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फार्मासिस्ट भटक गए हैं! ऐसा मैंने क्यों कहा?

इस बात में कोई शक नहीं हैं कि वर्तमान मेडिकल व्यवस्था में फार्मासिस्टों की एक अहम भूमिका है। दवा बनाने से लेकर दवा बेचने तक उनकी क्रियाशीलता कानूनन अनिवार्य है। वर्तमान कानूनी व्यवस्था में दवा की बात की जाए तो फार्मासिस्ट के बिना पूरी नहीं हो सकती है। कानूनी रूप से इतना सशक्त फार्मासिस्ट, अगर आज बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं तो इसका मतलब क्या निकाला जाए?

आशुतोष कुमार सिंह

 

पिछले दिनों मैंने अपने फेसबुक पर जब फार्मासिस्टों के भटकाव को लेकर पोस्ट लिखा तो देश भर के फार्मासिस्टों ने अपना-अपना विरोध दर्ज कराया। तमाम तरह की व्यवस्थागत खामियों की ओर उन्होंने इशारा किया। अपनी लाचारी का बहाना बनाया। सरकार की बेरूखी का रोना रोया। और खुद को पूरी तरह पाक-साफ बताने की कोशिश करते रहे।

इस बात में कोई शक नहीं हैं कि वर्तमान मेडिकल व्यवस्था में फार्मासिस्टों की एक अहम भूमिका है। दवा बनाने से लेकर दवा बेचने तक उनकी क्रियाशीलता कानूनन अनिवार्य है। वर्तमान कानूनी व्यवस्था में दवा की बात की जाए तो फार्मासिस्ट के बिना पूरी नहीं हो सकती है। कानूनी रूप से इतना सशक्त फार्मासिस्ट, अगर आज बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं तो इसका मतलब क्या निकाला जाए?

Two pharmacist looking for critical medicinal drug. Male doctor holding a medicine with female standing by in pharmacy.

जहां तक मुझे याद है 2013-14 से मैं फार्मासिस्टों के हितों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर लिख-पढ-बोल रहा हूं। उस समय कुछेक फार्मासिस्ट संगठन सक्रीय थे। www.swasthbharat.in के माध्यम से फार्मासिस्टों की आवाज को राष्ट्रीय मीडिया से लेकर सरकार तक पहुंचाने का काम हमने किया। 21000 किमी की #SwasthBharatYatra के दौरान अपने सभी कार्यक्रमों में फार्मासिस्टों की महत्ता को आम लोगों के सामने हमने रखा। रेडियो-टेलिविजन पर दिए गए अपने साक्षात्कार में भी हमने फार्मासिस्टों की स्थिति को राष्ट्रीय पहचान दी। रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री से हुई मुलाकात में भी फार्मासिस्टों की स्थिति को रेखांकित किया। मैं उस समय भी फार्मासिस्टों के साथ था, जब लखनऊ में अमित श्रीवास्तव की अगुवाई में महारैली निकली थी और स्वास्थ्य भवन का घेराव हुआ था। इतना ही नहीं लखनऊ में जब फार्मासिस्टों पर लाठियां चली, तब भी उनके पक्ष को मजबूती से सामने लाने का प्रयास किया। रायपुर में जब वैभव शास्त्री की गिरफ्तारी हुई और फार्मासिस्टों ने 21 दिनों तक भूख हड़ताल किया, उस समय भी #SwasthBharat फार्मासिस्टों के साथ रहा और सरकार की गलत नीतियों पर मुखर होकर बोलता रहा। जमशेदपुर में फार्मासिस्ट दिवस के दिन जब मुझे बोलने के लिए बुलाया गया, वहां पर भी मैंने फार्मासिस्टों का पक्ष मजबूती से रखा था। इसके गवाह सिंहभूम फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष धर्मेन्द्र सिंह, जितेन्द्र सिंह, शशि सिंह जैसे सैकड़ों उपस्थित फार्मासिस्ट हैं। उस समय मैंने पूरे देश में चल रहे आंदोलन को स्वीट रिवोल्यूशन अर्थात मीठी क्रांति कहा था। फार्मासिस्टों को सबसे पहले दवा का डॉक्टर कहने व लिखने वाला मैं ही हूं। पिछले चार सालों से फार्मासिस्टों की हर एक छोटी-बड़ी एक्टिविटी को सूक्ष्मता के साथ देख-समझ रहा हूं।

