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यूपीए सरकार की गलतियों को सुधारेगी मोदी सरकार!!

जब तक नई दवा नीति में सुधार नहीं होगा..सही मायने में दवाइयों के दाम नहीं घटेंगे...
जब तक नई दवा नीति में सुधार नहीं होगा..सही मायने में दवाइयों के दाम नहीं घटेंगे…

हिन्दुस्तान की सेहत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। घरेलू दवा बाजार का दायरा बढ़ता जा रहा है। महंगी दवाइयों से गरीब और गरीब होता जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ सरकार देश को तरक्की का नया पाठ पढ़ा रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में अपने जीवन के अधिकार का सही तरीके से उपयोग न कर पाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बीमार होते देश की सरकारी दवा नीति की सच्चाई को उजागर करती आशुतोष कुमार सिंह की विशेष रिपोर्ट…

14 जुलाई 2014, दोपहर का समय था। वाराणसी से मेरे दोस्त अतुल का फोन आया कि गैलेक्सी अस्पताल में एक दुर्घटनाग्रस्त मरीज को समय से प्रवेश नहीं मिलने के कारण उसकी मौत हो गयी। मरीज के परिवार के लोगों से 10 दिन का आसीयू चार्ज बतौर एडवांस मांगा जा रहा था, जिसे देने से परिवार वालों ने मना कर दिया था। इस बीच मरीज ने दम तोड़ दिया। इसके बाद वहां पर अस्पताल प्रशासन एवं मरीज के परिजनों में जमकर झगड़ा हो रहा है। पुलिस आ गयी है और लोगों को तीतर-बीतर करने में लगी है। उसी दिन शाम को मेरी नज़र प्रदीप पल्लव के फेसबुक स्टेटस पर जाकर टीक गयी। झारखंड के गोड्डा स्थित सरकारी अस्पताल में एक जच्चा की मौत महज 300 रूपये के कारण हो गयी। गरीब परिवार नर्स द्वारा बतौर बक्शीष (पुरस्कार) मांगे गए 300 रुपये की व्यवस्था करने में व्यस्त रहा और जच्चा की देखभाल ठीक से नहीं की जा सकी और उसने दम तोड़ दिया। इसी तरह एक घटना 3 जुलाई-2014 को देश के सबसे बड़े अस्पताल दिल्ली के एम्स के वार्ड-डी-6 में घटी। बिहार के दरभंगा से जाकर एम्स में अपने बच्चे का ईलाज करा रहे ललन के भतीजे ने इसलिए दम तोड़ दिया क्योंकि पिछले 17 घंटों से कोई डॉक्टर बेड संख्या 26 के मरीज को देखने नहीं आया। रात के 11 बजे से बच्चे की हालत बिगड़ने लगी थी, डॉक्टर को बुलाने की हर संभव कोशिश की गयी। डॉक्टर दूसरे दिन शाम को 5 बजे आया। तब तक ललन का 7 वर्षीय भतीजा दम तोड़ चुका था। उपर जितने भी उदाहरण हमने दिए उससे यह स्पष्ट होता है कि गरीब मरीज का ईलाज हिन्दुस्तान जैसे देश में कितना मुश्किल है। रिसर्च एजेंसी अर्नेस्ट एंड यंग व भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के लोग अपने स्वास्थ्य बजट का 72 प्रतिशत दवाइयों पर खर्च करते हैं। इस रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि महंगी दवाइयों के कारण प्रत्येक वर्ष भारत की 3 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से नीचे रह जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि देश की लगभग 4 करोड़ आबादी प्रत्येक वर्ष इसलिए गरीब रह जा रही है क्योंकि उसके पास महंगी दवाइयां खरीदने की आर्थिक ताकत नहीं है।

उपरोक्त स्थिति से स्पष्ट हो रहा है कि किसी देश के विकास में वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं का कितना महत्व है। किसी भी राष्ट्र-राज्य के नागरिक-स्वास्थ्य को समझे बिना वहां के विकास को नहीं समझा जा सकता है। दुनिया के तमाम विकसित देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतनशील व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य राष्ट्र की प्रगति को तीव्रता प्रदान करता है। दुर्भाग्य से हिन्दुस्तान में ‘स्वास्थ्य चिंतन’ न तो सरकारी प्राथमिकता में है और न ही नागरिकों की दिनचर्या में। हिन्दुस्तान में स्वास्थ्य के प्रति नागरिक तो बेपरवाह है ही, हमारी सरकारों के पास भी कोई नियोजित ढांचागत व्यवस्था नहीं है जो देश के प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य का ख्याल रख सके।

