस्ट

 

आज फिजां बदली जरूर है यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेंत कुछ राज्यों में पहले की अपेक्षा एक्टिविटी बढ़ी है। कई नए युवा फार्मा एक्टिविस्ट बनकर उभरे हैं… एकजुट होकर सडकों पर लड़ रहे। कोई दो राय नही इनके हौसले को देख भ्रष्ट अधिकारीयों और प्रशाशन की नींद हराम है। वहीँ दूसरी तरफ आज भी नब्बे फीसदी से ज्यादा फार्मासिस्ट आज सबकुछ देखते हुवे भी अपने स्मार्टफोन और इंटरनेट से बाहर नहीं निकल पा रहे। चंद फार्मासिस्ट संगठन के सीनियर पदाधिकारी सिर्फ अपने पद, प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए संगठनों को एक जुट नहीं होने देना चाह रहे । ज्यादातर  आज भी  ज्ञापन की कॉपी और प्रेस विज्ञप्ति लिए मीडिया के दफ्तर के चक्कर लगा रहे। एक बार अख़बार में नाम छप जाए बस … लगना तो फेसबुक पर ही है।

आखिर कबतक …

 

(विनय कुमार भारती )

Email: activistvinay@gmail.com

Know Your Medicine कैंपेन में फार्मासिस्टों का अहम् योगदानः विनय कुमार भारती

“नो योर मेडिसिन” पर बात करते हुए विनय कुमार भारती ने कहा की चूँकि हर कदम पर अनट्रेंड लोग दवा बाँट रहे है ऐसे में दवा की सही जानकारी मिलना मरीज़ के लिए असम्भव-सा है। ऐसे में डॉक्टर और फार्मासिस्ट की जिम्मेदारी बनती है की दवा के बारे में आम जनता को जागरूक करें। मरीज़ों को चाहिए की इलाज़ के दौरान अपने डॉक्टर और फार्मासिस्ट से दवा सम्बन्धी सवाल बेहिचक पूछें और उनके द्वारा बताए गए सलाह पर अमल करें। निरोग रहें…।

 
नई दिल्ली/ पिछले दिनों दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयेजित नो योर मेडिसिन कैंपेन के शुभारंभ के अवसर पर बोलते हुए फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने देश के फार्मासिस्टों से आह्वान किया कि वे इस कैंपेने से जुड़े। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि देश के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी फार्मा मित्रो पर है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि अगर हमारे किसी फार्मासिस्ट ने गलत किया है तो उसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए हम तैयार हैं।  लेकिन उन अस्सी फीसदी गैर फार्मासिस्टों का क्या जो वेखौफ़ होकर सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों समेत देश भर की दवा दुकानों में गैर क़ानूनी रूप से दवा बाँट रहे है? दवा को जन्म देने से लेकर उसे सुरक्षित तरीके से मरीज़ तक पहुँचाने का ज़िम्मा फार्मासिस्ट का है देश भर के फार्मासिस्ट अपनी पूरी निष्ठां से अपने कार्य में लगे हैं। नो योर मेडिसिन (अपनी दवा को जानिए) अभियान से जहाँ एक तरफ आम जन में जागरूकता आएगी वही दवा के दुष्प्रभाव से मरीज़ों को बचाया जा सकेगा!