ऐसे में अगर मैंने यह कहा कि, देश के फार्मासिस्ट भटक गए हैं तो इसके पीछे तर्क है, वाजिब कारण भी हैं। सबसे पहले फार्मासिस्टों की समस्याओं को समझना जरूरी है । मेरी समझ से सबसे बड़ी समस्या #बेरोजगारी है। दूसरी समस्या वेतन विसंगती है। अब सवाल यह उठता है कि जिस देश का दवा बाजार एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो, जिस देश में 25 हजार से ज्यदा दवा कंपनियां चल रही हो, जिस देश में 7 लाख से ज्यादा दवा की दुकाने चल रही हो, जिस देश में प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना चल रही हो, जिस देश  के ग्रामीण क्षेत्रों में (31 मार्च  2017 तक) 156231 उप स्वास्थ्य केन्द्र, 25650 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र हो, 5624 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हो वहां अगर #फार्मासिस्ट बेरोजगार हैं! यह बात सुनकर आश्चर्य होता है। इतना स्कोप होने के बावजूद आखिर फार्मासिस्ट को नौकरी क्यों नहीं मिल रही है? इस विषय पर गंभीरता से आप सभी चिंतन-मनन कीजिए।

जहां तक मेरी समझ है वह यह है कि बाजार में जितने फार्मासिस्ट हैं उसमें ज्यादातर ऐसे हैं जिन्होंने पैसे के बल पर डिग्री तो ले ली है लेकिन फार्मा की पढ़ाई ठीक से नहीं की है। उनके अंदर इतनी काबीलियत नहीं है कि वे प्रतियोगिता फेस करें और दवा कंपनियों से लेकर तमाम जगहों पर अपनी उपयोगिता को सिद्ध कर पाएं। यहीं कारण है कि ये सिर्फ और सिर्फ दवा दुकानों तक खुद को समेटकर रखना चाहते हैं। दरअसल ये वही फार्मासिस्ट हैं जिनको अपने प्रोफेशन की इज्जत से कोई लेना-देना नहीं है। ये सिर्फ किसी तरह पैसा कमाना चाहते हैं। इसके लिए इन्होंने अपने जमीर को बेच दिया है। अपनी डिग्री-डिप्लोमा को किराए पर दे दिया है। ये खुद निकम्मे और निठल्ले हैं और किराए के पैसे से रोजी-रोटी चलाना चाहते हैं। दवा खऱीदने वाले उपभोक्ताओं को अच्छी दवा मिले या न मिले इससे इनको कोई सरोकार नहीं है। इनके कारण मेहनत से पढ़े-लिखे फार्मासिस्टों की नाक कटती रहती है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि किरायेबाज फार्मासिस्टों को बेनकाब किया जाए। और ऐसा करने में तमाम फार्मासिस्ट संगठन लगभग विफल रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ वेतन विसंगती का जहां तक मामला है तो इसके लिए नौकरी कर रहे फार्मासिस्टों को एकजुट होना पड़ेगा। संसद से लेकर सड़क तक लड़ना पड़ेगा। एक राष्ट्रीय मसौदा तैयार करना पड़ेगा और उस पर गंभीरता से अमल भी करना पड़ेगा। लेकिन इस मामले में भी सारे संगठन चिरकुटई ही दिखाते हुए नज़र आ रहे हैं। फार्मा के दो-चार संगठन एक साथ एक मंच पर खड़ा होना नहीं चाहते हैं। सब अपनी-अपनी नेतागिरी चमकाने के चक्कर में मूल मुद्दे से भटक चुके हैं।

मेरे बात का विरोध कर रहे हैं फार्मा नेताओं और संगठनों से मैं पूछना चाहता हूं कि वो बतायेंगे कि जो जेनविन फार्मासिस्ट हैं? जो अपना रोजगार करना चाहता है, या नौकरी करना चाहता है उसको सही मार्गदर्शन देने के लिए आपने क्या किया है? क्या आपने किसी दवा कंपनी के मालिक को पत्र लिखा कि वो क्यों अपने यहां बीएससी के छात्रों को नौकरी दे देते हैं लेकिन फार्मासिस्टों को नहीं देते हैं?

मुझे यह समझ में नहीं आता है कि आखिर फार्मासिस्ट की पढ़ाई करने वाला सिर्फ और सिर्फ दवा की दुकान ही क्यों चलाना चाहता है? वो और आगे क्यों नहीं बढ़ना चाहता हैं। इस बिंदु पर क्या फार्मा के संगठनों और फार्मा-नेताओं ने कोई वर्कशॉप किया? नहीं किया तो क्यों नहीं किया? मेरी समझ से सभी फार्मा संगठनों एवं नेताओं का पहला काम यह होना चाहिए कि जो जेनविन बेरोजगार फार्मासिस्ट हैं, उसे एक नौकरी मिल जाए या उसकी अपनी कोई दुकान हो जाए।