हालांकि सरकार यह दिखाने का हमेशा से प्रयास करती रही है कि जनता के स्वास्थ्य की चिंता उसे है। इसी संदर्भ में सरकार ने पिछले दिनों नई दवा नीति को संसद में पास किया है। जिसके अंतर्गत दवाइयों के मूल्यों को नियंत्रित रखने के लिए ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर-2013 (डी.पी.सी.ओ-2013) जारी किया गया है। इसके पूर्व डीपीसीओ-1995 के अनुसार दवाइयों का दाम निर्धारित किया जाता था। सरकारी दवा नीति अपने शुरू के दिनों से ही विवादों में घिरी हुई है। आइए एक नज़र डालते हैं नई दवा नीति के मुख्य प्रावधानों पर।

क्या है नई दवा नीति

15 मार्च, 2013  को दिल्ली में दवा दुकाने बंद रहीं थी। क्योंकि केमिस्ट एसोसिएशन से जुड़े लोग नई दवा-नीति-2012 का विरोध कर रहे थे। उनका तर्क था कि नई दवा-नीति लागू होने से उनके मुनाफे पर असर पड़ेगा। लेकिन नई दवा नीति की सच्चाईयों को गौर से देखा जाए तो मामला कुछ और ही नज़र आता है। सरकार ने नई दवा नीति का मसौदा 2011 में ही सार्वजनिक कर दिया था और लोगों से इस मसौदे पर अपना सुझाव आमंत्रित किया था। नई दवा नीति के ड्राफ्ट में बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति को अपनाने की बात की गयी थी। स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य कर रही लगभग सभी गैर सरकारी संस्थाओं व स्वास्थ्य से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इस नीति का विरोध किया था। और अपना विरोध पत्र सरकार को भेजा था।

7 दिसम्बर 2012 को ‘भारत का राजपत्र’ में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (औषध विभाग) द्वारा जारी अधिसूचना को यदि गौर से पढ़ा जाए तो स्पष्ट हो जायेगा कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति-2012 (एनपीपीपी-2012) को बनाते समय जनहित को पूरी तरह से नकार दिया गया है।

नई दवा-नीति जिसके अंतर्गत डीपीसीओ-2013 लागू है, मुख्यतः तीन सिद्धांतों के अंतर्गत तैयार हुई है। पहला औषधियों की आवश्यकता का सिद्धांत है, जिसके पक्ष में सरकारी तर्क है कि इस सिद्धांत के आधार पर ही सरकार ने ज़रूरी दवाइयों की नई सूची जारी की है और इन दवाइयों से देश की आबादी की प्राथमिक स्वास्थ्य ज़रूरतों की पूर्ति होती है। वहीं सरकार के इस तर्क का विरोध करते हुए पिपल्स साइंस मुवमेंट व पिपल्स हेल्थ मुवमेंट से जुड़े अनंत फडके ‘योजना’ (अप्रैल-2014) में लिखते हैं कि, ‘सरकार ने राष्ट्रीय जरूरी दवा सूची (एनईएमएल) जारी करते हुए डब्लयू.एच.ओ द्वारा जारी जरूरी दवा सूची को नजरअंदाज किया है। वे आगे लिखते हैं कि डीपीसीओ-2013 ने सर्वोच्च न्यायाल के उस पत्र की भी अवहेलना की है, जिसमें कोर्ट ने एम.डी.आर.टी.वी की दवा (साइक्लोस्रीन, इथियोनामाइड, काना माइसिन, पारा एमिनोसालीसाईलिक एसिड, इन दवाइयों का अनुमानित मासिक खर्च 8340 रूपया है), एंटी फालसिपरम मलेरियल दवा (अर्टीमीदर, लुमेफैनट्रिन) एवं एंटी अनिमिया दवा (फेरस सल्फेट प्लस फॉलिक एसिड) को शामिल करने के लिए कहा था।’ दवा बाजार पर पैनी नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय जरूरी दवा सूची तैयार करते समय कई मानको को नजरअंदाज किया गया है। एक ही केमिकल क्लास की कुछ दवाइयों को शामिल किया गया है तो कुछ को छोड़ दिया गया है।