Know Your Medicin Programme

विनय ने बताया कि दवा बनाने से लेकर दवा का वितरण करने का क़ानूनी अधिकार केवल एक फार्मासिस्ट का है ! अपने चार बर्ष के पाठ्यक्रम में फार्मासिस्ट दवा से सम्बंधित विषय का गहन अध्ययन करते हैं, भारत जैसे उन्नत देश के लिए बड़े ही शर्म की बात है की दवा व्यवसाय से जुड़े  अस्सी फीसदी से कहीं ज्यादा ही लोग ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट और फार्मेसी एक्ट का उलंघन कर रहे हैं। यूपी का उदाहरण देते हुवे उन्होंने कहा की स्टेट फार्मेसी काउंसिल में केवल 45 हज़ार फार्मासिस्ट रजिस्टर्ड है जिसमे करीब 15 हज़ार फार्मासिस्ट सरकारी सेवा में हैं जो दवा दुकान का संचालन नही कर सकते, बावजूद इसके यूपी फ़ूड एंड ड्रग डिपार्टमेंट ने एक लाख से ज्यादा दवा दुकानों को लाइसेंस जारी कर दिया है। ऐसे में सहज अनुमान लगाया जा सकता है की लाखों की संख्या में गैर प्रशिक्षित लोग दवा बाँट रहे है ! आरटीआई से मिले आंकड़े इस बात के गवाह है की औषधी नियंत्रण प्रशासन पूरी तरफ भ्रष्टाचार में लिप्त है! अमूमन पूरे देश भर का यही हाल है। यह कहना गलत नहीं होगा की देश की दवा नीतियों पर कार्य करने वाली रेगुलेटरी संस्थायें पूरी तरह नाकाम साबित हुई हैं!

“नो योर मेडिसिन” पर बात करते हुए उन्होंने कहा की चूँकि हर कदम पर अनट्रेंड लोग दवा बाँट रहे है ऐसे में दवा की सही जानकारी मिलना मरीज़ के लिए असम्भव-सा है। ऐसे में डॉक्टर के साथ-साथ फार्मासिस्ट की भी जिम्मेदारी बनती है की दवा के बारे में आम जनता को जागरूक करें ! मरीज़ों को चाहिए की इलाज़ के दौरान अपने डॉक्टर और फार्मासिस्ट से दवा सम्बन्धी सवाल बेहिचक पूछें और उनके द्वारा बताए गए सलाह पर अमल करें ! निरोग रहें…।

 विनय कुमार भारती ने क्या कहा…देखिए विडिओ 

…तो हमारे अधिकारी चाहते हैं कि आंकड़ों में एड्स बना रहे !

नई दिल्ली/ 01.12.2015

 

Child's hands holding an HIV awareness ribbon,

Child’s hands holding an HIV awareness ribbon

 

आरटीआई कार्यकर्ता से स्वास्थ्य कार्यकर्ता बने विनय कुमार भारती ने झारखंड के सुदुर क्षेत्रों में एड्स जागरूकता अभियान के अंतर्गत काम किया है। अपने काम के दौरान उन्होंने जो देखा, जो समझा उसे वो अपने इस लेख के माध्यम से साझा कर रहे हैं। श्री भारती का यह लेख एड्स के बढ़ते बाजार के कारणों पर से पर्दा उठा रहा है…यह उनका भोगा हुआ सच है। उनके अनुभव से आप पाठकों को कुछ फायदा मिल सके यही सोच कर इस आलेख को हम प्रस्तुत कर रहे हैं। संपादक

 

आज विश्व एड्स दिवस है। आज कोशिश करता हूँ कि अपने अनुभव साझा करूँ। झारखण्ड में एड्स जागरूकता हेतु चलाये जा रहे कार्यक्रम के सिलसिले में काफी लोगों से मिलना-जुलना हुआ। एड्स विक्टिम से लेकर कार्यक्रम को संचालित करने वाले सरकारी अफसरों को करीब से समझने का मौका मिला। एक बात जो समझ में आई वह यह कि यहाँ भी भ्रष्टाचार चरम पर है। बात जिले या राज्यों तक सिमित नहीं है बल्कि यहां तो बॉउंड्री पार भी खेल होता है। हर इंसान अपने कर्मों का हिसाब लगाता है। एक दिन जब मैं अपने कर्मों का हिसाब लगाने बैठा तो अपने आप में कुछ ऐसा महसूस हुआ मानो मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा हूँ। जिस हिसाब से राष्ट्रीय स्तर पर एड्स का आंकड़ा दिखाया जाता है उसकी प्रमाणिकता आखिर क्या है? भारत में एड्स के वास्तविक आंकड़े किस आधार पर बनाये गए हैं?  यह एक बड़ा सवाल है। एड्स के नाम पर डराकर जो खेल करोड़ों- अरबों डॉलर का चल रहा है, उसके पीछे का सच न तो किसी ने कुरेदा… न ही जानने की कोशिश की। आखिर क्यों एड्स को जरुरत से ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है ? आखिर क्यों पैसे पानी की तरह बहाये जा रहे है? दूसरी कई बीमारियां ऐसी हैं जो एचआईवी / एड्स से ज्यादा खतरनाक हैं (खतरनाक कहने का आसय अन्य बीमारियों के होने वाली मौतों से है)