इस बीच में भारतीय जनऔषधि परियोजना को लेकर भी फार्मासिस्टों को बहुत भ्रमित किया गया है। जिस देश का प्रधानमंत्री फार्मासिस्ट से सीधे बात  करता हो, वहां पर सरकार की नियत को सार्थक नजरिए से देखने की जरूरत है। लेकिन कुछ फार्मा नेता जनऔषधि का विरोध करने में लगे हैं। जबकि यह फार्मासिस्टों के लिए एक सुनहरा अवसर है समाज सेवा करने का, अपनी अलग पहचान बनाने का और अपनी रोजी-रोटी चलाने का। सिस्टम से बाहर रहकर चिल्लाना बहुत आसान होता है। अगर फार्मासिस्टों को आगे बढ़ना है तो सिस्टम के अंदर आएं। यदि जनऔषधि की बात की जाए तो जिस दिन आपके अपने लोग जनऔषधि केन्द्र खोल लेंगे, आर्थिक रुप से मजबूत हो जाएंगे उस दिन सरकार पर अपने हिसाब से दबाव बनाने में भी सफल रहेंगे। सरकार अभी जो दे रही है, अथवा जितना दे पा रही है उसे स्वीकारने का समय है। न की अस्वीकार कर बेरोजगारी को और बढ़ाने का।

मैं देश के फार्मासिस्टों को एक हेल्थ एक्टिविस्ट के रूप में देखता रहा हूं इसलिए मेरी अपेक्षाएं भी आपलोगों से ज्यादा है। मुझे मालूम है कि आप चाहें तो देश के लोगों को सस्ती दवाइयां उपलब्ध हो सकती है। इसके लिए आपको बस यह करना है कि आप जहां हैं वहां पर लोगों को कम मुनाफे पर दवा देने का काम करें। कम से कम वे फार्मासिस्ट जिनका अपना दुकान हैं और दुकान में जेनरिक दवा रखे हुए हैं वे तो सस्ता दे ही सकते हैं। जहां तक सवाल प्रिस्कीप्सन पर लिखे दवा को सब्टीच्यूट करने का है तो इस मसले पर आप सभी एक मसौदा तैयार कीजिए, मैं आपके साथ हूं। इस मसौदे को सरकार तक ले जाने की जिम्मेदारी लेता हूं।

मुझे उस समय बहुत कष्ट होता है जब एक फार्मासिस्ट दूसरे फार्मासिस्ट को नीचे गिराने की जुगत करता है। आपका मुख्य फोकस फार्मा मुद्दे से भटक कर व्यक्ति विशेष हो जाता है। आपका हिरो आपका कंटेंट होना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे साउथ की फिल्मों के नायक उनका कंटेंट यानी उनकी कहानी होती है। जरुरत इस बात की है कि आप लोग अध्यक्ष और मंत्री-महामंत्री के लोभ से ऊपर उठें और फार्मा हितों की रक्षा करें। आप लोक सेवक बनें, लोगों के स्वास्थ्य के रक्षक बनें। लोगों को जागरुक करने का काम करें। इसी से आपकी अलग पहचान बनेगी और हमारे जैसा स्वस्थ भारत का सपना देखने वाला व्यक्ति यह नहीं कह पायेगा कि आप #भटक गए हैं! वर्तमान में आपका भटकाव हमें पीड़ा पहुंचाता है। अतः भटके नहीं, पद और लाभ को छोड़कर एक होइए। एक दूसरे को नीचा दिखाने से बचिए और फार्मासिस्टों को रोजगार कैसे दिलाया जाए इस पर मनन कीजिए!

संभव है मेरी बात कुछ मित्रो को अच्छी नहीं लगेगी। लेकिन फिर भी मैं जो कह रहा हूं, उस पर पांच मिनट चिंतन मनन कीजिए। उसके बाद भी अगर  आपको लगता है कि मैंने फार्मासिस्टों को भटका हुआ कह कर गुनाह किया है तो इसके लिए खेद प्रकट करता हूं। और उन तमाम मित्रो का आभार प्रकट करता हूं जिन्होंने मेरे पोस्ट पर कमेंट कर-कर के मुझे यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया।

 

सादर

आशुतोष कुमार सिंह

चेयरमैन, स्वस्थ भारत

राष्ट्रीय संयोजक-स्वस्थ भारत अभियान

संपादक-स्वस्थ भारत डॉट इन

 

 

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आशुतोष कुमार सिंह
आशुतोष कुमार सिंह भारत को स्वस्थ देखने का सपना संजोए हुए हैं। स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में अनेक आलेख लिखने के अलावा वह कंट्रोल एमएमआरपी (मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस) तथा 'जेनरिक लाइये, पैसा बचाइये' जैसे अभियानों के माध्यम से दवा कीमतों व स्वास्थय सुविधाओं पर जन जागरूकता के लिए काम करते रहे हैं। संपर्क-forhealthyindia@gmail.com, 9891228151
http://www.swasthbharat.in

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