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स्वस्थ भारत जेनरिक दवाइयों की उपलब्धता को लेकर प्रधानमंत्री को लिखे पत्र को आप यहां पढ़ सकते हैं

Ref. No.PM/Letter/01/OCT/17                                                                                                   Date : 26.102017
 
आदरणीय प्रधानमंत्री,
श्री नरेन्द्र मोदी, भारत सरकार।
सादर प्रणाम!
जनऔषधि केन्द्रों की असफलता के संदर्भ में
उम्मीद करता हूं आप स्वस्थ एवं सानंद होंगे। आपको एक विशेष प्रयोजन के लिए यह पत्र लिख रहा हूं। देश की सेहत को लेकर बहुत चिंतित हूं। भारत को कैसे स्वस्थ बनाया जाए, भारत के लोगों में कैसे स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आए इसके लिए अपने मित्रों के साथ मिलकर हमलोग लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। इस संदर्भ में हाल ही में स्वस्थ बालिका स्वस्थ समाज के संदेश को लेकर 21000 (इक्कीस हजार) किमी की स्वस्थ भारत यात्रा कर के लौटा हूं। देश के 29 राज्यों में लगातार 90 दिन भ्रमण करने के बाद देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की समझ में और वृद्धि हुई है। इस समझ के आधार पर मैं कह पा रहा हूं सरकार द्वारा शुरू की गई जनऔषधि केन्द्र की सफलता संदिग्ध है! इसका वर्तमान स्वरूप अव्यावहारिक है। धरातल पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। इससे आम जन नहीं जुड़ पा रहा है और लाभ भी आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
इसकी मुख्य वजह हमें जो समझ में आ रही है उसे बिंदुवार आपके सामने रख रहा हूं।

  • जेनरिक दवाइयों को लेकर बाजार में भ्रम की स्थिति आज भी पहले जैसी ही है।
  • कोई भी चिकित्सक जेनरिक यानी दवाइयों का साल्ट नेम लिखने के लिए तैयार नहीं है।
  • 20-25 हजार रुपये से कम मासिक वेतन पर ज्यादातर फार्मासिस्ट जनऔषधि केन्द्र पर काम करने के लिए तैयार नहीं हैं।
  • डीपीसीओ-2013 पूरी तरह से बाजार को खुश करने के लिए लागू किया गया है, इसका जनता से कोई सरोकार नहीं है।