जग जाहिर है की वर्ल्ड बैंक, डब्लूएचओ, USAIDS जैसी इंटरनेशनल संस्थाएं एड्स को लेकर अनुदान देती हैं। जो कई बिलियन डॉलर का है। भारत सरकार का एक पैसा भी एड्स भगाओ कार्यक्रम में नहीं लगा। काम के दौरान बड़े IAS अधिकारीयों से सच जानने की कोशिश करने लगा। जल्द ही सच्चाई पता चल गई। पहले कागज़ी खेल अच्छी तरह समझा… चूँकि जिले स्तर पर कार्यक्रम प्रबंधक था और फ़र्ज़ी आंकड़े बनाना सरकार की मांग थी। अगर जांच में एक भी पॉजिटिव ना हो तो कार्यक्रम बंद होने का खतरा मंडराता रहता। 35 से 55 हज़ार तक की सैलरी उठा रहे मैनेजरों की रोज़ी रोटी का संकट खड़ा हो रहा था। मैं भी कही ना कही उसी कतार में शामिल हो गया था। एक समय ऐसा आया की दफ्तर में कोई काम नहीं रह गया। बस महीने के अंत में वॉलेंटियर से सर्वे रिपोर्ट  व लैब टेंस्टिंग रिपोर्ट ( पूर्णतः फ़र्ज़ी ) कलेक्ट कर फाइनल रिपोर्ट जो आँख मूंद कर सरकारी टेलीफोनिक आदेश पर  बनाये जाने थे, बन कर तैयार रहते। एक चीज़ बढ़िया थी की सैलरी कमबख्त समय पर आती। करीबी मामला था सबकुछ सामने हो रहा था। मेरे लिए यह इस बात का प्रमाण था की काम चाहे कागज़ी हो, यहाँ अकाउंट अप टू डेट होता है…चूँकि तबा तोड़ खर्चे दिखाने होते, इसलिए झटपट सेटल करना होता है। कई बार तो एड्स कंट्रोल के मुख्यालय से वर्किंग रिपोर्ट से पहले स्टेटमेंट ऑफ़ अकाउंट (SOE) मांगी जाती। अगर काम काज का हिसाब लंबित भी रहे, तो चलता रहे। आंकड़े ही बनाने थे… तो हम बनाये या वे… सारे डाटा एक्सेल सीट में ही बनने थे। दो मिनट का काम है दस का बीस या बीस का तीस। कंप्यूटर का इस्तेमाल जोरदार तरीके से हो रहा था। ऐसा नहीं है कि केवल आंकड़े बढ़ाने ही है, चूँकि पैसा देने वाली संस्थाएं वर्ल्ड बैंक, डब्लूएचओ,  मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन और भी कई अन्य काम की समीक्षा भी करती हैं। ऐसे में काम दिखाने का दबाव तो था ही। कभी-कभी आंकड़े कहीं कहीं कम भी बनाये जाते। मेट्रो सिटी में संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है पर इसका मतलब नहीं की राह चलते आदमी की एड्स की जांच शुरू कर दी जाए या जबरन कंडोम बांटा जाने लगे।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की भारत जैसे देश में एचआईवी / एड्स की स्थिति सामान्य है पर स्थिति आउट ऑफ़ कंट्रोल है ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। कई ऐसी भी बीमारियां है जो एड्स से ज्यादा जान लेती है। आज कुपोषण से सबसे ज्यादा बच्चे मर रहे हैं। कई ऐसा गावं भी है जहाँ मात्र मलेरिया के कारण लोग मर जाते हैं। पिछले साल सबसे ज्यादा मौत टीबी से हुई।  स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष जी अक्सर कहते हैं कुछ बीमारियां पोलिटिकल होती हैं… कुछ ब्रांडेड ऐसे में एचआईवी / एड्स को तो कॉमर्शियल बीमारी कहना ही ठीक होगा। फ़िलहाल इतना ही ज़िन्दगी ज़िंदाबाद !!