दूसरा सिद्धांत है केवल फार्मुलेशनों के मूल्यों का नियंत्रण। इसके तहत सरकार इस मसौदे में लिखती है- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति-2012 में उल्लेखित दवाइयों का विनियमन केवल फार्मूलेशन के मूल्यों के विनियमन के आधार पर किया जायेगा। सरकार ने मसौदे के पैरा 3.2 (iii)  में तर्क दिया है- ‘बल्क औषधि और फार्मूलेशन दोनों के मूल्य निर्धारण का कार्य बहुत जटिल हो जाता है तथा उसमें बहुत समय लगता जो अंतिम उत्पाद अर्थात् फार्मूलेशन (इसके बल्क घटकों से भिन्न बल्क औषधि से निर्मित) के मूल्य से वास्तव में दुष्प्रभावित होता है।’ इस सिद्धांत के पक्ष में पैरा 3.2(v) में सरकार अपनी बात रखते हुए आगे लिखती है-‘चूकि बल्क औषधि विनिर्माता को नियत मूल्य पर बेचनी होती है इसलिए निर्माता सदैव संभावित नए क्रेता के स्थान पर मौजूदा क्रेता को वरीयता देता है। इससे मूल्य नियंत्रण क्षेत्र में नई कंपनियों और फार्मूलेशनों का उदय होता है और यह प्रक्रिया स्वभाविक रूप से प्रतिस्पर्धा के विरुद्ध होती है और इसके कारण उपभोक्ता भी लाभान्वित नहीं होता।’

डीपीसीओ-2013 के अंतर्गत जिन 348 दवाइयों का मूल्य निर्धारण की जिम्मेदारी एन.पी.पी.ए (नेशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइसिंग ऑथोरिटी) को है, उसमें 333 सिंगल इन्ग्रिडेंट व 15 फिक्स डोज कंबीनेशन (एफडीसी) शामिल है। केवल फार्म्यूलेशनों को मूल्य नियंत्रण में लाने की इस नीति का विरोध करते हुए 1980 से सस्ती जेनरिक दवाइयां उपलब्ध कराने वाली संस्था लोकॉस्ट के प्रबंधक एस. श्रीनिवासन अपने लेख में लिखते हैं कि, ‘ऐसे सैकड़ों एफडीसी हैं जिनमें दो या दो से ज्यादा दवाइयों को मिलाया जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत में ज्यादातर सिंगल इंनग्रिडेंट वाली दवाइयों की बिक्री एफडीसी से बहुत कम है। उदाहरण स्वरूप पारासेटामल 500 एम.जी. के टैबलेट को लिया जा सकता है। 1 प्रतिशत से ज्यादा बाजार शेयर वाले 13 ब्रांड की कुल ब्रिक्री 128 करोड़ वार्षिक है। प्राइस कंट्रोल के बाद 13 में से 9 ब्रांड के 105 करोड़ रूपये की ब्रिक्री प्रभावित होगी। वहीं दूसरी तरफ पारासेटामल के साथ दूसरी दवाइयों को मिलाकर बनने वाले डोजेज की ब्रिक्री 2571 करोड़ वार्षिक है। कहने का मतलब यह है कि पारासेटामल से युक्त दूसरी दवाइयों की ब्रिक्री प्राइस कंट्रोल में नहीं है। आंकड़ों की बात की जाए तो 2571 करोड़ रूपये के सामने केवल पारासेटामल की ब्रिक्री 105 करोड़ यानी महज 4 फीसदी है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार द्वारा केवल फार्म्यूलेशन को प्राइस कंट्रोल करने की नीति जनहितकारी नहीं है।’

