‘एड्स’ का बाजारशास्त्र !

Ashutosh Kumar Singh For SBA

aidsभारत एक ‘सुख-खोजी’ देश रहा है। भारतीय सांस्कृतिक चेतना का विस्तार सुखानुभूति पर आधारित रही है। सुख की खोज भारतीयों को आध्यात्म से जोड़ता है। जब मन-मस्तिष्क आध्यात्म की सीमा में प्रवेश करता है, तब आप मानवतावादी हो जाते हैं, सही मायने में धार्मिक हो जाते हैं। क्या करें? क्या न करें की सीमा को समझने लगते हैं। हम भारतीयों के इस स्वभाव को आधुनिक बाजार ने बहुत ही सूक्ष्मतापूर्वक समझा है। हमारे शब्दों के माध्यम से ही वह हमें मात देने की जुगत में है। सुख-खोजी भारतीयों को सुख-भोगी बनाने के लिए बड़े पैमाने पर बाजार ने जाल फैलाया है। ये दोनों शब्द प्रथमदृष्टया एक-से ही लगते हैं, इसी भ्रम का फायदा उठा कर बाजार ने सुख को बाजारू बना दिया! सुख को एक वस्तु में तब्दील कर दिया। सुख को एक आकार दे दिया। जब भाव को कोई आकार मिल जाता है तो स्वाभाविक रूप से हमारी इंद्रियां उस आकार के साथ खुद को जोड़ने के लिए चुंबक की तरह दौड़ी चली जाती हैं। इसी स्वभाविकता को बाजार ने अपने विस्तार का सबसे सुगम हथियार बनाया और हम अपने भावों को वस्तुपरक स्वरूप देते गए।

आज चहूंओर बाजार का दबदबा है। उसने हमारे मनोभाव को इस कदर गुलाम बना लिया है कि हम उसके कहे को नाकार नहीं पाते। वह जो कहता है, वहीं जीवन आधार व सुख का मानक हो जाता है!

इसी बाजार ने एक बीमारी दी, जिसको वर्तमान में ‘एड्स’ के नाम से पुकारा जाता है। इसके लिए बाजार ने बहुत ही शातीर तरीके से आपके सुख-खोजी प्रवृति को सुख-भोगी बना  दिया है! आप जैसे-जैसे भोग करते गए, बाजार बढ़ता गया। भोग-बाजार के विस्तार ने पारिवारिक ढांचा को तहस-नहस कर दिया, संबंध व रिश्तों के अनुशासन को बाजार के हवाले कर दिया व जरूरतों को वस्तुवादी बना दिया। और हम खुद भी बाजार के लिए एक वस्तु बन गए!

सुख-खोजी से सुख-भोगी तक के सफर ने मानवीय कंकाल में तब्दील कर दिया। इसी सफर ने आपको ‘एड्स’ नामक वायरस का दोस्त बना दिया। वर्तमान में बीमारियों में सबसे बड़े ब्रांड के रूप में ‘एड्स’ की पहचान है! पहले भोगी बनाकर बाजार ने कमाई की और अब भोग के साइड इफेक्ट को बेचकर बाजार अपना विस्तार पा रहा है। बाजार-विस्तार को सूक्ष्मता से निरिक्षण करने पर मालूम चलता है कि बाजार ने हमें बिमारू किस तरह से बना दिया है।

भारत में ‘एड्स’ का पहला मामला सन् 1986 में पाया/लाया गया था। यह वह दौर था, जब भारत के दरवाजे बाजार के लिए खुलने वाले थे। वैश्विक शक्ति एक ध्रुव्रीय होने की कगार पर पहुंच चुकी थी। हुआ भी यहीं, अगले पांच सालों में सोवियत संघ का पतन हुआ और बाजार-विस्तार की गति और तीव्र हुई। भारत में उदारीकरण का वायरस तेजी से विस्तार पाया और सुख-खोजी भारतीयों को सुख-भोगी बनाने का एक बड़ा प्लेटफार्म मिल गया।

एड्स का बाजार भारत में कितना बड़ा हो गया है इसका अदांजा इससे लगाया सहज लगाया जा सकता है कि एड्स नियंत्रण विभाग, भारत सरकार ने 2013-14 के दौरान 15 राज्यों में 5.17 लाख फूटकर विपरण केन्द्रों से 56.45 करोड़ कंडोम को बेचा है। एड्स नियंत्रण विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी 2013-14 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि 20.89 लाख लोग एड्स से प्रभावित हैं।

सवा अरब आबादी वाले देश में जिस बीमारी से तकरीबन 21 लाख लोग प्रभावित है, उसे रोकने के लिए नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम (एनएसीपी) तृतीय चरण (2007-12) के दौरान विभिन्न बजटीय बजटीय स्रोतों के माध्यम से 6,237.48 करोड़ रूपये का व्यय हुआ था और अब एनएसीपी के चौथे चरण के लिए 13,415 करोड़ रूपये का बजट अनुमोदित हुआ है, जिसमें सरकारी बजटीय सहयोग, विश्व बैंक बाह्य सहायता प्राप्त सहयोग और वैश्विक निधि व अन्य विकास साझेदारों के अतिरिक्त बजटीय सहयोग शामिल है।

सच्चाई यह है कि विगत् 28 वर्षों में बाजार ने पहले भोगी बनाया फिर रोगी बनाया और दोनों ही स्थिति में खुद को विस्तारित करने में सफल रहा!

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