(विनय कुमार भारती)

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(* ऊपर लिखे बिचार लेखक के अपने विचार है)

 

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…तो हम भी करेंगे ऑनलाइन फार्मेसी का समर्थन: AIOCD

14 अक्टूबर को दवा दुकाने रहेंगी बंद

फार्मासिस्टों ने किया बंद का विरोध

सरकार लगा सकती है एस्मा

नई दिल्ली/13.10.15

14 अक्टूबर को होने जा रहे दवा दुकानों के बंद के संदर्भ में मीडिया से रूबरू होते AIOCD के सदस्य

14 अक्टूबर को होने जा रहे दवा दुकानों के बंद के संदर्भ में मीडिया से रूबरू होते AIOCD के सदस्य

14 अक्टूबर को ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) देश भर के दवा दुकानों को बंद कराने जा रही है। बंद के समर्थन में अब तक जहां केमिस्ट एसोसिएशन यह कहते रहे थे कि वे ऑनलाइन फार्मेसी का विरोध कर रहे हैं और उनकी बात सरकार नहीं सुन रही है वहीं दूसरी तरफ आज उनके नेता ऑनलाइन के पक्ष में बयान देते नज़र आए। इस बावत आज जब नई दिल्ली के प्रेस क्लब में मीडिया से एआईओसीडी के अध्यक्ष जगन्नाथ शिंदे रूबरू हुए तो उनका सुर बदला हुआ नजर आया। उनका कहना था कि यदि ऑनलाइन फार्मेसी को हरी झंडी देनी ही है तो सरकार उनके साथ मिलकर काम करे। मीडिया के तीखे सवालों का जवाब शिंदे दे नहीं पा रहे थे। जब मीडिया ने पूछा कि क्या आप देश में सस्ती दवाइयों का विरोध कर रहे हैं तो शिंदे व उनकी टीम इसका ठीक से जवाब नहीं दे पायी।

सरकार को व्लैकमेल करने पर उतर आई है केमिस्ट एसोसिएशन!

पिछले 6 अक्टूबर को एनपीपीए ने एक पत्र लिखकर दवा संबंधी सभी संगठनों को यह चेता दिया था कि किसी भी सूरत में बंद को स्वीकार नहीं किया जायेगा। वहीं दूसरी तरफ मरीजों की असुविधा का ख्याल रखे बिना केमिस्ट एसोसिएशन अपनी अतार्तिक मांगों को पूरा कराने के लिए सरकार पर अनावश्यक दबाव डालने का प्रयास करती हुए नज़र आई। सूत्रों की माने तो केेमिस्ट एसोसिएशन ऑनलाइन फार्मेसी के विरोध के बहाने इस सेक्टर में खूद की हिस्सेदारी चाहती हैं। वे चाहते हैं कि सरकार कोई ऐसा कदम न उठाएं जिससे उनका मुनाफा कम हो।

