लंबा है स्वास्थ्य का डगर

मन की बात

बुरा हाल...

बुरा हाल…

सिद्धार्थ झा

भारत में एक बड़ी आबादी के पास आज भी स्वास्थ्य-सेवाएं नहीं पहुंच पायी हैं। वैसे कहने को तो हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम भारतीयों के स्वास्थ्य नीम हकीमों या टेलीवीजनी  बाबाओं के भरोसे ही है। दुर्भाग्य है इस व्यवस्था का, हमारा कि आजादी के इतने वर्ष बीत जे का बाद भी सरकार की नज़र में बड़ा भवन बना देना ही अस्पताल बना देने  का पर्याय मान लिया गया है।

जो मित्र देहाती पृष्ठभूमि से आते हैं उन्होंने जरूर गौर किया होगा कि कितने दिन उन भवनों में डॉक्टर बैठते हैं! राम भरोसे गांव के छोटे सरकारी अस्पताल चल रहे हैं। डॉकटर साहब से महीनों दर्शन तक नहीं होता है।

इन अस्पतालों में जो कंपाउंडर अथवा सहायक रहते हैं वे पैरासेटामल, एविल, एल्वेंडाजोल जैसी एक-दो दवाओं को देकर मरीज को चलता कर देते हैं।

हालत तो यह हैं कि जिन चिकित्सकों को गांवें में लोगों का ईलाज करने के लिए भेजा जाता है, वे शहरों में अपना निजी प्रैक्टिस कर रहे होते हैं।

स्थिति यह है कि अगर कोई गंभीर बीमारी से पीड़ित भी है तो उसे अपनी मौत आने तक पता तक नहीं चलता है कि उसे सही मायने में कौन-सी बीमारी हुई है। देर-सबेर किसी मरीज को सद्बुद्धि आ भी जाए तो वो दौड़ता है जिला अस्पताल या फिर एम्स की तरफ।

शहर के नजदीक बसे कस्बों में जितना कचड़ा भर गया है, उससे बीमारियों को फैलने का और मौका मिल रहा है। ऐसे में इस बार का बजट में इन समस्याओं को छूने की कोशिश सरकार ने की है। जब वित्तमंत्री जी ने आर्थिक रूप से कमजोर प्रत्येक परिवार 1 लाख रुपये के स्वस्थ्य बीमा की घोषणा की तो यह सुनकर अच्छा लगा। मुझे लगता है कि अगर इसे सही तरीके से लागू कर दिया जाए तो गरीबों को  बहुत फायदा मिलेगा। इसके पूर्व यूपीए सरकार ने 30 हजार रूपये तक का स्वस्थ्य बीमा शुरू की थी, लेकिन वह निजी अस्पतालों के बड़े पेट का का हिस्सा बन गया।

आज भी जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य योजनाओं को पर भी सरकार को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं, ये स्वीकारने में सरकार विरोधियों को भी हिचक नही होनी चाहिए।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि स्वास्थ्य की दिशा में हमको अभी भी मीलो लंबा सफर तय करना है।

 

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