अब बात करते हैं कि तीसरे सिद्धांत अर्थात् बाजार आधारित मूल्य निर्धारण की। इस सिद्धांत को लेकर सबसे ज्यादा विवाद है। मसौदे के पैरा ( 3.3 ) में लिखा है- ‘राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति, 2012 में औषधियों के मूल्यों का विनियमन बाजार आधारित (एमबीपी) के जरिए फार्मूलेशनों के मूल्यों के विनियमन के आधार पर होगा।’ इसके तर्क में पैरा (3.3(i)) में सरकार की शब्दावली कुछ इस तरह से है- ‘लागत आधारित मूल्य नियंत्रण के अधीन औषधियों के मूल्य की गणना हर वर्ष विस्तार से की जानी होती है, जिसमें विभिन्न प्रकार के जटिल आंकड़ों की आवश्यकता होती है। इसके लिए निर्माताओं (दवा) से अपेक्षा की जाती है कि वे अत्यधिक विस्तृत तरीके से अपने मूल्य निर्धारण आंकड़े दें, जिससे अनुचित हस्तक्षेप होता है और अलग-अलग निर्माताओं द्वारा इसका विरोध भी किया जाता है, परिणामतः जोड़-तोड़ की आशंका होती है और आधार लागत संबंधित आंकड़ों को देने में विलंब होता है। अलग-अलग निर्माताओं द्वारा दिए गए आंकड़ों की समय पर तथा पर्याप्त ढ़ंग से उचित जांच करना भी कठिन हो जाता है। तदनुसार उत्पादन के लिए प्रयुक्त प्रौद्योगिकियों के आधार पर उत्पादन लागत के संदर्भ में आंकड़ों में भिन्नता हो सकती है।’ सरकार अपनी बात को और मजबूती प्रदान करते हुए पैरा ( 3.3 (iv) ) में कहती है- ‘भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः बाजार संचालित है, विशेष रूप से निर्मित उत्पादों के मूल्य निर्धारण के क्षेत्र में मूल्यों का निर्धारण बाजार स्थितियों तथा बाजार ताकतों द्वारा होता है। निर्देशित मूल्य केवल कुछेक क्षेत्रों में मौजूद है, जैसे पेट्रोलियम उत्पादों का मूल्य निर्धारण और अनाज का क्रय मूल्य लेकिन यह सरकार द्वारा प्रदत्त सब्सिडी प्रणाली से पूर्णतः जुड़े हैं।’

नई दवा नीति-2012 को सबसे ज्यादा इसी बिन्दु पर आलोचना का शिकार होना पड़ा है। दवा जैसी जीवन के अधिकार से जुड़ी चीज को सरकार ने बाजार के हवाले कर दिया। इस बात को लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में बहुत आक्रोश है। सरकार को नई दवा नीति के ड्राफ्ट पर सुझाव भेजने वालों में से ज्यादातर लोगों ने लागत आधारित मूल्य निर्धारण (सीबीपी) की जगह बाजार आधारित मूल्य निर्धारण (एमबीपी) को अपनाये जाने का कड़े शब्दों में विरोध किया था। ऑल इंडिया केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन ( एआईसीडीएफ ) ने 30 नवंबर-2011 को सरकार को लिखे अपने सुझाव पत्र में लिखा था कि, यदि बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति लागू की जाती है तो यह उपभोक्ताओं पर थोपने जैसा होगा। एआईसीडीएफ के अध्यक्ष कैलाश गुप्ता व महासचिव ए. एन मोहन द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में सरकार की इस आशंका को निर्मूल बताया गया कि सीबीपी अपनाने से कंपनियां जरूरी दवाइयां बनाना बंद कर देती हैं।

इसी तरह ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (एआईडीएएन), जिसके जनहित याचिका पर 2 मई 2003 को सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को कहा था जरूरी दवाइयों के मूल्य को नियंत्रण में लाया जाए। इस संगठन ने भी 29 नवंबर 2011 को भेजे अपने सुझाव पत्र में बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति को न अपनाने का उदाहरण सहित सुझाव दिया था। एआईडीएएन का कहना है कि, जिस तरह से सरकार बिजली का मूल्य उत्पादन खर्च के आधार पर तय करती है, उसी तरह उसे दवाइयों के मूल्य का निर्धारण भी करना चाहिए। एआईडीएएन ने ड्राफ्ट के पैरा 4.7 में दवा मूल्य निर्धारण के लिए जिस वैप (वेट एवरेज प्राइसिंग) प्रणाली की बात की गयी है, जिसके तहत एक प्रतिशत शेयर वाली तीन दवा कंपनियों द्वारा निर्धारित दवा-मूल्य के औसत को राष्ट्रीय मूल्य माना गया था, का भी विरोध किया था। परिणाम स्वरूप फाइनल ड्राफ्ट में थोड़ा सा संसोधन कर के यह जोड़ दिया गया कि टॉप तीन ब्रांड की जगह पर एक प्रतिशत शेयरधारी दवा कंपनी के औसत मूल्य को राष्ट्रीय दवा मूल्य माना जायेगा।