सवालों का जवाब नहीं दे पाए एसोसिएशन के सदस्य

जब मीाडिया ने केमिस्टों कर्तव्यों को लेकर सवाल उठाना शुरू किया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। एआईओसीडी के महासचिव सुरेश गुप्ता ने जब यह कहा कि हमलोगों को लगभग 10 हजार करोड़ रुपये की बची दवाइयां मरीजों से वापस लेनी पड़ती है, लेकिन ऑनलाइन फार्मेसी से लोग बची हुई दवाइयां लौटा नहीं पायेंगे। इस पर काउंटर करते हुए मीडियाकर्मियों ने पूछा कि आपके केेमिस्ट स्ट्रीप से दवाइयां काटकर देते ही नहीं तो फिर आप लौटाते कैसे होंगे? इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था। उन्होंने एक मुद्दा उठाया कि ऑनलाइन वाले 30 फीसद तक छुट कैसे दे सकते हैं जब रिटेलर को 13.5 फीसद का ही मुनाफा है। उनके इस तर्क के काउंटर में जब स्वस्थ भारत डॉट इन ने उनसे पूछा कि दवाइयों पर जो बोनस मिलता उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? इस सवाल का भी सार्थक कोई उत्तर वे लोग नहीं दे पाए। अपना पक्ष रखते हुए एआईओसीडी के अध्यक्ष श्री शिंदे ने कहा कि ऑनलाइन फार्मेसी से बच्चों में नशा की लत बढ़ेगी। इस बात में सच्चाई हो सकती है लेकिन क्या किसी भी ऑनलाइन दवा प्रोवाडर को यह अधिकार है कि वह बिना प्रिस्किपसन के शेड्यूल  X व नार्कोटिक दवाइयां दे सकती हैं, क्या उन्हें अधिकार है कि वे बिना जांच पड़ताल के शिड्यूल एच-1 की दवाइयां दें।  सच्चाई तो यह है कि ऐसा वे कानूनन कर ही नहीं सकते और न ही सरकार उन्हें इस तरह खुला रूप से ऐसी दवाइयां बेचने की ईजाजत देगी।  तो फिर विरोध क्यों?

देखिए एक्सक्लूसिव विडियो

फार्मासिस्ट का अस्तित्व खतरे में!

बंद का विरोध करते राजस्थान के फार्मासिस्ट

बंद का विरोध करते राजस्थान के फार्मासिस्ट

एक तरफ जहां केमिस्ट एसोसिएशन फार्मासिस्टों बाध्यता को खत्म करने की बात कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ ऑनलाइन फार्मेसी के फार्मेट को लेकर फार्मासिस्टों में भ्रम की स्थिति है। ई-फार्मेसी के कॉन्सेप्ट पर न तो सरकार ठीक से गाइड कर रही है और न ही इसका विरोध करने वाले केमिस्ट एसोसिएशन! ई-फार्मेसी का विरोध पूरे देश के फार्मासिस्ट भी कर रहे हैं लेकिन इसके लिए केमिस्ट एसोसिएशन ने जो हथकंडा अपनाया है उसकी वे खिलाफत कर रहे हैं। यहीं कारण है कि 14 के बंद के विरोध में है देश भर के फार्मासिस्ट एसोसिएशन। फार्मासिस्टों की मांग है कि ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 नियम 1945 और फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा 42 में कोई भी बदलाव न हो और दवा मरीज के हाथों पहुंचाने व उसकी काउंसेलिंग की जिम्मेदारी हर हाल में उसी के हाथ में हो ताकि लोगों को सुरक्षित हाथों से व्यवस्थित दवा मिल सके।

