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स्वास्थ्य बजट अलग से क्यों नहीं…

कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेल बजट की तर्ज पर स्वास्थ्य के लिए भी अलग से बजट लाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य पर और ध्यान देते हुए स्वास्थ्य बजट में और पारदर्शिता लाए। इसके लिए आवश्यक है कि रेल बजट की तरह स्वास्थ्य बजट भी अलग से पेश किया जाए।

Budget_healthएक पुरानी और सर्वमान्य संकल्पना है कि पढ़ाई, दवाई और लड़ाई यानी कि शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तीनों पूरी तरह निःशुल्क होने चाहिएं। स्वाधीन भारत के संविधान निर्माताओं ने संभवतः इसी बात को ध्यान में रख कर भारत को एक कल्याणकारी राज्य घोषित किया था और इसको ही ध्यान में रख कर सरकार हर वर्ष बजट बनाती है। बजट में हजारों करोड़ रूपये स्वास्थ्य के लिए आबंटित भी किए जाते हैं। परंतु दुःख का विषय यह है कि तमाम सरकारी प्रयत्नों के बावजूद ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है।

पिछले वर्ष नई सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट में भी स्वास्थ्य के लिए पिछली सरकार की ही भांति प्रावधान किए गए थे। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 21912 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया था। इसके अतिरिक्त नए एम्स खोलने के लिए 500 करोड़ रूपये दिए गए थे। एकीकृत बालविकास सेवाओं हेतु 18691 करोड़ रूपये दिए गए और आयुष के लिए कुल 411 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया गया था। साथ ही फार्मास्यूटिकल रिसर्च के लिए 87 करोड़ रूपये दिए गए थे। इस प्रकार देखा जाए तो स्वास्थ्य के लिए सरकार ने बजट में कुल 41601 करोड़ रूपयों का प्रावधान किया था। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सरकार ने पिछली यूपीए सरकार के बजट के 37300 करोड़ रूपयों की तुलना में कहीं अधिक बजट स्वास्थ्य के लिए आबंटित किया था।

 

तब के बजट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं की झलक साफ दिखाई दी थी, जेटली अपने घोषणापत्र के हर राज्य में एम्स का वादा पूरा करने की दिशा में बढ़े। उन्होंने आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र में विदर्भ और यूपी के पूर्वाचल में एम्स जैसे चार संस्थानों के लिए 500 करोड़ आवंटित किए। 12 मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा भी की। गांवों के विकास के लिए ग्रामीण हेल्थ रिसर्च सेंटर खोलने का भी ऎलान किया। प्रधानमंत्री के एक वादे “सबके लिए स्वास्थ्य” का इस्तेमाल करते हुए कहा वित्त मंत्री ने कहा कि, नि:शुल्क औषधि सेवा और नि:शुल्क निदान सेवा प्राथमिकता का आधार पर शुरू की जाएगी। इस प्रकार बजट को स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक-ठाक कहा जा सकता है। परंतु देश के जनस्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मानें तो यह बजट पर्याप्त नहीं था।

कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन से जुड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेल बजट की तर्ज पर स्वास्थ्य के लिए भी अलग से बजट लाया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार स्वास्थ्य पर और ध्यान देते हुए स्वास्थ्य बजट में और पारदर्शिता लाए। इसके लिए आवश्यक है कि रेल बजट की तरह स्वास्थ्य बजट भी अलग से पेश किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य पर किया जाने वाला यह खर्च विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी कम है। दूसरा तर्क यह है कि सरकार द्वारा कम बजट और सुविधाएं दिए जाने के कारण लोगों को निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की ओर जाना पड़ता है। निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की भागेदारी आज सरकार से कहीं आधिक हो गई है। 2008-09 के एक अध्ययन के अनुसार देश के स्वास्थ्य-व्यय का 71.62 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है और केवल 26.7 प्रतिशत सरकार द्वारा। इससे स्वास्थ्य सेवाएं मंहगी और गरीबों की पहुंच से दूर हो रही हैं।

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रवि शंकर
लेखक गांधी दर्शन के शोधार्थी और स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनकी स्वास्थ्य विषय में रूचि रही है। पंचवटी फाउंडेशन के लिए गौसंपदा के आर्थिक वैज्ञानिक-पर्यावरणीय आयामों पर पांच खंडों में शोध ग्रंथ के संकलन व संपादन के अलावा पारंपरिक कृषि पर शोध कार्य किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की शोध परियोजना के अंतर्गत 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता' विषय पर पुस्तक प्रकाशित।
http://www.bhartiyapaksh.blogspot.com

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