इसी तरह 7.5 लाख सदस्यों वाले ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (एआईबीसीडी) ने अपने सुझाव पत्र में एम.बी.पी का विरोध किया था। इस बावत एआईबीसीडी के चेयरमैन जे.एस शिंदे का कहना है कि, ‘हमलोगों ने उस समय भी एमबीपी का विरोध किया था, आज भी कर रहे हैं।’ श्री शिंदे आगे कहते हैं कि, ‘ हमारी बात रसायन व उर्वक मंत्री अनंत कुमार से हुई है। उन्होंने हमसे इस दिशा में सुझाव मांगा है। हम नए सिरे से सुझाव-पत्र ड्राफ्ट कर रहे हैं। हम सरकार से यह भी मांग करते हैं कि वह ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के उस प्रावधान को हटाए, जिसके तहत दवा दुकानदार डॉक्टर के लिखे दवा का सब्टीच्यूट (विकल्प) नहीं दे सकता है। यदि यह प्रावधान हट जाता है तो हम ग्राहकों को बाजार में उपलब्ध सस्ती दवाइयां देने के लिए स्वतंत्र हो जायेंगे। हमें उम्मीद है कि नई सरकार फार्मा नीति को जनहितकारी बनायेंगी।’

इसी तरह भारतीय ट्रेड यूनियन केन्द्र, दिल्ली डायबिटिज रिसर्च सेंटर, जन स्वास्थ्य अभियान सहित कई संगठनों ने एमबीपी का विरोध किया था। भारतीय ट्रेड यूनियन केन्द्र से जुड़े सीपीआई (एम) नेता व सांसद तपन सेन का कहना है कि, ‘हम एमबीपी का शुरू से विरोध कर रहे हैं। जब दवा के मूल्य का निर्धारण बाजार ही करेगा तो फिर डीपीसीओ की जरूरत ही क्या है!’ इसी तरह राजस्थान में जेनरिक दवाइयों के प्रचार-प्रसार में अगुवा रहे आइएएस अधिकारी डॉ. समित शर्मा कहते हैं कि, ‘देश को सस्ती दवाइयों की जरूरत है। जब राजस्थान सरकार सस्ती दवाइयां उपलब्ध करा सकती है तो बाकी सरकारें भी ऐसा कर सकती हैं।’

उपरोक्त विरोधों के बावजूद ऐसा नहीं है कि एमबीपी के समर्थक नहीं है। फेडेरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने सरकार की नई दवा नीति के ड्राफ्ट का खुलकर समर्थन किया था। फिक्की ने नई दवा नीति का समर्थन करते हुए कहा था कि, ‘हम नई दवा नीति-2012 में प्रस्तावित एम.बी.पी का स्वागत करते हैं। अब 70 प्रतिशत दवाइयां प्राइस कंट्रोल में आयेंगी जो कि पहले 20 प्रतिशत थी। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कोई भी दवा उत्पादक कंपनी ज्यादा मुनाफा नहीं कमा पायेगी।’ हालांकि फिक्की ने यह भी आशंका जताई थी कि प्राइस कंट्रोल से जरूरी दवाइयों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। फिक्की मूल रूप से प्राइस कंट्रोल को समर्थन नहीं करता। फिक्की के सुर में सुर मिलाते हुए ऑर्गेनाइजेशन ऑफ फार्मास्यूटिकल्स प्रोड्यूसर ऑफ इंडिया, पार्टनरशीप ऑफ सेफ मेडिसिन इंडिया ने एमबीपी का समर्थन किया था। कुछ व्यक्तिगत सुझाव पत्रों में भी एमबीपी को समर्थन दिया गया था लेकिन ये पत्र विश्वसनीय नहीं माने जा सकते क्योंकि इन पत्रों में सुझाव भेजने वाले का केवल नाम लिखा है, उनका संपर्क सूत्र नहीं लिखा है। इससे इस बात की आशंका प्रबल होती है कि दवा कंपनियों ने ही अपनी बात को रखवाने के लिए फेक आईडी से सुझाव पत्र प्रेषित करवाई हो। यह जाँच का विषय हो सकता है!