 
इन सब के बीच में मेरा अनुभव यह कहता है कि भारत में जनऔषधि केन्द्र की जरूरत ही नहीं है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि वैध-अवैध मिलाकर देश में 7 लाख से अधिक अंग्रेजी दवा दुकाने चल रही हैं। भारत का घरेलु दवा बाजार 90 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया है। ऐसे में अगर कुछ हजार जनऔषधि केन्द्र खुल भी जायेंगे तो कितना फायदा हो जायेगा। क्या सच में इससे समस्या का समाधान हो पायेगा। मेरी समझ में तो बिल्कुल भी नहीं। यहां पर यह भी समझना जरूरी है कि आज के समय में देश में जितनी भी दवाइयां बिक रही हैं उनमें से 90 फीसद या उससे भी ज्यादा दवाइयों की पेटेंट अवधि समाप्त हो चुकी हैं और वे बाजार में जेनरिक हो चुकी हैं। और भारत में जितनी दवा कंपनियां हैं उनके पास अपने पेटेंट वाली कितनी दवाइयां हैं या भारत सरकार के पास अपनी पेटेंटेड दवाइयों की कितनी संख्या है। न के बराबर। इसका मतलब यह हुआ कि भारत में जो ब्रांड के नाम पर दवाइयां बेची जा रही हैं, वो भी जेनरिक ही हैं। फिर उनकी इतनी कीमत क्यों हैं? इसके जवाब में ही महंगी दवाइयों से निजात पाने का समाधान है।
इस संदर्भ में मैं स्वस्थ भारत अभियान एवं स्वस्थ भारत (न्यास) की ओर से एक सुझाव दे रहा हूं। इस पर आप गंभीरता पूर्वक विचार कीजिए। शायद देश में स्वास्थ्य व्यवस्था की तकदीर बदल जाए। मेरे चिंतन के हिसाब से देश में दवा दुकानों की जो वर्तमान चेन है, उसे राष्ट्रीयकृत कर देना चाहिए। अर्थात देश की सभी दवा दुकानों पर सरकार द्वारा अनुमोदित एवं जन-किफायती दवाइयां ही बिक सकेंगी ऐसा कानून अगर आप पास करा लें तो निश्चित रूप से सरकार को जन औषधि केन्द्र चलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
जब देश के सभी दवा दुकाने जनऔषधि ही हो जायेंगी फिर दवा व्यापार में जो लाभालाभ की बीमारी घर कर गई है वो बंद हो जायेगी। इस संदर्भ में एक और बात याद दिलाना चाहता हूं। आपकी सरकार आने के ठीक पहले देश में ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर-1995 की जगह डीपीसीओ-2013 लागू किया गया।
इस ऑर्डर में जनहित को दरकिनार करते हुए शरद पवार जी की अध्यक्षता वाली समिति ने इस ड्राफ्ट को लागू कराया। जन से जितने भी जुड़े लोग थे सबने बाजार आधारित मूल्य निर्धारण नीति के फार्मूले का विरोध किया। क्योंकि 2012 में ही सरकार ने संसद में  यह माना था कि दवा कंपनियां 1100 फीसद तक मुनाफा कमा रही है। ऐसे में उनके मुनाफे को कैप किए बगैर दवा की कीमतों को तय करने का अधिकार एक तरह से उन्हीं को दे दिया गया और कहा गया कि किसी भी दवा को बनाने वाली ऐसी कंपनी जिसके उस दवा का बाजार में 1 फीसद शेयर है, उसके द्वारा तय किए गए मैक्सिमम रिटेल प्राइस को ही राष्ट्रीय एमआरपी मानी जायेगी। और उसी आधार पर नेशनल फार्मास्यूटिक्लस प्राइसिंग ऑथोरिटी दवाइयों के मूल्यों का नियमन करेगी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कंपनियों के लूट को सरकारी जामा पहना दिया गया।
आपकी सरकार आई तो हमें उम्मीद थी कि आप इस कलाबाजारी को समझ पायेंगे और महंगी दवाइयों से गरीब हो रहे भारतीय समाज के दर्द को समझ सकेंगे। लेकिन विगत तीन वर्षों में आप इस कसौटी पर खड़ा नहीं उतर पाएं हैं। मुझे नहीं मालूम कि इन विषयों पर आपको सलाह देने वाले कौन लोग हैं, लेकिन जो भी हैं वो जनता के लोग नहीं है ऐसा मैं कह सकता हूं।
एक और बिंदु पर आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूं। दवा कंपनियों ने पिछले 3 वर्षों में एंटी इंफ्लामेट्री यानी दर्द निवारक दवाइयां, कैल्सियम की गोली, आयरन की गोली एवं कैप्सूल, कफ सीरप पर 100 फीसद से ज्यादा की वृद्धि की है। जिसकी जाँच किए जाने की जरूरत है। सरकार द्वारा स्थापित ड्रग्स इंस्पेक्टरों की टोली लूट को बढावा देने के अलावा और कुछ नहीं कर पाई है।
ऐसे में इस क्षेत्र में जो कुछ नहीं हो पाया है, ऐसा नहीं है कि आप नहीं चाह रहे होंगे कि हो। बल्कि आप तक सही जानकारी नहीं पहुंचने दी गई है। और इस क्षेत्र में जरूरी सुधार करने से आप चूक गए।
मुझे नहीं मालूम है कि यह पत्र आप तक पहुंच पायेगा कि नहीं। या रास्ते में ही इसे उन लोगों तक पहुंचा दिया जायेगा जहां इसे नहीं पहुंचना चाहिए। इसलिए इस पत्र को मैं आपको मेल करने के बाद मीडिया के सामने प्रेषित कर दूंगा ताकि यह बात दबाई न जा सके!
अंत में यही कहूंगा कि हर हाल में भारत के लोगों को सस्ती दवा मिले और लोगों को स्वास्थ्य का अधिकार मिले इसके लिए आपको बड़े स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी सुधार करने पड़ेंगे। इस पत्र के माध्यम से अपनी बात आप तक कितना पहुंचा पाया बता नहीं सकता लेकिन यह बात तो आप भी मानेंगे ही कि महंगी दवाइयों से आज देश गरीब हो रहा है।
देश स्वच्छ हो देश स्वस्थ हो और देश विकसित हो इसी कामना के साथ अपनी बात को फिलहाल विराम देता हूं। आशा है आप मेरे सुझावों पर गंभीरता से विचार करते हुए जनहित में सार्थक कदम उठायेंगे।
जय हिन्द!
स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत
 
सादर
आशुतोष कुमार सिंह
राष्ट्रीय संयोजक, स्वस्थ भारत अभियान
चेयरमैन, स्वस्थ भारत (न्यास)s
 
संपादक-www.swasthbharat.in
संपर्क-9891228151
ईमेल-forhealthyindia@gmail.com
 
 
 
 
 
 
 
 

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