दुकान चलाने के लिए अधिकारियोें को पैसा देना पड़ता है

एआईओसीडी के महासचिव सुरेश गुप्ता ने कहा कि दुकान चलाने के लिए हमें फार्मासिस्ट का रजिस्ट्रेशन चाहिए होता है और इसे खुद एफडीए के अधिकारी मुहैया कराते हैं, जिसके बदले में केमिस्ट को पैसा देना पड़ता है। यूपी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वहां पर महज 22 हजार फार्मासिस्ट हैं जबकि 72 हजार लाइसेंसी रिटेल की दुकाने हैं। उनके इस जवाब पर जब स्वस्थ भारत डॉट इन ने सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या इन सभी फर्जी व गैरकानूनी दवा दुकानों की लाइसेंस को रद्द नहीं कर देना चाहिए? इस पर उग्र होते हुए उनका जवाब था कि आखिर केमिस्ट ही क्यों निशाना बनें. जिन लोगों ने लाइसेंस दिया है उनको आप मीडिया वाले क्यों नहीं कुछ कहते। इस संदर्भ में उन्होेंने यह भी कहा कि पूरे देश में सिर्फ 1.5 लाख फार्मासिस्ट रिटेलर हैं। इस संदर्भ में  फार्मा एक्टिविस्ट विनय कुमार भारती ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि एआईओसीडी के पदाधिकारी गलत बयानी कर रहे हैं और अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। हम मांग करते हैं कि यदि फार्मासिस्ट दोषी है तो उसे भी सजा मिले लेकिन इस आड़ में केमिस्ट आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करें! उन्होंने आरोप लगाया कि एओआईसीडी खुद अपनी ई-कामर्स कंपनियां खोलने की फिराक में है, केमिस्टों को एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति का विरोध

बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति का विरोध करते हुए जगन्नाथ शिंदे कहा कि वे चाहते हैं कि बेतहाशा बढ़ी हुई दवा की कीमतें कम हों और इसके लिए सरकार द्वारा दवाइयों के मूल्यों को नियंत्रित करने का जो फार्म्यूला लाया गया है व जनहित में नहीं है।

ई-फार्मेसी को लॉच करने की साजिश तो नहीं…

जिस तरह से ई-फार्मेसी के मुद्दे को आगे बढ़ाया जा रहा है उससे यह आशंका हो रही है कि ई-फार्मेसी के लिए भारत का बाजार खोलने की पूरी

इस विज्ञापन को देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि ऑनलाइन का बाजार बहुत जल्द फैलने वाला है...

इस विज्ञापन को देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि ऑनलाइन का बाजार बहुत जल्द फैलने वाला है…

कवायद की जा रही है। इसमें दवा कंपनियों से लेकर, इ-कॉमर्स व आईटी के दिग्गज भी बड़े पैमाने पर अपना भाग्य आजमाने की कोशिश में लगे हैं। जाहिर है कि देश का घरेलू दवा बाजार पिछले 10 वर्षों में 32 हजार करोड़ से बढ़कर 70 हजार करोड़ रूपये का आंकड़ा पार कर चुका है। चूंकि सरकार भी मान चुकी है कि दवाइयों में 1000 फीसद तक का मुनाफा है, तो ऐसे में इन बड़े प्लेयरों का आना स्वभाविक ही लगता है। लेकिन इन सब के बीच में अगर किसी को नुक्सान होने वाला है तो वह  है आम जनता, जिसे मालूम ही नहीं है कि उसके स्वास्थ्य के साथ किस कदर एक्सपेरिमेंट किया जा रहा है! इस संदर्भ में स्वस्थ भारत अभियान का मानना है कि देश का दवा बाजार 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नहीं होना चाहिए। इसका आंकड़ा 70 हजार करोड़ इसलिए पार कर चुका है क्योंकि दवाइयों में मुनाफाखोरी चरम पर है और उसकी एमआरपी पर सरकार का नियंत्रण लगभग न के बराबर है। पिछले दिनों जिस रफ्तार से ऑनलाइन फार्मेसी का विज्ञापन मीडिया में दिया जा रहा है उससे यह आशंका तो जाहिर की ही जा सकती है कि इस खेल में कहीं सभी (सरकार, दवा कंपनिया व केमिस्ट संगठन) की हिस्सेदारी तो नहीं!

आखिर ई-फार्मेसी है क्या?