उपरोक्त चर्चा से एक बात यह भी स्पष्ट हो रही है कि सरकार ने नई दवा नीति को लागू करने में जनता के सुझाओं को नजअंदाज किया है। जब सरकार को सुझाव मानना ही नहीं था तो सुझाव मंगाने की जरूरत  ही क्या थी!

फिक्की भले ही कहे कि डीपीसीओ-2013 से 70 प्रतिशत दवाइयों के मूल्य नियंत्रण में आ जायेंगे लेकिन दूसरी तरफ फिक्की की बात को झूठलाते हुए खुद भारत सरकार ने नवंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय को दिए एक एफीडेविट में स्वीकार किया है कि कुल घरेलु दवा बाजार (71246 करोड़) का महज 18 प्रतिशत दवाइयां ही मूल्य नियंत्रण के दायरे में आयी हैं। इसका मतलब यह हुआ कि डीपीसीओ-2013 से 82 प्रतिशत दवाइयां बाहर हैं। इसी एफेडेविट में यह भी कहा गया है कि डीपीसीओ-2013 के दायरे में 82 फीसद एंटीबायोटिक्स, 86 फीसद एंटीमलेरियल्स, 81 फीसद एंटी टीवी, 99 प्रतिशत ब्लड रिलेटेड, 71 फीसद कार्डिएक, 100 हैप्टोप्रोटैक्टिव्स, 71 प्रतिशत एचआईवी से संबंधित, 90 फीसद दर्द निवारक और 99 प्रतिशत विटामिन्स व मिनरल्स नहीं आते हैं। एनपीपीए के चेयरमैन इनजेती श्रीनिवास ने 2 जुलाई, 2014 को दिए संदेश में जो आंकड़ा दिया है वह तो और भी चौंकाने वाला है। उनके अनुसार जून 2013-मई 2014 तक भारत का घरेलु दवा बाजार 82 हजार करोड़ रूपये का हो गया है और डीपीसीओ-2013 महज 16 प्रतिशत दवाइयों को ही प्रत्यक्ष रूप से कवर कर रहा है।

नई दवा नीति का सच अब आप सब के सामने है। इसे जानने के बाद सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर सवालिया निशान लगना जाहिर सी बात है। 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2011 तक देश में 1 लाख 76 हजार 8 सौ 20 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (ब्लॉक स्तर), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप-केंद्र स्थापित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त देश में 11 हजार 4 सौ 93 सरकारी अस्पताल हैं और 27 हजार 3 सौ 39 आयुष केंद्र। देश में (आधुनिक प्रणाली के) 9 लाख 22 हजार 1 सौ 77 डॉक्टर हैं। नर्सों की संख्या 18 लाख 94 हजार 9 सौ 68 बताई गई है। इसके बावजूद केवल मुंबई में पिछले 6 वर्षों में टी.वी से 46606 लोगों की जान गयी है। अर्थात् देश की आर्थिक राजधानी में केवल टीवी से प्रत्येक दिन 18 लोग अपना दम तोड़ रहे हैं। बिहार के मुज्जफरपुर, यूपी के गोरखपुर क्षेत्र व पश्चिम बंगाल के उत्तरी क्षेत्रों में जापानी बुखार से लगातार बच्चों की मौत हो रही है। जुलाई-2014 के दूसरे सप्ताह में त्रिपुरा में मलेरिया से मरने वालों की संख्या 70 से ज्यादा हो गयी है और 30 हजार से ज्यादा लोग मलेरिया की चपेट में हैं।

स्वास्थ्य के लिहाज से इतनी विकट परिस्थितियों से जूझ रहे भारत के लिए नई एन.डी.ए सरकार से लोगों की उम्मीदे बढ़ गयी है। वित्तीय वर्ष 2014-15 के स्वास्थ्य मद में नई सरकार ने 35163 करोड़ रूपये आवंटित किए हैं। जिस देश का घरेलु दवा बाजार लगभग 1,00000 करोड़ रूपये का हो वहां पर पूरे देश के स्वास्थ्य बजट की राशि बहुत बौना दिख रही है। देश की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था के लिहाज से इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है।

 

डीपीसीओ-2013 लागू होने के बाद

वर्तमान में दवाइयों का मूल्य निर्धारण के लिए डीपीसीओ-2013 लागू किया जा चुका है। राष्ट्रीय जरूरी दवा सूची के 348 दवाइयों का मूल्य निर्धारण की जिम्मेदारी का निर्वहन एन.पी.पी.ए कर रहा है। एक उदाहरण के साथ मैं बाजार आधारित दवा मूल्य निर्धारण के साइड इफेक्ट को बताता हूं।

उदाहरण-1

अबोट कंपनी की गार्डेनल नामक टैबलेट बनाती है…दवा मार्केट में इसका शेयर 98.2 प्रतिशत है। यह कंपनी फेनोबारबिटोन नामक मूल सॉल्ट को गारडेनल-60 एम.जी के ब्रान्ड नेम से 1.94 रुपये में एक टैबलेट बेचती है। इसी सॉल्ट को मेडो फार्मा इमगार्ड-60 के नाम से 2.15 रुपये प्रति टैबलेट के हिसाब से बेचती है, जिसका शेयर 1.01 प्रतिशत है। इनटास फार्मा phenobarb-60 के नाम से इसे प्रति टैबलेट 0.56 रुपये में बेच रही है, लेकिन उसका बाजार शेयर 0.94 प्रतिशत है, समर्थ फार्मा fenobarb-60 के नाम से इस दवा को प्रति टैबलेट 0.61 रुपये में बेच रही है। नई दवा नीति के हिसाब से यदि इस साल्ट का राष्ट्रीय मूल्य निकालना हो तो एक प्रतिशत अथवा इससे ज्यादा शेयरधारी कंपनी द्वारा तय एम.आर.पी का औसत निकाला जायेगा। इस फार्मुले से एबोट फार्मा व मेडो फार्मा जिनका शेयर एक प्रतिशत से ज्यादा है, द्वारा तय की गयी एम.आर.पी का औसत ही राष्ट्रीय एम.आर.पी होगी। अर्थात् 1.94+2.15/2=2.5। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि दवाइयों के मूल्य निर्धारण के इस नीति से किस तरह से सस्ती दवाइयां बाजार से बाहर हो जायेंगी।

कोट (हाइलाइट्स)

”हमलोगों ने उस समय भी एमबीपी का विरोध किया था, आज भी कर रहे हैं। हमारी बात रसायन व उर्वरक मंत्री अनंत कुमार से हुई है। उन्होंने हमसे इस दिशा में सुझाव मांगा है। हम नए सिरे से सुझाव-पत्र ड्राफ्ट कर रहे हैं। हमने सरकार से यह भी मांग करते हैं कि वह ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के उस प्रावधान को हटाए, जिसके तहत दवा दुकानदार डॉक्टर के लिखे दवा का सब्टीच्यूट नहीं दे सकता है।” जे. एश शिंदे, चेयरमैन, ए.आई.बी.सी.डी

”हम नई दवा नीति-2012 में प्रस्तावित एम.बी.पी का स्वागत करते हैं। अब 70 प्रतिशत दवाइयां प्राइस कंट्रोल में आयेंगी जो कि पहले 20 प्रतिशत थी। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कोई भी दवा उत्पादक कंपनी ज्यादा मुनाफा नहीं कमा पायेगी।” फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की)

”हम एम.बी.पी का शुरू से विरोध कर रहे हैं। जब दवा के मूल्य का निर्धारण बाजार ही करेगा तो फिर डी.पी.सी.ओ की जरूरत ही क्या है!”

तपन सेन, भारतीय ट्रेड यूनियन से संबद्ध, सीपीआई (एम) नेता व सांसद

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