ऑनलाइन या ई-फार्मेसी से सीधा-सा मतलब है दवा का ऑनलाइन कारोबार!  यानी जिस तरह से आप अपने घर बैठे अपने मनपसंद की कोई भी वस्तु ऑनलाइन प्लैटफार्म से ऑर्डर कर के मंगाते हैं ठीक वैसे हीं आप दवाइयों को भी मंगा सकेंगे।

कैसे काम करती है ई-फार्मेसी

कुछ गिनी चुनी ई-फार्मेसी वर्तमान में दिख रही हैं लेकिन बहुत जल्द इनकी संख्या बढ़ने वाली हैं। ई-फार्मेसी कंपनियों ने अपने वेबपोर्टल और एप्स बना रखे हैं ! इन कंपनियों के कॉल सेंटर में फार्मासिस्ट मरीज़ों को दवा के डोज़ एलर्जी रिएक्शन समेत कई तरह की जानकारी उपलब्ध कराते हैं ! प्रिस्क्रिप्सन वेबपोर्टल पर अपलोड होने से लेकर डिलीवरी तक फार्मासिस्ट का रोल अहम होता है। ऑनलाइन वेबसाइट्स पाटर्नर फार्मेसियों से दवा खरीद कर उपभोक्ता के घर तक दवाओं की डिलीवरी करती हैं। कुछ फार्मेसियां ऑनलाइन ऑर्डर पर अपने आउटलेट के जरिए दवा पहुंचाती हैं।

स्वस्थ भारत अभियान जानना चाहता है

  • आखिर कब तक जनता को भ्रमित करते रहेंगे ये संगठन व सरकार के लोग?
  • सस्ती दवाइयां सही मायने में कब उपलब्ध होंगी?
  • आखिर क्यों इस बाजार में उतरने के लिए इतनी मारामारी है?
  • क्या सच में मेडिकल केयर एक उद्योग हो गया है, इसे अब सामाजिक सेवा भाव से कोई लेना देना नहीं है?
  • डिजिटल इंडिया की आड़ में कहीं आम लोगों को धोखा तो नहीं दिया जा रहा है?
  • सरकार की जेनरिक स्टोर खोलने की बात की थी, कितनी दुकाने खुलीं?
  • कहीं ऐसा तो नहीं देश के स्वास्थ्य से पल्ला झाड़ना चाहती है सरकार?

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फ़र्ज़ी फार्मासिस्ट मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट सख्त

Guwahati High Court

गुवाहाटी / नई दिल्ली

जबतक अवैध दवा दुकानो को बंद करने के साथ साथ असम फार्मेसी काउंसिल में रजिस्टर्ड फ़र्ज़ी फार्मासिस्टों को जेल नहीं भेजा जाएगा तबतक हमलोग चैन से बैठने वाले नहीं । ये बातें एसोसिएशन और रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट (एआरपीए) असम के महासचिव जाकिर सिकदर ने स्वस्थ भारत डॉट इन से कही । ज़ाकिर असम फार्मेसी काउंसिल में हुवे करीब 3 हज़ार फ़र्ज़ी रजिस्ट्रेशन पर करवाई की मांग कर रहे थे ।

असम रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष सोफियर रहमान खान ने बताया की असम फार्मेसी कौंसिल द्वारा ३ हज़ार फार्मासिस्ट को जांच में फ़र्ज़ी करार दिया गया था । स्टेट कौंसिल ने डिटेल काउंसिल की वेबसाइट पर डाला था । रजिस्ट्रार द्वारा पहले तो एफआईआर की बात कही गई । पर अबतक दोषियों पर कोई करवाई नहीं की गई है । सोफियर रहमान ने स्टेट कौंसिल पर दोषियों को बचाने का आरोप लगाया है ।

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने लिया संज्ञान 

इधर ज़ाकिर सिकदर की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुवे गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम सरकार को फटकार लगते हुवे असम के हेल्थ सेक्रेटरी, असम फार्मेसी कौंसिल के रजिस्ट्रार, फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया (नई दिल्ली) समेत ड्रग कंट्रोलर जेनेरल ऑफ़ इंडिया को नोटिस भेज कर जबाब माँगा है । वकीलों के अनुसार समय पर जबाब नहीं देने की स्थिति में कोर्ट की अवमानना के आरोप में अदालत की ओर से सम्मन जारी किया जाएगा ।

विगत कुछ महीने पहले ही प्रसन्ना कुमार शर्मा ने असम फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार का पदभार ग्रहण किया था । पद पर आते ही उन्होंने फ़र्ज़ी फार्मासिस्टों की खोजबीन करनी शुरू की थी प्रसन्ना शर्मा ने बताया की 754 फ़र्ज़ी फार्मासिस्टों पर एफआईआर की जा चुकी है। जबकि करीब 3 हज़ार फ़र्ज़ी फार्मासिस्ट होने की सम्भावना जताई प्रसन्ना ने बताया की उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट का नोटिस मिल चूका है । उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश को फार्मेसी काउंसिल ऑफ़ इंडिया की रजिस्ट्रार अर्चना मुगदल को भेज दिल्ली भेज कर दिशा निर्देश मांगे है । दिशा निर्देश आते ही आगे की करवाई होगी ।

इधर स्वस्थ भारत डॉट इन की दिल्ली टीम ने जब पीसीआई की रजिस्ट्रार अर्चना मुगदल से बात करनी चाही तो कहा की मिडिया से बात करने की इज़ाज़त उन्हें नहीं है ।

यूपी: अवैध दवा दुकानों के प्रकरण पर PIL दाखिल

यूपी में दाखिल हुई जनहित याचिका

यूपी में दाखिल हुई जनहित याचिका

लखनऊ/

यूपी में गैर क़ानूनी तरीके से चल रहे हज़ारों दवा दुकानों पर गाज़ गिरना तय माना जा रहा है । फार्मासिस्ट फाउंडेशन के सदस्य पंकज मिश्रा हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की । सूत्रों के हवाले से खबर मिली की हाई कोर्ट ने याचिका मंजूर कर ली है । फार्मासिस्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष अमित श्रीवस्तस्व ने स्वस्थ भारत डॉट इन को बताया की कई बार औषधि नियंत्रण प्रसाशन समेत सरकार से गुहार लगाई गयी पर आज तक कोई भी करवाई नहीं की गई । जिससे फार्मासिस्टों का आक्रोश उमड़ पड़ा ।  गैर क़ानूनी तरीके से एक एक फार्मासिस्ट के नाम पर कई कई दवा दुकानों के लाइसेंस आवंटित किये गए है । वही दूसरी तरफ गैर प्रशिक्षित लोगों से सरकारी अस्पतालों में दवा वितरण कार्य कराया जाता है । अमित श्रीवस्तस्व ने आगे बताया की ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट 1940 नियम 1945 फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा 42 के तहत केवल रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट ही दवा वितरण कर सकता है ।

 

हाल में ही औषधि नियंत्रण प्रसाशन ने ड्रग लाइसेंस की प्रक्रिया के साथ ही नवीनीकरण को भी ऑनलाइन कर दिया है वही दूसरी तरफ फार्मासिस्ट फाउंडेशन  हज़ारों कार्यकर्ताओं ने अपना आन्दोलन तेज़ करते हुवे औषधि प्रसाशन की नींद उड़ा दी है । विगत सोमबार को फार्मासिस्ट फाउंडेशन के हज़ारों सदस्य सडकों पर उतर आए थे और सरकार से अवैध तरीके से चल रही खुदरा दवा दुकानों को बंद किये जाने की मांग की थी । दूसरी तरफ यूपी के केमिस्टों में निराशा का माहोल है दवा कारोबारियों के सामने दोहरी मार पड़ रही है नाम ना छापने की शर्त पर एक दवा कारोबारी ने बताया की अबतक ड्रग इंस्पेक्टर पैसे लेकर दवा दुकान चलने देते थे अब वे भी मुकरने लगे है ।